Monday, December 29, 2025

मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी



संपादकीय: मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी

मजीठिया वेज बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में फैसला पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्रकारों और समाचार पत्र कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन और भत्तों की सिफारिशें वैध और लागू होने योग्य हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस की वकालत ने कर्मचारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाई।

लेकिन, 2025 में भी यह लड़ाई पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कई मीडिया संस्थानों में वेज बोर्ड की सिफारिशों का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है। कर्मचारियों को अभी भी अपने बकाया वेतन और भत्तों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह दर्शाता है कि कानूनी जीत के बावजूद, वास्तविक जीवन में न्याय के लिए निरंतर सतर्कता और प्रयास की आवश्यकता होती है।

मजीठिया वेज बोर्ड का मामला हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है। जब तक पत्रकारों के अधिकार सुरक्षित नहीं होंगे, समाज में निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया का सपना अधूरा रहेगा।

न्यायपालिका ने दिशा दिखा दी है, अब यह जिम्मेदारी मीडिया संस्थानों और समाज की है कि पत्रकारों के अधिकारों की पूरी रक्षा सुनिश्चित करें।

Sunday, December 28, 2025

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर आरोप नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत आत्मालोचना है। सच यह है कि आज का ब्राह्मण—और केवल ब्राह्मण ही क्यों, पूरा समाज—अपने मूल दर्शन से कटा हुआ है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।

पहला कारण—जन्म का भ्रम।
समय के साथ ब्राह्मण होना साधना से हटकर पहचान बन गया। जो दर्शन कभी ज्ञान, संयम और तप पर आधारित था, वह केवल उपनाम और परंपरा में सिमट गया। जब “होना” स्वतः मान लिया जाए, तो “बनने” की यात्रा रुक जाती है। यही कारण है कि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी, जो आत्मचिंतन और प्रश्न की मांग करती थी, औपचारिक कर्मकांड में बदल गई।

दूसरा कारण—ग्रंथों से दूरी।
जिस परंपरा की आत्मा उपनिषद जैसे ग्रंथों में बसती है, वहाँ आज उनका पाठ नहीं, केवल उनका नाम बचा है। ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी प्रश्न पूछना सिखाती है—“मैं कौन हूँ?”, “सत्य क्या है?”—लेकिन आज अधिकांश धार्मिक शिक्षा उत्तर रटाने तक सीमित है। प्रश्नों से डर और जिज्ञासा का अभाव बोध को जन्म ही नहीं लेने देता।

तीसरा कारण—कर्मकांड का वर्चस्व।
दर्शन कठिन है, कर्मकांड आसान। दर्शन विवेक माँगता है, कर्मकांड केवल अभ्यास। धीरे-धीरे ब्राह्मण की भूमिका समाज के पथप्रदर्शक से घटकर अनुष्ठान कराने वाले पेशेवर की बन गई। जब ज्ञान का स्थान प्रक्रिया ले ले, तब बोध खो जाता है।

चौथा कारण—सत्ता से समझौता।
इतिहास में कई दौर ऐसे आए जब ब्राह्मण वर्ग ने सत्ता से दूरी रखने के बजाय उससे समझौता किया। परिणामस्वरूप दर्शन निर्भीक नहीं रहा। जबकि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का मूल स्वर सत्ता से प्रश्न करना था—जैसा कि आदि शंकराचार्य ने अपने समय में किया। आज वह साहस कम दिखाई देता है।

पाँचवाँ कारण—आधुनिकता का अधूरा बोध।
आज का ब्राह्मण न पूरी तरह परंपरा में है, न पूरी तरह आधुनिक विवेक में। पश्चिमी आधुनिकता उसने उपभोग में अपनाई, लेकिन आलोचनात्मक चिंतन में नहीं; और परंपरा उसने रस्मों में बचाई, दर्शन में नहीं। इस दोराहे पर खड़ा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से बौध से दूर हो जाता है।

निष्कर्ष
आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध इसलिए नहीं है क्योंकि उसने ब्राह्मण होने को विरासत और ब्राह्मण बनने की साधना छोड़ दी है।
बोध किसी जाति से नहीं, चेतना के श्रम से आता है।
जिस दिन ब्राह्मण फिर से प्रश्न करेगा, सत्ता से दूरी रखेगा, और ज्ञान को जीवन में उतारेगा—उसी दिन यह दर्शन पुनर्जीवित होगा।

