Wednesday, November 5, 2025

“राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”


📘 “राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”
(ड्राफ्ट बिल + कार्यान्वयन योजना)

यह प्रस्ताव मेहंदीपुर बालाजी, खाटू श्यामजी जैसे स्थलों पर बढ़ते अंधविश्वास, शोषण, और हिंसा को रोकने के उद्देश्य से होगा — धर्म या आस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि धोखे, भय और हिंसा के खिलाफ।


I. प्रस्तावना (Preamble)

राजस्थान राज्य की जनता के हित में यह आवश्यक है कि अंधविश्वास, चमत्कारों के झूठे दावों, झाड़-फूंक, मानव बलि, और ऐसी किसी भी अमानवीय प्रथा के माध्यम से नागरिकों के शोषण को रोका जाए तथा समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा दिया जाए।
अतः राजस्थान विधानमंडल यह अधिनियम पारित करता है:


II. नाम और प्रारंभ

इस अधिनियम को कहा जाएगा —
👉 “राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”
यह अधिनियम राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात समूचे राजस्थान राज्य में लागू होगा।


III. उद्देश्य (Objectives)

  1. चमत्कार, तांत्रिक कर्मकांड या झाड़-फूंक के नाम पर नागरिकों को धोखा देने से रोकना।

  2. मानव बलि, पशु बलि, या किसी भी अमानवीय धार्मिक कृत्य को अपराध घोषित करना।

  3. धर्मस्थलों पर होने वाले झूठे “चमत्कार प्रदर्शन” और मानसिक शोषण को रोकना।

  4. जनता में वैज्ञानिक सोच, मानवता और संविधानसम्मत आस्था का प्रसार करना।


IV. परिभाषाएँ (Definitions)

  1. अंधविश्वास — कोई भी ऐसी आस्था या प्रथा जो प्रमाण, तर्क या वैज्ञानिक परीक्षण से परे हो और जिसके कारण शारीरिक, मानसिक या आर्थिक शोषण होता हो।

  2. चमत्कार का दावा — जब कोई व्यक्ति या संस्था यह कहे कि उसके पास अलौकिक या दिव्य शक्ति है जिससे रोग, समस्या या पाप मिट सकते हैं।

  3. मानव बलि/अमानवीय प्रथा — किसी व्यक्ति या पशु को धार्मिक उद्देश्य से हानि पहुँचाना।

  4. झाड़-फूंक या तांत्रिक कर्मकांड — ऐसी गतिविधि जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता, शारीरिक अखंडता या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचे।


V. दंड (Penalties)

  1. अंधविश्वास के नाम पर धोखा देना: 6 माह से 3 वर्ष तक की कैद या ₹50,000 तक जुर्माना।

  2. मानव या पशु बलि देना: 7 वर्ष तक की सख्त कैद और ₹1 लाख तक जुर्माना।

  3. धोखे से ‘चमत्कार’ का प्रदर्शन या झूठा प्रचार: 1 से 5 वर्ष तक की कैद।

  4. पीड़ित को शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचाने पर: गैर-जमानती अपराध, 5 वर्ष तक कैद।

  5. दोहराव की स्थिति में: दोगुना दंड।


VI. लागू करने की व्यवस्था (Implementation Mechanism)

  1. विशेष प्रकोष्ठ (Special Cell): राज्य स्तर पर “अंधविश्वास निवारण प्रकोष्ठ” का गठन।

  2. पुलिस प्रशिक्षण: प्रत्येक जिला पुलिस में नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा जो इस अधिनियम की निगरानी करेगा।

  3. मंदिर/धार्मिक स्थलों के लिए निर्देश:

    • मेहंदीपुर बालाजी और खाटू श्यामजी जैसे स्थलों पर CCTV निगरानी अनिवार्य।

    • झाड़-फूंक, भूत-प्रेत निकासी, या मानसिक उत्पीड़न जैसी गतिविधियों पर रोक।

    • केवल पंजीकृत पुजारी/संचालक को धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति।

  4. जन-जागरूकता:

    • स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और मीडिया के माध्यम से “धर्म नहीं, धोखा रोको” अभियान।

