Sunday, November 23, 2025

काले मुर्गे की बढ़ती मांग: अंधविश्वास की वापसी या बेरोज़गारी का नया बाजार?

संपादकीय

काले मुर्गे की बढ़ती मांग: अंधविश्वास की वापसी या बेरोज़गारी का नया बाजार?

उत्तराखंड एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ आस्था और अंधविश्वास, विज्ञान और तंत्रवाद, और रोजगार व बाज़ार—तीनों की टकराहट साफ देखी जा सकती है। हाल के दिनों में मषण पूजन, झाड़–फूंक और तांत्रिक अनुष्ठानों की बढ़ती चर्चा के साथ काले मुर्गों की मांग में अचानक उछाल आना कोई संयोग नहीं है।

पहाड़ के कई इलाकों में काले मुर्गे बाजार में आमतौर पर मिलने वाली कीमत से कई गुना अधिक दामों पर बेचे जा रहे हैं। इसकी वजह न वैज्ञानिक है, न आर्थिक—बल्कि समाज में फैलती वह मनोवृत्ति है जहाँ समाधान की तलाश तर्क में नहीं बल्कि डर और आस्था में की जा रही है।

अंधविश्वास का बाज़ार

उत्तराखंड की पहाड़ी बसावटें सदियों से अपने लोकदेवताओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जानी जाती रही हैं। यह परंपराएँ समाज को जोड़ने का काम करती थीं। लेकिन अब इन्हीं परंपराओं की आड़ में एक ऐसा अंधविश्वास पनप रहा है जो न सिर्फ लोगों को भ्रमित कर रहा है, बल्कि उसे एक ‘कमाई का साधन’ भी बनाया जा रहा है।

कुछ लोगों द्वारा प्रचारित यह धारणा कि काले मुर्गे से “उपरी बाधा”, “बुरी नजर” या “ग्रह दोष” दूर हो सकते हैं, न सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टि का क्षय है बल्कि लोगों की कमजोरियों का शोषण भी है।

दुर्भाग्य यह है कि यही अंधविश्वास अब व्यापार बन गया है।

बेरोज़गारी और भ्रमित विकल्प

राज्य में बेरोज़गारी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में युवा किसी भी नए रोज़गार मॉडल की तरफ आकर्षित होते हैं। मुर्गी पालन एक बेहतर और व्यावहारिक व्यवसाय हो सकता है, लेकिन जब उसका आधार अंधविश्वास बन जाए तो समाज के सामने नई समस्याएँ खड़ी होती हैं।

यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या उत्तराखंड के युवाओं का भविष्य ऐसे व्यवसाय पर टिक सकता है जो तर्कहीन मान्यताओं पर आधारित हो?
अगर रोजगार की दिशा अज्ञान, डर, और तांत्रिक प्रथाओं पर निर्भर होने लगे, तो यह प्रगति नहीं, पिछड़ापन है।

क्या हम पुराने दौर की ओर लौट रहे हैं?

गाँवों में बढ़ती झाड़–फूंक संस्कृति, बीमारी का इलाज मेडिकल सेंटर की बजाय अनुष्ठान से करवाना, और सामाजिक संकटों का हल तांत्रिक तरीकों में ढूँढ़ना—ये सब संकेत हैं कि हम वैज्ञानिक सोच से दूर होते जा रहे हैं।
यह वही रास्ता है जो समाज को विकास से नहीं, बल्कि भ्रम की खाई में ले जाता है।

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और आपदाग्रस्त राज्य में वैज्ञानिक चेतना न सिर्फ ज़रूरी है बल्कि जीवनरक्षक भी है। ऐसे में अंधविश्वास का बढ़ना एक खतरनाक संदेश देता है।

आगे की दिशा

समाधान सरकार या समाज—दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

स्कूलों और गांवों में वैज्ञानिक चेतना के कार्यक्रम

स्वास्थ्य सुविधाओं और मानसिक परामर्श तक आसान पहुंच

प्रशासन द्वारा अवैध तांत्रिक गतिविधियों पर रोक

आधुनिक पशुपालन और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा

मीडिया द्वारा संतुलित, तथ्यपूर्ण रिपोर्टिंग


यह जरूरी है कि हम रोजगार दें—लेकिन ऐसा रोजगार जो तर्क, तकनीक, और सृजनशीलता पर आधारित हो, न कि भय और अंधविश्वास पर।



काला मुर्गा समस्या नहीं है—वह केवल एक प्रतीक है।
समस्या वह सोच है जो आज भी हमारे समाज के बड़े हिस्से को जकड़े हुए है।

उत्तराखंड को आगे बढ़ना है तो रास्ता विज्ञान से होकर गुजरेगा, न कि उन काले मुर्गों से जिनकी कीमत आज आस्था के नाम पर लगातार बढ़ रही है।

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