Saturday, June 21, 2025
गढ़वाली नाटक: "भोर च अनपढ़"
"एक रुपए का वर्तमान में क्या महत्व है?"
"एक रुपए का वर्तमान में क्या महत्व है?" — यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। आइए इसे विभिन्न पहलुओं से समझते हैं:
🔹 1. आर्थिक दृष्टि से (Monetary Value):
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क्रय शक्ति (Purchasing Power):
- आज एक रुपए में शायद आप एक टॉफी, एक माचिस की डिब्बी या एक प्लास्टिक बैग ही खरीद सकते हैं।
- महंगाई और मुद्रा अवमूल्यन (inflation) के कारण इसकी वास्तविक क्रय शक्ति बहुत कम हो गई है।
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लेन-देन में उपयोग:
- बैंक ट्रांजेक्शन, ऑनलाइन भुगतान या बड़़े व्यापारिक लेनदेन में ₹1 का सिक्का लगभग अप्रासंगिक हो चुका है।
- हालांकि पेट्रोल पंप, राशन की दुकान या सरकारी लेन-देन में ₹1 को गिनती के हिसाब से जरूर जोड़ा जाता है (e.g. ₹500.01)।
🔹 2. न्यायिक व विधिक दृष्टि से (Legal Tender):
- एक रुपए का सिक्का या नोट आज भी भारतीय मुद्रा अधिनियम, 1934 के तहत वैध मुद्रा (Legal Tender) है।
- ₹1 का नोट RBI नहीं, बल्कि भारत सरकार (Ministry of Finance) जारी करती है — यही इसे खास बनाता है।
🔹 3. मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक महत्व:
- "छोटा पैसा भी पैसा होता है" – यह विचार आज भी सामाजिक रूप से मौजूद है।
- बच्चों को बचत सिखाने में ₹1 का सिक्का उपयोगी होता है।
- दान-पेटियों में, मंदिरों में ₹1 के सिक्के का भावनात्मक महत्व है।
- व्यापारिक लेन-देन में भी “₹1 अधिक” का भाव कई बार प्रतीकात्मक होता है (₹100 की बजाय ₹101 देना – शुभ शगुन में)।
🔹 4. व्यापारिक और सामुदायिक व्यवहार में:
- ई-कॉमर्स और डिजिटल ट्रांजेक्शन में ₹1 का मूल्य अब अकाउंटिंग एडजस्टमेंट तक सीमित हो गया है।
- फिर भी ₹1 का सिक्का मूल्य की एकता (unit of value) को दर्शाता है – यह "हर रुपया मायने रखता है" की सोच को बनाए रखता है।
🔹 5. ऐतिहासिक महत्व:
- कभी एक रुपए में एक सेर गेहूं, दूध या रेल यात्रा भी मिलती थी।
- आज भले ही उसकी क्रय शक्ति घट गई हो, लेकिन वह मुद्रा की इकाई (unit of account) के रूप में आधार बना हुआ है।
🔚 निष्कर्ष:
👉 एक रुपए का वास्तविक मूल्य आज कम हो गया है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक, ऐतिहासिक और विधिक महत्व अब भी बना हुआ है।
👉 यह हमें याद दिलाता है कि अर्थव्यवस्था में हर छोटी इकाई की भी अहमियत होती है।
CBDC क्या है?
CBDC का मतलब है Central Bank Digital Currency यानी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा। यह एक डिजिटल रूप होती है उस "मुद्रा" की जिसे देश का केंद्रीय बैंक (जैसे भारत में RBI - Reserve Bank of India) जारी करता है। इसे आप डिजिटल ₹ (डिजिटल रुपया) के रूप में समझ सकते हैं।
🔍 CBDC क्या है?
