Wednesday, November 5, 2025

अंधविश्वास, ढोंग और चमत्कारों के नाम पर शोषण जैसे मुद्दे आज भी उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी समाज में मौजूद हैं।

 अंधविश्वास, ढोंग और चमत्कारों के नाम पर शोषण जैसे मुद्दे आज भी उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी समाज में मौजूद हैं।

अब देखें, कानूनी रूप से उत्तराखंड में ऐसा “Anti-Superstition Act” लाया जा सकता है या नहीं, तो जवाब है —
👉 हाँ, बिल्कुल लाया जा सकता है।

आइए विस्तार से समझते हैं 👇


⚖️ 1. संवैधानिक आधार (Constitutional Basis)

भारत के संविधान में राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वे “लोक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और सामाजिक सुधार” से जुड़े विषयों पर कानून बना सकती हैं।
यह अधिकार राज्य सूची (State List) और समवर्ती सूची (Concurrent List) में आता है।

इसलिए, उत्तराखंड सरकार चाहे तो महाराष्ट्र या कर्नाटक की तर्ज पर “अंधविश्वास निवारण अधिनियम” बना सकती है।


🏛️ 2. उदाहरण: महाराष्ट्र का कानून

महाराष्ट्र ने 2013 में एक ऐतिहासिक क़ानून बनाया था —
👉 “Maharashtra Prevention and Eradication of Human Sacrifice and Other Inhuman, Evil and Aghori Practices and Black Magic Act, 2013”

इस कानून के तहत:

  • झाड़-फूंक, चमत्कार दिखाकर धोखा देना,

  • अंधविश्वास के नाम पर किसी को नुकसान पहुँचाना,

  • तांत्रिक या बाबा बनकर आर्थिक शोषण करना,

  • इंसानी बलि या काला जादू जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देना
    अपराध माना गया है।

कर्नाटक ने भी 2017 में इसी तरह का कानून पारित किया।


🌄 3. उत्तराखंड में क्यों ज़रूरत है

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में:

  • कई जगहों पर भूत-प्रेत, झाड़-फूंक, और चमत्कारों के नाम पर शोषण होता है।

  • “देव-प्रेत निकालने” या “देवी चढ़ने” के नाम पर महिलाओं के साथ हिंसा और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएँ होती हैं।

  • कुछ “बाबा” या “धर्मगुरु” अंधभक्ति के जरिए पैसा और प्रभाव बटोरते हैं।

ऐसे में यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को नहीं, बल्कि धोखे और शोषण को रोकने का औजार बन सकता है।


📜 4. संभावित नाम और ढाँचा (Draft Idea)

यदि उत्तराखंड में ऐसा कानून बनाया जाए, तो उसका नाम और उद्देश्य कुछ इस तरह रखा जा सकता है:

“उत्तराखंड अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”

मुख्य प्रावधान हो सकते हैं:

  1. अंधविश्वास, काला जादू, या चमत्कार के नाम पर धोखा देने पर 6 माह से 5 वर्ष तक की सज़ा।

  2. झाड़-फूंक या देव-प्रेत निकालने के नाम पर किसी व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक रूप से हानि पहुँचाने पर सख्त दंड।

  3. ऐसे मामलों में विशेष पुलिस प्रकोष्ठ और जन-जागरूकता अभियान

  4. स्कूलों में वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के कार्यक्रम।


🧭 5. चुनौतियाँ

  • धार्मिक संगठनों की गलतफहमी कि यह कानून “धर्म-विरोधी” है।

  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।

  • पुलिस और प्रशासनिक प्रशिक्षण की कमी।

इन सबके बावजूद, अगर कानून का उद्देश्य स्पष्ट हो —

“धर्म नहीं, बल्कि धोखे के खिलाफ” —
तो यह समाज में एक बड़ा सुधारकारी कदम साबित हो सकता है।


🔹 निष्कर्ष

उत्तराखंड में अंधविश्वास और चमत्कारों के नाम पर शोषण रोकने के लिए कानून लाया जा सकता है —
बशर्ते सरकार इसे सामाजिक सुधार और वैज्ञानिक सोच के रूप में प्रस्तुत करे, न कि धार्मिक हस्तक्षेप के रूप में।



No comments:

Post a Comment

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...