    • राज्य शिक्षा विभाग द्वारा वैज्ञानिक सोच पर आधारित विशेष कक्षाएँ।


VII. संरक्षण और सहायता (Protection & Support)

  1. पीड़ित व्यक्ति या गवाह को पुलिस सुरक्षा दी जाएगी।

  2. ऐसे मामलों के लिए त्वरित अदालत (Fast Track Court) गठित की जाएगी।

  3. गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को शिकायतों के संकलन और जन-जागरूकता में भागीदारी दी जाएगी।


VIII. विशेष प्रावधान (Special Provisions for Religious Sites)

  1. मेहंदीपुर बालाजी और खाटू श्यामजी जैसे प्रमुख स्थलों पर:

    • भीड़ नियंत्रण और स्वास्थ्य सहायता केंद्र अनिवार्य।

    • धार्मिक कर्मकांड के दौरान किसी व्यक्ति पर हिंसा, बेहोशी, मारपीट या जंजीरबंदी को अपराध माना जाएगा।

    • जिला प्रशासन द्वारा निगरानी समिति (Collector की अध्यक्षता में) गठित की जाएगी।

  2. मंदिर प्रबंधन को प्रत्येक वर्ष “सुरक्षित आस्था रिपोर्ट” राज्य सरकार को देनी होगी।


IX. सामाजिक जागरूकता योजना (6-महीने की कार्ययोजना)

चरण अवधि प्रमुख गतिविधि जिम्मेदार एजेंसी
1. प्रारंभिक समीक्षा 1 माह मौजूदा कानूनों और घटनाओं का अध्ययन (बालाजी, खाटू) विधि विभाग
2. मसौदा व अनुमोदन 2 माह ड्राफ्ट बिल तैयार कर मंत्रिमंडल में प्रस्तुत करना गृह विभाग
3. पायलट लागू क्षेत्र 3-4 माह दो धार्मिक स्थलों पर पायलट — CCTV, पोस्टर, निगरानी जिला प्रशासन
4. जन-जागरूकता अभियान 4-6 माह मीडिया, स्कूल, सोशल कैंपेन सूचना विभाग + NGOs
5. निगरानी मूल्यांकन 6 माह प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट योजना विभाग

X. निष्कर्ष

“आस्था यदि ज्ञान के साथ है, तो वह शक्ति है;
लेकिन जब वह भय और धोखे में बदल जाए —
तब कानून का हस्तक्षेप ज़रूरी है।”

यह अधिनियम राजस्थान में आस्था की गरिमा को बनाए रखते हुए अंधविश्वास, भय और शोषण को समाप्त करने का उद्देश्य रखता है।


राजस्थान में मेहंदीपुर बालाजी/खाटूश्याम जैसे स्थलों पर बढ़ते अंधविश्वास को रोकने के लिए विशेष कानूनी और नीतिगत कदम उठाये जाएँ।

 राजस्थान में मेहंदीपुर बालाजी/खाटूश्याम जैसे स्थलों पर बढ़ते अंधविश्वास को रोकने के लिए विशेष कानूनी और नीतिगत कदम उठाये जाएँ। 

 क्या-क्या किया जा सकता है, किस तरह के कानून मॉडल उपलब्ध हैं, और लागू करने में क्या चुनौतियाँ रहेंगी। 


1) क्या राज्य ऐसा कानून ला सकता है? — हाँ, और आधार क्या है

  • राज्य विधानमंडल के पास सामाजिक सुधार और लोक-व्यवस्था से संबंधित विषयों पर कानून लाने का अधिकार है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों ने इसी आधार पर “Anti-superstition / Black-magic” प्रकार के क़ानून बनाए हैं जिनमें धोखा देने, मानव बलि, दुष्प्रथा और हिंसा जैसी प्रथाओं को अपराध कहा गया है। (India Code)

  • राजस्थान में पहले से ही “Rajasthan Prevention of Witch-Hunting Act, 2015” जैसी व्यवस्था है जो witch-hunting (डायन-शिकायत, उत्पीड़न) रोकने के लिए मौजूद है — पर यह व्यापक तौर पर हर तरह के 'चमत्कार/झाड़-फूंक/धोखे' को कवर नहीं करता। यदि उद्देश्य मेहंदीपुर बालाजी जैसे धार्मिक/आस्था स्थलों पर व्याप्त शोषण और हिंसा को रोकना है, तो राज्य नया व्यापक कानून या मौजूदा कानूनों का विस्तार कर सकता है। (Integral University)


2) कौन-से मॉडल अपनाये जा सकते हैं (उदाहरण)

