Thursday, November 6, 2025
क्या राजनीति साधन नहीं, उद्देश्य बन गई है?
“क्या राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित है या सामाजिक बदलाव का माध्यम?”
Wednesday, November 5, 2025
उत्तराखंड में अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और डायन-प्रथा की प्रचलन स्थिति एवं नियंत्रण हेतु नीतिगत सुझाव
🧾 भाग–1 : नीतिगत रिपोर्ट (Policy Brief)
विषय: उत्तराखंड में अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और डायन-प्रथा की प्रचलन स्थिति एवं नियंत्रण हेतु नीतिगत सुझाव
🔹 परिचय
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में धार्मिक आस्था गहरी है, परंतु इसके साथ-साथ अंधविश्वास, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और “डायन” जैसी अवधारणाएँ भी कुछ क्षेत्रों में सामाजिक समस्या के रूप में मौजूद हैं।
ये प्रथाएँ विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए मानसिक, सामाजिक और शारीरिक हिंसा का कारण बनती हैं।
🔹 मुख्य कारण
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शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी
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ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता
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सामाजिक असमानता व लैंगिक भेदभाव
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धार्मिक आड़ में धोखाधड़ी करने वाले तथाकथित तांत्रिक व ओझा
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कानूनी जागरूकता का अभाव और पीड़ितों का डर
🔹 वर्तमान स्थिति
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NCRB रिपोर्टों के अनुसार, “जादू-टोना” या “डायन” के आरोपों से जुड़ी हत्याएँ देशभर में होती हैं,
हालांकि उत्तराखंड में आँकड़े अपेक्षाकृत कम हैं। -
राज्य के कुछ पर्वतीय जिलों (जैसे चंपावत, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा) से समय-समय पर
झाड़-फूंक, भूत-प्रेत या “देवी-दर्शन” के नाम पर हिंसक या शोषणकारी घटनाएँ सामने आई हैं। -
सरकार ने हाल ही में “फर्जी बाबाओं” और तांत्रिकों पर निगरानी बढ़ाई है, जो सकारात्मक कदम है।
🔹 प्रभाव
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महिलाओं के प्रति हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक उत्पीड़न।
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ग्रामीण समाज में भय और विभाजन।
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आर्थिक दोहन (भेंट, चढ़ावा, नकली इलाज)।
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कानून व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव।
🔹 सुझाव
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अंधविश्वास-निवारण अधिनियम:
महाराष्ट्र मॉडल की तरह “अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून” उत्तराखंड में भी लागू किया जाए। -
स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार:
प्रत्येक ब्लॉक में मोबाइल हेल्थ यूनिट्स और महिला स्वास्थ्य स्वयंसेवक नियुक्त हों। -
शैक्षिक और सामाजिक अभियान:
विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और ग्राम सभाओं के माध्यम से “वैज्ञानिक सोच” और “विवेक आधारित आस्था” पर कार्यक्रम। -
महिला सुरक्षा एवं पुनर्वास केंद्र:
झूठे आरोपों से प्रभावित महिलाओं के लिए कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श। -
मीडिया व डिजिटल अभियान:
सोशल मीडिया पर “#विश्वास_न_अंधविश्वास” जैसे अभियान चलाए जाएँ। -
फर्जी तांत्रिकों पर कानूनी कार्रवाई:
धार्मिक या तांत्रिक आड़ में धोखाधड़ी करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान।
🔹 निष्कर्ष
अंधविश्वास केवल अज्ञानता का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी का परिणाम है।
इसलिए सरकार, नागरिक समाज, धार्मिक संगठन और मीडिया — सभी को मिलकर
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशील कानून और जनजागरूकता को प्राथमिकता देनी होगी।
✍️ भाग–2 : संपादकीय/लेख
शीर्षक:
🕯️ “जब विश्वास अंधा हो जाता है — उत्तराखंड में अंधविश्वास का सच”
🌿 लेख
उत्तराखंड की वादियाँ देवभूमि कहलाती हैं, पर इन्हीं घाटियों में कभी-कभी अंधविश्वास के अंधेरे भी छिपे मिलते हैं।
कहीं कोई तांत्रिक “देवी उतरने” का दावा करता है, तो कहीं किसी महिला को “डायन” कहकर समाज से अलग कर दिया जाता है।
सवाल यह है — 21वीं सदी में भी यह सब क्यों?
