🧾 भाग–1 : नीतिगत रिपोर्ट (Policy Brief)
विषय: उत्तराखंड में अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और डायन-प्रथा की प्रचलन स्थिति एवं नियंत्रण हेतु नीतिगत सुझाव
🔹 परिचय
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में धार्मिक आस्था गहरी है, परंतु इसके साथ-साथ अंधविश्वास, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और “डायन” जैसी अवधारणाएँ भी कुछ क्षेत्रों में सामाजिक समस्या के रूप में मौजूद हैं।
ये प्रथाएँ विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए मानसिक, सामाजिक और शारीरिक हिंसा का कारण बनती हैं।
🔹 मुख्य कारण
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शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी
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ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता
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सामाजिक असमानता व लैंगिक भेदभाव
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धार्मिक आड़ में धोखाधड़ी करने वाले तथाकथित तांत्रिक व ओझा
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कानूनी जागरूकता का अभाव और पीड़ितों का डर
🔹 वर्तमान स्थिति
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NCRB रिपोर्टों के अनुसार, “जादू-टोना” या “डायन” के आरोपों से जुड़ी हत्याएँ देशभर में होती हैं,
हालांकि उत्तराखंड में आँकड़े अपेक्षाकृत कम हैं। -
राज्य के कुछ पर्वतीय जिलों (जैसे चंपावत, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा) से समय-समय पर
झाड़-फूंक, भूत-प्रेत या “देवी-दर्शन” के नाम पर हिंसक या शोषणकारी घटनाएँ सामने आई हैं। -
सरकार ने हाल ही में “फर्जी बाबाओं” और तांत्रिकों पर निगरानी बढ़ाई है, जो सकारात्मक कदम है।
🔹 प्रभाव
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महिलाओं के प्रति हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक उत्पीड़न।
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ग्रामीण समाज में भय और विभाजन।
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आर्थिक दोहन (भेंट, चढ़ावा, नकली इलाज)।
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कानून व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव।
🔹 सुझाव
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अंधविश्वास-निवारण अधिनियम:
महाराष्ट्र मॉडल की तरह “अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून” उत्तराखंड में भी लागू किया जाए। -
स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार:
प्रत्येक ब्लॉक में मोबाइल हेल्थ यूनिट्स और महिला स्वास्थ्य स्वयंसेवक नियुक्त हों। -
शैक्षिक और सामाजिक अभियान:
विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और ग्राम सभाओं के माध्यम से “वैज्ञानिक सोच” और “विवेक आधारित आस्था” पर कार्यक्रम। -
महिला सुरक्षा एवं पुनर्वास केंद्र:
झूठे आरोपों से प्रभावित महिलाओं के लिए कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श। -
मीडिया व डिजिटल अभियान:
सोशल मीडिया पर “#विश्वास_न_अंधविश्वास” जैसे अभियान चलाए जाएँ। -
फर्जी तांत्रिकों पर कानूनी कार्रवाई:
धार्मिक या तांत्रिक आड़ में धोखाधड़ी करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान।
🔹 निष्कर्ष
अंधविश्वास केवल अज्ञानता का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी का परिणाम है।
इसलिए सरकार, नागरिक समाज, धार्मिक संगठन और मीडिया — सभी को मिलकर
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशील कानून और जनजागरूकता को प्राथमिकता देनी होगी।
✍️ भाग–2 : संपादकीय/लेख
शीर्षक:
🕯️ “जब विश्वास अंधा हो जाता है — उत्तराखंड में अंधविश्वास का सच”
🌿 लेख
उत्तराखंड की वादियाँ देवभूमि कहलाती हैं, पर इन्हीं घाटियों में कभी-कभी अंधविश्वास के अंधेरे भी छिपे मिलते हैं।
कहीं कोई तांत्रिक “देवी उतरने” का दावा करता है, तो कहीं किसी महिला को “डायन” कहकर समाज से अलग कर दिया जाता है।
सवाल यह है — 21वीं सदी में भी यह सब क्यों?
दरअसल, जब स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर हों, शिक्षा अधूरी हो और न्याय दूर लगे —
तब भय, बीमारी और दुर्भाग्य का कारण “जादू-टोना” में खोज लिया जाता है।
और यही वह क्षण होता है जब विश्वास, अंधविश्वास में बदल जाता है।
ग्रामीण समाज में महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं।
जिनके पास जमीन नहीं, जिनकी आवाज़ कमजोर है — वे ही “डायन, जोगिन या कलंकित ” घोषित कर दी जाती हैं।
कई बार यह आरोप किसी की ज़मीन या प्रतिष्ठा हड़पने का हथियार बन जाता है।
उत्तराखंड सरकार ने हाल के वर्षों में फर्जी बाबाओं पर शिकंजा कसने की पहल की है,
लेकिन यह तभी पर्याप्त होगी जब शिक्षा और विज्ञान लोगों की आस्था के साथ-साथ चलें।
“देवभूमि” का अर्थ तभी पूरा होगा जब भक्ति के साथ विवेक भी जुड़ा हो।
अंधविश्वास कोई धर्म नहीं — यह भय की उपज है।
और भय को मिटाने का एक ही उपाय है — ज्ञान, संवेदना और सत्य का प्रकाश।
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