  1. महाराष्ट्र मॉडल (2013) — काफ़ी व्यापक: मानव बलि, inhuman/aghori प्रथाएँ, “चमत्कार” के दावों के जरिए धोखा और प्रचार पर पाबंदी। इसे राज्य स्तर पर लागू किया गया। (India Code)

  2. कर्नाटक एक्ट (2017) — inhuman practices और black magic को अपराध मानता है; लागू करने और परिभाषा-निर्धारण पर लंबी बहस भी रही। (India Code)

  3. राजस्थान-विशेष (वर्तमान + विस्तार) — राजस्थान के पास witch-hunting के खिलाफ कानून है; राज्य चाहे तो उसे broaden कर ‘अंधविश्वास निवारण और मानव सुरक्षा अधिनियम’ जैसा रूप दे सकता है (मेहंदीपुर जैसे स्थानों पर सार्वजनिक सुरक्षा और धोखे पर विशेष प्रावधानों के साथ)। (Integral University)


3) कानून में किन बातों को शामिल किया जाए (प्रस्तावित मुख्य प्रावधान)

  • परिभाषाएँ स्पष्ट हों — ‘चमत्कार का दावा’, ‘झाड़-फूंक/बाबा-प्रचार’, ‘मानसिक/आर्थिक शोषण’, ‘मानव बलि/हिंसा’ — ताकि धर्म/आस्था के सामान्य अधिकार पर असर न पड़े।

  • स्पष्ट अपराध-धाराएँ — चमत्कार के नाम पर धोखा (दंड), शारीरिक/मानसिक उत्पीड़न, बच्चों/कनिष्ठों के साथ अत्याचार, और भौतिक प्रमाण के बिना रोग/उपचार के झूठे दावे कर आर्थिक शोषण पर सजा।

  • प्रोसीजर/इन्फोर्समेंट — विशेष पुलिस-कोईलिशन या डायरेक्टर(प्रिवेंशन ऑफ अंधविश्वास) इकाई, तेज़ ट्रायल और पब्लिक-विजिलेंस विंग।

  • जनजागरूकता और शिक्षा — मंदिरों/धार्मिक समितियों के साथ संवाद, साधु-संतों को प्रशिक्षित करना, और स्कूलों में वैज्ञानिक शिक्षा/critical thinking कार्यक्रम।

  • प्रोटेक्शन-क्लॉज — पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा (गवाहों को धमकाने पर सख्त दंड)।

(इन बिंदुओं का उपयोग आप एक प्रारूप बिल में कर सकते हैं।)


4) मेहंदीपुर बालाजी/खाटूश्याम जैसे स्थानों पर विशेष कदम

  • स्थल-विशेष निर्देश: तीव्र भीड़ प्रबंधन, अनिवार्य CCTV, मंदिर प्रबंधन को लाइसेंस/रजिस्ट्रेशन और उनकी गतिविधियों पर पारदर्शिता, और यदि कोई ‘देवी-प्रेत निकालने’ के दौरान हिंसा होती है तो तीव्र कार्रवाई। (मीडिया रिपोर्टों में मेहंदीपुर के ‘prets’ वाली परंपराओं का ज़िक्र है — जहाँ लोग आत्माओं की पेशी का दावा करते हैं)। (https://rajasthan.ndtv.in/)

  • स्थानीय समाज-नेताओं/पंडितों के साथ गठजोड़: धार्मिक नेताओं को साथ लेकर जागरूकता चलाना ताकि वे अंधविश्वास और शोषण के बीच का फर्क लोगों को समझाएँ।

  • सख्त दंड और त्वरित कार्रवाई: जहाँ भी वीडियो/सबूत मिलें, तुरन्त प्राथमिकी और पब्लिक-इंगेजमेंट।


5) लागू करने में चुनौतियाँ (हकीकत)

  • धार्मिक संवेदनशीलता: कानून को “धर्म-विरोधी” नहीं दिखाना चाहिए; यही सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक जोखिम है।

  • पुलिस/एडमिन जागरूकता व प्रशिक्षण का अभाव — कई मामलों में पुलिस कानून की धाराओं से अनभिज्ञ रहती है, इसलिए प्रशिक्षण जरूरी है। (यह चुनौती महाराष्ट्र-कर्नाटक के लागू होने पर भी सामने आई थी)। (The Indian Express)

  • गवाहों का डर और दबाव — स्थानीय दबाव से लोग शिकायत करने से डरते हैं; संरक्षण तंत्र आवश्यक है।