दरअसल, जब स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर हों, शिक्षा अधूरी हो और न्याय दूर लगे —
तब भय, बीमारी और दुर्भाग्य का कारण “जादू-टोना” में खोज लिया जाता है।
और यही वह क्षण होता है जब विश्वास, अंधविश्वास में बदल जाता है।
ग्रामीण समाज में महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं।
जिनके पास जमीन नहीं, जिनकी आवाज़ कमजोर है — वे ही “डायन, जोगिन या कलंकित ” घोषित कर दी जाती हैं।
कई बार यह आरोप किसी की ज़मीन या प्रतिष्ठा हड़पने का हथियार बन जाता है।
उत्तराखंड सरकार ने हाल के वर्षों में फर्जी बाबाओं पर शिकंजा कसने की पहल की है,
लेकिन यह तभी पर्याप्त होगी जब शिक्षा और विज्ञान लोगों की आस्था के साथ-साथ चलें।
“देवभूमि” का अर्थ तभी पूरा होगा जब भक्ति के साथ विवेक भी जुड़ा हो।
अंधविश्वास कोई धर्म नहीं — यह भय की उपज है।
और भय को मिटाने का एक ही उपाय है — ज्ञान, संवेदना और सत्य का प्रकाश।
“उत्तराखंड आस्था-सुरक्षा एवं अंधविश्वास निवारण अधिनियम”
🌿 “उत्तराखंड आस्था-सुरक्षा एवं अंधविश्वास निवारण अधिनियम”
Udaen Foundation के माध्यम से प्रस्तुत करने की वैधानिक व व्यावहारिक रूपरेखा
🔹 1. संस्था की भूमिका
Udaen Foundation इस प्रस्ताव को एक जन-हित आधारित नीति अनुशंसा (Policy Recommendation) के रूप में राज्य सरकार को प्रस्तुत कर सकती है।
यह “धर्म या आस्था विरोधी” नहीं, बल्कि “मानवाधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय” के पक्ष में पहल के रूप में जाएगी।
🔹 2. प्रस्तुति का कानूनी तरीका
आप तीन स्तरों पर इसे प्रस्तुत कर सकते हैं —
(a) जनहित ज्ञापन (Public Memorandum):
Udaen Foundation, अपने लेटरहेड पर अधिनियम का ड्राफ्ट व औचित्य नोट संलग्न कर मुख्यमंत्री, विधि मंत्री, और मुख्य सचिव को ज्ञापन दे सकती है।
(b) राज्य नीति आयोग या समाज कल्याण विभाग को सिफारिश:
यह अधिनियम “समाज कल्याण”, “महिला एवं बाल विकास”, “मानवाधिकार” और “गृह विभाग” सभी से जुड़ा है। इसलिए फाउंडेशन “समाज कल्याण विभाग” के अंतर्गत नीति प्रस्ताव के रूप में फाइल कर सकती है।
(c) जन-जागरूकता और शोध-पत्र:
आप इस ड्राफ्ट को Policy Paper + Field Report के रूप में तैयार कर
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प्रेस कॉन्फ़्रेंस,
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Udaen News Network,
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तथा शैक्षणिक संस्थानों (जैसे HNB Garhwal University, Doon University आदि)
के समक्ष रख सकते हैं।
🔹 3. आवश्यक दस्तावेज़
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फाउंडेशन का पंजीकरण प्रमाणपत्र और CSR/NGO परिचय।
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प्रस्तावित अधिनियम (Draft Bill)।
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औचित्य नोट (Justification Note) — जिसमें आप स्पष्ट करेंगे कि यह
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धार्मिक स्वतंत्रता का विरोध नहीं करता,
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बल्कि परिवार, महिला, बच्चों और कमजोर वर्गों को “झाड़-फूंक, जगर, या देवी-प्रभाव” के नाम पर हो रहे शोषण से बचाने के लिए है।
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6-महीने की कार्यान्वयन रूपरेखा (Implementation Roadmap)।
🔹 4. जनसहयोग मॉडल (Public Participation)
Udaen Foundation इसे जनता से जोड़ सकती है:
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“अंधविश्वास से आज़ादी” नामक ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान (petition)।
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जिलास्तरीय संवाद — “जगर या जागरूकता?” विषय पर सेमिनार/चर्चा।
