Sunday, June 29, 2025

**स्क्रिप्ट: “औक़ात की जात”**

 **नुक्कड़ नाटक / वीडियो स्क्रिप्ट** के रूप में ढाला गया है — शीर्षक है **“औक़ात की जात”**। यह स्क्रिप्ट सामाजिक भेदभाव, जातिवाद और नैतिक पतन पर तीखा सवाल उठाती है। इसे नुक्कड़ नाटक, सोशल मीडिया वीडियो, या थिएटर प्रस्तुति के लिए प्रयोग किया जा सकता है।


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### 🎭 **स्क्रिप्ट: “औक़ात की जात”**


**शैली:** सामाजिक-संघर्ष आधारित नुक्कड़ नाटक

**समय:** 6-8 मिनट

**कलाकार:** 4-5 पात्र

**स्थान:** गाँव, चौराहा या कोई गली


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#### **\[दृश्य 1: चौराहे पर हलचल, दो लोग बहस कर रहे हैं जात को लेकर]**


**पात्र 1 (अहंकार से):**

अबे तू जानता नहीं, हम ऊँची जात वाले हैं!

हमारे सामने ज़्यादा मत बोल!


**पात्र 2 (गुस्से में):**

जात बड़ी है या इंसान?

तू चोरी करता है, घूस खाता है,

फिर भी खुद को बड़ा समझता है?


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#### **\[दृश्य 2: बाकी पात्र आते हैं और मंच के बीचोंबीच गोल घेरा बनाते हैं]**


**(सभी मिलकर तालियों की लय में बोलते हैं):**

जात पूछते हो?

पहले इंसानियत का चेहरा ढूंढो!


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#### **पात्र 3 (कविता की शैली में):**


जिसने औरत को बेचा,

जिसने ग़रीब का खून चूसा —

वो किस जात का था?


**पात्र 4 (आवेश में):**

जो धर्म के नाम पर

दंगा करवाता है,

और फिर वोट बटोरता है —

उसे किसने ऊँची जात दी?


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#### **पात्र 5 (तेज आवाज़ में, जनता की ओर मुंह करके):**


हरामियों की औकात होती है,

**जात नहीं!**

लेकिन समाज क्या करता है?

जो मेहनत करता है,

उसे नीच बना देता है।


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#### **\[तालियों की लय दोबारा शुरू]**


**सभी:**

नाम बड़े, काम सड़े —

फिर भी सर ऊँचा किए घूमते हैं,

दिल से बड़ा है जो —

वो झुका खड़ा है!


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#### **पात्र 2 (भावुक होकर):**


इतिहास गवाही देता है —

हर बड़ा इंकलाब

नीच कहे गए इंसान ने ही किया है।


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#### **पात्र 1 (अब बदले स्वर में):**


शायद मैं गलत था,

जात नहीं,

औकात देखनी चाहिए थी।


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#### **सभी पात्र (अंतिम नारा):**


अब वक़्त है —

शब्दों की दीवारें तोड़ो!

जात नहीं,

**चरित्र का तराजू जोड़ो!**


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### 🎬 **(पर्दा गिरता है / लाइट बंद)**


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**"समाज में हरामियों की औकात होती है, जात नहीं"** पर आधारित एक सामाजिक चेतना और विद्रोह की भावना से भरी **कविता**:



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### **औक़ात की जात**


जात पूछते हो?

चलो पहले इंसानियत का चेहरा ढूंढो,

जिसने औरत को बेचा,

जिसने गरीब का खून चूसा,

वो किस जात का था?


जो मंदिर-मस्जिद की आड़ में

दंगा भड़काता है,

जो कुर्सी के लिए

क़ौम को बाँट जाता है —

उसे भी किसी ने

ऊँची जात वाला बताया था!


