Friday, October 25, 2024

ये सरकारी कीड़ा क्या है क्या आप जानते हो ?

 सरकारी दफ्तरों में अक्सर "सरकारी कीड़ा" एक व्यंग्यात्मक शब्द के रूप में इस्तेमाल होता है, जिसका मतलब उन कर्मचारियों से होता है जो छोटी-छोटी बातें पकड़कर नियमों और प्रक्रियाओं में उलझे रहते हैं, काम करने की बजाय फाइलों और कागजों में फंसे रहते हैं। ये लोग हर काम में देरी और लालफीताशाही के लिए जाने जाते हैं। 


इसके अलावा, यह शब्द उन लोगों के लिए भी प्रयोग होता है जो सरकारी नियम-कानूनों के नाम पर हर छोटी बात पर अड़चन डालते हैं और वास्तविक कार्य के बजाय दस्तावेजी प्रक्रिया में समय बर्बाद करते हैं।

Thursday, October 24, 2024

ईजीपी (EGP), जिसे "इकोलॉजी-इकॉनॉमी ग्रोथ प्लेटफ़ॉर्म" या पर्यावरण-आधारित आर्थिक वृद्धि कहा जा सकता है, उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण अवधारणा हो सकती है।

उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन और पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए, ईजीपी की नींव कुछ ऐसे कदमों पर आधारित होनी चाहिए जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए आर्थिक विकास को बढ़ावा दें।


### उत्तराखंड में EGP (इकोलॉजी-इकॉनॉमी ग्रोथ प्लेटफ़ॉर्म) के मुख्य स्तंभ


#### 1. **ग्रीन और सतत कृषि**

   - **जैविक खेती:** जैविक और टिकाऊ कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देना, जो न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि किसानों के लिए भी अधिक लाभकारी हो सकती है। उत्तराखंड की जैविक उपज (जैसे कि मंडुवा, झंगोरा, आलू, सेब) को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ावा देना।

   - **मूल्य वर्धित उत्पाद:** स्थानीय कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण और पैकेजिंग, जैसे हर्बल चाय, मसाले, और दालें, ताकि किसानों को बेहतर लाभ मिल सके और रोजगार के अवसर पैदा हों।


#### 2. **पारिस्थितिकी-पर्यटन (Eco-Tourism)**

   - **पर्यावरणीय पर्यटन:** उत्तराखंड के सुंदर प्राकृतिक दृश्य, वन्यजीव अभ्यारण्य और धार्मिक स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। ईजीपी के तहत, इस क्षेत्र में ऐसे पर्यटन मॉडल विकसित किए जा सकते हैं जो पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव डालते हैं, जैसे ट्रैकिंग, वन्यजीव सफारी, और सांस्कृतिक पर्यटन।

   - **स्थानीय समुदायों का जुड़ाव:** स्थानीय समुदायों को पर्यटन से जोड़कर उन्हें स्थायी आजीविका के अवसर प्रदान करना, जैसे होमस्टे, गाइड सेवाएँ, और स्थानीय हस्तशिल्प विक्रय।


#### 3. **नवीकरणीय ऊर्जा**

   - **सौर और पवन ऊर्जा:** राज्य की बिजली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वच्छ और हरित ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देना। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में सौर ऊर्जा के बड़े अवसर हैं जिन्हें प्रोत्साहित किया जा सकता है।

   - **छोटे और मिनी हाइड्रो प्रोजेक्ट्स:** छोटे जल विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन, जो बड़े बांधों की तुलना में कम पर्यावरणीय प्रभाव डालते हैं।


#### 4. **जैव विविधता और वनों का संरक्षण**

   - **सामुदायिक वन प्रबंधन:** स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण के कार्यों में शामिल करना और उन्हें बांस शिल्प, मधुमक्खी पालन, औषधीय पौधों की खेती जैसे व्यवसायों के माध्यम से आर्थिक रूप से मजबूत बनाना।

   - **जैव विविधता संरक्षण:** वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों के साथ-साथ जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए पुनर्वनीकरण प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करना।


#### 5. **पानी के संसाधनों का संरक्षण**

   - **जल संचयन और संरक्षण:** जल संचयन, ड्रिप सिंचाई, और अन्य जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देना, जिससे कृषि और पेयजल के लिए पानी की उपलब्धता बनी रहे।

   - **नदियों और जलस्रोतों का संरक्षण:** जल प्रदूषण को रोकने के लिए प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन योजनाओं को लागू करना।