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मीडिया कवरेज — Udaen News Network के माध्यम से विशेष कवरेज और रिपोर्ट सीरीज़।
🔹 5. संविधानिक औचित्य (Legal Validity)
इस कानून का संविधान में पूरा आधार है:
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अनुच्छेद 21: जीवन और गरिमा का अधिकार।
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अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, जब तक वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के विपरीत न हो।
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अनुच्छेद 51-A(h): नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता और सुधार की भावना विकसित करे।
👉 इसलिए यह अधिनियम संविधान-सम्मत और धर्म-निरपेक्ष दोनों रहेगा।
🔹 6. राज्यस्तरीय सहयोग
इसे प्रारंभिक चरण में निम्न संस्थाओं के साथ साझा कर सकते हैं:
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उत्तराखंड समाज कल्याण विभाग
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उत्तराखंड महिला आयोग / बाल अधिकार संरक्षण आयोग
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उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग
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विधि विभाग / विधायी विभाग सचिवालय, देहरादून
🔹 7. Udaen Foundation के लिए आगामी कदम
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“अंधविश्वास निवारण अधिनियम (उत्तराखंड) प्रस्तावित” ड्राफ्ट को अंतिम रूप दें।
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उसके साथ “औचित्य नोट” जोड़ें (2–3 पृष्ठ)।
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6 महीने की पायलट कार्ययोजना (Implementation Framework) संलग्न करें।
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सब कुछ एक संयुक्त PDF ज्ञापन-पैकेट में तैयार करें।
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देहरादून में संबंधित विभागों को ज्ञापन सौंपें और मीडिया में रिलीज़ दें।
उत्तराखंड: “आस्था-सुरक्षा और अंधविश्वास निवारण (प्रस्तावित) अधिनियम” — आउटलाइन
“जागर, पाखंड या देवी-देवता के नाम पर परिवार टूटना, बलात्कार, मानसिक उत्पीड़न, और आर्थिक शोषण” जैसी घटनाएँ देखी जाती हैं।
उत्तराखंड: “आस्था-सुरक्षा और अंधविश्वास निवारण (प्रस्तावित) अधिनियम” — आउटलाइन
1) उद्देश्य (Purpose)
उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता का सम्मान करते हुए यह अधिनियम लक्ष्य करेगा:
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जगर/भूत-प्रेत/चमत्कार के नाम पर परिवारों का विघटन, जबरन वंश-भंग, घरेलू हिंसा और आर्थिक दुरुपयोग रोकना;
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धार्मिक विश्वास को निशाना बनाए बिना शोषण और हिंसा को दंडित करना;
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जन-सुरक्षा, तर्कशील शिक्षा और पीड़ित संरक्षण को सुनिश्चित करना।
2) मुख्य परिभाषाएँ (Selected Definitions)
(नियमों में स्पष्ट परिभाषाएँ अनिवार्य हैं ताकि धर्म-स्वतंत्रता पर असर न हो)
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आस्था-कृत्य: पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान जिनका उद्देश्य पूजा/परंपरा है और जिनसे शारीरिक-मानसिक/आर्थिक क्षति न हो।
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अंधविश्वासी शोषण: किसी व्यक्ति/समूह द्वारा जगर, चमत्कार, भूत-प्रेत आदि का दावा कर डर, भलाई के बहाने धन/स्वतंत्रता/रेप/वंश-विच्छेद आदि कराना।
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खतरनाक कर्मकांड: ऐसे कर्मकांड जो शारीरिक चोट, मजबूरी, बाल-श्रम, मानव-बलि या परिवारिक तोड़फोड़ का कारण बनें।