**हरामियों की औकात होती है,

जात नहीं**,

फिर भी समाज में

बदनाम वो होता है

जो चुपचाप मेहनत करता है

और जाति में छोटा कहलाता है।


नाम बड़े, पर काम सड़े,

फिर भी सर ऊँचा लिए घूमते हैं,

और जो दिल से बड़ा है,

वो आज भी झुका खड़ा है।


कर्म की पहचान मिटा दी गई,

खून की भाषा जात से जोड़ी गई,

मगर इतिहास गवाही देता है —

**हर बड़ा इंकलाब

नीच कहे गए इंसान ने ही किया है।**


अब वक्त है,

शब्दों की दीवारें तोड़ो,

जात नहीं,

चरित्र का तराजू जोड़ो।


हरामियों को

जात का तमगा मत दो,

वरना वो तुम्हारे बच्चों को

औक़ात सिखाते फिरेंगे!


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10 साल, विकलांग आदमी सिंचाई विभाग की परीक्षा में 1 अंक से अधिक लड़ाई जीतता है; उत्तराखंड एचसी ऑर्डर का चयन उत्तर के बाद की त्रुटि की पुष्टि की गई



देहरादुन: उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) परीक्षा के लिए लगभग एक दशक पहले, संदीप कुमार - 57% विकलांगता के साथ - एक कथित गलत जवाब के कारण 0.25 अंक से सिंचाई विभाग में समूह सी सीनचपल (सिंचाई) की स्थिति के लिए अर्हता प्राप्त करने से चूक गए थे। लेकिन कुमार - तब अपने 20 के दशक में - मानते थे कि उन्हें गलत तरीके से चिह्नित किया गया था, क्योंकि उनका जवाब सही था। उन्होंने यूकेएसएसएससी द्वारा अंततः स्वीकार किए गए सही उत्तर के लिए कानूनी संघर्ष के वर्षों के माध्यम से दृढ़ता से काम किया।



चुनाव लड़ा गया सवाल था: "फ्रेडरिक स्मेटेसेक ने एक तितली संग्रहालय कहाँ स्थापित किया?" यद्यपि कुमार ने "भिम्तल" का उत्तर दिया, आधिकारिक उत्तर कुंजी ने "सत्ताल" को सही उत्तर के रूप में सूचीबद्ध किया, जिसके परिणामस्वरूप कुमार के लिए "1.25 अंक की कटौती" हुई, जिसके कारण उनकी अयोग्यता हुई। लेकिन, जब सचिवालय सुरक्षा कैडर पोस्ट के लिए एक अन्य UKSSSC परीक्षा में एक ही सवाल दिखाई दिया, तो "भीमटल" को सही उत्तर के रूप में चिह्नित किया गया था।

आयोग को खींचते हुए, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को राज्य को "पांच सप्ताह के भीतर" कुमार को नियुक्ति प्रदान करने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और अलोक महारा की डिवीजन पीठ ने कहा: "यह आयोग का कर्तव्य है कि वह विशेषज्ञों की राय पर नेत्रहीन रूप से भरोसा न करें और इसके बजाय एक तंत्र को काउंटर-चेक करने के लिए तैयार करें, विशेष रूप से जगह के भौगोलिक संबंधों से संबंधित प्रश्नों पर।

Saturday, June 28, 2025

वीडियो स्क्रीनप्ले + वॉइस ओवर स्क्रिप्ट 🎞️ **शीर्षक: कैदी जो आज़ाद हो सकते थे**


🎥 **“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”** डॉक्यूमेंट्री का

✅ **वीडियो स्क्रीनप्ले (Scene-by-Scene Visual Plan)**

✅ **वॉइस ओवर स्क्रिप्ट** (Voice Over Script)


यह डॉक्यूमेंट्री सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, और सिस्टम की संवेदनहीनता पर आधारित है।


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## 🎬 वीडियो स्क्रीनप्ले + वॉइस ओवर स्क्रिप्ट


🎞️ **शीर्षक: कैदी जो आज़ाद हो सकते थे**

📽️ **अवधि:** 12-15 मिनट

🗣️ **भाषा:** हिंदी

📺 **फॉर्मेट:** डॉक्यूमेंट्री (OTT/YouTube/NGO मंच)


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### 🎬 **Scene 1: \[Opening | Black Screen + Title Reveal]**


**वीडियो:**


* काली स्क्रीन

* टाइटल टेक्स्ट उभरता है:

  *“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”*

* धीमी, रहस्यमयी पृष्ठभूमि ध्वनि


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “कल्पना कीजिए… आपने अपनी सजा पूरी कर ली है…

> लेकिन फिर भी आप जेल में हैं।

> क्यों?