यह संकट किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे समाज का है। क्योंकि जब मार्गदर्शक ही मार्ग भूल जाए, तो यात्रा भटकना तय है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी: जन्म नहीं, बोध की परंपरा

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी: जन्म नहीं, बोध की परंपरा

आज “ब्राह्मण” शब्द आते ही बहस खड़ी हो जाती है। कोई इसे विशेषाधिकार से जोड़ता है, कोई वर्चस्व से। लेकिन इस शोर में वह मूल विचार गुम हो गया है जिसे ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी कहा जाता है। यह दर्शन किसी जाति का प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि ब्रह्म को जानने की बौद्धिक–नैतिक यात्रा है।

भारतीय दर्शन की परंपरा में ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का आधार वेद और उपनिषद हैं। इन ग्रंथों में ब्राह्मण का अर्थ है—जो प्रश्न करता है, जो सत्य की खोज में जीवन को तपस्या बनाता है। “अहं ब्रह्मास्मि” जैसी उक्ति यह स्पष्ट करती है कि परम सत्य बाहर नहीं, चेतना के भीतर खोजा जाना है।

यह दर्शन ज्ञान को सर्वोच्च मानता है। यहाँ सत्ता, संपत्ति या जन्म नहीं, बल्कि विवेक और बोध निर्णायक हैं। इसलिए ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी समाज को निर्देश देती है कि अंधविश्वास नहीं, प्रश्न पूछो; अनुकरण नहीं, आत्मबोध करो। यही कारण है कि यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, गहराई से दार्शनिक और नैतिक है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का शिखर रूप अद्वैत वेदांत में दिखाई देता है, जिसे व्यवस्थित स्वरूप दिया आदि शंकराचार्य ने। अद्वैत का संदेश सीधा है—जीव और ब्रह्म में भेद अज्ञान से है, ज्ञान से नहीं। जब यह समझ आती है, तब ऊँच–नीच, मैं–तुम, अपना–पराया अपने आप ढह जाते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ इस दर्शन को जन्म आधारित श्रेष्ठता में बदल दिया गया। यही विकृति “ब्राह्मणवाद” कहलाती है, जिसने दर्शन को सत्ता का औज़ार बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जो परंपरा समाज को दिशा देने वाली थी, वही समाज को बाँटने का माध्यम बन गई।

आज के भारत में, जब धर्म का उपयोग राजनीति और ध्रुवीकरण के लिए हो रहा है, तब ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी की मूल आत्मा और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि धर्म आचरण है, प्रदर्शन नहीं; और ब्राह्मण होना अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है—सत्य बोलने का, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का, और समाज को विवेक की ओर ले जाने का।

निष्कर्षतः, ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी किसी एक समुदाय की जागीर नहीं। यह चेतना की वह ऊँचाई है जहाँ पहुँचना हर मनुष्य के लिए संभव है। जो सत्य की खोज करे, जो ज्ञान को जीवन में उतारे—वही इस दर्शन की सच्ची परिभाषा है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी के मूल स्तंभ

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी कोई जातीय श्रेष्ठता का सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन–ब्रह्म–ज्ञान को समझने की एक दार्शनिक परंपरा है। इसका केंद्र “कौन जन्म से क्या है” नहीं, बल्कि “कौन कर्म, ज्ञान और आचरण से क्या बनता है” — यही इसका मूल है।


---

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी के मूल स्तंभ

1️⃣ ब्रह्म की खोज

ब्राह्मण दर्शन का केंद्रीय प्रश्न है— ब्रह्म क्या है?
यानी वह परम सत्य जो सृष्टि, चेतना और अस्तित्व का आधार है।
यह विचार हमें वेद और विशेष रूप से उपनिषद में मिलता है—

> “अहं ब्रह्मास्मि” — मैं ही ब्रह्म हूँ।




---

2️⃣ ज्ञान को सर्वोच्च मान

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी में ज्ञान (ज्ञानयोग) को मुक्ति का मार्ग माना गया है—
धन, सत्ता या जन्म नहीं, बल्कि बोध और विवेक।

यही कारण है कि यह दर्शन प्रश्न करना सिखाता है—

> क्यों? कैसे? सत्य क्या है?