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सांस्कृतिक अपवाद: परंपरागत कर्मकांड जिन्हें समाज-स्वीकृति है और जो किसी भी व्यक्ति को शारीरिक/मानसिक/आर्थिक हानि नहीं पहुँचाते — वे इस अधिनियम की दण्डनीय सूची से अलग रखे जा सकेंगे (बशर्ते वे किसी का शोषण न करें)।
3) अपराध-धाराएँ और दंड (Examples)
(न्यायिक मर्यादा के साथ — बाल/महिला सुरक्षा के हिसाब से कड़े प्रावधान)
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धारा A — आस्था के बहाने धोखा/ठगी: १–५ वर्षों की कैद और ₹50,000–₹2,00,000 जुर्माना।
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धारा B — परिवारिक तोड़फोड़ (जबरन वंश-विच्छेद/त्याग): ३–७ वर्षों की कैद और उच्च जुर्माना; पीड़ित परिवार के पुनर्संयोजन के लिए सरकारी सहायता।
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धारा C — शारीरिक/मानसिक शोषण (झाड़-फूंक के दौरान): गैर-जमानती, ५–१० वर्ष तक की सजा।
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धारा D — मानव-बलि/बच्चों का उपयोग/बाल-श्रम: कठोर दंड, ७–१२ वर्ष तक।
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धारा E — दोहराव/संगठित गिरोह: दंड दोगुना और संगठन के खिलाफ संपत्ति जब्ती की अनुमति।
4) संरक्षण प्रावधान (Protection & Relief)
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पीड़ितों के लिये तात्कालिक शेल्टर और कानूनी सहायता; मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग।
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वकील/NGO द्वारा नि:शुल्क प्रतिनिधित्व।
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गवाह सुरक्षा और गवाह-बचाव प्रावधान।
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पारिवारिक पुनर्संयोजन प्रोग्राम तथा आर्थिक नुकसान की आंशिक भरपाई/रिहैबिलिटेशन।
5) लागू करने की संरचना (Institutional Mechanism)
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राज्य अंधविश्वास-निवारण प्रकोष्ठ (State Cell) — नीति, निगरानी, पायलट और डेटा-रिपोर्टिंग।
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जिला-स्तर नोडल अधिकारी (DNO) — हर जिले में ट्रेनिंग, शिकायत-हैंडलिंग, और पंचायत-काइटिंग।
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स्थल-विशेष निगरानी समितियाँ — जगर/झाड़-फूंक के बड़े केंद्रों (जैसे कुछ ग्रामों में होने वाले जगर) पर स्थानीय प्रशासन + सामाजिक कार्यकर्ता + धर्मगुरु का समावेश।
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फास्ट-ट्रैक पैनल — पीड़ित मामलों के लिए समयबद्ध सुनवाई।
6) सांस्कৃতিক संवेदनशीलता और लोक-परंपरा का संरक्षण
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अधिनियम स्पष्ट करेगा: आस्था-अभिव्यक्ति पर रोक नहीं, केवल जब यह किसी का शोषण/हानि कर दे तो कार्रवाई होगी।
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स्थानीय पंडित, ज्योतिषी, भानगे/बाजार-नेताओं के साथ संवाद — उन्हें ट्रेनिंग और रजिस्ट्रेशन के विकल्प दिए जाएँ।
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परंपरागत विधियों का दस्तावेजीकरण और यदि आवश्यक हो तो वैकल्पिक सामाजिक अनुष्ठानों का प्रचार, ताकि परंपरा टिके पर हानि न हो।
7) शिक्षा-और-समुदाय कार्यक्रम (Prevention)
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स्कूलों में critical thinking, स्वास्थ्य शिक्षा और मानव अधिकारों की पढ़ाई।
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ग्राम सभाओं/पंचायतों में जागरूकता-बैठकें; महिला समूहों को सशक्त बनाना।
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धार्मिक/समाज-नेताओं के साथ “सुरक्षित जगर” समझौते — सार्वजनिक नियम जैसे भीड़-नियंत्रण, अनुमति-पत्र, और किसी चिकित्सा मामले में चिकित्सक की अपील।
