Sunday, May 25, 2025

पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत (Public Trust Doctrine)

पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत (Public Trust Doctrine) 


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क्या है पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत?

पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत एक ऐसा कानूनी सिद्धांत है जिसके अनुसार कुछ प्राकृतिक संसाधन जैसे – जल, वायु, वन, नदियाँ, समुद्र तट आदि – जनता की साझा संपत्ति माने जाते हैं और इनका संरक्षण करना राज्य (सरकार) का कर्तव्य होता है।

राज्य इन संसाधनों का मालिक नहीं, बल्कि ट्रस्टी (संरक्षक) होता है और वह इन्हें निजी स्वार्थ, लाभ या विकास परियोजनाओं के नाम पर किसी को बेच या नुकसान नहीं पहुँचा सकता।


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मुख्य बिंदु:

1. उत्पत्ति (Origin):

यह सिद्धांत रोमन कानून से आया है जिसमें कहा गया कि कुछ संसाधन (जैसे हवा, पानी) सभी के लिए समान रूप से हैं।

फिर यह ब्रिटिश कॉमन लॉ में विकसित हुआ और अब भारत समेत कई देशों में लागू होता है।



2. भारत में स्थिति:

सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को कई पर्यावरणीय मामलों में लागू किया है।

प्रमुख मामला: एम.सी. मेहता बनाम कमलनाथ (1997) – कोर्ट ने कहा कि सरकार पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील भूमि को निजी रिसॉर्ट बनाने के लिए नहीं दे सकती।

यह सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 48A एवं 51A(g) से जुड़ा है जो पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं।



3. सरकार की भूमिका:

सरकार इन संसाधनों की मालिक नहीं है, केवल रक्षक है।

वह इन्हें सिर्फ जनहित में ही उपयोग कर सकती है, न कि निजी कंपनियों या उद्योगों को सौंपने के लिए।



4. जनहित में प्रभाव:

यह सिद्धांत जनहित याचिकाओं (PIL) का आधार बनता है।

नागरिक इस सिद्धांत के तहत पर्यावरण संरक्षण के लिए न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं।





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उदाहरण:

नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए।

जंगलों में अवैध खनन रोकने के लिए।

समुद्र तटों पर निजी निर्माण पर रोक लगाने के लिए।

जल स्रोतों की सफाई और पुनर्जीवन के लिए।



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निष्कर्ष:

पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत आधुनिक भारत में पर्यावरण न्याय और सतत विकास का एक मजबूत आधार है। यह सुनिश्चित करता है कि प्राकृतिक संसाधन केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संरक्षित रहें।


Saturday, May 24, 2025

### **सरकारी नौकरी: मात्र नौकरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व**



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आज के समय में जब युवा वर्ग करियर विकल्पों को लेकर उत्साहित और महत्वाकांक्षी है, तो उनके मन में सरकारी नौकरी को लेकर एक खास स्थान होता है। यह नौकरी न केवल स्थायित्व, सुविधाओं और सम्मान का प्रतीक मानी जाती है, बल्कि इसके साथ एक गहन **सामाजिक उत्तरदायित्व (Social Responsibility)** भी जुड़ा होता है — जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।


#### **सरकारी नौकरी: जनसेवा का माध्यम**


सरकारी सेवा का मूल उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि **जनता की सेवा** और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी है। एक शिक्षक हो, एक पुलिसकर्मी, एक पटवारी, या एक जिला अधिकारी — सभी की भूमिका समाज को दिशा देने और व्यवस्था बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।


जब एक सरकारी कर्मचारी अपने कर्तव्यों को निष्ठा और ईमानदारी से निभाता है, तो वह न केवल कानून और नियमों को लागू करता है, बल्कि जनता के विश्वास को भी मजबूत करता है। यही विश्वास लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करता है।


#### **सत्ता नहीं, सेवा का साधन**


सरकारी पद को अक्सर "सत्ता" का प्रतीक समझा जाता है, लेकिन वास्तव में यह **"सेवा" का माध्यम** है। यह सेवा भावना ही एक सरकारी कर्मचारी को आम जनता से जोड़ती है। यदि अधिकारी संवेदनशीलता और सजगता के साथ अपने कार्यों को अंजाम दें, तो वे समाज के कमजोर वर्गों के लिए आशा की किरण बन सकते हैं।