  • राजनीतिक इच्छाशक्ति — बिना नेतृत्व और संचार-रणनीति के क़ानून केवल कागज़ों पर रह सकते हैं।


6) तुरन्त उठाये जाने योग्य कदम (प्राथमिकता-सूची)

  1. मौजूदा कानूनों का परीक्षण-अध्ययन (Rajasthan Witch-Hunting Act) — कहाँ कमी है, क्या बढ़ाने की जरूरत। (Integral University)

  2. कानून-मॉडल चुनना/ड्राफ्ट करना — महाराष्ट्र/कर्नाटक के प्रावधानों से उपयुक्त धाराएँ लेकर राज्य अनुकूल ड्राफ्ट बनाना। (India Code)

  3. पुलिस/प्रोविन्सियल ट्रेनिंग और स्पेशल यूनिट की स्थापना।

  4. स्थानीय जागरूकता-अभियान (मंदिर समितियों, NGOs, स्कूल) — “धर्म नहीं — धोखा रोको” जैसा संदेश।

  5. पायलट-प्रोजेक्ट: मेहंदीपुर/खाटूश्याम जैसे हाई-रिस्क स्थलों पर पायलट लागू कर प्रभाव मापा जाए। (https://rajasthan.ndtv.in/)



अंधविश्वास, ढोंग और चमत्कारों के नाम पर शोषण जैसे मुद्दे आज भी उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी समाज में मौजूद हैं।

 अंधविश्वास, ढोंग और चमत्कारों के नाम पर शोषण जैसे मुद्दे आज भी उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी समाज में मौजूद हैं।

अब देखें, कानूनी रूप से उत्तराखंड में ऐसा “Anti-Superstition Act” लाया जा सकता है या नहीं, तो जवाब है —
👉 हाँ, बिल्कुल लाया जा सकता है।

आइए विस्तार से समझते हैं 👇


⚖️ 1. संवैधानिक आधार (Constitutional Basis)

भारत के संविधान में राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वे “लोक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और सामाजिक सुधार” से जुड़े विषयों पर कानून बना सकती हैं।
यह अधिकार राज्य सूची (State List) और समवर्ती सूची (Concurrent List) में आता है।

इसलिए, उत्तराखंड सरकार चाहे तो महाराष्ट्र या कर्नाटक की तर्ज पर “अंधविश्वास निवारण अधिनियम” बना सकती है।


🏛️ 2. उदाहरण: महाराष्ट्र का कानून

महाराष्ट्र ने 2013 में एक ऐतिहासिक क़ानून बनाया था —
👉 “Maharashtra Prevention and Eradication of Human Sacrifice and Other Inhuman, Evil and Aghori Practices and Black Magic Act, 2013”

इस कानून के तहत:

  • झाड़-फूंक, चमत्कार दिखाकर धोखा देना,

  • अंधविश्वास के नाम पर किसी को नुकसान पहुँचाना,

  • तांत्रिक या बाबा बनकर आर्थिक शोषण करना,

  • इंसानी बलि या काला जादू जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देना
    अपराध माना गया है।

कर्नाटक ने भी 2017 में इसी तरह का कानून पारित किया।


🌄 3. उत्तराखंड में क्यों ज़रूरत है

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में:

  • कई जगहों पर भूत-प्रेत, झाड़-फूंक, और चमत्कारों के नाम पर शोषण होता है।

  • “देव-प्रेत निकालने” या “देवी चढ़ने” के नाम पर महिलाओं के साथ हिंसा और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएँ होती हैं।

  • कुछ “बाबा” या “धर्मगुरु” अंधभक्ति के जरिए पैसा और प्रभाव बटोरते हैं।

ऐसे में यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को नहीं, बल्कि धोखे और शोषण को रोकने का औजार बन सकता है।


📜 4. संभावित नाम और ढाँचा (Draft Idea)

यदि उत्तराखंड में ऐसा कानून बनाया जाए, तो उसका नाम और उद्देश्य कुछ इस तरह रखा जा सकता है:

“उत्तराखंड अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”

मुख्य प्रावधान हो सकते हैं:

  1. अंधविश्वास, काला जादू, या चमत्कार के नाम पर धोखा देने पर 6 माह से 5 वर्ष तक की सज़ा।

  2. झाड़-फूंक या देव-प्रेत निकालने के नाम पर किसी व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक रूप से हानि पहुँचाने पर सख्त दंड।