CBDC बिल्कुल उसी मुद्रा की तरह होता है जो अभी आप नकद (cash) में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह डिजिटल रूप में होता है और इसे किसी भी प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी की तरह नहीं बल्कि सरकार द्वारा नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से जारी किया जाता है।
🔑 CBDC के मुख्य फायदे:
- नकदी पर निर्भरता कम होगी।
- लेन-देन तेज और सस्ता होगा।
- भ्रष्टाचार और काले धन पर रोक लगेगी।
- CBDC को आसानी से ट्रैक किया जा सकता है।
- डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा।
🇮🇳 भारत में CBDC (डिजिटल रुपया):
- भारत में CBDC का नाम है: e₹ (ई-रुपया / Digital Rupee)
- इसे दो प्रकारों में लागू किया गया है:
- e₹-W (Wholesale) – बैंक के बीच बड़े लेन-देन के लिए (1 नवम्बर 2022 से शुरू)
- e₹-R (Retail) – आम जनता के उपयोग के लिए (1 दिसम्बर 2022 से पायलट प्रोजेक्ट शुरू)
📅 CBDC कब तक पूरी तरह लागू होगा?
👉 RBI ने फरवरी 2023 में संसद में बताया था कि CBDC का रिटेल संस्करण (e₹-R) कई शहरों में ट्रायल बेसिस पर चल रहा है।
👉 जून 2024 तक डिजिटल रुपया चुनिंदा बैंकों और शहरों में UPI के साथ भी टेस्ट किया गया है।
पूर्ण रूप से लागू होने में 2025-26 तक का समय लग सकता है, लेकिन यह धीरे-धीरे पूरे भारत में फैलाया जाएगा।
🏦 कौन-से बैंक जुड़े हैं डिजिटल रुपये से?
- State Bank of India (SBI)
- ICICI Bank
- HDFC Bank
- Yes Bank
- Union Bank of India
- Bank of Baroda
- Kotak Mahindra Bank
- IDFC First Bank
(और अन्य भी)
📲 CBDC का उपयोग कैसे कर सकेंगे?
- मोबाइल ऐप के ज़रिए (जैसे UPI ऐप)
- डिजिटल वॉलेट में सीधे CBDC रूप में पैसा होगा
- QR कोड स्कैन करके भुगतान किया जा सकेगा
- बिना बैंक खाता भी कुछ हद तक उपयोग संभव होगा (फ्यूचर वर्जन)
उत्तराखंड में ग्रामसभाओं की शक्ति का क्षय: लोकतंत्र पर संकट
रिपोर्ट
उत्तराखंड में ग्रामसभाओं की शक्ति का क्षय: लोकतंत्र पर संकट
तैयारकर्ता: Udaen Foundation / जनभागीदारी मंच
तारीख: जून 2025
स्थान: उत्तराखंड
🔷 भूमिका
भारतीय संविधान के 73वें संशोधन और उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम के अनुसार ग्रामसभा लोकतंत्र की मूल इकाई है। लेकिन हाल के वर्षों में उत्तराखंड राज्य में ग्रामसभाओं की ताकत को कमजोर करने की घटनाएं सामने आई हैं, जो स्थानीय स्वराज और जन-सहभागिता के विरुद्ध हैं।
🔷 मुख्य निष्कर्ष
1. ग्रामसभा की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण
- चारधाम परियोजना, एलिवेटेड रोड (कोटद्वार, ऋषिकेश), जल विद्युत योजनाएं (टिहरी, पिंडर घाटी) आदि में ग्रामसभा की सहमति नहीं ली गई।
- यह वन अधिकार अधिनियम (FRA) और पर्यावरणीय जन-सहमति प्रक्रिया (EIA) का उल्लंघन है।
2. प्रस्तावों की उपेक्षा
- कई ग्रामसभाओं द्वारा खनन या शराब की बिक्री के खिलाफ पारित प्रस्तावों को जिलाधिकारी या राज्य सरकार द्वारा अस्वीकार किया गया।
3. वित्तीय अधिकारों की कटौती
- ग्राम प्रधानों को स्वीकृति के बाद भी ब्लॉक स्तर पर बजट रोका जाता है, जिससे ग्रामसभा की योजना लागू नहीं हो पाती।
4. प्रशासनिक हस्तक्षेप
- मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन आदि योजनाओं में टेंडरिंग और चयन प्रक्रिया पूरी तरह ब्लॉक व ठेकेदारों पर केंद्रित हो गई है।
5. सूचना का अभाव
- ग्रामसभा की बैठकें सूचना के बिना या बिना कोरम के की जाती हैं।
- रिकॉर्ड्स पारदर्शी नहीं, आम जनता को जानकारी नहीं मिलती।
🔷 प्रभाव और खतरे
- जन प्रतिनिधित्व का क्षरण: लोग पंचायतों से विमुख हो रहे हैं, लोकतंत्र खोखला हो रहा है।
- भ्रष्टाचार में वृद्धि: पंचायत स्तर पर कार्यों का संचालन न होने से पारदर्शिता घटती है।