#### **भ्रष्टाचार मुक्त कार्य संस्कृति की आवश्यकता**


दुर्भाग्यवश, कुछ सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार, विलंब और असंवेदनशीलता जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। ये समस्याएं केवल प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि नैतिक स्तर पर भी चिंता का विषय हैं। यदि प्रत्येक सरकारी कर्मचारी अपने पद को एक **"लोकसेवक"** की तरह माने, तो इन बुराइयों पर लगाम लगाई जा सकती है।


#### **युवा पीढ़ी और सामाजिक चेतना**


नई पीढ़ी को यह समझने की आवश्यकता है कि सरकारी नौकरी केवल अपने जीवन को सुरक्षित करने का साधन नहीं है, बल्कि यह देश की प्रगति का हिस्सा बनने का अवसर है। यदि युवा वर्ग इस सोच के साथ सरकारी सेवा में आता है कि **"मैं समाज के लिए जिम्मेदार हूं"**, तो वे एक सशक्त, जवाबदेह और मानवीय प्रशासन का निर्माण कर सकते हैं।


#### **निष्कर्ष**


सरकारी नौकरी को यदि केवल सुविधा और प्रतिष्ठा के दृष्टिकोण से देखा जाएगा, तो यह समाज और राष्ट्र दोनों के लिए घातक हो सकता है। लेकिन यदि इसे **एक सामाजिक उत्तरदायित्व** की भावना से निभाया जाए, तो यह देश के हर नागरिक के जीवन में सुधार लाने वाला परिवर्तनकारी उपकरण बन सकता है।


इसलिए, आइए हम सभी — चाहे हम सरकारी नौकरी में हों या उसकी तैयारी कर रहे हों — यह संकल्प लें कि हम अपने कर्तव्यों को सेवा, ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ निभाएंगे। क्योंकि **"सरकारी नौकरी, मात्र नौकरी नहीं — यह समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।"**


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Thursday, May 22, 2025

बदलते मौसम में जीवन की सुरक्षा — हीट वेव्स और अकस्मात बारिश से बचाव की ज़रूरत


भारत के अधिकांश हिस्सों में अब मौसम का मिज़ाज बेहद असामान्य और अस्थिर हो गया है। एक ओर जहाँ तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक मूसलधार बारिश और ओलावृष्टि जीवन को अस्त-व्यस्त कर रही है। इस बदले हुए मौसम चक्र ने आम नागरिकों के साथ-साथ समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग—दिव्यांगजनों—के लिए भी नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।

हीट वेव्स: मौन जानलेवा संकट

हीट वेव्स यानी लू अब केवल एक मौसमी परेशानी नहीं रही, यह स्वास्थ्य आपातकाल बन चुकी है। धूप में काम करने वाले श्रमिक, बुजुर्ग, बच्चे और दिव्यांगजन इसकी चपेट में सबसे पहले आते हैं। प्यास लगने से पहले शरीर पानी मांगता है, लेकिन जागरूकता के अभाव में लोग निर्जलीकरण, थकावट और हीट स्ट्रोक का शिकार हो जाते हैं। ऐसे में सरकार और समाज की ज़िम्मेदारी बनती है कि न केवल सार्वजनिक स्थलों पर पानी और छायादार व्यवस्था हो, बल्कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में हीट स्ट्रोक के इलाज की विशेष तैयारी हो।

अकस्मात बारिश: शहरी अव्यवस्था का आईना

अकस्मात बारिश और जलभराव ने यह दिखा दिया है कि हमारा शहरी नियोजन कितना कमज़ोर है। सड़कों पर पानी भर जाना, नालों का जाम होना और बस्तियों में घुटनों तक पानी खड़ा होना आम दृश्य बन गया है। दिव्यांगजन, जो व्हीलचेयर या सहायक उपकरणों पर निर्भर हैं, इस स्थिति में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उन्हें न तो सुरक्षित निकासी मार्ग मिलते हैं, न ही आपातकालीन मदद की संरचित व्यवस्था।

दिव्यांगजन की सुरक्षा: नीतियों में संवेदनशीलता की ज़रूरत

जब हम आपदा प्रबंधन या मौसम से जुड़ी सावधानियों की बात करते हैं, तो दिव्यांगजनों की ज़रूरतें अक्सर योजनाओं से गायब होती हैं। यह एक गहरी सामाजिक चूक है। व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं के लिए जलभराव में चलना असंभव हो जाता है। दृष्टिबाधितों को रास्ता समझना और बहरे व्यक्तियों को चेतावनियाँ समझना कठिन हो जाता है। ऐसे में ज़रूरी है कि सरकारी चेतावनियाँ दृष्टि, श्रवण और शारीरिक रूप से बाधित नागरिकों को ध्यान में रखकर जारी हों। दिव्यांग मित्र स्वयंसेवकों की व्यवस्था की जानी चाहिए जो संकट के समय उनकी सहायता कर सकें।