  3. ऐसे मामलों में विशेष पुलिस प्रकोष्ठ और जन-जागरूकता अभियान

  4. स्कूलों में वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के कार्यक्रम।


🧭 5. चुनौतियाँ

  • धार्मिक संगठनों की गलतफहमी कि यह कानून “धर्म-विरोधी” है।

  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।

  • पुलिस और प्रशासनिक प्रशिक्षण की कमी।

इन सबके बावजूद, अगर कानून का उद्देश्य स्पष्ट हो —

“धर्म नहीं, बल्कि धोखे के खिलाफ” —
तो यह समाज में एक बड़ा सुधारकारी कदम साबित हो सकता है।


🔹 निष्कर्ष

उत्तराखंड में अंधविश्वास और चमत्कारों के नाम पर शोषण रोकने के लिए कानून लाया जा सकता है —
बशर्ते सरकार इसे सामाजिक सुधार और वैज्ञानिक सोच के रूप में प्रस्तुत करे, न कि धार्मिक हस्तक्षेप के रूप में।



“क्या देवी-देवता और आत्मा का असर होता है?

 “क्या देवी-देवता और आत्मा का असर होता है?” — जिसका उत्तर केवल एक दिशा में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह आस्था, अनुभव, और विज्ञान — तीनों के बीच की सीमारेखा पर टिका हुआ है।

आइए इसे तीन दृष्टिकोणों से समझें 👇


🕉️ 1. आध्यात्मिक या धार्मिक दृष्टिकोण

अधिकांश धर्मों और परंपराओं में माना जाता है कि देवी-देवता, आत्मा, और अदृश्य शक्तियाँ वास्तविक हैं और वे मनुष्य के जीवन को प्रभावित कर सकती हैं।

  • हिंदू दर्शन कहता है कि “देवता प्रकृति की शक्तियों का रूप हैं।”

  • आत्मा को “नश्वर शरीर से परे, शाश्वत चेतना” माना गया है।

  • साधक, भक्त या संत अपने अनुभवों में इन्हें महसूस करने का दावा करते हैं — जैसे ध्यान, साधना या स्वप्न में दिव्य उपस्थिति का अनुभव।

यह दृष्टिकोण कहता है कि ये शक्तियाँ भौतिक रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा या चेतना के स्तर पर प्रभाव डालती हैं — कभी प्रेरणा, कभी अंतर्ज्ञान, कभी भय या श्रद्धा के रूप में।


🔬 2. वैज्ञानिक और तर्कवादी दृष्टिकोण

विज्ञान का मत इससे बिल्कुल अलग है।

  • विज्ञान केवल प्रमाणित और दोहराए जा सकने वाले अनुभवों को “सत्य” मानता है।

  • अब तक न तो देवी-देवता की उपस्थिति और न ही आत्मा के अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण मिला है।

  • जो भी घटनाएँ “अलौकिक” या “आत्मिक” कही जाती हैं, विज्ञान उन्हें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, या प्राकृतिक कारणों से समझाने की कोशिश करता है — जैसे डर, अवचेतन मन, सामूहिक विश्वास, या भ्रम।

इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि में “देवी-देवता और आत्मा का असर” मानव चेतना की व्याख्या का हिस्सा है, कोई भौतिक शक्ति नहीं।


⚖️ 3. संतुलित या दार्शनिक दृष्टिकोण

कई विचारक मानते हैं कि यह प्रश्न केवल “सत्य या असत्य” का नहीं है, बल्कि मानव अनुभव और अर्थ की खोज का है।

  • यदि देवी-देवता या आत्मा में विश्वास से किसी व्यक्ति को संवेदना, प्रेरणा, और नैतिक बल मिलता है, तो उसका प्रभाव वास्तविक है — भले ही वह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध न हो।

  • परंतु जब यही विश्वास भय, शोषण, या अंधविश्वास में बदल जाता है, तब वही प्रभाव हानिकारक बन जाता है।


🔸 निष्कर्ष

देवी-देवता और आत्मा का असर होता है या नहीं — यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे कैसे देखते और अनुभव करते हैं
आस्था अगर ज्ञान और करुणा के साथ जुड़ी हो, तो वह शक्ति देती है;
लेकिन अगर भय और भ्रम के साथ जुड़ जाए, तो वह कमजोरी बन जाती है।


