राजनीति — यह शब्द सुनते ही आम लोगों के मन में दो तस्वीरें उभरती हैं: पहली, सत्ता की दौड़ में शामिल नेताओं की, और दूसरी, समाज की समस्याओं के समाधान की उम्मीद की। परंतु आज यह सवाल जरूरी हो गया है कि क्या राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित रह गई है, या यह सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम भी बन सकती है?
1. राजनीति का उद्देश्य — सत्ता या समाज?
भारत के लोकतंत्र में राजनीति मूलतः जनता की सेवा और समाज के उत्थान का माध्यम थी। गांधी, नेहरू, लोहिया, अंबेडकर, जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का औजार माना। उनके लिए सत्ता साधन थी, उद्देश्य नहीं। लेकिन समय के साथ राजनीति का चरित्र बदलता गया। आज अधिकांश दल और नेता चुनावी जीत को ही अंतिम लक्ष्य मानते हैं। नीति और विचारधारा की जगह अब जाति, धर्म और पैसों की ताकत ने ले ली है।
2. चुनाव के बाद राजनीति का मौन
चुनाव के दौरान नेता जनता के बीच जाकर विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात करते हैं, परंतु जीत के बाद वही विषय उनके एजेंडे से गायब हो जाते हैं। राजनीति अब पांच वर्षों में एक बार जागने वाला उत्सव बन गई है। इस प्रवृत्ति ने जनता और नेताओं के बीच विश्वास का संकट पैदा किया है।
3. सामाजिक मुद्दों पर जन आंदोलन — राजनीति का असली रूप
जब-जब जनता ने राजनीति को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा, तब-तब इतिहास ने परिवर्तन देखा।
स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन तक,
अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन से लेकर महिलाओं और किसानों के अधिकारों की लड़ाई तक,
इन सबने दिखाया कि राजनीति सिर्फ सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि जनचेतना जगाने का आंदोलन भी है।
राजनीति तब सार्थक होती है जब वह समाज के मौलिक प्रश्नों — जैसे शिक्षा, बेरोजगारी, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण, और समान अवसर — पर जनमत तैयार करे और ठोस बदलाव लाए।
4. राजनीतिक कार्यकर्ता — सेवक या करियरिस्ट?
आज का बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या राजनीतिक कार्यकर्ता अपने को सामाजिक परिवर्तन का वाहक मानता है या फिर राजनीति को रोजगार का विकल्प समझने लगा है?
अधिकांश युवा राजनीति में विचारधारा से ज्यादा भविष्य की सुरक्षा के लिए आते हैं। पार्टियों में टिकट, पद और पहचान पाने की होड़ में सामाजिक सरोकार पीछे छूट जाते हैं। परंतु कुछ अपवाद आज भी हैं — जो बिना किसी पद या लाभ के समाज के लिए कार्य कर रहे हैं, यही लोग राजनीति की असली आत्मा हैं।
5. भविष्य की राजनीति — जन और समाज के बीच सेतु
अगर राजनीति को फिर से जनआंदोलन से जोड़ना है, तो उसे
पारदर्शिता,
जवाबदेही,
नैतिकता
और
सामाजिक संवेदनशीलता
के सिद्धांतों पर खड़ा करना होगा।
राजनीतिक कार्यकर्ता को पार्टी का प्रचारक नहीं, बल्कि जनहित का प्रहरी बनना होगा।
निष्कर्ष:
राजनीति तब तक अधूरी है जब तक वह समाज की आत्मा को नहीं छूती। चुनाव जीतना राजनीति का हिस्सा है, पर उद्देश्य नहीं। असली राजनीति वही है जो जनता के जीवन में आशा, न्याय और समानता का संचार करे।
इसलिए अब वक्त है यह तय करने का — हम राजनीति को सत्ता का मंच मानते हैं या सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन?
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