#### 6. **शिक्षा और स्थानीय कौशल का विकास**

   - **कौशल विकास कार्यक्रम:** स्थानीय युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम, जो उन्हें सतत कृषि, पर्यटन, हस्तशिल्प, और नवीकरणीय ऊर्जा में रोजगार के अवसर प्रदान कर सके।

   - **जागरूकता अभियान:** सतत विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चलाना, ताकि लोग जिम्मेदार नागरिक बन सकें।


#### 7. **स्थानीय उद्योग और हस्तशिल्प को बढ़ावा देना**

   - **पारंपरिक शिल्प और कला:** पारंपरिक हस्तशिल्प जैसे बुनाई, लकड़ी के शिल्प, और अन्य स्थानीय कलाओं का पुनरुद्धार, जो न केवल आर्थिक विकास में सहायक होंगे बल्कि सांस्कृतिक धरोहर को भी संरक्षित करेंगे।

   - **लघु और कुटीर उद्योग:** स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योगों की स्थापना करना, जैसे जैविक खाद्य प्रसंस्करण, जड़ी-बूटी उत्पाद, और स्थानीय वस्त्र उद्योग।


### निष्कर्ष

ईजीपी की अवधारणा उत्तराखंड में सतत विकास का एक प्रभावी साधन बन सकती है, जो पर्यावरण और आर्थिक विकास के बीच एक सही संतुलन स्थापित कर सके। इस मॉडल के तहत, न केवल प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा होगी, बल्कि लोगों की आजीविका के लिए स्थायी और लाभकारी अवसर भी पैदा होंगे। उत्तराखंड के अनोखे भौगोलिक और सांस्कृतिक धरोहर को देखते हुए, इस तरह का विकास मॉडल राज्य की समग्र प्रगति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था उत्तराखंड के विकास के लिए कदम

 उत्तराखंड के विकास के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो पर्यावरणीय स्थिरता और आर्थिक वृद्धि दोनों को एकीकृत करे। इस दृष्टिकोण से यह सुनिश्चित होता है कि क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सके और साथ ही स्थानीय जनसंख्या के लिए आर्थिक अवसर भी बढ़ें। यहाँ कुछ प्रमुख "कदम" दिए गए हैं जो उत्तराखंड के विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं:


### 1. **सतत पर्यटन**

   - **ईको-टूरिज्म:** पर्यावरणीय रूप से स्थिर प्रथाओं के साथ लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर ईको-टूरिज्म को बढ़ावा दें। ट्रैकिंग, वन्यजीव पर्यटन और सांस्कृतिक पर्यटन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दें जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं।

   - **एडवेंचर टूरिज्म:** हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता का उपयोग करते हुए, रिवर राफ्टिंग, पर्वतारोहण और कैंपिंग जैसी साहसिक पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा दें। पर्यावरणीय दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करें ताकि पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान न हो।


### 2. **कृषि पारिस्थितिकी और जैविक खेती**

   - **जैविक कृषि:** जैविक खेती को बढ़ावा दें, जो मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, जल संसाधनों की सुरक्षा करती है, और उच्च गुणवत्ता वाली फसलें पैदा करती है। इसमें पारंपरिक फसलें जैसे बाजरा, औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियाँ शामिल हो सकती हैं।

   - **एग्री-टूरिज्म:** कृषि को पर्यटन के साथ जोड़ें, जिससे पर्यटक ग्रामीण जीवन, कृषि पद्धतियों और स्थानीय भोजन का अनुभव कर सकें, और इससे किसानों की आय में वृद्धि हो।


### 3. **नवीकरणीय ऊर्जा**

   - **हाइड्रोपावर में सावधानी:** उत्तराखंड में जलविद्युत की बड़ी संभावनाएं हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर परियोजनाओं की योजना पर्यावरणीय प्रभावों से बचने के लिए सावधानीपूर्वक बनाई जानी चाहिए।

   - **सौर और पवन ऊर्जा:** विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा समाधान, विशेष रूप से सौर और पवन ऊर्जा में निवेश करें, ताकि ऊर्जा की आवश्यकताओं को पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना पूरा किया जा सके।


### 4. **वन संरक्षण और जैव विविधता**

   - **पुनर्वनीकरण और वृक्षारोपण:** बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियानों को लागू करें, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जो वनस्पति रहित हो गए हैं, ताकि वन आवरण को बहाल किया जा सके, जलग्रहण क्षेत्रों की रक्षा हो सके, और जैव विविधता को बढ़ावा मिले।

   - **सामुदायिक-प्रबंधित वन:** स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण प्रयासों में शामिल करें, जिससे उन्हें बांस शिल्प, शहद उत्पादन और औषधीय पौधों के संग्रह जैसी टिकाऊ आजीविका मिले।


