Tuesday, July 1, 2025

मनोविज्ञान और मानव व्यवहार: मन की गहराइयों की यात्रा




मानव जीवन जितना जटिल है, उतना ही जटिल है उसका मनोविज्ञान और व्यवहार। मनुष्य केवल एक भौतिक शरीर नहीं है, बल्कि वह एक सोचने, महसूस करने, सपने देखने और प्रतिक्रिया देने वाली इकाई है। मनोविज्ञान (Psychology) इस गहराई को समझने का विज्ञान है – वह विज्ञान जो यह जानने की कोशिश करता है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा क्यों सोचते हैं; हम जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा क्यों करते हैं।


1. मनोविज्ञान क्या है?

मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ है – "मन का अध्ययन"। यह विज्ञान इस बात का विश्लेषण करता है कि किसी व्यक्ति की सोच, भावना, और क्रिया-प्रतिक्रिया कैसे बनती हैं, कैसे बदलती हैं, और कैसे दूसरों पर असर डालती हैं।


2. मानव व्यवहार के प्रकार

मनुष्य का व्यवहार कई रूपों में सामने आता है:

  • संज्ञानात्मक व्यवहार (Cognitive): सोच, निर्णय लेना, समस्याओं का समाधान।
  • भावनात्मक व्यवहार (Emotional): प्रेम, क्रोध, डर, ईर्ष्या जैसे भाव।
  • सामाजिक व्यवहार (Social): समूह में रहना, दूसरों के साथ तालमेल बनाना।
  • अनुक्रियात्मक व्यवहार (Reactive): किसी घटना पर तत्काल प्रतिक्रिया देना।

3. व्यवहार कैसे बनता है?

व्यवहार कई कारकों से प्रभावित होता है:

  • परिवार और परवरिश – बचपन का वातावरण व्यक्ति के व्यवहार की नींव रखता है।
  • समाज और संस्कृति – समाज के नियम, परंपराएँ और धर्म सोच को प्रभावित करते हैं।
  • अनुभव और स्मृतियाँ – अच्छे-बुरे अनुभव हमारे भविष्य के निर्णयों को आकार देते हैं।
  • अनुवांशिकता और जैविक कारक – हमारे जीन्स और हार्मोन भी व्यवहार में भूमिका निभाते हैं।

4. सामान्य व्यवहारिक समस्याएँ

  • तनाव (Stress) और चिंता (Anxiety)
  • अवसाद (Depression)
  • गुस्सा नियंत्रण की समस्या
  • नकारात्मक सोच और आत्म-संदेह
  • दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता या अकेलापन

5. मानसिक स्वास्थ्य का महत्व

शरीर की तरह मन का स्वास्थ्य भी जरूरी है। अगर मन असंतुलित हो तो व्यक्ति का पूरा जीवन प्रभावित हो सकता है। यह समझना जरूरी है कि:

  • मानसिक समस्याएं आम हैं और इलाज संभव है।
  • काउंसलिंग, ध्यान (Meditation), संवाद और सकारात्मक जीवनशैली इससे राहत दिला सकते हैं।

6. क्या करें? — व्यवहार को समझने और बेहतर बनाने के उपाय

  • स्व-निरीक्षण करें: अपने व्यवहार और प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करें।
  • सकारात्मक सोच विकसित करें: हर स्थिति का उजला पक्ष देखें।
  • दूसरों को समझें: सहानुभूति (Empathy) रखें, आलोचना नहीं।
  • योग, ध्यान, और शांति के अभ्यास करें: ये मानसिक संतुलन को बढ़ाते हैं।
  • जरूरत हो तो मदद लें: मनोवैज्ञानिक सलाह लेने में झिझक न करें।

निष्कर्ष:

मनोविज्ञान हमें यह नहीं सिखाता कि हमें दूसरों को कैसे बदलना है, बल्कि यह बताता है कि हम स्वयं को कैसे बेहतर बना सकते हैं।
मानव व्यवहार एक बहता हुआ जल है – उसे रोका नहीं जा सकता, पर समझा जा सकता है। और जब हम अपने व्यवहार को समझते हैं, तब हम अपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं।


