Wednesday, November 5, 2025

“अंधविश्वास और कानून” विषय पर समाज, धर्म और कानून के बीच की महीन रेखा को बेहद सटीक रूप में प्रस्तुत करता है।

“अंधविश्वास और कानून” विषय पर समाज, धर्म और कानून के बीच की महीन रेखा को बेहद सटीक रूप में प्रस्तुत करता है। 


अंधविश्वास और कानून: विश्वास की मर्यादा बनाम शोषण का व्यापार

शोषण के खिलाफ, धर्म के नहीं

समाजसेवी अमोल मानव ने स्पष्ट किया है कि उनका आंदोलन किसी भी धर्म या देवी-देवता के विरोध में नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जो चमत्कार और अंधविश्वास के नाम पर भोले-भाले लोगों का शोषण करते हैं। उनका कहना है कि ऐसे लोग धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करके लोगों से पैसा और सत्ता दोनों बटोरते हैं।

विश्वास और धोखे के बीच की रेखा

मानव का तर्क है कि कानून किसी के धार्मिक विश्वास या आध्यात्मिक अनुभव पर रोक नहीं लगाता, बल्कि केवल उस स्थिति में हस्तक्षेप करता है जब कोई व्यक्ति “चमत्कार करने” का दावा करके दूसरों को धोखा देने या ठगने की कोशिश करता है। यही अंतर “श्रद्धा” और “शोषण” के बीच की असली रेखा है।

वैज्ञानिक सोच और सामाजिक बदलाव

इस कानून को वे केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में एक कदम मानते हैं। उनका विश्वास है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा देकर यह कानून समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकता है, जहां लोग सवाल पूछने से डरें नहीं और अंधभक्ति से मुक्त हों।


लागू करने से जुड़ी चुनौतियाँ

खराब कार्यान्वयन

मानव ने हाल के वर्षों में कानून के कमजोर कार्यान्वयन पर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि सरकार की नीयत साफ नहीं है — कानून तो बना दिया गया, पर इसे लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई

पुलिस जागरूकता की कमी

वे बताते हैं कि बड़ी समस्या यह है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इस कानून के प्रावधानों की पूरी जानकारी नहीं होती। परिणामस्वरूप, बहुत कम मामले दर्ज होते हैं और उनमें भी सज़ा की दर बेहद कम रहती है।

ढोंगी बाबाओं को खुली चुनौती

मानव इस कानून को केवल किताबों में नहीं छोड़ना चाहते — वे इसे सक्रिय रूप से लागू कराने के लिए अभियान चला रहे हैं। उन्होंने कई बार अपने आंदोलनों में बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जैसे तथाकथित चमत्कारी बाबाओं को चुनौती दी है। जब ये व्यक्ति अपने “चमत्कारों” को साबित करने में नाकाम रहते हैं, तो मानव उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हैं


निष्कर्ष

अंधविश्वास के खिलाफ यह संघर्ष केवल कानून का नहीं, समाज की चेतना का संघर्ष है। यह उस सोच को मजबूत करता है जो कहती है कि ईश्वर पर विश्वास और विज्ञान पर भरोसा — दोनों एक साथ संभव हैं, बशर्ते विश्वास का उपयोग शोषण का साधन न बने।



Tuesday, November 4, 2025

रिपोर्ट: गांव में साहित्य का मेला या भ्रम का जाल?



रिपोर्ट: गांव में साहित्य का मेला या भ्रम का जाल?

स्थान: ——देहरादून 
संवाददाता: ——unn 

गांव में इन दिनों साहित्यिक गतिविधियों का खूब बोलबाला है। लेखक गांव के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र में साहित्यकारों का जमघट लगा हुआ है। गांव के अन्नदाता निशंक अब तक 100 से भी अधिक किताबें लिख चुके हैं, जिससे यह स्थान एक तरह से "ग्रामीण साहित्य राजधानी" बन गया है।

लेकिन इसी साहित्यिक रौनक के बीच एक सवाल उठ खड़ा हुआ है —
अगर हाल ही में लगाए गए पोस्टर में दी गई जानकारी सही है, तो ‘कलिंग पर विजय’ नाटक मोहन राकेश का है या यह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता से जुड़ा हुआ काव्य रूपांतरण है?