### 5. **जल संसाधन प्रबंधन**

   - **नदी संरक्षण:** उचित अपशिष्ट प्रबंधन, सीवेज उपचार और कृषि से रसायनों के कम उपयोग द्वारा नदियों और धाराओं को प्रदूषण से बचाएं।

   - **वर्षा जल संचयन:** भूजल को पुनर्भरण करने और कृषि व घरेलू उपयोग के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वर्षा जल संचयन प्रणालियों का प्रोत्साहन दें।


### 6. **स्थानीय हस्तशिल्प और लघु उद्योगों को बढ़ावा**

   - **पारंपरिक शिल्प:** स्थानीय हस्तशिल्प, बुनाई और अन्य पारंपरिक उद्योगों को बढ़ावा दें। इससे सांस्कृतिक धरोहर संरक्षित होगी और रोजगार के अवसर मिलेंगे।

   - **लघु खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ:** स्थानीय उत्पादों जैसे फलों, जड़ी-बूटियों और अनाज के लिए लघु प्रसंस्करण इकाइयों का विकास करें, जिन्हें जैविक और स्वस्थ उत्पाद के रूप में बाजार में बेचा जा सके।


### 7. **आपदा तैयारी और लचीलापन**

   - **आपदा प्रबंधन योजना:** क्षेत्र की प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूस्खलन और बाढ़ की प्रवृत्ति को देखते हुए मजबूत बुनियादी ढांचा योजना और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली जरूरी है।

   - **जलवायु-लचीली कृषि:** ऐसी खेती की तकनीकों को समर्थन दें जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील हों, जैसे कि फसल विविधीकरण, मृदा संरक्षण और जल-बचत सिंचाई प्रणाली।


### 8. **शिक्षा और कौशल विकास**

   - **कौशल विकास कार्यक्रम:** टिकाऊ खेती, ईको-टूरिज्म, नवीकरणीय ऊर्जा और हस्तशिल्प उत्पादन में स्थानीय कौशल को बढ़ावा दें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि स्थानीय लोग विकास परियोजनाओं में सक्रिय रूप से भाग ले सकें और उससे लाभान्वित हो सकें।

   - **जागरूकता कार्यक्रम:** सतत प्रथाओं, संरक्षण और आपदा तैयारी के बारे में जागरूकता बढ़ाएं ताकि विकास के लिए एक सामुदायिक दृष्टिकोण तैयार किया जा सके।


### 9. **पर्यावरणीय विचारों के साथ बुनियादी ढांचा विकास**

   - **सतत सड़क और भवन निर्माण:** बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए पर्यावरण-अनुकूल सामग्री और तकनीकों का उपयोग करें ताकि उनके पारिस्थितिकीय प्रभाव को कम किया जा सके। ऐसी सड़कों पर ध्यान केंद्रित करें जो भूस्खलन और कटाव के प्रति कम संवेदनशील हों।

   - **अपशिष्ट प्रबंधन:** विशेष रूप से पर्यटन क्षेत्रों में, अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को लागू करें ताकि प्रदूषण को रोका जा सके और पर्यावरण की सुरक्षा हो सके।


### निष्कर्ष

उत्तराखंड के लिए सतत विकास का अर्थ है आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संतुलन के बीच सामंजस्य बनाना। ग्रीन टूरिज्म, जैविक कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा और सामुदायिक-आधारित संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करके, राज्य अपने प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान करते हुए समावेशी विकास की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

ecology and economy footsteps for development of uttarakhand

 The development of Uttarakhand requires a balanced approach that integrates both ecological sustainability and economic growth. This approach ensures that the region’s natural resources are preserved while also promoting economic opportunities for the local population. Here are some key "footsteps" or strategies for the development of Uttarakhand:


### 1. **Sustainable Tourism**

   - **Eco-Tourism:** Promote eco-tourism by developing sustainable practices in popular tourist destinations. Encourage activities like trekking, wildlife tours, and cultural tourism that do not harm the environment.

   - **Adventure Tourism:** Leverage the natural landscapes of the Himalayas for adventure tourism, including activities like river rafting, mountaineering, and camping. Ensure strict environmental guidelines to prevent damage to ecosystems.


### 2. **Agro-Ecology and Organic Farming**

   - **Organic Agriculture:** Support organic farming practices, which can improve soil health, protect water resources, and produce high-quality crops. This can include traditional crops like millets, herbs, and medicinal plants.

   - **Agri-Tourism:** Integrate farming with tourism, allowing tourists to experience rural life, farming practices, and local cuisine, which can increase farmers' income.


