Saturday, October 4, 2025

🏔️ “सुविधा से समस्या तक: उत्तराखंड के विकास की दोधारी तलवार”




सुविधा से समस्या तक: उत्तराखंड के विकास की दोधारी तलवार

उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ “विकास” और “विनाश” के बीच की रेखा धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है। यह सच है कि सुविधा किसी भी समाज के विकास की बुनियाद होती है, लेकिन जब वही सुविधा बिना दूरदृष्टि और संवेदनशीलता के दी जाती है, तो वह नई समस्याओं का कारण बन जाती है। उत्तराखंड इसका जीवंत उदाहरण है।


सड़क सुविधा से पलायन की समस्या

पहाड़ों में सड़कें बनीं तो उम्मीद जगी कि अब जीवन आसान होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की पहुँच बढ़ेगी। हुआ भी ऐसा — लेकिन साथ ही गाँवों से शहरों की ओर पलायन तेज़ हो गया।
पहले जो युवा खेती, पशुपालन और ग्राम जीवन से जुड़े थे, वे अब नौकरी और आराम की तलाश में मैदानों की ओर बढ़ गए।
सड़क सुविधा ने जहाँ विकास का रास्ता खोला, वहीं उसने गाँवों को खाली कर दिया


पर्यटन सुविधा से पर्यावरण संकट

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार ने इसके लिए सड़कें, होटल, और होमस्टे की सुविधाएँ दीं।
परिणामस्वरूप पहाड़ों में अंधाधुंध निर्माण, कचरे का ढेर, जल संकट, और भूस्खलन जैसी समस्याएँ बढ़ीं।
धार्मिक स्थलों का व्यावसायीकरण हुआ, और प्रकृति की पवित्रता कम होने लगी।


ऊर्जा और जल परियोजनाएँ – विकास की कीमत

ऊर्जा उत्पादन के नाम पर बड़े बाँध और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स बनाए गए। इनसे बिजली तो आई, पर नदियों का स्वाभाविक प्रवाह बाधित हुआ।
कई गाँव डूब क्षेत्र में चले गए, भूगर्भीय जलस्तर गिरा, और भूकंपीय अस्थिरता बढ़ी।
यानी ऊर्जा की सुविधा ने पारिस्थितिक असंतुलन को जन्म दिया।


तकनीक और शिक्षा – सामाजिक दूरी का कारण

बिजली, मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट ने आधुनिक जीवन को गाँवों तक पहुँचाया, लेकिन इसके साथ भौतिकवाद और मानसिक अलगाव भी बढ़ा।
युवा अब खेतों की जगह मोबाइल स्क्रीन से जुड़े हैं।
स्थानीय संस्कृति, लोककला और आपसी संवाद धीरे-धीरे पीछे छूट रहे हैं।


निष्कर्ष

उत्तराखंड की कहानी बताती है कि कोई भी सुविधा यदि स्थानीय भूगोल, संस्कृति और पारिस्थितिकी को ध्यान में रखे बिना दी जाए, तो वह विकास नहीं, बल्कि नई समस्या का द्वार बन जाती है।
अब समय आ गया है कि हम “विकास” को केवल सड़कों और भवनों से नहीं, बल्कि संतुलित, सहभागी और आत्मनिर्भर ग्राम प्रणाली से परिभाषित करें।
सुविधा तब ही सार्थक है, जब वह समाज और प्रकृति – दोनों के बीच संतुलन बनाए रखे।



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