उत्तराखंड जैसे छोटे, संवेदनशील और संसाधन-सीमित राज्य में राजनीति का चरित्र केवल सत्ता का प्रश्न नहीं होता, वह जनता के भविष्य का प्रश्न होता है। 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही यह सवाल और गहरा हो गया है—क्या उत्तराखंड की राजनीति जनता की समस्याओं से बाहर निकल पाएगी, या वही “गंदी राजनीति” एक बार फिर हावी रहेगी?
पिछले वर्षों में सत्ता का व्यवहार यह संकेत देता रहा है कि चुनावी प्रबंधन, छवि निर्माण और विरोध को दबाना—इन सबको शासन से ज़्यादा महत्व मिला। पहाड़ों में रोज़गार का संकट गहराता गया, पलायन स्थायी समस्या बनता गया, लेकिन राजनीति का विमर्श इन मुद्दों के इर्द-गिर्द टिक नहीं पाया।
2027 के चुनाव से पहले एक बार फिर वही रणनीति साफ दिखती है—भावनात्मक मुद्दे, पहचान की राजनीति और विकास के बड़े-बड़े दावे। ज़मीन पर स्कूलों की हालत, अस्पतालों की कमी, आपदा प्रबंधन की विफलताएँ और बेरोज़गार युवाओं की हताशा इन दावों से मेल नहीं खाती।
भ्रष्टाचार के सवाल भी चुनावी मौसम में दबा दिए जाते हैं। जांच आयोग और रिपोर्टें जनता के सामने जवाब नहीं बन पातीं, बल्कि समय काटने का औज़ार बन जाती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है, क्योंकि जब चुनाव बिना जवाबदेही के हो, तो सत्ता और निरंकुश हो जाती है।
2027 का चुनाव इसलिए निर्णायक है क्योंकि यह सिर्फ़ सरकार बदलने या बनाए रखने का चुनाव नहीं है—यह राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देने का अवसर है। सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा, सवाल यह है कि क्या जनता मुद्दों को एजेंडा बना पाएगी?
अगर रोज़गार, पलायन, पर्यावरण, स्थानीय अधिकार और पारदर्शिता चुनावी बहस के केंद्र में नहीं आए, तो “गंदी राजनीति” और मजबूत होगी। लेकिन अगर मतदाता सवाल पूछने लगे, तो यही चुनाव राजनीति को साफ करने की शुरुआत भी बन सकता है।
उत्तराखंड का इतिहास गवाह है—यह राज्य चुप रहने के लिए नहीं बना। 2027 में जनता के पास मौका है कि वह तय करे:
राजनीति सत्ता के लिए होगी या पहाड़ और जनता के लिए।