### 3. **Renewable Energy**

   - **Hydropower with Caution:** While Uttarakhand has significant potential for hydropower, large-scale projects must be planned carefully to avoid adverse environmental impacts like flooding and habitat destruction.

   - **Solar and Wind Energy:** Invest in decentralized renewable energy solutions, particularly solar and wind, to meet energy needs sustainably without harming the environment.


### 4. **Forest Conservation and Biodiversity**

   - **Reforestation and Afforestation:** Implement large-scale tree plantation drives, especially in degraded areas, to restore forest cover, protect watersheds, and enhance biodiversity.

   - **Community-Managed Forests:** Engage local communities in forest management and conservation efforts, providing them with sustainable livelihoods like bamboo crafts, honey production, and medicinal plant collection.


### 5. **Water Resource Management**

   - **River Conservation:** Protect rivers and streams from pollution by ensuring proper waste management, sewage treatment, and reduced chemical runoff from agriculture.

   - **Rainwater Harvesting:** Encourage the use of rainwater harvesting systems to recharge groundwater and ensure water availability for agriculture and households.


### 6. **Promoting Local Handicrafts and Small-Scale Industries**

   - **Traditional Crafts:** Promote local handicrafts, weaving, and other traditional industries. This will help preserve cultural heritage and provide employment opportunities.

   - **Small-Scale Food Processing:** Develop small-scale processing units for local produce like fruits, herbs, and grains, which can be marketed as organic, healthy products.


### 7. **Disaster Preparedness and Resilience**

   - **Disaster Management Plans:** Given the region’s vulnerability to natural disasters like landslides and floods, robust infrastructure planning and early warning systems are essential.

   - **Climate-Resilient Agriculture:** Support farming techniques that are more resilient to climate change, such as crop diversification, soil conservation, and water-saving irrigation systems.


### 8. **Education and Skill Development**

   - **Skill Development Programs:** Enhance local skills in sustainable farming, eco-tourism, renewable energy, and handicraft production. This will ensure that local populations can actively participate in and benefit from development projects.

   - **Awareness Programs:** Raise awareness about sustainable practices, conservation, and disaster preparedness to build a community-oriented approach to development.


### 9. **Infrastructure Development with Environmental Considerations**

   - **Sustainable Road and Building Construction:** Use eco-friendly materials and techniques for infrastructure projects to reduce their ecological footprint. Focus on creating roads that are less prone to landslides and erosion.

   - **Waste Management:** Implement effective waste management systems, particularly in tourist areas, to prevent pollution and protect the environment.


### Conclusion

For Uttarakhand, sustainable development means finding harmony between economic growth and ecological balance. By focusing on green tourism, organic agriculture, renewable energy, and community-based conservation, the state can pave the way for inclusive growth that respects its natural and cultural heritage.

Thursday, October 10, 2024

क्या शराब भारतीय सरकार की नज़र में नशा है

 हां, भारतीय सरकार की नज़र में शराब एक नशा है, लेकिन इसे एक कानूनी रूप से नियंत्रित पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसका मतलब है कि शराब का उत्पादन, बिक्री और उपयोग सरकार द्वारा नियंत्रित और लाइसेंस प्राप्त है, और इसके उपभोग के लिए कानूनी उम्र तय की गई है।

शराब और नशे के संदर्भ में भारतीय सरकार का दृष्टिकोण:

  1. कानूनी स्थिति: भारत में शराब की बिक्री और सेवन वैध है, लेकिन यह राज्य सरकारों के नियमन के तहत आता है। हर राज्य में शराब पर अलग-अलग कानून होते हैं। कुछ राज्यों में शराब पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, जैसे गुजरात, बिहार, मणिपुर, और नागालैंड, जहां शराब का उत्पादन, बिक्री और उपभोग अवैध है।

  2. नियंत्रण और लाइसेंस: शराब की बिक्री के लिए विशेष लाइसेंस की आवश्यकता होती है, और इसे केवल लाइसेंस प्राप्त दुकानों, होटलों, या बार में ही बेचा जा सकता है। शराब का सेवन केवल तय की गई कानूनी उम्र (जो अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकती है, जैसे 18 से 25 वर्ष के बीच) के बाद ही किया जा सकता है।

  3. स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव: भारतीय सरकार शराब को नशा मानती है और इसके अनियंत्रित उपयोग से जुड़े स्वास्थ्य और सामाजिक खतरों को पहचानती है। शराब के अत्यधिक सेवन से स्वास्थ्य समस्याएँ, दुर्घटनाएँ, और सामाजिक समस्याएँ (जैसे घरेलू हिंसा, अपराध) हो सकती हैं। इसलिए, सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियाँ शराब के दुरुपयोग के खतरों के बारे में जागरूकता अभियान भी चलाती हैं।