8) तत्काल क्रियावली (6-महीने पायलट योजना)
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महीना 1: स्थिति मानचित्रण — उच्च-जोखिम गांवों/स्थलों की सूची (जगर केंद्र) बनाना।
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महीना 2: कानूनी मसौदा + स्थानीय परामर्श — समुदायों के साथ परामर्श।
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महीना 3–4: पायलट लागू — 2–3 जिलों में DNO, हॉटलाइन, और फास्ट-ट्रैक मामला संचालन।
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महीना 5: प्रशिक्षण और जन-जागरूकता — पुलिस/स्वास्थ्यकर्मी/पंचायतों का प्रशिक्षण।
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महीना 6: मूल्यांकन और विस्तार योजना — प्रभाव रिपोर्ट के आधार पर राज्य-व्यापी रोल-आउट।
9) चुनौतियाँ और बचाव रणनीतियाँ
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धार्मिक प्रतिरोध: स्पष्ट संदेश — “धर्म नहीं, शोषण पर कार्रवाई”। समुदाय-नेताओं को जोड़ना ज़रूरी।
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पुलिस और प्रशासन की नॉलेज-गैप: व्यापक प्रशिक्षण और SOPs।
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गवाह और पीड़ितों का डर: त्वरित सुरक्षा एवं माहौल-सुरक्षा।
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संविधानिक चुनौतियाँ: कानून को धर्म-स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं बनाना — कानूनी समीक्षा और विधि-विशेषज्ञों की संलिप्तता आवश्यक।
10) नमूना क्लॉज़-टेक्स्ट (संक्षेप)
धारा X(1): किसी भी व्यक्ति द्वारा देवी-देवता, जगर, आत्मा या किसी अलौकिक शक्ति के नाम पर किसी अन्य व्यक्ति को डराकर, धमका कर, या धोखा देकर धन/संपत्ति/स्वतंत्रता/यौन सम्बन्ध आदि के लिए बाध्य करना दंडनीय अपराध होगा।
धारा X(2): उपधारा (1) के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर ३ वर्ष तक की कैद तथा ₹1,00,000 तक जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं।
धारा Y: यदि दोषी व्यक्ति ने बाल या मानसिक रूप से असमर्थ व्यक्ति का अपमान/कठोर व्यवहार किया तो दंड ५–१० वर्ष तक होगा।
धारा Z: स्थानीय पंचायत/मंदिर प्रबंधन के लिए अनिवार्य है कि वे किसी भी सार्वजनिक अनुष्ठान के दौरान स्वास्थ्य व सुरक्षा विनियमों का पालन कराएँ और यदि किसी भी प्रकार का शोषण हो तो प्रशासन को तुरंत सूचित करें।
"राजस्थान धर्म-संवेदनशीलता और अंधविश्वास निवारण अधिनियम" (या छोटा नाम – "Faith & Rationality Protection Act")
अगर राजस्थान में बालाजी महाराज (हनुमान) और खाटू श्याम से जुड़े अंधविश्वास या धोखाधड़ी जैसी गतिविधियाँ बढ़ रही हैं — जैसे:
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चमत्कार दिखाने के नाम पर धन एकत्र करना,
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लोगों को डराकर चढ़ावा या दान लेना,
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मानसिक रोगों या चिकित्सा मामलों को “देवी-देवता का प्रकोप” बताकर इलाज से दूर रखना,
तो इस पर कानूनी नियंत्रण लाना संभव है।
🔹 कानूनी ढांचा प्रस्ताव:
"राजस्थान धर्म-संवेदनशीलता और अंधविश्वास निवारण अधिनियम"
(या छोटा नाम – "Faith & Rationality Protection Act")
🔹 उद्देश्य:
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देवी-देवता, आत्मा, भूत-प्रेत, चमत्कार आदि के नाम पर ठगी, डर या शोषण को रोकना।
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धार्मिक आस्था को संरक्षित रखते हुए अंधविश्वास, धोखे, और शारीरिक या मानसिक हानि से जनता की रक्षा करना।
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वैज्ञानिक सोच और तर्कशील दृष्टिकोण को बढ़ावा देना।
🔹 संभावित धाराएँ:
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धारा 1 – अंधविश्वास पर आधारित ठगी दंडनीय अपराध होगा।
