रिपोर्ट: गांव में साहित्य का मेला या भ्रम का जाल?
स्थान: ——देहरादून
संवाददाता: ——unn
गांव में इन दिनों साहित्यिक गतिविधियों का खूब बोलबाला है। लेखक गांव के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र में साहित्यकारों का जमघट लगा हुआ है। गांव के अन्नदाता निशंक अब तक 100 से भी अधिक किताबें लिख चुके हैं, जिससे यह स्थान एक तरह से "ग्रामीण साहित्य राजधानी" बन गया है।
लेकिन इसी साहित्यिक रौनक के बीच एक सवाल उठ खड़ा हुआ है —
अगर हाल ही में लगाए गए पोस्टर में दी गई जानकारी सही है, तो ‘कलिंग पर विजय’ नाटक मोहन राकेश का है या यह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता से जुड़ा हुआ काव्य रूपांतरण है?
कई स्थानीय बुद्धिजीवी और साहित्यप्रेमी इस पोस्टर को देखकर भ्रमित हैं। कुछ का कहना है कि यह साहित्यिक कार्यक्रम में तथ्यों की गलती का उदाहरण है, जबकि कुछ इसे अनजाने में हुई चूक बता रहे हैं।
स्थानीय प्रतिक्रिया:
गांव के एक अध्यापक ने कहा —
> “अगर हम साहित्य का प्रचार करते हुए भी गलत जानकारी देंगे, तो यह आने वाली पीढ़ी के लिए भ्रम का कारण बनेगा।”
दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि “शायद पोस्टर बनाने वालों को यह जानकारी नहीं रही कि ‘कलिंग विजय’ विषय पर दिनकर की प्रसिद्ध रचना ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’ जैसी काव्यधाराएँ हैं, जबकि मोहन राकेश नाट्य विधा के लिए जाने जाते हैं।”
विश्लेषण:
यह विवाद केवल एक नाम या शीर्षक का नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि गांवों में साहित्यिक चेतना तो बढ़ रही है, लेकिन सही जानकारी और संदर्भ की पुष्टि की जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है।
निष्कर्ष:
साहित्यिक कार्यक्रमों में यदि तथ्यगत स्पष्टता नहीं रखी गई, तो ज्ञान का प्रचार भ्रम में बदल सकता है। लेखक गांव को यदि सच में साहित्य का केंद्र बनना है, तो उसे सही संदर्भों के साथ अपनी पहचान मजबूत करनी होगी।
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