कई स्थानीय बुद्धिजीवी और साहित्यप्रेमी इस पोस्टर को देखकर भ्रमित हैं। कुछ का कहना है कि यह साहित्यिक कार्यक्रम में तथ्यों की गलती का उदाहरण है, जबकि कुछ इसे अनजाने में हुई चूक बता रहे हैं।

स्थानीय प्रतिक्रिया:
गांव के एक अध्यापक ने कहा —

> “अगर हम साहित्य का प्रचार करते हुए भी गलत जानकारी देंगे, तो यह आने वाली पीढ़ी के लिए भ्रम का कारण बनेगा।”



दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि “शायद पोस्टर बनाने वालों को यह जानकारी नहीं रही कि ‘कलिंग विजय’ विषय पर दिनकर की प्रसिद्ध रचना ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’ जैसी काव्यधाराएँ हैं, जबकि मोहन राकेश नाट्य विधा के लिए जाने जाते हैं।”

विश्लेषण:
यह विवाद केवल एक नाम या शीर्षक का नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि गांवों में साहित्यिक चेतना तो बढ़ रही है, लेकिन सही जानकारी और संदर्भ की पुष्टि की जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है।

निष्कर्ष:
साहित्यिक कार्यक्रमों में यदि तथ्यगत स्पष्टता नहीं रखी गई, तो ज्ञान का प्रचार भ्रम में बदल सकता है। लेखक गांव को यदि सच में साहित्य का केंद्र बनना है, तो उसे सही संदर्भों के साथ अपनी पहचान मजबूत करनी होगी।

भ्रष्टाचार पर पहली चोट — जागता उत्तराखंड, गैरसैंण की पुकार और ‘आधे सच’ की गूँज



✍️ संपादकीय लेख : दिनेश गुसाईं


कभी-कभी विधानसभा के भीतर उठी एक आवाज़ पूरे राज्य के नैतिक तंत्र को हिला देती है।
उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में विपक्ष के उपनेता भुवन कापड़ी का यह कहना —
“भ्रष्टाचार की शुरुआत हमसे होती है, विधायक निधि से 15% कमीशन काट लिया जाता है” —
सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा पर पड़ी पहली चोट है।

कापड़ी का यह वक्तव्य उस सच्चाई की झलक है,
जिसे जनता वर्षों से महसूस कर रही थी लेकिन कोई कह नहीं रहा था।
उन्होंने सदन में कहा कि विधायक विकास निधि से नौकरशाहों द्वारा 15% कमीशन लिया जाता है।
लेकिन यह कहानी का केवल आधा सच है।

सच यह है कि इसके अलावा भी विधायक के क्षेत्र में काम करवाने के लिए स्वयं विधायक को 7% रिश्वत देनी पड़ती है।
जेई (J.E.), एक्सईएन (XEN), एकाउंटेंट से लेकर उच्च स्तर तक,
कई बार विकास कार्यों की कुल रकम का लगभग 48 प्रतिशत हिस्सा कमीशनखोरी में चला जाता है।
यह वह सड़ांध है जिसने उत्तराखंड के विकास की जड़ों को खोखला कर दिया है।

इस कड़वे सच को स्वीकार करने का साहस ही असली शुरुआत है।
भुवन कापड़ी ने सदन में जो कहा, वह राजनीतिक बयान नहीं —
एक आत्मस्वीकृति थी, एक पुकार थी कि अब बदलाव भीतर से शुरू हो।

और इसी आत्मजागरण के बीच फिर एक पुरानी आवाज़ गूँज रही है —
स्थायी राजधानी गैरसैंण की माँग।
यह सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि जनभावना और न्याय का प्रश्न है।
गैरसैंण को राजधानी बनाना,
उत्तराखंड की जनता को शासन के और करीब लाना है।
यह भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के उस फासले को खत्म करने की शुरुआत होगी,
जो देहरादून की ऊँची दीवारों ने पैदा कर दिया है।

आज जरूरत है कि यह “भ्रष्टाचार पर पहली चोट”
एक नई राजनीति का सूत्रपात बने —
जहाँ सत्ता का केंद्र जनता की संवेदना में हो,
और उत्तराखंड का दिल गैरसैंण में धड़के।

