“अंधविश्वास और कानून” विषय पर समाज, धर्म और कानून के बीच की महीन रेखा को बेहद सटीक रूप में प्रस्तुत करता है।
अंधविश्वास और कानून: विश्वास की मर्यादा बनाम शोषण का व्यापार
शोषण के खिलाफ, धर्म के नहीं
समाजसेवी अमोल मानव ने स्पष्ट किया है कि उनका आंदोलन किसी भी धर्म या देवी-देवता के विरोध में नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जो चमत्कार और अंधविश्वास के नाम पर भोले-भाले लोगों का शोषण करते हैं। उनका कहना है कि ऐसे लोग धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करके लोगों से पैसा और सत्ता दोनों बटोरते हैं।
विश्वास और धोखे के बीच की रेखा
मानव का तर्क है कि कानून किसी के धार्मिक विश्वास या आध्यात्मिक अनुभव पर रोक नहीं लगाता, बल्कि केवल उस स्थिति में हस्तक्षेप करता है जब कोई व्यक्ति “चमत्कार करने” का दावा करके दूसरों को धोखा देने या ठगने की कोशिश करता है। यही अंतर “श्रद्धा” और “शोषण” के बीच की असली रेखा है।
वैज्ञानिक सोच और सामाजिक बदलाव
इस कानून को वे केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में एक कदम मानते हैं। उनका विश्वास है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा देकर यह कानून समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकता है, जहां लोग सवाल पूछने से डरें नहीं और अंधभक्ति से मुक्त हों।
लागू करने से जुड़ी चुनौतियाँ
खराब कार्यान्वयन
मानव ने हाल के वर्षों में कानून के कमजोर कार्यान्वयन पर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि सरकार की नीयत साफ नहीं है — कानून तो बना दिया गया, पर इसे लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई।
पुलिस जागरूकता की कमी
वे बताते हैं कि बड़ी समस्या यह है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इस कानून के प्रावधानों की पूरी जानकारी नहीं होती। परिणामस्वरूप, बहुत कम मामले दर्ज होते हैं और उनमें भी सज़ा की दर बेहद कम रहती है।
ढोंगी बाबाओं को खुली चुनौती
मानव इस कानून को केवल किताबों में नहीं छोड़ना चाहते — वे इसे सक्रिय रूप से लागू कराने के लिए अभियान चला रहे हैं। उन्होंने कई बार अपने आंदोलनों में बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जैसे तथाकथित चमत्कारी बाबाओं को चुनौती दी है। जब ये व्यक्ति अपने “चमत्कारों” को साबित करने में नाकाम रहते हैं, तो मानव उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हैं।
निष्कर्ष
अंधविश्वास के खिलाफ यह संघर्ष केवल कानून का नहीं, समाज की चेतना का संघर्ष है। यह उस सोच को मजबूत करता है जो कहती है कि ईश्वर पर विश्वास और विज्ञान पर भरोसा — दोनों एक साथ संभव हैं, बशर्ते विश्वास का उपयोग शोषण का साधन न बने।