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यदि कोई व्यक्ति “चमत्कार दिखाने”, “देवी प्रकोप उतारने”, “भूत भगाने” या “दान से मोक्ष देने” का झूठा दावा कर धन/संपत्ति लेता है, तो
➤ उसे 3 वर्ष तक की सजा और ₹50,000 तक का जुर्माना।
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धारा 2 – स्वास्थ्य और शिक्षा में अंधविश्वास फैलाना प्रतिबंधित।
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यदि किसी धार्मिक या सामाजिक व्यक्ति द्वारा किसी रोग या शिक्षा से जुड़े विषय में वैज्ञानिक उपचार या शिक्षा से लोगों को दूर किया जाए।
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धारा 3 – धार्मिक भावनाओं का सम्मान।
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कोई भी व्यक्ति आस्था के स्थलों या पूजा-पद्धति में हस्तक्षेप नहीं करेगा जब तक कि वहां अपराध, शोषण या धोखाधड़ी न हो।
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धारा 4 – तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण संवर्धन परिषद
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राज्य स्तर पर एक परिषद बनेगी जो शिक्षा, मीडिया और समाज में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देगी।
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🔹 सामाजिक लाभ:
-
धार्मिक आस्था सुरक्षित रहेगी लेकिन ठग और पाखंडी तंत्र कमजोर होंगे।
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असली भक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी मजबूत होगी।
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गरीब और अशिक्षित लोग ठगी से बचेंगे।
“राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”
📘 “राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”
(ड्राफ्ट बिल + कार्यान्वयन योजना)
यह प्रस्ताव मेहंदीपुर बालाजी, खाटू श्यामजी जैसे स्थलों पर बढ़ते अंधविश्वास, शोषण, और हिंसा को रोकने के उद्देश्य से होगा — धर्म या आस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि धोखे, भय और हिंसा के खिलाफ।
I. प्रस्तावना (Preamble)
राजस्थान राज्य की जनता के हित में यह आवश्यक है कि अंधविश्वास, चमत्कारों के झूठे दावों, झाड़-फूंक, मानव बलि, और ऐसी किसी भी अमानवीय प्रथा के माध्यम से नागरिकों के शोषण को रोका जाए तथा समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा दिया जाए।
अतः राजस्थान विधानमंडल यह अधिनियम पारित करता है:
II. नाम और प्रारंभ
इस अधिनियम को कहा जाएगा —
👉 “राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”
यह अधिनियम राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात समूचे राजस्थान राज्य में लागू होगा।
III. उद्देश्य (Objectives)
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चमत्कार, तांत्रिक कर्मकांड या झाड़-फूंक के नाम पर नागरिकों को धोखा देने से रोकना।
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मानव बलि, पशु बलि, या किसी भी अमानवीय धार्मिक कृत्य को अपराध घोषित करना।
-
धर्मस्थलों पर होने वाले झूठे “चमत्कार प्रदर्शन” और मानसिक शोषण को रोकना।
-
जनता में वैज्ञानिक सोच, मानवता और संविधानसम्मत आस्था का प्रसार करना।
IV. परिभाषाएँ (Definitions)
-
अंधविश्वास — कोई भी ऐसी आस्था या प्रथा जो प्रमाण, तर्क या वैज्ञानिक परीक्षण से परे हो और जिसके कारण शारीरिक, मानसिक या आर्थिक शोषण होता हो।
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चमत्कार का दावा — जब कोई व्यक्ति या संस्था यह कहे कि उसके पास अलौकिक या दिव्य शक्ति है जिससे रोग, समस्या या पाप मिट सकते हैं।
-
मानव बलि/अमानवीय प्रथा — किसी व्यक्ति या पशु को धार्मिक उद्देश्य से हानि पहुँचाना।
-