- जन असंतोष: भूमि अधिग्रहण और विकास योजनाओं के विरोध में गांवों में आक्रोश बढ़ा है।
- संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन: 73वां संशोधन, PESA एक्ट, FRA कानून और पंचायती राज अधिनियम की अवहेलना।
🔷 कानूनी और संवैधानिक संदर्भ
- संविधान अनुच्छेद 243 (b): ग्रामसभा की परिभाषा
- 73वां संशोधन अधिनियम (1992): पंचायती राज की नींव
- उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016
- PESA (1996): आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा की सर्वोच्चता
- Forest Rights Act (2006): वन क्षेत्र में ग्रामसभा का भूमि पर अधिकार
🔷 सुझाव और मांगें
- ग्रामसभा प्रस्तावों को कानूनी बाध्यता दी जाए।
- भूमि अधिग्रहण व योजनाओं में अनिवार्य जन-सहमति सुनिश्चित की जाए।
- ग्राम पंचायतों को 29 विषयों पर पूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए जाएं।
- जन-जागरूकता और ग्रामसभा सशक्तिकरण कार्यक्रम शुरू हों।
- PIL/RTI के माध्यम से कानूनी हस्तक्षेप हो।
🔷 निष्कर्ष
यदि ग्रामसभा की ताकत को पुनः स्थापित नहीं किया गया, तो यह न केवल ग्रामीण लोकतंत्र के लिए, बल्कि भारत के संविधान की आत्मा के लिए भी खतरा होगा। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में ग्रामसभा ही जन-भागीदारी का सबसे मजबूत मंच है, जिसे बचाना आज की आवश्यकता है।
📎 परिशिष्ट:
- क्षेत्रीय ग्रामसभा प्रस्तावों की प्रतियां
- RTI से प्राप्त पंचायत बजट डेटा
- मीडिया रिपोर्ट्स और केस स्टडी (2021-2025)
- FRA और PESA कानून की हिंदी व्याख्या
उत्तराखंड में ग्रामसभाओं की ताकत कैसे कमज़ोर की जा रही है
देखा गया है कि उत्तराखंड सरकार (और अन्य राज्यों की सरकारें भी) ग्रामसभाओं की शक्ति को संविधान में वर्णित "लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण" के आदर्शों के विपरीत कमजोर करती आई हैं। यह मुद्दा काफी गंभीर और बहस योग्य है। आइए तथ्यों और उदाहरणों के साथ समझते हैं कि उत्तराखंड में ग्रामसभाओं की ताकत कैसे कमज़ोर की जा रही है:
🔴 1. बिना ग्रामसभा की अनुमति के भूमि अधिग्रहण
- कई बार जलविद्युत परियोजनाओं, सड़क निर्माण, चारधाम परियोजना, एलिवेटेड रोड, या स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लिए ग्रामसभा की सहमति के बिना भूमि का अधिग्रहण कर लिया गया है।
- यह PESA एक्ट और वन अधिकार अधिनियम (FRA) जैसे कानूनों का उल्लंघन है, खासकर आदिवासी और वन क्षेत्रों में।
🔴 2. टॉप-डाउन प्लानिंग (ऊपर से नीचे योजनाएं)
- ग्राम स्तर पर योजनाएं लोगों की ज़रूरतों के अनुसार नहीं, बल्कि सरकारी मशीनरी द्वारा ऊपर से तय की जाती हैं।
- मनरेगा जैसी योजनाओं में कामों का चयन अक्सर ब्लॉक या जिला अधिकारियों द्वारा होता है, न कि ग्रामसभा द्वारा।
🔴 3. प्रधानों की शक्तियां सीमित करना
- ग्राम प्रधानों को कई योजनाओं के लिए अब सीधा बजट या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं मिलता। पैसा ब्लॉक या जिला स्तर पर रोक कर रखा जाता है।
- इससे ग्रामसभा के निर्णय लागू नहीं हो पाते, प्रधान सिर्फ नाम के रह जाते हैं।
🔴 4. ग्रामसभाओं की बैठकों को औपचारिकता बना देना
- कई गांवों में ग्रामसभा की बैठकें केवल औपचारिक रूप से कागज़ पर होती हैं, न तो सही सूचना दी जाती है, न ही आम जनता को बुलाया जाता है।
- बैठक में कोई असली निर्णय नहीं लिया जाता, सब कुछ पहले से तय होता है।
🔴 5. स्थानीय आवाजों को नजरअंदाज करना
- उत्तराखंड के कई हिस्सों में गांववासियों द्वारा विरोध दर्ज करने के बावजूद खनन, सड़क या औद्योगिक परियोजनाएं लागू की गईं (जैसे भट्टा खदान, कालीसौड़ झील, एलिवेटेड रोड, हेमकुंड ropeway आदि)।
- ग्रामसभा द्वारा पारित प्रस्तावों को सरकार द्वारा दरकिनार कर दिया गया।
