“अध्यक्ष या कार्यकर्ता? लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल”
लोकतंत्र में पद की गरिमा व्यक्ति से बड़ी होती है। और जब बात विधानसभा अध्यक्ष की हो, तो यह गरिमा और भी ऊँची हो जाती है। अध्यक्ष केवल एक विधायक नहीं होते, वे सदन की आत्मा होते हैं—निष्पक्षता, संतुलन और संविधान के प्रहरी।
भारतीय संविधान ने विधानसभा अध्यक्ष को जो स्थान दिया है, वह दलगत सीमाओं से परे है। अनुच्छेद 178 से 187 तक अध्यक्ष की भूमिका स्पष्ट करती है कि यह पद सत्ता या विपक्ष का नहीं, बल्कि पूरे सदन का है। ऐसे में यदि कोई अध्यक्ष आम जनता के बीच अपनी ही पार्टी के पक्ष में नारे लगाते दिखाई दें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या वे अब भी निष्पक्ष हैं?
सवाल केवल नैतिकता का नहीं, लोकतांत्रिक विश्वास का है।
Supreme Court of India ने दल-बदल कानून के संदर्भ में कई बार कहा है कि अध्यक्ष का पद “अर्ध-न्यायिक” (quasi-judicial) प्रकृति का है। जब वही व्यक्ति खुले मंच से दलगत नारों में शामिल हो, तो क्या उनके निर्णयों पर भरोसा वैसा ही रह पाएगा?
लोकतंत्र में निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए और दिखनी ही चाहिए।
अध्यक्ष यदि पार्टी के कार्यकर्ता की भूमिका निभाएँगे, तो सदन में विपक्ष को न्याय मिलने की उम्मीद कैसे होगी? क्या उनके हर फैसले पर राजनीतिक चश्मा नहीं चढ़ जाएगा?
यह तर्क दिया जा सकता है कि अध्यक्ष अपनी पार्टी के सदस्य बने रहते हैं, इसलिए उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। परंतु क्या संवैधानिक पद की शपथ केवल औपचारिकता है? क्या पद की गरिमा व्यक्तिगत राजनीतिक उत्साह से छोटी हो गई है?
ब्रिटेन सहित कई संसदीय लोकतंत्रों में स्पीकर चुने जाने के बाद दलगत राजनीति से स्वयं को अलग कर लेते हैं। भारत में भले ही ऐसा औपचारिक प्रावधान न हो, परंतु परंपरा और मर्यादा यही अपेक्षा करती है।
आज आवश्यकता है कि हम पद और व्यक्ति के बीच स्पष्ट रेखा खींचें।
अध्यक्ष यदि पार्टी के मंच पर खड़े होकर नारे लगाएँगे, तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाएगा।
लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं, विश्वास का तंत्र है।
और विश्वास की पहली शर्त है—निष्पक्षता।
अंततः प्रश्न यही है:
क्या विधानसभा अध्यक्ष दल के सिपाही बनेंगे या संविधान के प्रहरी बने रहेंगे?
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