(मुंशी प्रेमचंद के व्यंग्य का सामाजिक आईना)
मुंशी प्रेमचंद की यह दो पंक्तियाँ —
“आदमी जूठा तभी खाता है जब मीठा हो,
कलंक चाँदी से ही धुलता है।”
आज के समाज पर उतनी ही खरी उतरती हैं जितनी उनके समय में थीं।
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मनुष्य का चरित्र तभी तक पवित्र दिखाई देता है जब तक उसके सामने स्वार्थ नहीं आता। जब लाभ, लोभ या अवसर की मिठास सामने होती है, तो वही व्यक्ति अपने सिद्धांतों को तोड़कर “जूठा” स्वीकार कर लेता है। यह जूठापन केवल भोजन का नहीं, बल्कि विचारों, रिश्तों और नैतिकता का भी है। लोग अब सच्चाई नहीं, सुविधा के अनुसार व्यवहार करते हैं।
दूसरी पंक्ति — “कलंक चाँदी से ही धुलता है” — समाज की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करती है। आज दोषी वही निर्दोष बन जाता है जिसके पास धन है। न्याय की तराजू अक्सर “चाँदी के सिक्कों” के बोझ से झुक जाती है। ईमानदारी, चरित्र और सच्चाई के मायने तब बदल जाते हैं जब किसी के पास ताकत और पैसा हो।
यह व्यंग्य हमें बताता है कि समाज की असली बीमारी गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन है। जब तक लोग “मीठे” के पीछे दौड़ते रहेंगे और “चाँदी” को पूजा का प्रतीक मानते रहेंगे, तब तक सत्य और न्याय के लिए जगह संकरी होती जाएगी।
प्रेमचंद ने केवल कहानी नहीं लिखी, बल्कि समाज को आईना दिखाया — और वह आईना आज भी उतना ही साफ़ है, बस देखने की हिम्मत कम हो गई है।
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