---

3️⃣ कर्म और आचरण

यह दर्शन केवल विचार नहीं, जीवन-पद्धति है।
ब्राह्मण वही है जो—

सत्य बोले

संयम रखे

लोभ से मुक्त हो

समाज को दिशा दे


यानी ब्राह्मण होना कर्तव्य है, अधिकार नहीं।


---

4️⃣ अद्वैत की दृष्टि

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का शिखर है अद्वैत वेदांत —
जिसे व्यवस्थित रूप दिया आदि शंकराचार्य ने।

इसका सार—

> जीव और ब्रह्म अलग नहीं हैं।
भेद अज्ञान से है, ज्ञान से एकता प्रकट होती है।




---

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी बनाम ब्राह्मणवाद

यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा हुआ—

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी → ज्ञान, तप, नैतिकता, प्रश्न

ब्राह्मणवाद (विकृत रूप) → जन्म, प्रभुत्व, अहंकार


जब दर्शन सत्ता का औज़ार बनता है, तब उसका पतन होता है।


---

आज के संदर्भ में

आज जब—

धर्म राजनीति बन रहा है

ज्ञान की जगह शोर है

आस्था का उपयोग नफ़रत के लिए हो रहा है


तब ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी हमें याद दिलाती है—

> धर्म धारण करने की वस्तु है,
दूसरों पर थोपने की नहीं।




---

निष्कर्ष

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी जन्म की नहीं, चेतना की पहचान है।
जो सत्य की खोज करे, वही ब्राह्मण—
चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या समय का हो।


इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

(संपादकीय)

1919 में यदि औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिनिधि Lord Chelmsford से जुड़ा यह कथन— “ब्राह्मणों में नायकत्व नहीं होता”—कहा या प्रचारित किया गया, तो वह केवल उस दौर की राजनीतिक चाल नहीं थी। वह एक सोची-समझी रणनीति थी—समाज को बाँटो, नेतृत्व को कमज़ोर करो और सत्ता को सुरक्षित रखो।

दुखद सच्चाई यह है कि एक सदी बाद भी यह रणनीति बदली नहीं है, केवल शासक बदल गए हैं, तरीके आधुनिक हो गए हैं।

आज भी नायकत्व को परिभाषित करने का ठेका कुछ खास खाँचों ने ले रखा है। कोई जाति, कोई वर्ग, कोई विचारधारा—सबको प्रमाणपत्र बाँटे जा रहे हैं कि कौन “नेतृत्व के योग्य” है और कौन नहीं। फर्क बस इतना है कि 1919 में यह काम विदेशी सत्ता करती थी, आज यह काम हम अपने ही समाज के भीतर से कर रहे हैं।

वर्तमान भारत में जब भी कोई वर्ग सवाल पूछता है, तर्क देता है, संविधान की भाषा बोलता है—उसे तुरंत किसी न किसी लेबल में बंद कर दिया जाता है।

कभी “एलीट”

कभी “अर्बन नक्सल”

कभी “जातिवादी”


यह वही मानसिकता है, जो कभी “नायकत्व नहीं होता” जैसे वाक्यों में व्यक्त हुई थी।

आज नेतृत्व को भी केवल शोर, शक्ति और आक्रामकता से जोड़ दिया गया है। शांत विवेक, वैचारिक गहराई और नैतिक साहस को कमजोरी समझा जाने लगा है। यह सोच लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक है, जितनी औपनिवेशिक शासन के लिए राष्ट्रीय चेतना खतरनाक थी।

इतिहास गवाह है—जब भी समाज ने नायकत्व को संकीर्ण परिभाषाओं में कैद किया, तब-तब वह बाहरी या भीतरी सत्ता के हाथों खिलौना बना। 1919 में अंग्रेज़ों ने यह प्रयोग किया था, आज हम वही प्रयोग स्वयं पर दोहरा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किस जाति या वर्ग में नायकत्व है।
असल सवाल यह है—क्या हम विचार आधारित नेतृत्व से डरने लगे हैं?
क्या हम अब भी यह तय करना चाहते हैं कि कौन नेतृत्व करेगा, और कौन केवल अनुसरण?