🔴 6. पंचायती राज संस्थाओं को अधिकार देने में ढिलाई
- संविधान के 73वें संशोधन के बावजूद उत्तराखंड सरकार ने अभी तक पंचायती राज एक्ट की पूरी भावना से क्रियान्वयन नहीं किया।
- 29 विषयों के विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया अधूरी है — जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, जल संरक्षण, कृषि, आदि।
✅ क्या किया जा सकता है? (जन जागरूकता और प्रतिरोध)
- ग्रामसभा प्रस्तावों को दस्तावेज़ी बनाकर हाईकोर्ट या RTI के ज़रिए उठाना।
- जन आंदोलन और मीडिया के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाना।
- PESA और FRA जैसे कानूनों की ट्रेनिंग ग्राम स्तर पर देना।
- “ग्राम स्वराज अभियान” जैसी पहल को पुनर्जीवित करना।
✊ एक नारा:
“जो निर्णय ले गांव की सभा, वो ही हो राज्य की नीति, नहीं तो लोकतंत्र है अधूरी कोई रीत।
Article 21 of the Indian Constitution
Article 21 of the Indian Constitution is one of the most important and fundamental rights guaranteed to every person in India. It reads:
"No person shall be deprived of his life or personal liberty except according to procedure established by law."
🔍 Key Features of Article 21:
-
Universal Protection:
- It applies to citizens and non-citizens alike.
- Covers everyone including foreigners and stateless persons within India.
-
Life and Personal Liberty:
- "Life" means more than mere animal existence—it includes right to live with dignity, right to health, clean environment, education, privacy, etc.
- "Personal liberty" includes freedom from arbitrary arrest, detention, and all actions that take away the dignity of an individual.
-
Due Process of Law:
- Originally interpreted narrowly ("procedure established by law"), but after the Maneka Gandhi case (1978), the Supreme Court expanded it to mean:
- The procedure must be just, fair, and reasonable.
- Arbitrary or oppressive laws are not acceptable.
- Originally interpreted narrowly ("procedure established by law"), but after the Maneka Gandhi case (1978), the Supreme Court expanded it to mean:
🧠 Important Judicial Interpretations:
| Case Name | Year | Contribution |
|---|---|---|
| Maneka Gandhi v. Union of India | 1978 | Expanded Article 21 to include due process; interlinked it with Articles 14 & 19. |
| Francis Coralie Mullin v. UT of Delhi | 1981 | Right to live with human dignity, includes food, clothing, shelter, education. |
| Olga Tellis v. Bombay Municipal Corp. | 1985 | Right to livelihood is part of right to life. |
| K.S. Puttaswamy v. Union of India | 2017 | Declared Right to Privacy as a fundamental right under Article 21. |
📜 Examples of Rights under Article 21:
- Right to live with dignity
- Right to health and medical care
- Right to shelter
- Right to education (now also under Article 21-A)
- Right to clean air and environment
- Right to privacy
- Right against sexual harassment
- Right to die with dignity (passive euthanasia, 2018)
🧾 Summary:
Article 21 is the heart of Fundamental Rights in India. It is a dynamic and evolving right, interpreted expansively by the judiciary to include a wide range of human rights necessary for a dignified life.
ग्राम सभा की ताकत (The Power of Gram Sabha)
न्यूज़ विचार और व्यव्हार
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