> क्योंकि सिस्टम ने आपको **भूल** दिया है।”


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### 🎬 **Scene 2: \[Drone Shot | जेल परिसर, ऊँची दीवारें, बंद गेट]**


**वीडियो:**


* नैनीताल/हरिद्वार/हल्द्वानी जेलों के ऊपर से ड्रोन व्यू

* जेल के भारी दरवाज़े, ताले, सुरक्षा कैमरे


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “उत्तराखंड की जेलों में ऐसे 140 कैदी हैं…

> जो सालों पहले रिहा किए जाने के योग्य थे…

> लेकिन अब भी बंद हैं।

> 2019 से 2025 — सिर्फ इंतज़ार, और इंतज़ार…”


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### 🎬 **Scene 3: \[Inside Jail | खाली बैरक, खामोशी, पुरानी फाइलें]**


**वीडियो:**


* धूल भरी रजिस्टर-बुक, पुरानी फाइलें

* जेल के गलियारे में एक अकेला वृद्ध कैदी


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “इनकी सजा पूरी हो चुकी है।

> लेकिन Sentence Review Board की बैठकें टलती रहीं।

> और ये कैदी — ताले के पीछे, सड़ते रहे।”


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### 🎬 **Scene 4: \[Newspaper Clips + कोर्ट ऑर्डर स्लाइड्स]**


**वीडियो:**


* स्क्रीन पर चलते हुए अखबारों की सुर्खियाँ

* कोर्ट की टिप्पणियाँ: “प्रशासनिक उदासीनता”, “मानवाधिकार का उल्लंघन”


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई।

> आदेश दिया — दो हफ्तों में बोर्ड बनाओ,

> और रिहाई की प्रक्रिया शुरू करो।”


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### 🎬 **Scene 5: \[Testimony | पूर्व कैदी की रीकंस्ट्रक्टेड क्लिप]**


**वीडियो:**


* एक 60 वर्षीय व्यक्ति (ध्यान से फिल्माया गया)

* कमजोर, आंखों में थकावट


**🎙️ पात्र संवाद:**


> “मेरी रिहाई की तारीख थी 2020…

> पर मैं निकला 2024 में।

> चार साल… बिना वजह… बंद था।”


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### 🎬 **Scene 6: \[Statistical Graphics | Jail Data on Screen]**


**वीडियो:**


* एनीमेटेड ग्राफिक्स

* कैपेसिटी: 3000

* वर्तमान कैदी: 4600

* रिहाई योग्य: 140+


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “जेल पहले ही अपनी क्षमता से 50% ज्यादा भरी हैं।

> फिर भी, जिन्हें छोड़ा जा सकता था…

> उन्हें सिस्टम ने रोक रखा है।”


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### 🎬 **Scene 7: \[Human Rights Activists | इंटरव्यू क्लिप्स]**


**वीडियो:**


* NGO प्रतिनिधि, विधिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता


**🎙️ वॉइस ओवर (बैकग्राउंड):**


> “हमने बार-बार कहा… Sentence Review Board की नियमित बैठकें होनी चाहिए।

> लेकिन हर बार, फाइलें धूल खाती रहीं…”


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### 🎬 **Scene 8: \[Court Sketch Animation | निर्णय की पुनरावृत्ति]**


**वीडियो:**


* एनिमेटेड कोर्टरूम विज़ुअल

* स्क्रॉलिंग कोर्ट ऑर्डर टेक्स्ट


**🎙️ कोर्ट संवाद (रिकॉर्डेड वॉइस):**


> “यह न्याय का मज़ाक है।

> पात्र कैदियों को अब और एक दिन भी जेल में नहीं रहना चाहिए।”