अगर सदन में 15% कमीशन पर माननीयों की आत्मा जागी है,
तो समझिए — यह सिर्फ भ्रष्टाचार पर नहीं,
अन्याय और दूरी पर भी पहली चोट है।
उत्तराखंड अब वाकई जाग रहा है —
अपने सच के साथ, अपने स्वाभिमान और अपनी राजधानी गैरसैंण के साथ।

Tuesday, October 28, 2025

अगर हम आज के वैश्विक और राष्ट्रीय हालात देखें — तो युद्ध अब सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि समाजों और मनुष्यों के भीतर चल रहे हैं।इसे तीन स्तरों पर समझा जा सकता है 👇

अगर हम आज के वैश्विक और राष्ट्रीय हालात देखें — तो युद्ध अब सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि समाजों और मनुष्यों के भीतर चल रहे हैं।
इसे तीन स्तरों पर समझा जा सकता है 👇


---

1. बाहरी युद्ध से ज्यादा आंतरिक युद्ध

आज हर व्यक्ति किसी न किसी “विचारधारा”, “धर्म”, “जाति”, या “राजनीतिक पहचान” के घेरे में है।
सोशल मीडिया पर मतभेद अब संवाद नहीं, संघर्ष बन गए हैं।
इसलिए आने वाले युद्ध बंदूकों से नहीं, बल्कि विचारों, सूचनाओं और भावनाओं के हथियारों से लड़े जाएंगे।

> युद्ध अब मैदानों में नहीं, मन में होगा।




---

2. समाज बनाम समाज — गृहयुद्ध के बीज

दुनिया के कई देशों में (और भारत में भी धीरे-धीरे) समाज के भीतर ध्रुवीकरण (polarization) बढ़ रहा है।
गरीब-अमीर, ग्रामीण-शहरी, जातीय-धार्मिक, और सत्ता-विरोधी बनाम सत्ता-समर्थक खेमे लगातार दूर हो रहे हैं।
अगर यह दूरी संवाद से नहीं पाटी गई, तो गृहयुद्ध जैसी स्थिति — यानी समाज के अपने लोगों के बीच संघर्ष — असंभव नहीं है।
यह संघर्ष अब तलवार से नहीं, बल्कि सत्ता, संसाधन और नैरेटिव पर नियंत्रण के लिए होगा।


---

3. नई युद्धभूमि: सूचना और तकनीक

अब युद्ध डिजिटल हो गए हैं।
डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर हमले, और मीडिया — ये सब नए हथियार हैं।
जो सूचना नियंत्रित करेगा, वही युद्ध जीतेगा।
इसलिए आने वाला युद्ध व्यक्ति के बीच नहीं, बल्कि व्यक्ति के दिमाग पर नियंत्रण के लिए होगा।


---

🔮 निष्कर्ष

आने वाला युग “गृहयुद्ध” से ज्यादा “चेतना का युद्ध” होगा।
मनुष्य बाहरी शत्रु से नहीं, अपने भीतर के भ्रम, लालच और असहिष्णुता से लड़ेगा।
अगर समाज संवाद, सहिष्णुता और सत्य पर लौट आया — तो युद्ध टल जाएगा;
वरना, हर घर में युद्ध, हर व्यक्ति में रणभूमि होगी।

Friday, October 24, 2025

“भविष्य का अस्पताल: भीड़ नहीं, चेतना की जरूरत”




आने वाले समय में हमारे अस्पताल केवल बीमारियों के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि समाज की तबाही के प्रतीक बन सकते हैं। हवा, पानी और भोजन की गुणवत्ता में गिरावट, मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी, और बढ़ती तकनीक पर निर्भरता—ये सभी कारण हैं कि अस्पतालों में भीड़ लगातार बढ़ती जाएगी।

हमने प्राकृतिक जीवनशैली और संतुलित आहार की बजाय त्वरित और अस्वस्थ विकल्प चुने हैं। हमने मिट्टी की खुशबू, प्राकृतिक धूप और ताज़ा हवा का महत्व भूलकर, मशीनों और डिजिटल दुनिया में खुद को खो दिया है। परिणामस्वरूप न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक बीमारियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।

मोबाइल और तकनीक पर अत्यधिक निर्भर जीवन हमें अस्थायी राहत देता है, लेकिन असली समस्याओं को बढ़ा देता है। जब ये तकनीकी साधन कभी ठप पड़ेंगे, तब हमें एहसास होगा कि हमने खुद से और अपने वास्तविक जीवन से दूरी बना ली थी।

समाधान सरल है—प्रकृति और आत्मा के साथ जुड़ाव को पुनः प्राप्त करना। हमें अपने जीवन के स्वास्थ्य और मानसिक शांति के प्रति सचेत रहना होगा। वरना आने वाला कल हमें केवल अस्पतालों की लंबी कतारों में ही नहीं, बल्कि जीवन के असली सवालों के सामने भी खड़ा कर देगा: “हमने क्या खो दिया और क्या पाया?”

