Friday, February 20, 2026

उत्तराखंड पर आर्थिक बोझ: बढ़ती अफसरशाही और घटती कार्यकुशलता की हकीकत

उत्तराखंड पर आर्थिक बोझ: बढ़ती अफसरशाही और घटती कार्यकुशलता की हकीकत

देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक संपदा, पर्यटन और सैनिक परंपरा के लिए जानी जाती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। एक ओर विकास योजनाओं के बड़े दावे हैं, तो दूसरी ओर सरकारी खजाने पर बढ़ता वेतन–पेंशन बोझ और विभागों में अधिकारी–कर्मचारियों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय बन चुकी है।

1. बढ़ता वेतन और पेंशन व्यय

राज्य के वार्षिक बजट का बड़ा हिस्सा वेतन, भत्तों और पेंशन में खर्च हो जाता है। विकास योजनाओं, आधारभूत संरचना और रोजगार सृजन के लिए अपेक्षित संसाधन सीमित रह जाते हैं। छोटे राज्य होने के बावजूद प्रशासनिक ढांचा अपेक्षाकृत बड़ा है, जिससे राजकोषीय संतुलन बिगड़ता है।

2. विभागों में बढ़ती “फौज”

कई विभागों में पदों का सृजन तो हुआ, पर कार्य–आवंटन और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था नहीं बन पाई। परिणामस्वरूप:

फाइलों का अंबार बढ़ता है

निर्णय लेने में देरी होती है

ज़मीनी स्तर पर काम की गति धीमी रहती है

समान कार्य के लिए कई स्तरों पर स्वीकृति की जरूरत पड़ती है


यह संरचना आम जनता को त्वरित सेवा देने के बजाय प्रक्रिया को जटिल बना देती है।

3. काम न करने की सच्चाई या सिस्टम की खामी?

यह कहना आसान है कि “अधिकारी काम नहीं करते”, पर समस्या अक्सर प्रणालीगत होती है:

बार–बार तबादले

स्पष्ट लक्ष्य और प्रदर्शन मानकों का अभाव

राजनीतिक हस्तक्षेप

तकनीकी दक्षता की कमी


जब जवाबदेही तय नहीं होती, तो कार्य संस्कृति भी कमजोर पड़ती है।

4. आर्थिक बोझ के परिणाम

राज्य का कर्ज बढ़ता है

नई भर्तियों पर रोक या देरी

विकास परियोजनाओं में कटौती

कर/शुल्क बढ़ाने का दबाव


इसका सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है—चाहे वह बिजली दर हो, पानी का बिल या अन्य सेवाएं।

5. समाधान क्या हो सकते हैं?

1. प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन प्रणाली लागू की जाए।


2. ई-गवर्नेंस और डिजिटल फाइल सिस्टम को अनिवार्य बनाया जाए।


3. अनावश्यक पदों की समीक्षा और मानव संसाधन ऑडिट किया जाए।


4. विभागों के विलय/पुनर्गठन से प्रशासनिक खर्च कम किया जाए।


5. लोकसेवकों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त निगरानी तंत्र बने।



निष्कर्ष

उत्तराखंड जैसे छोटे और संसाधन–संवेदनशील राज्य के लिए वित्तीय अनुशासन और कार्यकुशल प्रशासन अनिवार्य है। केवल कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने से विकास नहीं होता; आवश्यक है पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणाम–केंद्रित शासन।

यदि राज्य को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है, तो “संख्या” नहीं, “कुशलता” पर ध्यान देना होगा—तभी सरकारी तंत्र जनता के विश्वास पर खरा उतर सकेगा।

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