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### 🎬 **Scene 9: \[Hope Visuals | खुले जेल गेट, बुजुर्ग का चेहरा ऊपर उठना]**


**वीडियो:**


* जेल का गेट खुलता है

* धूप अंदर आती है

* बुजुर्ग कैदी बाहर देखता है, आंखें नम


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “उन्हें चाहिए

> सिर्फ आज़ादी नहीं…

> एक नया जीवन।

> एक सम्मान, एक पुनर्वास…

> और समाज से फिर जुड़ने का हक़।”


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### 🎬 **Scene 10: \[Udaen Foundation Logo | संपर्क स्लाइड]**


**वीडियो:**


* Udaen Foundation का लोगो

* ईमेल, वेबसाइट, हेल्पलाइन


**🎙️ वॉइस ओवर:**


> “Udaen Foundation मांग करता है —

> हर पात्र कैदी को न्याय मिले।

> क्योंकि…

> **‘न्याय में देरी, अन्याय है।’**”


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## 🎬 *अंतिम टेक्स्ट ऑन स्क्रीन:*


**"कैदी जो आज़ाद हो सकते थे..."**

*डॉक्यूमेंट्री प्रजेंटेड बाय – Udaen News Network / Udaen Foundation*

📞 *Contact: [info@udaen.org](mailto:info@udaen.org) | [www.udaen.org](http://www.udaen.org)*


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**“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”**


🎬 **“कैदी जो आज़ाद हो सकते थे”**

*(एक सच्ची कहानी उन 140 कैदियों की, जो रिहाई के पात्र थे, लेकिन सालों तक जेल में सड़ते रहे)*


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## 🎞️ **डॉक्यूमेंट्री स्क्रिप्ट**


### 🎬 शीर्षक: **"कैदी जो आज़ाद हो सकते थे"**


**अवधि:** 12-15 मिनट

**भाषा:** हिंदी

**फॉर्मेट:** नैरेशन + ग्राउंड विज़ुअल्स + केस स्टोरीज़ + कोर्ट टिप्पणियाँ


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### 🔊 **\[Opening Scene – ब्लैक स्क्रीन पर नैरेशन]**


🎙️ (धीमी आवाज में)

“कल्पना कीजिए…

आपने अपनी सजा पूरी कर ली है।

कोर्ट, समाज, और सरकार — सभी ने माना कि अब आप आज़ाद होने के योग्य हैं।

लेकिन फिर भी… आप आज़ाद नहीं।

आप जेल में ही बंद हैं... बिना कसूर के।

ऐसे हैं उत्तराखंड के वो 140 कैदी...

**‘जो आज़ाद हो सकते थे।’**”


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### 🎥 **\[सीन 1 – जेल के बाहर के शॉट्स, ताले लगे दरवाज़े, बंजर गलियाँ]**


🎙️ नैरेशन:

"उत्तराखंड की जेलें… जहाँ सैकड़ों कैदी अपने किए की सजा भुगतते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी **सजा पूरी हो चुकी है**, पर रिहाई अब तक नहीं हुई।"


📋 टेक्स्ट ऑन स्क्रीन:


> *“140 कैदी, 5 से 6 साल से जेलों में बंद, जबकि वे रिहाई के पात्र हैं।”*

> — *उत्तराखंड हाईकोर्ट, जून 2025*


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### 🎥 **\[सीन 2 – डॉक्यूमेंट्स की क्लोज़-अप, पुराने सरकारी फाइलों की धूल भरी अलमारी]**


🎙️ नैरेशन:

"सरकारी फाइलों की भीड़ में, कहीं गुम हो जाती है इन कैदियों की **रिहाई की अपील**।

Sentence Review Board की बैठकें स्थगित होती रहीं…

और हर बार नई तारीख दी जाती रही।"


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### 🎥 **\[सीन 3 – कोर्ट रूम स्केच, न्यूज़ क्लिपिंग्स फ्लैश]**