1919 का कथन हमें चेतावनी देता है—नायकत्व को जाति, वर्ग या पहचान से जोड़ना सत्ता के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन समाज के लिए यह हमेशा विनाशकारी सिद्ध हुआ है।

इतिहास केवल पढ़ने के लिए नहीं होता।
इतिहास इसलिए होता है ताकि हम वही गलती दोबारा न करें—
जिसे कभी किसी वायसराय ने हमारे लिए रचा था,
और जिसे आज हम स्वयं अपने लिए रच रहे हैं।

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

धर्म का अर्थ है—जो हमें धारण करे, जो हमारे आचरण, करुणा और विवेक को संभाले।
पर जब धर्म नशा बन जाता है, तब वह हमें नहीं संभालता—हम दूसरों को कुचलने लगते हैं।

धर्म का नशा आदमी को इतना मदहोश कर देता है कि
वह ईश्वर की जगह स्वयं को उसका ठेकेदार समझने लगता है।
फिर सत्य नहीं, केवल पहचान बचती है;
करुणा नहीं, केवल क्रोध बोलता है।

धर्म को धारण करने वाला व्यक्ति
शांत होता है, सहिष्णु होता है, प्रश्न करता है।
वहीं धर्म का नशा करने वाला
भीड़ बनाता है, दुश्मन खोजता है और हिंसा को आस्था कहता है।

सच्चा धर्म
हाथ में शस्त्र नहीं,
हृदय में संवेदना देता है।
वह दूसरों को बदलने नहीं,
खुद को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।

धर्म यदि हमें
अहंकारी, कठोर और असहिष्णु बना दे—
तो समझ लेना चाहिए कि
हमने धर्म नहीं, नशा कर लिया है।

धर्म वह है जो
मनुष्य को मनुष्य बनाए।
बाक़ी सब—केवल शोर है।

Saturday, December 27, 2025

चुप्पी भी एक अपराध

 

संपादकीय | चुप्पी भी एक अपराध

अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर से सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है। कारण है—मामले में वीआईपी नाम का सामने आना। लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक है, इस खुलासे के बाद संविधानिक संस्थाओं की चुप्पी, विशेषकर उत्तराखंड महिला आयोग का इस पर संज्ञान न लेना।

यह सवाल केवल एक व्यक्ति या एक बयान का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है, जो महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का दावा करती है, लेकिन जब सत्ता के गलियारों तक मामला पहुंचता है, तो वही व्यवस्था मौन साध लेती है।

अंकिता एक आम लड़की थी—न सत्ता में, न प्रभाव में। उसकी हत्या पहले ही प्रदेश और देश की न्यायिक संवेदना को झकझोर चुकी है। ऐसे में यदि अब किसी वीआईपी की भूमिका को लेकर सवाल उठते हैं, तो यह महिला आयोग जैसे संस्थानों की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वे स्वतः संज्ञान लें, निष्पक्ष जांच की मांग करें और पीड़िता के पक्ष में मजबूती से खड़ी हों।

लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो संदेश स्पष्ट जाता है—
कि न्याय की रेखा प्रभावशाली और साधारण के बीच कहीं धुंधली हो जाती है।

महिला आयोग का मौन केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि संस्थागत साहस की कमी को उजागर करता है। आयोग का गठन सिर्फ औपचारिकता के लिए नहीं हुआ है; उसका उद्देश्य है—जहाँ व्यवस्था डगमगाए, वहाँ हस्तक्षेप करना।

आज जरूरत है कि इस मामले में:

  • सभी दावों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो

  • किसी भी प्रभावशाली नाम को जांच से बाहर न रखा जाए

  • महिला आयोग जैसी संस्थाएं अपनी भूमिका को पुनः स्थापित करें

क्योंकि अगर सत्ता के नाम पर संवेदनशील मामलों में भी संस्थाएं खामोश रहेंगी, तो सवाल केवल अंकिता के लिए नहीं उठेगा—सवाल हर उस बेटी के लिए होगा, जो न्याय की उम्मीद लेकर व्यवस्था की ओर देखती है।

न्याय केवल फैसलों से नहीं, साहसिक हस्तक्षेप से भी जिंदा रहता है।
और चुप्पी—कई बार सबसे बड़ा अपराध बन जाती है।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...