समाधान: तकनीक, नीति और संवेदना का संगम

बदलते मौसम की चुनौती का सामना करने के लिए केवल अल्पकालिक इंतज़ाम काफी नहीं हैं। इसके लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी जिसमें नागरिक जागरूकता, स्थायी बुनियादी ढाँचा, तकनीकी सहायता, और दिव्यांगजन समावेशिता की ठोस नीति शामिल हो। स्मार्ट सिटी तभी स्मार्ट होगी जब वह समाज के हर वर्ग की ज़रूरतों का सम्मान और समाधान करे।

निष्कर्षतः, हीट वेव्स और अकस्मात बारिश केवल जलवायु संकट नहीं हैं, ये हमारे सामाजिक ताने-बाने और सरकारी योजनाओं की परीक्षा हैं। अगर हम अब भी न चेते, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं को होगा, जो पहले से ही समाज की हाशिए पर खड़े हैं—हमारे दिव्यांग भाई-बहन।



Wednesday, May 21, 2025

“प्रकृति की विविधता में ही जीवन का अस्तित्व है”


“प्रकृति की विविधता में ही जीवन का अस्तित्व है”

परिचय:
हर वर्ष 22 मई को विश्व जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य है लोगों को जैव विविधता (Biodiversity) के महत्व, संरक्षण और उसके संकटों के प्रति जागरूक करना। जैव विविधता में सभी जीव-जंतु, पेड़-पौधे, सूक्ष्मजीव और पारिस्थितिकी तंत्र शामिल होते हैं, जो धरती पर जीवन को संतुलित और समर्थ बनाते हैं।

2025 की थीम:
2025 में इस दिवस की थीम है – “Be Part of the Plan” यानी “योजना का हिस्सा बनें”। यह थीम इस बात पर बल देती है कि जैव विविधता की रक्षा केवल सरकारों या वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति, समुदाय और संगठन को इसमें भागीदारी निभानी होगी।

जैव विविधता का महत्व:

  1. पोषण और भोजन: विविध प्रकार की फसलें, फल, सब्जियां और जड़ी-बूटियां पोषण का स्रोत हैं।
  2. चिकित्सा: 80% औषधियां प्राकृतिक स्रोतों से आती हैं।
  3. पर्यावरणीय संतुलन: जैव विविधता मिट्टी की उर्वरता, जलवायु संतुलन और प्रदूषण नियंत्रण में सहायक होती है।
  4. सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व: भारत की अनेक परंपराएं, त्यौहार और पूजा-पद्धतियां प्रकृति और जीवों से जुड़ी हैं।

जैव विविधता पर संकट:

  • वनों की कटाई
  • प्रदूषण (जल, वायु, भूमि)
  • अति दोहन और शिकार
  • जलवायु परिवर्तन
  • अवैध वन्यजीव व्यापार

भारत और जैव विविधता:
भारत विश्व के 17 “मेगा बायोडायवर्स” देशों में से एक है। यहाँ 47,000 से अधिक पौधों और 90,000 से अधिक प्रजातियों के जानवर पाए जाते हैं। हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट और सुंदरबन से लेकर अंडमान-निकोबार तक हर क्षेत्र अनोखी जैव विविधता से समृद्ध है।

संरक्षण की दिशा में कदम:

  • जैव विविधता अधिनियम, 2002
  • नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी (NBA) की स्थापना
  • जैव विविधता रजिस्टर और पीपुल्स बायोडायवर्सिटी बोर्ड
  • जैव विविधता पार्क, अभयारण्य और बायोस्फीयर रिज़र्व
  • समुदाय आधारित संरक्षण जैसे “वन पंचायत”, “महिला मंगल दल” की भूमिका


विश्व जैव विविधता दिवस केवल एक दिवस नहीं, बल्कि एक संकल्प है – “प्रकृति के साथ तालमेल में जीने का।” हमें यह समझना होगा कि जैव विविधता की रक्षा करना हमारी अपनी रक्षा करना है। अगर हम प्रकृति की विविधता को बचाएंगे, तभी जीवन की निरंतरता बनी रहेगी।