📢 न्यूज़ एंकर (वॉइसओवर):

“उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जेलों में बंद 140 रिहाई के पात्र कैदियों की रिहाई में देरी पर जताई कड़ी नाराज़गी…”


🎙️ नैरेशन:

"हाईकोर्ट ने इसे **'प्रशासनिक उदासीनता'** कहा — और दो सप्ताह में सक्षम बोर्ड गठित करने का आदेश दिया।"


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### 🎥 **\[सीन 4 – एक पूर्व कैदी की कहानी (रीक्रिएटेड विज़ुअल्स)]**


👤 (वृद्ध व्यक्ति कैमरे की ओर)

"मेरी रिहाई 2020 में होनी थी…

लेकिन मैं 2024 तक जेल में ही था।

कहते थे – ‘बोर्ड नहीं बैठा अभी’।

वो 4 साल मेरी ज़िंदगी के सबसे काले साल थे।"


🎙️ नैरेशन:

"ऐसी कहानी अकेले एक की नहीं… **140 ज़िंदगियाँ** इस सिस्टम की चुप्पी का शिकार बनीं।"


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### 🎥 **\[सीन 5 – वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की क्लिप]**


🧑‍⚖️ अधिवक्ता (क्लिप):

"हमने कई बार अनुरोध किया कि Sentence Review Board नियमित हो…

लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।"


👩‍⚕️ सोशल वर्कर:

"बुजुर्ग कैदी मानसिक रूप से टूट चुके हैं। कई तो जेल में ही बीमार हो गए।"


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### 🎥 **\[सीन 6 – जेलों की भीड़भाड़, कैदियों की संख्या पर आंकड़े]**


📊 ग्राफिक्स ऑन स्क्रीन:


> "उत्तराखंड की जेलों की कुल क्षमता: 3000

> वर्तमान कैदी: 4600

> रिहाई के पात्र: 140+ (2025 रिपोर्ट)"


🎙️ नैरेशन:

"जब जेलें ओवरलोड हैं, तब भी जिन्हें छोड़ा जा सकता है, उन्हें रोकना न सिर्फ अन्याय है – बल्कि अमानवीयता है।"


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### 🎥 **\[सीन 7 – हाईकोर्ट के आदेश का फ्लैश, ऑडियो क्लिप (रीक्रिएटेड)]**


👨‍⚖️ *आवाज़ (नाटकीय पुनर्निर्माण)*

"यह न्याय का मज़ाक है…

पात्र कैदियों को अब और एक दिन भी जेल में नहीं रहना चाहिए।"


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### 🎥 **\[सीन 8 – सामाजिक संगठनों की अपील]**


🎙️ नैरेशन:

"Udaen Foundation और अन्य सामाजिक संगठन अब आवाज़ उठा रहे हैं –

कि सिर्फ आदेश नहीं, **प्रभावी कार्यवाही** हो।

हर पात्र कैदी को रिहा किया जाए।

और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।"


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### 🎥 **\[सीन 9 – उम्मीद और पुनर्वास के विज़ुअल्स]**


🎙️ नैरेशन:

"इन 140 कैदियों को सिर्फ आज़ादी ही नहीं चाहिए…

उन्हें चाहिए **सम्मान, पुनर्वास, और जीवन जीने का दूसरा अवसर।**

हमें उन्हें वो अवसर देना होगा… क्योंकि

**'न्याय में देरी, अन्याय होता है।'**"


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### 🎬 **\[अंतिम दृश्य – कैमरा ऊपर की ओर उठता है, बैकग्राउंड में धूप, खुला गेट, और आवाज़]**


🎙️ वॉइसओवर:

**"कैदी जो आज़ाद हो सकते थे —

अब वो कह रहे हैं,

'हमें और देर मत कीजिए…

अब हमें जीने दीजिए।'"**




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## 📰 **मानवाधिकार की घुटन और जेलों का बोझ: रिहाई के पात्र कैदियों के लिए न्याय की देरी, उत्तराखंड हाईकोर्ट का हस्तक्षेप**



