इन दो पंक्तियों में मुंशी प्रेमचंद ने समाज की गहरी सच्चाई को व्यंग्य और यथार्थ के माध्यम से उजागर किया है।
व्याख्या:
1. “आदमी जूठा तभी खाता है जब मीठा हो”
इसका अर्थ यह है कि मनुष्य स्वार्थ के आगे नैतिकता को भूल जाता है। जब तक किसी चीज़ में लाभ (मीठापन) है, तब तक इंसान उसके दोषों (जूठेपन) को नजरअंदाज कर देता है। यह वाक्य मानवीय लोभ, अवसरवाद और दोहरे चरित्र पर तीखा कटाक्ष है।
2. “कलंक चाँदी से ही धुलता है”
यह पंक्ति समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और पैसों के प्रभाव को उजागर करती है। “चाँदी” यहाँ प्रतीक है धन का। इसका अर्थ है कि समाज में दोषी या कलंकित व्यक्ति भी यदि धनवान है तो वह अपने कलंक को पैसे से मिटा सकता है। न्याय, ईमानदारी और चरित्र सब कुछ धन के आगे झुक जाता है।
सार:
इन पंक्तियों में मुंशी प्रेमचंद ने समाज की वास्तविक मानसिकता को बहुत ही संक्षेप और तीखे व्यंग्य में उजागर किया है —
कि नैतिकता तब तक ही चलती है जब तक स्वार्थ नहीं टकराता,
और समाज में सम्मान या “पवित्रता” भी अक्सर धन के बल पर खरीदी जाती है।
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