कोई श्रेष्ठ नहीं, कोई हीन नहीं – लेकिन कोई समान भी नहीं है: हर व्यक्ति अद्वितीय है





“कोई भी श्रेष्ठ नहीं है, कोई हीन नहीं है, लेकिन कोई भी समान भी नहीं है। लोग बस अद्वितीय होते हैं, अपूर्व और अतुलनीय। तुम तुम हो, मैं मैं हूँ।”

यह विचार जीवन के गहरे सत्य को उजागर करता है। समाज ने हमेशा हमें तुलनाओं में उलझाया है – कौन बेहतर है, कौन पीछे है, कौन आगे बढ़ रहा है, और कौन पिछड़ रहा है। लेकिन अगर हम थोड़ी देर के लिए इन सभी सामाजिक मापदंडों को एक तरफ रख दें, तो हम देख पाएंगे कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में एक अनोखी दुनिया है।

1. तुलना ही दुःख की जड़ है

हम अपने बच्चों की तुलना अन्य बच्चों से करते हैं, अपनी सफलता को पड़ोसी से मापते हैं, अपनी सुंदरता को फिल्मों के पात्रों से और अपनी जीवनशैली को सोशल मीडिया से। लेकिन यह सब हमें कभी संतोष नहीं देता, क्योंकि हम अपनी मौलिकता को भूलकर किसी और की छाया बनने की कोशिश करते हैं।

2. श्रेष्ठता और हीनता भ्रम है

जब हम कहते हैं कि कोई “श्रेष्ठ” है, तो हम मानते हैं कि किसी और की “कमियां” हैं। लेकिन क्या कला को विज्ञान से तुलना की जा सकती है? क्या कविता को व्यवसाय से मापा जा सकता है? क्या किसी किसान की मेहनत को एक इंजीनियर की नौकरी से तुलनात्मक दृष्टि से देखा जा सकता है? हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ है – क्योंकि वह वही कर रहा है जो उसकी आत्मा से जुड़ा है।

3. समानता भी एक कृत्रिम अवधारणा है

लोकतंत्र और समाज में सभी को समान अधिकार मिलना चाहिए – इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन ‘समानता’ का अर्थ यह नहीं कि हर कोई एक जैसा है। दो लोगों के फिंगरप्रिंट भी नहीं मिलते – तो विचार, भावनाएं, क्षमताएं और व्यक्तित्व कैसे मिल सकते हैं? समानता का ढांचा भी तब असत्य हो जाता है जब हम सभी को एक ही साँचे में ढालने की कोशिश करते हैं।

4. अद्वितीयता: असली पहचान

प्रकृति में कोई दो फूल एक जैसे नहीं होते, कोई दो पेड़ एक जैसे नहीं बढ़ते। वैसे ही हर इंसान की अपनी सोच, अनुभव, उद्देश्य और आत्मा होती है। जब हम खुद को किसी से बेहतर या कमतर मानते हैं, तो हम अपने अंदर की इस अनोखापन को नकार देते हैं।

5. “तुम तुम हो, मैं मैं हूँ” – इसका अर्थ क्या है?

इसका अर्थ यह नहीं कि हम एक-दूसरे से अलग होकर अहंकार में जीएं, बल्कि इसका मतलब है कि हम हर किसी की विशेषता को स्वीकार करें – खुद की भी और दूसरों की भी। न तुलना, न प्रतिस्पर्धा – बस समझदारी, स्वीकृति और आत्म-प्रेम।


निष्कर्ष:

इस जीवन में न कोई बड़ा है, न छोटा – और न ही कोई समान है। हम सभी उस महान रचनाकार की अनोखी कृतियाँ हैं। जब हम दूसरों से तुलना करना छोड़कर खुद को पहचानना शुरू करते हैं, तभी सच्ची शांति, सच्चा विकास और सच्चा प्रेम संभव होता है।