“मीठे में जूठा और चाँदी से धुलता कलंक”




(मुंशी प्रेमचंद के व्यंग्य का सामाजिक आईना)

मुंशी प्रेमचंद की यह दो पंक्तियाँ —
“आदमी जूठा तभी खाता है जब मीठा हो,
कलंक चाँदी से ही धुलता है।”
आज के समाज पर उतनी ही खरी उतरती हैं जितनी उनके समय में थीं।
<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1817100962636779"
     crossorigin="anonymous"></script>

मनुष्य का चरित्र तभी तक पवित्र दिखाई देता है जब तक उसके सामने स्वार्थ नहीं आता। जब लाभ, लोभ या अवसर की मिठास सामने होती है, तो वही व्यक्ति अपने सिद्धांतों को तोड़कर “जूठा” स्वीकार कर लेता है। यह जूठापन केवल भोजन का नहीं, बल्कि विचारों, रिश्तों और नैतिकता का भी है। लोग अब सच्चाई नहीं, सुविधा के अनुसार व्यवहार करते हैं।

दूसरी पंक्ति — “कलंक चाँदी से ही धुलता है” — समाज की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करती है। आज दोषी वही निर्दोष बन जाता है जिसके पास धन है। न्याय की तराजू अक्सर “चाँदी के सिक्कों” के बोझ से झुक जाती है। ईमानदारी, चरित्र और सच्चाई के मायने तब बदल जाते हैं जब किसी के पास ताकत और पैसा हो।

यह व्यंग्य हमें बताता है कि समाज की असली बीमारी गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन है। जब तक लोग “मीठे” के पीछे दौड़ते रहेंगे और “चाँदी” को पूजा का प्रतीक मानते रहेंगे, तब तक सत्य और न्याय के लिए जगह संकरी होती जाएगी।

प्रेमचंद ने केवल कहानी नहीं लिखी, बल्कि समाज को आईना दिखाया — और वह आईना आज भी उतना ही साफ़ है, बस देखने की हिम्मत कम हो गई है।

“आदमी जूठा तभी खाता है जब मीठा हो,कलंक चाँदी से ही धुलता है।”— मुंशी प्रेमचंद




इन दो पंक्तियों में मुंशी प्रेमचंद ने समाज की गहरी सच्चाई को व्यंग्य और यथार्थ के माध्यम से उजागर किया है।

व्याख्या:

1. “आदमी जूठा तभी खाता है जब मीठा हो”
इसका अर्थ यह है कि मनुष्य स्वार्थ के आगे नैतिकता को भूल जाता है। जब तक किसी चीज़ में लाभ (मीठापन) है, तब तक इंसान उसके दोषों (जूठेपन) को नजरअंदाज कर देता है। यह वाक्य मानवीय लोभ, अवसरवाद और दोहरे चरित्र पर तीखा कटाक्ष है।


2. “कलंक चाँदी से ही धुलता है”
यह पंक्ति समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और पैसों के प्रभाव को उजागर करती है। “चाँदी” यहाँ प्रतीक है धन का। इसका अर्थ है कि समाज में दोषी या कलंकित व्यक्ति भी यदि धनवान है तो वह अपने कलंक को पैसे से मिटा सकता है। न्याय, ईमानदारी और चरित्र सब कुछ धन के आगे झुक जाता है।



सार:

इन पंक्तियों में मुंशी प्रेमचंद ने समाज की वास्तविक मानसिकता को बहुत ही संक्षेप और तीखे व्यंग्य में उजागर किया है —
कि नैतिकता तब तक ही चलती है जब तक स्वार्थ नहीं टकराता,
और समाज में सम्मान या “पवित्रता” भी अक्सर धन के बल पर खरीदी जाती है।


न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...