“अंधविश्वास और कानून” विषय पर समाज, धर्म और कानून के बीच की महीन रेखा को बेहद सटीक रूप में प्रस्तुत करता है।

“अंधविश्वास और कानून” विषय पर समाज, धर्म और कानून के बीच की महीन रेखा को बेहद सटीक रूप में प्रस्तुत करता है। 


अंधविश्वास और कानून: विश्वास की मर्यादा बनाम शोषण का व्यापार

शोषण के खिलाफ, धर्म के नहीं

समाजसेवी अमोल मानव ने स्पष्ट किया है कि उनका आंदोलन किसी भी धर्म या देवी-देवता के विरोध में नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जो चमत्कार और अंधविश्वास के नाम पर भोले-भाले लोगों का शोषण करते हैं। उनका कहना है कि ऐसे लोग धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करके लोगों से पैसा और सत्ता दोनों बटोरते हैं।

विश्वास और धोखे के बीच की रेखा

मानव का तर्क है कि कानून किसी के धार्मिक विश्वास या आध्यात्मिक अनुभव पर रोक नहीं लगाता, बल्कि केवल उस स्थिति में हस्तक्षेप करता है जब कोई व्यक्ति “चमत्कार करने” का दावा करके दूसरों को धोखा देने या ठगने की कोशिश करता है। यही अंतर “श्रद्धा” और “शोषण” के बीच की असली रेखा है।

वैज्ञानिक सोच और सामाजिक बदलाव

इस कानून को वे केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में एक कदम मानते हैं। उनका विश्वास है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा देकर यह कानून समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकता है, जहां लोग सवाल पूछने से डरें नहीं और अंधभक्ति से मुक्त हों।


लागू करने से जुड़ी चुनौतियाँ

खराब कार्यान्वयन

मानव ने हाल के वर्षों में कानून के कमजोर कार्यान्वयन पर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि सरकार की नीयत साफ नहीं है — कानून तो बना दिया गया, पर इसे लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई

पुलिस जागरूकता की कमी

वे बताते हैं कि बड़ी समस्या यह है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इस कानून के प्रावधानों की पूरी जानकारी नहीं होती। परिणामस्वरूप, बहुत कम मामले दर्ज होते हैं और उनमें भी सज़ा की दर बेहद कम रहती है।

ढोंगी बाबाओं को खुली चुनौती

मानव इस कानून को केवल किताबों में नहीं छोड़ना चाहते — वे इसे सक्रिय रूप से लागू कराने के लिए अभियान चला रहे हैं। उन्होंने कई बार अपने आंदोलनों में बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जैसे तथाकथित चमत्कारी बाबाओं को चुनौती दी है। जब ये व्यक्ति अपने “चमत्कारों” को साबित करने में नाकाम रहते हैं, तो मानव उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हैं


निष्कर्ष

अंधविश्वास के खिलाफ यह संघर्ष केवल कानून का नहीं, समाज की चेतना का संघर्ष है। यह उस सोच को मजबूत करता है जो कहती है कि ईश्वर पर विश्वास और विज्ञान पर भरोसा — दोनों एक साथ संभव हैं, बशर्ते विश्वास का उपयोग शोषण का साधन न बने।



Tuesday, November 4, 2025

रिपोर्ट: गांव में साहित्य का मेला या भ्रम का जाल?



रिपोर्ट: गांव में साहित्य का मेला या भ्रम का जाल?

स्थान: ——देहरादून 
संवाददाता: ——unn 

गांव में इन दिनों साहित्यिक गतिविधियों का खूब बोलबाला है। लेखक गांव के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र में साहित्यकारों का जमघट लगा हुआ है। गांव के अन्नदाता निशंक अब तक 100 से भी अधिक किताबें लिख चुके हैं, जिससे यह स्थान एक तरह से "ग्रामीण साहित्य राजधानी" बन गया है।

लेकिन इसी साहित्यिक रौनक के बीच एक सवाल उठ खड़ा हुआ है —
अगर हाल ही में लगाए गए पोस्टर में दी गई जानकारी सही है, तो ‘कलिंग पर विजय’ नाटक मोहन राकेश का है या यह रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता से जुड़ा हुआ काव्य रूपांतरण है?

