Friday, November 14, 2025

जेब भरी, पेट खाली — आधुनिक जीवन का नया विरोधाभास



हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। लोग पहले से अधिक कमाने लगे हैं, सुविधाएँ बढ़ रही हैं, तकनीक जीवन को आसान बना रही है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गहरी और असहज सच्चाई छिपी है—आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद लोग भूखे पेट दिन काट रहे हैं।
यह गरीबी का नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक असंतुलन का संकट है, जिसे हम अब तक समझने में नाकाम रहे हैं।

भूख का गायब होना—मन की बीमारी, जेब की नहीं

आज कई लोग काम के बोझ, तनाव और लगातार भागदौड़ में इतने खो जाते हैं कि उन्हें खाना खाने की याद तक नहीं रहती। यह वह दौर है जहाँ शरीर की भूख से पहले मन की भूख आवाज़ देती है—और अक्सर अनसुनी रह जाती है।
मानसिक थकान, अवसाद और भावनात्मक खालीपन ने भूख को दबा दिया है। पैसा होने पर भी इंसान अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा, यह आधुनिक समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

अकेलापन—भूख का सबसे बड़ा शत्रु

शहरों में बढ़ता अकेलापन, टूटते सामाजिक संबंध और परिवारों की बदलती संरचना ने खाने के अर्थ को बदल दिया है।
कई लोग साथ के अभाव में खाना टाल देते हैं।
कभी खाना एक सामाजिक क्रिया था—अब एक व्यक्तिगत काम बनकर रह गया है।
और व्यक्तिगत काम अक्सर जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाते हैं।

जिम्मेदारियों की दौड़ में खुद को भूला हुआ इंसान

आर्थिक सक्षम व्यक्ति के पास साधन तो होते हैं, पर समय नहीं। पैसा कमाने की मशीन बनते-बनते मनुष्य अपने शरीर की भाषा सुनना भूल गया है।
वह दूसरों को खिलाने में लगा रहता है, पर खुद को ही भूखा छोड़ देता है।
इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि खुद पर निवेश करने की संस्कृति गायब हो रही है।

खाना नहीं, संतुलन चाहिए

यह समझना होगा कि भूख का मिटना सिर्फ खाने से नहीं, बल्कि मानसिक शांति, भावनात्मक सहारा और सामाजिक जुड़ाव से भी जुड़ा है।
जब मन थक जाता है, तो शरीर के संकेत भी धुंधले पड़ जाते हैं।
इसलिए यह मुद्दा व्यक्तिगत स्वास्थ्य से आगे बढ़कर एक सामाजिक चेतावनी है—कि हमारा जीवन संतुलन खो रहा है।

समस्या पेट की नहीं, युग की है

आधुनिक जीवन की रफ्तार ने इंसान को इतना व्यस्त और थका दिया है कि वह अपनी ही जरूरतों का बंधक बन गया है।
पैसा पाना आसान हुआ है, पर मन को स्थिर रखना कठिन।
इसलिए आज यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है:
क्या हम सचमुच आगे बढ़ रहे हैं, या बस भाग रहे हैं?


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निष्कर्ष:

जब जेब भरी हो पर पेट खाली, तो यह सिर्फ एक व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि समाज के मानसिक स्वास्थ्य की खामोश गवाही है।
यह संकेत है कि हमें वापस खुद तक लौटना होगा—
अपने मन की सुननी होगी, अपने शरीर का सम्मान करना होगा,
और यह स्वीकार करना होगा कि जीवन केवल कमाई और काम का नाम नहीं, बल्कि देखभाल, संतुलन और आत्म-संवाद का भी नाम है।


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