🏔️ संपादकीय
“सुविधा से समस्या तक: उत्तराखंड के विकास की दोधारी तलवार”
✍️ लेख: दिनेश पाल सिंह गुसाईं
स्रोत: Udaen News Network
उत्तराखंड — देवभूमि, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य की भूमि। लेकिन आज यही धरती एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहाँ “विकास” और “विनाश” के बीच की रेखा तेजी से धुंधली हो रही है। यह प्रश्न अब बार-बार उठता है कि — क्या एक सुविधा, दूसरी समस्या को जन्म नहीं दे रही?
🚗 सड़क सुविधा: गाँव खाली, शहर भरे
सड़कें आईं, जीवन जुड़ा। शिक्षा, स्वास्थ्य और बाज़ार की पहुँच आसान हुई। पर इसी सुविधा ने पहाड़ों के युवाओं को शहरों की ओर धकेल दिया।
आज सैकड़ों गाँवों के दरवाज़े बंद हैं, खेत बंजर पड़े हैं। सड़कें बनीं, मगर उनके साथ ग्राम जीवन की आत्मा खो गई।
🏨 पर्यटन सुविधा: अर्थव्यवस्था के साथ प्रदूषण
पर्यटन ने आय बढ़ाई, रोजगार दिया — लेकिन किस कीमत पर?
हरिद्वार से लेकर औली तक पहाड़ अब होटल, गेस्ट हाउस और होमस्टे से पटे पड़े हैं।
कचरा, पानी की कमी, और निर्माण ने नाजुक पारिस्थितिकी को खतरे में डाल दिया।
धार्मिक स्थलों की शुद्धता अब व्यापारिक होड़ में कहीं खो गई है।
⚡ ऊर्जा परियोजनाएँ: बिजली आई, संतुलन गया
हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स ने उत्तराखंड को ऊर्जा राज्य कहा जाने लगा,
लेकिन इन परियोजनाओं ने नदियों का स्वाभाविक प्रवाह रोक दिया।
कई गाँव जलाशयों में डूबे, और लगातार भूस्खलन व भूगर्भीय अस्थिरता बढ़ी।
बिजली की सुविधा ने प्रकृति के ताने-बाने को तोड़ दिया।
📱 तकनीक और आधुनिकता: मानसिक दूरी
मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक जीवनशैली ने गाँवों को दुनिया से जोड़ा,
मगर इंसान को इंसान से दूर कर दिया।
पहले जो गाँव आपसी सहयोग से चलते थे, आज वही एकाकीपन और उपभोक्तावाद का शिकार हैं।
🌱 समाधान: संतुलित और आत्मनिर्भर विकास
उत्तराखंड का भविष्य केवल सुविधाओं पर नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच और स्थानीय समझ पर निर्भर है।
जरूरत है कि विकास योजनाएँ गाँव की ज़मीन, जल, जंगल और जन की भावना से जुड़ें।
“विकास तभी सार्थक है जब वह प्रकृति, समाज और संस्कृति — तीनों के बीच संतुलन रखे।”
🕊️ निष्कर्ष
उत्तराखंड को आज “सुविधा आधारित नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और संतुलित विकास मॉडल” की आवश्यकता है।
क्योंकि जब विकास में संवेदनशीलता खो जाती है —
तो सुविधा नहीं, समस्या जन्म लेती है।
📰 Udaen News Network
“हिमालय की आवाज़ — जन, जल, जंगल और जमीन के सवालों से सीधा संवाद।”
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