"प्रकृति को नष्ट करना, स्वयं को नष्ट करना है – आइए, जैव विविधता को बचाने की योजना का हिस्सा बनें।"

Monday, May 19, 2025

‘क्याब – रिफ्यूज’ को मिला बेस्ट स्क्रिप्ट और उत्तराखंड की दीवा शाह को बेस्ट स्क्रिप्ट रायटर का अवॉर्ड कान फिल्म फेस्टिवल फ्रांस में।


यह एक अत्यंत प्रेरणादायक उपलब्धि है। फिलहाल दिवा द्वारा बनाई जा रही फिल्म ‘क्याब – रिफ्यूज’ न केवल तिब्बती शरणार्थियों की तीसरी पीढ़ी की पहचान, संघर्ष और आत्म-संवेदनाओं को उजागर करती है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर शरणार्थियों के मानवाधिकार और अस्तित्व की बहस में भी एक महत्वपूर्ण योगदान देती है।

सीएनसी रेजीडेंसी कार्यक्रम के अंतर्गत ‘क्याब’ की पटकथा को पेरिस में चार से पांच महीने तक विशेषज्ञों के साथ परिष्कृत किया गया, जिससे इसकी विषयवस्तु और प्रस्तुति दोनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का मानक प्राप्त हुआ। इस स्क्रिप्ट का कान्स फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित होना इस बात का प्रमाण है कि यह कहानी केवल एक समुदाय तक सीमित न रहकर वैश्विक मानवीय संवेदनाओं को छूती ।
 

‘क्याब – रिफ्यूज’: तिब्बती शरणार्थियों की तीसरी पीढ़ी की कहानी को वैश्विक मंच पर लाने वाली एक सशक्त फिल्म परियोजना

भारत में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों की तीसरी पीढ़ी की अस्मिता, पहचान और संघर्ष की कहानी को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने के लिए फिल्मकार फिलहाल दिवा अपनी नई फिल्म परियोजना ‘क्याब – रिफ्यूज’ पर कार्य कर रही हैं। यह फिल्म मात्र एक कथा नहीं, बल्कि एक समुदाय के भीतर उपजे अस्तित्व-संकट और सांस्कृतिक खोज की गहराई में उतरने का प्रयास है।

एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता

‘क्याब’ की पटकथा को प्रतिष्ठित सीएनसी रेजीडेंसी कार्यक्रम (CNC Residency Programme) के तहत कान्स फिल्म फेस्टिवल में चुना गया, जहाँ इसे वर्ष की सर्वश्रेष्ठ स्क्रिप्ट के रूप में सम्मानित किया गया। यह उपलब्धि न केवल फिल्म की गुणवत्ता का प्रमाण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि शरणार्थियों की कहानियाँ अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहीं — वे विश्व सिनेमा के केंद्र में आ रही हैं।

सीएनसी रेजीडेंसी का अनुभव

सीएनसी रेजीडेंसी फ्रांस सरकार द्वारा आयोजित एक अनूठा कार्यक्रम है, जिसमें चयनित प्रतिभागियों को चार से पाँच महीने तक पेरिस में रहने और अपने फिल्म प्रोजेक्ट्स पर गहन कार्य करने का अवसर मिलता है। प्रतिभागी न केवल अपने विचारों को संवारते हैं, बल्कि विश्व सिनेमा के दिग्गजों, पटकथा लेखकों, संपादकों और निर्देशकों से संवाद स्थापित कर एक वैश्विक दृष्टिकोण विकसित करते हैं।

फिलहाल दिवा ने इस रेजीडेंसी के दौरान ‘क्याब’ की स्क्रिप्ट को संवारा, जिससे यह फिल्म एक अत्यंत परिपक्व और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रस्तुति बन गई।

'क्याब' की मूल संवेदना

'क्याब' का तात्पर्य होता है — आश्रय या शरण। यह फिल्म एक ऐसे युवा की कहानी है जो भारत में पैदा हुआ, लेकिन जिसकी जड़ें तिब्बत में हैं — एक ऐसी भूमि जिसे वह जानता तो है, पर कभी देखा नहीं। तीसरी पीढ़ी के तिब्बती शरणार्थी की यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, आत्मिक और पहचान से जुड़ी हुई है।

यह फिल्म उन जटिल सवालों को उठाती है जो अक्सर शरणार्थी परिवारों की तीसरी पीढ़ी में उठते हैं — “मैं कौन हूं?”, “कहां से आया हूं?”, “क्या मेरी कोई मातृभूमि है?”।

