दिव्यांगजन समावेशन पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर संवाद की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। 12वीं राष्ट्रीय दिव्यांगता सम्मेलन ने इस दिशा में एक मजबूत पहल करते हुए “सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) और दिव्यांगजन समावेशन” जैसे व्यापक विषय पर केंद्रित चर्चा की, जिसने न केवल चुनौतियों को उजागर किया बल्कि एक सशक्त भविष्य की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।
भारत ने SDGs के माध्यम से यह संकल्प लिया है कि विकास की दौड़ में किसी को पीछे नहीं छोड़ा जाएगा। लेकिन वास्तविकता यह बताती है कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और तकनीक तक दिव्यांगजनों की समान पहुँच अभी भी एक दूर का लक्ष्य है। सम्मेलन में प्रस्तुत आँकड़े—70% पुनर्वास विशेषज्ञों की कमी, 50% विशेष शिक्षकों का अभाव और पूरे देश में 60 से भी कम एक्सेसिबिलिटी ऑडिटर्स—इस बात का संकेत हैं कि समावेशन अब विकल्प नहीं बल्कि विकास की अनिवार्यता है।
तकनीक और स्किलिंग पर केंद्रित सत्रों ने यह भरोसा दिलाया कि AI, डिजिटल टूल्स और सहायक तकनीक दिव्यांगजनों के लिए नए अवसरों के द्वार खोल सकते हैं। राष्ट्रीय एबिलिम्पिक्स के प्रतिभागियों की प्रतिभा और जज़्बे ने यह साबित किया कि कौशल की दुनिया में कोई सीमा नहीं—सीमाएँ केवल उन नजरियों में होती हैं जो समाज अक्सर दिव्यांगजनों पर थोप देता है।
सम्मेलन में “Sarthak Global University” का विचार एक दूरदर्शी कदम के रूप में उभर कर आया। यदि भारत को दिव्यांगता अध्ययन, शोध, पुनर्वास और समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है, तो ऐसी संस्था की स्थापना समय की बड़ी मांग है।
मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब तक समाज के कथानक बदलेंगे नहीं, तब तक नीतियाँ और कार्यक्रम भी आधे-अधूरे रहेंगे। दिव्यांगजनों के संघर्ष, उपलब्धियों और क्षमताओं को सम्मानजनक तरीके से प्रस्तुत करना मीडिया की जिम्मेदारी है, ताकि समाज में सकारात्मक और संवेदनशील दृष्टिकोण पैदा हो सके।
अंततः, यह सम्मेलन हमें एक स्पष्ट संदेश देता है—
दिव्यांगजन भारत के विकास के केंद्र में हैं, हाशिये पर नहीं।
SDGs हमें वह रूपरेखा देते हैं जो एक समावेशी, न्यायपूर्ण और सुलभ समाज के निर्माण की दिशा में हमारा मार्गदर्शन करती है। अब आवश्यक है कि सरकार, कॉर्पोरेट, सामाजिक संस्थाएँ और नागरिक समाज मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहाँ हर व्यक्ति—क्षमता या अक्षमता से परे—सम्मान, अधिकार और अवसरों के साथ आगे बढ़ सके।
12वीं राष्ट्रीय दिव्यांगता सम्मेलन ने इस यात्रा को एक नई दिशा दी है।
अब यह हम पर निर्भर है कि हम इस दिशा को कितनी दूर और कितनी दृढ़ता से लेकर जाते हैं।
दीनेश पाल सिंह गुसाईँ
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