  4. शराब पर कर (Excise Duty): शराब से सरकार को भारी राजस्व प्राप्त होता है। इसे नियंत्रित करने और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार शराब पर भारी कर लगाती है। इस राजस्व का उपयोग स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों में किया जाता है।

शराब और अन्य नशीले पदार्थों में अंतर:

  • शराब भारत में कानूनी रूप से विनियमित है और इसका उत्पादन और बिक्री सरकार की अनुमति के तहत होती है।
  • अन्य नशीले पदार्थ जैसे हेरोइन, कोकीन, और गांजा का उपयोग, व्यापार, और उत्पादन अवैध है और इन पर सख्त कानून हैं।

इस प्रकार, शराब को एक प्रकार का नशा माना जाता है, लेकिन इसे नियंत्रित तरीके से उपभोग किया जा सकता है, जबकि अन्य नशीली दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध है।

नशीले पदार्थों की अवैध गतिविधि और वैध गतिविधि क्या है ?

 नशीले पदार्थों की अवैध गतिविधियाँ वे हैं जो कानून द्वारा निषिद्ध हैं और समाज के लिए गंभीर खतरों का कारण बनती हैं। इनमें नशीली दवाओं की तस्करी, गैरकानूनी उत्पादन, वितरण, और बिक्री शामिल हैं। इन गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य मुनाफे के लिए दवाओं का अवैध व्यापार करना होता है, जिससे समाज में नशे की लत, अपराध, और हिंसा जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। तस्करी के रास्ते से यह पदार्थ आम तौर पर सीमाओं के पार भेजे जाते हैं और इससे कई देशों में राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी असर पड़ता है।

दूसरी ओर, नशीले पदार्थों की वैध गतिविधियाँ वे हैं जो चिकित्सा, अनुसंधान, और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए की जाती हैं। उदाहरण के लिए, मोर्फिन, कोडीन, और अन्य नियंत्रित दवाएँ अस्पतालों और फार्मेसियों में दर्द प्रबंधन और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। इन्हें सरकार और चिकित्सा नियामक संस्थाओं द्वारा नियंत्रित और लाइसेंस प्राप्त संगठनों द्वारा ही बनाया और वितरित किया जा सकता है। यह पूरी तरह से कानून के दायरे में आता है और इनका उद्देश्य चिकित्सा लाभ प्रदान करना होता है।

अवैध और वैध के बीच का अंतर यह है कि जहां अवैध गतिविधियों का मकसद आर्थिक लाभ और सामाजिक नुकसान होता है, वहीं वैध गतिविधियों का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सा लाभ होता है।

नार्को कोआर्डिनेशन सेंटर (एनकॉर्ड) uttarakhand

 नार्को कोआर्डिनेशन सेंटर (एनकॉर्ड) एक केंद्र सरकार की पहल है, जिसका उद्देश्य नशीली दवाओं के मामलों की प्रभावी जांच, रोकथाम, और नशीले पदार्थों के तस्करों के खिलाफ समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करना है। एनकॉर्ड का गठन गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के अंतर्गत किया गया है। यह विभिन्न राज्यों के पुलिस, नारकोटिक्स विभाग, और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच तालमेल स्थापित करता है, ताकि नशीले पदार्थों की अवैध गतिविधियों को रोका जा सके।

उत्तराखंड में भी एनकॉर्ड की इकाइयाँ सक्रिय हैं, जो राज्य की सीमा से गुजरने वाली नशीली दवाओं के तस्करों पर नजर रखती हैं। उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति, जिसमें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सीमाएं आती हैं, इसे नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र बनाती है। एनकॉर्ड के तहत राज्य में विभिन्न स्तरों पर बैठकें आयोजित की जाती हैं, जहाँ पुलिस, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), और अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय किया जाता है।

एनकॉर्ड के मुख्य कार्यों में शामिल हैं:

  1. तस्करी विरोधी कार्रवाई: नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसियों का समन्वय।
  2. सूचना साझा करना: राज्यों और केंद्र के बीच नशीली दवाओं के मामलों से संबंधित जानकारी का आदान-प्रदान।
  3. सतर्कता बढ़ाना: स्थानीय पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों को नशीले पदार्थों के मामलों में सतर्क और प्रशिक्षित करना।
  4. नियंत्रण और रोकथाम: नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और उसकी तस्करी के खिलाफ कदम उठाना।

उत्तराखंड में एनकॉर्ड का उद्देश्य राज्य के युवाओं को नशीली दवाओं के प्रभाव से बचाना और राज्य में कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाए रखना है।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...