झाड़-फूंक या तांत्रिक कर्मकांड — ऐसी गतिविधि जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता, शारीरिक अखंडता या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचे।
V. दंड (Penalties)
-
अंधविश्वास के नाम पर धोखा देना: 6 माह से 3 वर्ष तक की कैद या ₹50,000 तक जुर्माना।
-
मानव या पशु बलि देना: 7 वर्ष तक की सख्त कैद और ₹1 लाख तक जुर्माना।
-
धोखे से ‘चमत्कार’ का प्रदर्शन या झूठा प्रचार: 1 से 5 वर्ष तक की कैद।
-
पीड़ित को शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचाने पर: गैर-जमानती अपराध, 5 वर्ष तक कैद।
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दोहराव की स्थिति में: दोगुना दंड।
VI. लागू करने की व्यवस्था (Implementation Mechanism)
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विशेष प्रकोष्ठ (Special Cell): राज्य स्तर पर “अंधविश्वास निवारण प्रकोष्ठ” का गठन।
-
पुलिस प्रशिक्षण: प्रत्येक जिला पुलिस में नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा जो इस अधिनियम की निगरानी करेगा।
-
मंदिर/धार्मिक स्थलों के लिए निर्देश:
-
मेहंदीपुर बालाजी और खाटू श्यामजी जैसे स्थलों पर CCTV निगरानी अनिवार्य।
-
झाड़-फूंक, भूत-प्रेत निकासी, या मानसिक उत्पीड़न जैसी गतिविधियों पर रोक।
-
केवल पंजीकृत पुजारी/संचालक को धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति।
-
-
जन-जागरूकता:
-
स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और मीडिया के माध्यम से “धर्म नहीं, धोखा रोको” अभियान।
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राज्य शिक्षा विभाग द्वारा वैज्ञानिक सोच पर आधारित विशेष कक्षाएँ।
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VII. संरक्षण और सहायता (Protection & Support)
-
पीड़ित व्यक्ति या गवाह को पुलिस सुरक्षा दी जाएगी।
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ऐसे मामलों के लिए त्वरित अदालत (Fast Track Court) गठित की जाएगी।
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गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को शिकायतों के संकलन और जन-जागरूकता में भागीदारी दी जाएगी।
VIII. विशेष प्रावधान (Special Provisions for Religious Sites)
-
मेहंदीपुर बालाजी और खाटू श्यामजी जैसे प्रमुख स्थलों पर:
-
भीड़ नियंत्रण और स्वास्थ्य सहायता केंद्र अनिवार्य।
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धार्मिक कर्मकांड के दौरान किसी व्यक्ति पर हिंसा, बेहोशी, मारपीट या जंजीरबंदी को अपराध माना जाएगा।
-
जिला प्रशासन द्वारा निगरानी समिति (Collector की अध्यक्षता में) गठित की जाएगी।
-
-
मंदिर प्रबंधन को प्रत्येक वर्ष “सुरक्षित आस्था रिपोर्ट” राज्य सरकार को देनी होगी।
IX. सामाजिक जागरूकता योजना (6-महीने की कार्ययोजना)
| चरण | अवधि | प्रमुख गतिविधि | जिम्मेदार एजेंसी |
|---|---|---|---|
| 1. प्रारंभिक समीक्षा | 1 माह | मौजूदा कानूनों और घटनाओं का अध्ययन (बालाजी, खाटू) | विधि विभाग |
| 2. मसौदा व अनुमोदन | 2 माह | ड्राफ्ट बिल तैयार कर मंत्रिमंडल में प्रस्तुत करना | गृह विभाग |
| 3. पायलट लागू क्षेत्र | 3-4 माह | दो धार्मिक स्थलों पर पायलट — CCTV, पोस्टर, निगरानी | जिला प्रशासन |
| 4. जन-जागरूकता अभियान | 4-6 माह | मीडिया, स्कूल, सोशल कैंपेन | सूचना विभाग + NGOs |
| 5. निगरानी मूल्यांकन | 6 माह | प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट | योजना विभाग |
X. निष्कर्ष
“आस्था यदि ज्ञान के साथ है, तो वह शक्ति है;
लेकिन जब वह भय और धोखे में बदल जाए —
तब कानून का हस्तक्षेप ज़रूरी है।”
यह अधिनियम राजस्थान में आस्था की गरिमा को बनाए रखते हुए अंधविश्वास, भय और शोषण को समाप्त करने का उद्देश्य रखता है।
न्यूज़ विचार और व्यव्हार
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