तुम तुम हो, मैं मैं हूँ – और इसी में है जीवन का सौंदर्य।

Sunday, June 29, 2025

**"औकात की जात" – वीडियो और मंच प्रस्तुति गाइड**



### 🎥 **2. वीडियो शूटिंग गाइड**


#### 📍 **लोकेशन सुझाव (सचेत और प्रतीकात्मक):**


* गाँव की चौपाल / गली

* पुरानी दीवारों वाली जगह (जहां जाति के स्लोगन हों)

* किसी स्कूल या पंचायत भवन के सामने


#### 📸 **कैमरा एंगल्स:**


* **ओपनिंग:** फ़िक्स कैमरा, चौपाल की हलचल

* **मुख्य संवाद:** क्लोज़ अप जब पात्र 1 जाति का घमंड दिखाता है

* **कविता:** सीनिक शॉट्स (धीरे-धीरे घेरा बनता है)

* **अंतिम नारा:** ड्रोन या हाई एंगल कैमरा से ऊपर से गोल घेरा दिखाएं


#### 🎼 **बैकग्राउंड म्यूजिक:**


* धीमी मृदंग या ढोलक की थाप (नाटक शैली लाने के लिए)

* अंत में एक तेज़, जोशीला बीट – नारा के साथ तालमेल में


#### 🎭 **कास्टिंग टिप:**


* हर पात्र एक अलग वर्ग से हो: एक महिला, एक बुज़ुर्ग, एक युवा

* सभी पोशाकें साधारण ग्रामीण/आम जन की हो


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### 🎨 **3. पोस्टर / बैनर डिज़ाइन (ऑन स्क्रीन + ऑफलाइन)**


#### 🖼️ मुख्य टेक्स्ट:


> **"जात नहीं, औक़ात देखो!"**

> *एक जनचेतना पर आधारित प्रस्तुति*

> ✊ **उद्घोष: 'औक़ात की जात'**


#### 🎨 पृष्ठभूमि विचार:


* फटी हुई जाति-प्रथा की दीवार

* एक मुट्ठी, जो "जाति" शब्द को तोड़ रही हो

* नीचे Udaen Foundation / लोकमंच का लोगो


*(बताएं, क्या इस पोस्टर को अभी डिज़ाइन करूँ? PNG और PDF दोनों दूँगा)*


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### 📜 **4. टेक्स्ट एंड स्क्रीन स्लाइड (वीडियो एंडिंग)**


```plaintext

"जात पूछने से पहले इंसान देखो,  

हरामियों की कोई जात नहीं होती…  

क्योंकि समाज औकात से चलता है,  

जात से नहीं।"


— प्रस्तुतकर्ता: [आपका समूह/संस्था नाम]  

#औकातकीजात #SayNoToCaste #NukkadNatak

```


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**स्क्रिप्ट: “औक़ात की जात”**

 **नुक्कड़ नाटक / वीडियो स्क्रिप्ट** के रूप में ढाला गया है — शीर्षक है **“औक़ात की जात”**। यह स्क्रिप्ट सामाजिक भेदभाव, जातिवाद और नैतिक पतन पर तीखा सवाल उठाती है। इसे नुक्कड़ नाटक, सोशल मीडिया वीडियो, या थिएटर प्रस्तुति के लिए प्रयोग किया जा सकता है।


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### 🎭 **स्क्रिप्ट: “औक़ात की जात”**


**शैली:** सामाजिक-संघर्ष आधारित नुक्कड़ नाटक

**समय:** 6-8 मिनट

**कलाकार:** 4-5 पात्र

**स्थान:** गाँव, चौराहा या कोई गली


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#### **\[दृश्य 1: चौराहे पर हलचल, दो लोग बहस कर रहे हैं जात को लेकर]**


**पात्र 1 (अहंकार से):**

अबे तू जानता नहीं, हम ऊँची जात वाले हैं!

हमारे सामने ज़्यादा मत बोल!


**पात्र 2 (गुस्से में):**

जात बड़ी है या इंसान?

तू चोरी करता है, घूस खाता है,

फिर भी खुद को बड़ा समझता है?


