क्या राजनीति साधन नहीं, उद्देश्य बन गई है?
राजनीति का मूल अर्थ है — “जनसेवा के माध्यम से समाज में व्यवस्था, न्याय और विकास स्थापित करना।”
महात्मा गांधी ने कहा था — “राजनीति धर्म से अलग नहीं हो सकती, यदि वह समाज की सेवा के लिए की जाए।”
लेकिन आज की राजनीति को देखकर लगता है कि उसका मार्ग बदल गया है। जो कभी साधन था — अब वही उद्देश्य बन बैठा है।
1. राजनीति का उद्देश्य हुआ करता था ‘सेवा’
आज़ादी के पहले के नेताओं के लिए राजनीति एक त्याग और सेवा का मार्ग थी।
नेहरू, पटेल, अंबेडकर, लोहिया या जयप्रकाश नारायण — इन सबके लिए राजनीति का अर्थ सत्ता नहीं, समाज था।
वे जानते थे कि सत्ता साधन है — जनता की पीड़ा को कम करने, देश को दिशा देने के लिए।
लेकिन अब राजनीति का मतलब है सत्ता प्राप्ति — और सेवा, नीति, आदर्श सब पीछे छूट गए हैं।
2. सत्ता साधन से उद्देश्य कैसे बनी?
धीरे-धीरे राजनीति में विचारधारा की जगह व्यक्तिवाद, जनहित की जगह निजी स्वार्थ और संघर्ष की जगह सुविधा आ गई।
जब राजनीति में पैसा, जाति, धर्म और मीडिया की ताकत हावी होने लगी, तब नीति की जगह अवसरवाद ने ले ली।
अब नेता यह नहीं सोचते कि “मैं क्या बदल सकता हूँ”, बल्कि यह सोचते हैं कि “मुझे क्या मिलेगा?”
यही वह मोड़ है जहाँ राजनीति साधन से उद्देश्य बन गई।
3. समाज पर प्रभाव — मूल्यहीन राजनीति का दौर
जब राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता रह जाए, तो समाज में भी मूल्यों का पतन होता है।
जनता नेताओं को “सेवक” नहीं, “शासक” समझने लगती है।
राजनीति फिर लोकतंत्र की आत्मा नहीं, लोभ का खेल बन जाती है।
नीतियां जनहित में नहीं, बल्कि राजनीतिक हित में बनती हैं।
4. क्या अब भी बदलाव संभव है?
हाँ, बिल्कुल। राजनीति को फिर से साधन बनाने के लिए जरूरी है कि —
जनता सजग और जागरूक बने,
युवाओं को राजनीति में सेवा भावना के साथ लाया जाए,
दलों में आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही स्थापित की जाए,
और सबसे जरूरी — जनता यह पूछे कि “राजनीति से हमें क्या मिला?” नहीं, बल्कि “राजनीति ने समाज के लिए क्या किया?”
5. निष्कर्ष
राजनीति जब तक साधन है, तब तक वह लोकशक्ति है;
पर जब वह उद्देश्य बन जाती है, तब वह लोकशक्ति नहीं, लोभशक्ति बन जाती है।
अब समय है कि राजनीति को फिर से अपने मूल स्वरूप — जनसेवा और सामाजिक परिवर्तन के साधन — के रूप में पुनर्स्थापित किया जाए।
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