दक्षिण एशिया के देश Sri Lanka ने हाल ही में सांसदों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन समाप्त कर एक बड़ा और प्रतीकात्मक निर्णय लिया है। 49 वर्ष पुराने कानून को भारी बहुमत से रद्द किया जाना केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का संदेश भी है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है—क्या India में भी ऐसा होना चाहिए?
भारत में सांसदों को पेंशन का प्रावधान सांसद वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 के तहत मिलता है। केवल एक कार्यकाल (पाँच वर्ष) पूरा करने पर आजीवन पेंशन का अधिकार बन जाता है, और अतिरिक्त कार्यकाल पर राशि बढ़ती जाती है। यह व्यवस्था उस समय बनी थी जब राजनीति में आर्थिक स्थिरता सीमित थी और जनप्रतिनिधियों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक समझा गया।
लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। देश में करोड़ों कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना से बाहर हो चुके हैं। सरकारी सेवाओं में अंशदायी पेंशन व्यवस्था लागू है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों के लिए बिना अंशदान के आजीवन पेंशन का प्रावधान नैतिक बहस का विषय बनता है। क्या लोकतंत्र में कानून बनाने वाले स्वयं के लिए विशेषाधिकार सुरक्षित रखें, जबकि आम नागरिक कठोर नियमों का पालन करे?
पेंशन समाप्त करने के पक्ष में तर्क है कि राजनीति “सेवा” है, स्थायी रोजगार नहीं। जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास से चुनकर आते हैं, न कि नौकरी के अनुबंध से। पाँच वर्ष के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन का अधिकार आम नागरिक की दृष्टि में असमानता का प्रतीक बनता है। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और सादगी का संदेश भी आवश्यक है।
हालाँकि विरोध में यह तर्क भी कमज़ोर नहीं है कि राजनीति पूर्णकालिक दायित्व है। अनेक सांसद निजी व्यवसाय या पेशा छोड़कर सार्वजनिक जीवन में आते हैं। आर्थिक सुरक्षा का अभाव उन्हें बाहरी आर्थिक प्रभावों के प्रति संवेदनशील बना सकता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी समानता।
इस बहस का समाधान शायद पूर्ण समाप्ति या यथास्थिति में नहीं, बल्कि संतुलित सुधार में है। पेंशन को अंशदायी बनाया जा सकता है, आय या आर्थिक स्थिति से जोड़ा जा सकता है, या न्यूनतम कार्यकाल की सीमा बढ़ाई जा सकती है। “एक व्यक्ति, एक पेंशन” का सिद्धांत भी अपनाया जा सकता है।
अंततः यह प्रश्न केवल वित्तीय नहीं, बल्कि नैतिक और लोकतांत्रिक है। जनता आज अधिक जागरूक है और राजनीतिक वर्ग से जवाबदेही की अपेक्षा करती है। यदि जनप्रतिनिधि स्वयं को विशेषाधिकार से ऊपर रखकर समानता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता और मजबूत होगी।
भारत को निर्णय जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक विमर्श के बाद लेना चाहिए। पर इतना निश्चित है कि समय बदल चुका है—और राजनीति को भी बदलते समय के अनुरूप स्वयं को पुनर्परिभाषित करना होगा।
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