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#### **\[दृश्य 2: बाकी पात्र आते हैं और मंच के बीचोंबीच गोल घेरा बनाते हैं]**


**(सभी मिलकर तालियों की लय में बोलते हैं):**

जात पूछते हो?

पहले इंसानियत का चेहरा ढूंढो!


---


#### **पात्र 3 (कविता की शैली में):**


जिसने औरत को बेचा,

जिसने ग़रीब का खून चूसा —

वो किस जात का था?


**पात्र 4 (आवेश में):**

जो धर्म के नाम पर

दंगा करवाता है,

और फिर वोट बटोरता है —

उसे किसने ऊँची जात दी?


---


#### **पात्र 5 (तेज आवाज़ में, जनता की ओर मुंह करके):**


हरामियों की औकात होती है,

**जात नहीं!**

लेकिन समाज क्या करता है?

जो मेहनत करता है,

उसे नीच बना देता है।


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#### **\[तालियों की लय दोबारा शुरू]**


**सभी:**

नाम बड़े, काम सड़े —

फिर भी सर ऊँचा किए घूमते हैं,

दिल से बड़ा है जो —

वो झुका खड़ा है!


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#### **पात्र 2 (भावुक होकर):**


इतिहास गवाही देता है —

हर बड़ा इंकलाब

नीच कहे गए इंसान ने ही किया है।


---


#### **पात्र 1 (अब बदले स्वर में):**


शायद मैं गलत था,

जात नहीं,

औकात देखनी चाहिए थी।


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#### **सभी पात्र (अंतिम नारा):**


अब वक़्त है —

शब्दों की दीवारें तोड़ो!

जात नहीं,

**चरित्र का तराजू जोड़ो!**


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### 🎬 **(पर्दा गिरता है / लाइट बंद)**


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**"समाज में हरामियों की औकात होती है, जात नहीं"** पर आधारित एक सामाजिक चेतना और विद्रोह की भावना से भरी **कविता**:



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### **औक़ात की जात**


जात पूछते हो?

चलो पहले इंसानियत का चेहरा ढूंढो,

जिसने औरत को बेचा,

जिसने गरीब का खून चूसा,

वो किस जात का था?


जो मंदिर-मस्जिद की आड़ में

दंगा भड़काता है,

जो कुर्सी के लिए

क़ौम को बाँट जाता है —

उसे भी किसी ने

ऊँची जात वाला बताया था!


**हरामियों की औकात होती है,

जात नहीं**,

फिर भी समाज में

बदनाम वो होता है

जो चुपचाप मेहनत करता है

और जाति में छोटा कहलाता है।


नाम बड़े, पर काम सड़े,

फिर भी सर ऊँचा लिए घूमते हैं,

और जो दिल से बड़ा है,

वो आज भी झुका खड़ा है।


कर्म की पहचान मिटा दी गई,

खून की भाषा जात से जोड़ी गई,

मगर इतिहास गवाही देता है —

**हर बड़ा इंकलाब

नीच कहे गए इंसान ने ही किया है।**


अब वक्त है,

शब्दों की दीवारें तोड़ो,

जात नहीं,

चरित्र का तराजू जोड़ो।


हरामियों को

जात का तमगा मत दो,

वरना वो तुम्हारे बच्चों को

औक़ात सिखाते फिरेंगे!


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10 साल, विकलांग आदमी सिंचाई विभाग की परीक्षा में 1 अंक से अधिक लड़ाई जीतता है; उत्तराखंड एचसी ऑर्डर का चयन उत्तर के बाद की त्रुटि की पुष्टि की गई



देहरादुन: उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) परीक्षा के लिए लगभग एक दशक पहले, संदीप कुमार - 57% विकलांगता के साथ - एक कथित गलत जवाब के कारण 0.25 अंक से सिंचाई विभाग में समूह सी सीनचपल (सिंचाई) की स्थिति के लिए अर्हता प्राप्त करने से चूक गए थे। लेकिन कुमार - तब अपने 20 के दशक में - मानते थे कि उन्हें गलत तरीके से चिह्नित किया गया था, क्योंकि उनका जवाब सही था। उन्होंने यूकेएसएसएससी द्वारा अंततः स्वीकार किए गए सही उत्तर के लिए कानूनी संघर्ष के वर्षों के माध्यम से दृढ़ता से काम किया।



