Monday, December 29, 2025
मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी
Sunday, December 28, 2025
आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?
ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी: जन्म नहीं, बोध की परंपरा
ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी के मूल स्तंभ
इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक
“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”
Saturday, December 27, 2025
चुप्पी भी एक अपराध
संपादकीय | चुप्पी भी एक अपराध
अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर से सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है। कारण है—मामले में वीआईपी नाम का सामने आना। लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक है, इस खुलासे के बाद संविधानिक संस्थाओं की चुप्पी, विशेषकर उत्तराखंड महिला आयोग का इस पर संज्ञान न लेना।
यह सवाल केवल एक व्यक्ति या एक बयान का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है, जो महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का दावा करती है, लेकिन जब सत्ता के गलियारों तक मामला पहुंचता है, तो वही व्यवस्था मौन साध लेती है।
अंकिता एक आम लड़की थी—न सत्ता में, न प्रभाव में। उसकी हत्या पहले ही प्रदेश और देश की न्यायिक संवेदना को झकझोर चुकी है। ऐसे में यदि अब किसी वीआईपी की भूमिका को लेकर सवाल उठते हैं, तो यह महिला आयोग जैसे संस्थानों की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वे स्वतः संज्ञान लें, निष्पक्ष जांच की मांग करें और पीड़िता के पक्ष में मजबूती से खड़ी हों।
लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो संदेश स्पष्ट जाता है—
कि न्याय की रेखा प्रभावशाली और साधारण के बीच कहीं धुंधली हो जाती है।
महिला आयोग का मौन केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि संस्थागत साहस की कमी को उजागर करता है। आयोग का गठन सिर्फ औपचारिकता के लिए नहीं हुआ है; उसका उद्देश्य है—जहाँ व्यवस्था डगमगाए, वहाँ हस्तक्षेप करना।
आज जरूरत है कि इस मामले में:
सभी दावों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो
किसी भी प्रभावशाली नाम को जांच से बाहर न रखा जाए
महिला आयोग जैसी संस्थाएं अपनी भूमिका को पुनः स्थापित करें
क्योंकि अगर सत्ता के नाम पर संवेदनशील मामलों में भी संस्थाएं खामोश रहेंगी, तो सवाल केवल अंकिता के लिए नहीं उठेगा—सवाल हर उस बेटी के लिए होगा, जो न्याय की उम्मीद लेकर व्यवस्था की ओर देखती है।
न्याय केवल फैसलों से नहीं, साहसिक हस्तक्षेप से भी जिंदा रहता है।
और चुप्पी—कई बार सबसे बड़ा अपराध बन जाती है।
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