Sunday, October 19, 2025

✍️ “दीप से पटाखे तक — जब परंपरा ने रूप बदला”

✍️ “दीप से पटाखे तक — जब परंपरा ने रूप बदला”

दीपावली, भारत का सबसे प्रकाशमय और पवित्र त्योहार, “अंधकार से प्रकाश की ओर” बढ़ने का प्रतीक है। इस पर्व का मूल स्वरूप सदियों पुराना है, लेकिन समय के साथ इसकी परंपराएँ भी बदलती गई हैं।

🔶 दीपों की आराधना: त्रेता युग की परंपरा

कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों ने उनके स्वागत में संपूर्ण अयोध्या को दीपों से आलोकित कर दिया। तभी से दीपावली का अर्थ ‘दीपों की पंक्ति’ बन गया।
वैदिक ग्रंथों — ऋग्वेद, अथर्ववेद और स्कंद पुराण — में भी दीपदान को शुभ माना गया है। उस समय दीप जलाना सद्भाव, शांति और समृद्धि का प्रतीक था।

💥 पटाखों का युग: मध्यकालीन प्रभाव

बारूद और आतिशबाज़ी भारत की मूल परंपरा नहीं थे। इसका आविष्कार 9वीं शताब्दी में चीन में हुआ और भारत में यह 13वीं–14वीं सदी के बीच पहुँचा।
मुगल सम्राट अकबर के काल में पटाखे जलाने और आतिशबाज़ी देखने की प्रथा दरबारों में आम हो गई। धीरे-धीरे यह चमक आम जनता तक पहुँची और दीपावली का हिस्सा बन गई।

🌱 आज की सीख: पर्यावरण और परंपरा का संतुलन

दीपावली का असली अर्थ केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकाश, करुणा और आत्मचिंतन है।
आज आवश्यकता है कि हम दीपों की परंपरा को जीवित रखते हुए, पटाखों के प्रदूषण से बचें। मिट्टी के दीये, घी के दीप और हरियाली से सजी दीपावली ही सच्चे अर्थों में “हर घर उजियारा” ला सकती है।


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