चुनाव लड़ा गया सवाल था: "फ्रेडरिक स्मेटेसेक ने एक तितली संग्रहालय कहाँ स्थापित किया?" यद्यपि कुमार ने "भिम्तल" का उत्तर दिया, आधिकारिक उत्तर कुंजी ने "सत्ताल" को सही उत्तर के रूप में सूचीबद्ध किया, जिसके परिणामस्वरूप कुमार के लिए "1.25 अंक की कटौती" हुई, जिसके कारण उनकी अयोग्यता हुई। लेकिन, जब सचिवालय सुरक्षा कैडर पोस्ट के लिए एक अन्य UKSSSC परीक्षा में एक ही सवाल दिखाई दिया, तो "भीमटल" को सही उत्तर के रूप में चिह्नित किया गया था।

आयोग को खींचते हुए, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को राज्य को "पांच सप्ताह के भीतर" कुमार को नियुक्ति प्रदान करने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और अलोक महारा की डिवीजन पीठ ने कहा: "यह आयोग का कर्तव्य है कि वह विशेषज्ञों की राय पर नेत्रहीन रूप से भरोसा न करें और इसके बजाय एक तंत्र को काउंटर-चेक करने के लिए तैयार करें, विशेष रूप से जगह के भौगोलिक संबंधों से संबंधित प्रश्नों पर।

Saturday, June 28, 2025

वीडियो स्क्रीनप्ले + वॉइस ओवर स्क्रिप्ट 🎞️ **शीर्षक: कैदी जो आज़ाद हो सकते थे**


🎥 **“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”** डॉक्यूमेंट्री का

✅ **वीडियो स्क्रीनप्ले (Scene-by-Scene Visual Plan)**

✅ **वॉइस ओवर स्क्रिप्ट** (Voice Over Script)


यह डॉक्यूमेंट्री सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, और सिस्टम की संवेदनहीनता पर आधारित है।


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## 🎬 वीडियो स्क्रीनप्ले + वॉइस ओवर स्क्रिप्ट


🎞️ **शीर्षक: कैदी जो आज़ाद हो सकते थे**

📽️ **अवधि:** 12-15 मिनट

🗣️ **भाषा:** हिंदी

📺 **फॉर्मेट:** डॉक्यूमेंट्री (OTT/YouTube/NGO मंच)


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### 🎬 **Scene 1: \[Opening | Black Screen + Title Reveal]**


**वीडियो:**


* काली स्क्रीन

* टाइटल टेक्स्ट उभरता है:

  *“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”*

* धीमी, रहस्यमयी पृष्ठभूमि ध्वनि


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “कल्पना कीजिए… आपने अपनी सजा पूरी कर ली है…

> लेकिन फिर भी आप जेल में हैं।

> क्यों?

> क्योंकि सिस्टम ने आपको **भूल** दिया है।”


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### 🎬 **Scene 2: \[Drone Shot | जेल परिसर, ऊँची दीवारें, बंद गेट]**


**वीडियो:**


* नैनीताल/हरिद्वार/हल्द्वानी जेलों के ऊपर से ड्रोन व्यू

* जेल के भारी दरवाज़े, ताले, सुरक्षा कैमरे


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “उत्तराखंड की जेलों में ऐसे 140 कैदी हैं…

> जो सालों पहले रिहा किए जाने के योग्य थे…

> लेकिन अब भी बंद हैं।

> 2019 से 2025 — सिर्फ इंतज़ार, और इंतज़ार…”


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### 🎬 **Scene 3: \[Inside Jail | खाली बैरक, खामोशी, पुरानी फाइलें]**