भारत में तिब्बती शरणार्थियों की स्थिति

भारत में तिब्बती शरणार्थियों की पहली पीढ़ी 1959 में चीन के कब्ज़े के बाद आई थी। लेकिन आज की पीढ़ी एक अलग द्वंद में है — न वे पूर्णतः भारतीय हैं, न पूरी तरह तिब्बती। ‘क्याब’ इन्हीं असमंजसों और संघर्षों को पर्दे पर लाकर न केवल तिब्बती समुदाय के भीतर की संवेदनाओं को सामने रखती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सांस्कृतिक पहचान किसी कागज़ी नागरिकता से कहीं अधिक जटिल और मानवीय विषय है।

निष्कर्ष

‘क्याब – रिफ्यूज’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक आंदोलन है — जो शरणार्थी अनुभवों को, उनकी जटिलताओं को और उनकी मानवीय आकांक्षाओं को सिनेमा के माध्यम से सामने ला रहा है। यह परियोजना न केवल फिलहाल दिवा की प्रतिभा का प्रमाण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि संवेदनशील और प्रामाणिक कहानियों की आज भी वैश्विक स्तर पर मांग है।

यह फिल्म जब पूरी होगी, तो निःसंदेह यह भारत के भीतर और बाहर, पहचान, विस्थापन और सांस्कृतिक जड़ों की गूंज को एक नई आवाज़ देगी।


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Thursday, May 15, 2025

“People Against Police Atrocities”

The phrase “People Against Police Atrocities” generally refers to individuals, grassroots movements, or organized groups that resist, expose, or seek justice against excessive use of force, unlawful detention, custodial torture, extra-judicial killings, or systemic abuse by police forces.

Here are some key elements related to such movements:


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1. Notable Movements in India

PUCL (People’s Union for Civil Liberties) – Monitors and documents police and state violence.

NAPM (National Alliance of People's Movements) – Often speaks against custodial deaths and police misuse.

Human Rights Law Network (HRLN) – Provides legal support in cases of police brutality.

Campaign Against State Repression (CASR) – A network opposing police repression, often on tribal and marginalized communities.



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2. Common Demands

Independent judicial inquiries in cases of custodial deaths or encounters.

Stronger implementation of Supreme Court guidelines on police reforms (Prakash Singh case).

Installation of CCTV cameras in police stations.

Strict action against police officials violating human rights.

Compensation and rehabilitation for victims.



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3. Legal Tools Used

RTI applications to demand transparency.

Writ petitions and PILs in High Courts/Supreme Court.

NHRC complaints (National Human Rights Commission).

Media campaigns and street protests to create pressure.



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4. Global Perspective

Black Lives Matter (USA) is one of the most internationally known anti-police brutality movements.

Similar groups operate in many countries demanding accountability, community policing, and justice.



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Wednesday, May 14, 2025

अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21

 अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का सरल और स्पष्ट हिंदी में विवरण दिया गया है:


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अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार

मूल पाठ:
"राज्य भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधियों के समक्ष समानता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।"

मुख्य बिंदु:

सभी व्यक्तियों (नागरिक और गैर-नागरिक) को कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण मिलता है।

राज्य किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकता।

वाजिब वर्गीकरण (reasonable classification) की अनुमति है, लेकिन मनमानी या वर्ग आधारित कानून (class legislation) की नहीं।


उदाहरण:

जाति, लिंग, धर्म, स्थान या जन्म के आधार पर किया गया भेदभाव अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना जाएगा।

यदि कोई नीति केवल एक समूह को लाभ देती है और दूसरों को बिना कारण वंचित करती है, तो उसे चुनौती दी जा सकती है।



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अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

मूल पाठ:
"किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा, सिवाय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार।"

मुख्य बिंदु:

हर व्यक्ति (नागरिक और गैर-नागरिक) को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है।

'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' का अर्थ है – कानूनन, और वह प्रक्रिया न्यायपूर्ण, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए।


न्यायपालिका ने इसमें कई अधिकार जोड़े हैं:

निजता का अधिकार (Right to Privacy)

रोजगार का अधिकार (Right to Livelihood)

स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार

कानूनी सहायता का अधिकार (Legal Aid)

सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार (Passive Euthanasia)


प्रसिद्ध मामला:
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978): इस निर्णय में अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 में दी गई "विधि की प्रक्रिया" न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और उचित होनी चाहिए।


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न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...