कई स्थानीय बुद्धिजीवी और साहित्यप्रेमी इस पोस्टर को देखकर भ्रमित हैं। कुछ का कहना है कि यह साहित्यिक कार्यक्रम में तथ्यों की गलती का उदाहरण है, जबकि कुछ इसे अनजाने में हुई चूक बता रहे हैं।

स्थानीय प्रतिक्रिया:
गांव के एक अध्यापक ने कहा —

> “अगर हम साहित्य का प्रचार करते हुए भी गलत जानकारी देंगे, तो यह आने वाली पीढ़ी के लिए भ्रम का कारण बनेगा।”



दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि “शायद पोस्टर बनाने वालों को यह जानकारी नहीं रही कि ‘कलिंग विजय’ विषय पर दिनकर की प्रसिद्ध रचना ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’ जैसी काव्यधाराएँ हैं, जबकि मोहन राकेश नाट्य विधा के लिए जाने जाते हैं।”

विश्लेषण:
यह विवाद केवल एक नाम या शीर्षक का नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि गांवों में साहित्यिक चेतना तो बढ़ रही है, लेकिन सही जानकारी और संदर्भ की पुष्टि की जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है।

निष्कर्ष:
साहित्यिक कार्यक्रमों में यदि तथ्यगत स्पष्टता नहीं रखी गई, तो ज्ञान का प्रचार भ्रम में बदल सकता है। लेखक गांव को यदि सच में साहित्य का केंद्र बनना है, तो उसे सही संदर्भों के साथ अपनी पहचान मजबूत करनी होगी।

भ्रष्टाचार पर पहली चोट — जागता उत्तराखंड, गैरसैंण की पुकार और ‘आधे सच’ की गूँज



✍️ संपादकीय लेख : दिनेश गुसाईं


कभी-कभी विधानसभा के भीतर उठी एक आवाज़ पूरे राज्य के नैतिक तंत्र को हिला देती है।
उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में विपक्ष के उपनेता भुवन कापड़ी का यह कहना —
“भ्रष्टाचार की शुरुआत हमसे होती है, विधायक निधि से 15% कमीशन काट लिया जाता है” —
सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा पर पड़ी पहली चोट है।

कापड़ी का यह वक्तव्य उस सच्चाई की झलक है,
जिसे जनता वर्षों से महसूस कर रही थी लेकिन कोई कह नहीं रहा था।
उन्होंने सदन में कहा कि विधायक विकास निधि से नौकरशाहों द्वारा 15% कमीशन लिया जाता है।
लेकिन यह कहानी का केवल आधा सच है।

सच यह है कि इसके अलावा भी विधायक के क्षेत्र में काम करवाने के लिए स्वयं विधायक को 7% रिश्वत देनी पड़ती है।
जेई (J.E.), एक्सईएन (XEN), एकाउंटेंट से लेकर उच्च स्तर तक,
कई बार विकास कार्यों की कुल रकम का लगभग 48 प्रतिशत हिस्सा कमीशनखोरी में चला जाता है।
यह वह सड़ांध है जिसने उत्तराखंड के विकास की जड़ों को खोखला कर दिया है।

इस कड़वे सच को स्वीकार करने का साहस ही असली शुरुआत है।
भुवन कापड़ी ने सदन में जो कहा, वह राजनीतिक बयान नहीं —
एक आत्मस्वीकृति थी, एक पुकार थी कि अब बदलाव भीतर से शुरू हो।

और इसी आत्मजागरण के बीच फिर एक पुरानी आवाज़ गूँज रही है —
स्थायी राजधानी गैरसैंण की माँग।
यह सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि जनभावना और न्याय का प्रश्न है।
गैरसैंण को राजधानी बनाना,
उत्तराखंड की जनता को शासन के और करीब लाना है।
यह भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के उस फासले को खत्म करने की शुरुआत होगी,
जो देहरादून की ऊँची दीवारों ने पैदा कर दिया है।

आज जरूरत है कि यह “भ्रष्टाचार पर पहली चोट”
एक नई राजनीति का सूत्रपात बने —
जहाँ सत्ता का केंद्र जनता की संवेदना में हो,
और उत्तराखंड का दिल गैरसैंण में धड़के।

अगर सदन में 15% कमीशन पर माननीयों की आत्मा जागी है,
तो समझिए — यह सिर्फ भ्रष्टाचार पर नहीं,
अन्याय और दूरी पर भी पहली चोट है।
उत्तराखंड अब वाकई जाग रहा है —
अपने सच के साथ, अपने स्वाभिमान और अपनी राजधानी गैरसैंण के साथ।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...