**वीडियो:**


* धूल भरी रजिस्टर-बुक, पुरानी फाइलें

* जेल के गलियारे में एक अकेला वृद्ध कैदी


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “इनकी सजा पूरी हो चुकी है।

> लेकिन Sentence Review Board की बैठकें टलती रहीं।

> और ये कैदी — ताले के पीछे, सड़ते रहे।”


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### 🎬 **Scene 4: \[Newspaper Clips + कोर्ट ऑर्डर स्लाइड्स]**


**वीडियो:**


* स्क्रीन पर चलते हुए अखबारों की सुर्खियाँ

* कोर्ट की टिप्पणियाँ: “प्रशासनिक उदासीनता”, “मानवाधिकार का उल्लंघन”


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई।

> आदेश दिया — दो हफ्तों में बोर्ड बनाओ,

> और रिहाई की प्रक्रिया शुरू करो।”


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### 🎬 **Scene 5: \[Testimony | पूर्व कैदी की रीकंस्ट्रक्टेड क्लिप]**


**वीडियो:**


* एक 60 वर्षीय व्यक्ति (ध्यान से फिल्माया गया)

* कमजोर, आंखों में थकावट


**🎙️ पात्र संवाद:**


> “मेरी रिहाई की तारीख थी 2020…

> पर मैं निकला 2024 में।

> चार साल… बिना वजह… बंद था।”


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### 🎬 **Scene 6: \[Statistical Graphics | Jail Data on Screen]**


**वीडियो:**


* एनीमेटेड ग्राफिक्स

* कैपेसिटी: 3000

* वर्तमान कैदी: 4600

* रिहाई योग्य: 140+


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “जेल पहले ही अपनी क्षमता से 50% ज्यादा भरी हैं।

> फिर भी, जिन्हें छोड़ा जा सकता था…

> उन्हें सिस्टम ने रोक रखा है।”


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### 🎬 **Scene 7: \[Human Rights Activists | इंटरव्यू क्लिप्स]**


**वीडियो:**


* NGO प्रतिनिधि, विधिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता


**🎙️ वॉइस ओवर (बैकग्राउंड):**


> “हमने बार-बार कहा… Sentence Review Board की नियमित बैठकें होनी चाहिए।

> लेकिन हर बार, फाइलें धूल खाती रहीं…”


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### 🎬 **Scene 8: \[Court Sketch Animation | निर्णय की पुनरावृत्ति]**


**वीडियो:**


* एनिमेटेड कोर्टरूम विज़ुअल

* स्क्रॉलिंग कोर्ट ऑर्डर टेक्स्ट


**🎙️ कोर्ट संवाद (रिकॉर्डेड वॉइस):**


> “यह न्याय का मज़ाक है।

> पात्र कैदियों को अब और एक दिन भी जेल में नहीं रहना चाहिए।”


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### 🎬 **Scene 9: \[Hope Visuals | खुले जेल गेट, बुजुर्ग का चेहरा ऊपर उठना]**


**वीडियो:**


* जेल का गेट खुलता है

* धूप अंदर आती है

* बुजुर्ग कैदी बाहर देखता है, आंखें नम


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “उन्हें चाहिए

> सिर्फ आज़ादी नहीं…

> एक नया जीवन।

> एक सम्मान, एक पुनर्वास…

> और समाज से फिर जुड़ने का हक़।”


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### 🎬 **Scene 10: \[Udaen Foundation Logo | संपर्क स्लाइड]**


**वीडियो:**


* Udaen Foundation का लोगो

* ईमेल, वेबसाइट, हेल्पलाइन


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “Udaen Foundation मांग करता है —

> हर पात्र कैदी को न्याय मिले।

> क्योंकि…

> **‘न्याय में देरी, अन्याय है।’**”


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## 🎬 *अंतिम टेक्स्ट ऑन स्क्रीन:*


**"कैदी जो आज़ाद हो सकते थे..."**

*डॉक्यूमेंट्री प्रजेंटेड बाय – Udaen News Network / Udaen Foundation*

📞 *Contact: [info@udaen.org](mailto:info@udaen.org) | [www.udaen.org](http://www.udaen.org)*


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न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...