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**दिनांक:** 28 जून 2025

**स्थान:** नैनीताल, उत्तराखंड

**प्रस्तुति:** *Udaen Foundation / Udaen News Network (यदि उपयोग करना चाहें)*


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### 📌 **मामला क्या है?**


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में 5 से 6 वर्षों से **रिहाई के पात्र 140 कैदियों** की अब तक रिहाई न होने पर **गंभीर नाराजगी** जताई है। अदालत ने इस देरी को **"प्रशासनिक उदासीनता"** करार दिया है और दो सप्ताह के भीतर **सक्षम प्राधिकारी बोर्ड** गठित कर शीघ्र रिहाई की प्रक्रिया आरंभ करने का आदेश दिया है।


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### ⚖️ **कोर्ट की टिप्पणियाँ और आदेश:**


* यह मामला **मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र** और **न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल** की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ।

* रिपोर्ट में बताया गया कि 140 ऐसे कैदी हैं जो **सरकार की नीति के अनुसार रिहाई के पात्र** हैं, परंतु **कोई निर्णय नहीं लिया गया**।

* रिपोर्ट में तीन कैदियों का उदाहरण दिया गया, जो **2019, 2020, और 2021 से ही रिहाई के योग्य** थे।

* **राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA), और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)** के प्रयासों के बावजूद सरकार की निष्क्रियता बनी रही।


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### 🧾 **यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?**


* भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, *"हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है।"*

* यदि कोई व्यक्ति अपनी सजा पूरी कर चुका है या सरकार की नीति के अंतर्गत **रिहाई का पात्र है**, तो उसे और अधिक जेल में रखना **न्यायालयिक हिंसा** और **मानवाधिकार हनन** है।

* जेलों पर पहले से ही **क्षमता से अधिक भीड़** है। ऐसे मामलों में देरी **अन्य कैदियों के लिए भी संकट** पैदा करती है।


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### 📣 **उद्यान फाउंडेशन / नागरिक समाज की मांग:**


1. **सभी पात्र कैदियों की सूची सार्वजनिक की जाए।**

2. **रिहाई में देरी के लिए उत्तरदायी प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।**

3. **स्थायी 'Sentence Review Board'** का गठन किया जाए, जो 6-6 महीने में स्वतः समीक्षा करे।

4. **पिछले मामलों में मानसिक, सामाजिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई** पर विचार हो।

5. **RTI के माध्यम से जिला-वार सूची** प्राप्त कर स्थानीय कानूनी सहायता केंद्र बनाए जाएं।


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### 🔍 **जनहित याचिका या RTI हेतु आधारभूत प्रश्न:**


* जिला जेलों में कितने कैदी रिहाई के पात्र हैं लेकिन अब तक बंद हैं?

* Sentence Review Board की बैठकें कितनी बार हुईं और किसने रोका?

* 2018 से 2024 तक कितने कैदियों को समय से पहले रिहा किया गया?


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### 🕊️ **न्याय की देरी, न्याय का इंकार:**


यह मामला हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि **"सजा पूरी हो जाने के बाद भी अगर आज़ादी न मिले, तो यह किस प्रकार का लोकतंत्र है?"**

उत्तराखंड हाईकोर्ट की यह सख्त टिप्पणी **राज्य की जेल प्रणाली, दया नीति, और प्रशासनिक जवाबदेही** को नए सिरे से देखने की मांग करती है।


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### 🖊️ *लेखक/संपादक सुझाव:*


* इस विषय पर एक RTI फाइल करें

* जेल सुधारों पर पंचायत / ब्लॉक स्तर पर संवाद आयोजित करें

* मीडिया में दबाव बनाकर सरकार से रिपोर्ट मांगें

* उच्चतम न्यायालय में *guidelines for mandatory sentence review system* की याचिका तैयार करें


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## 📰 **उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 140 पात्र कैदियों की रिहाई में देरी पर जताई कड़ी नाराज़गी, दो हफ्ते में बोर्ड गठन का आदेश**






**नैनीताल, 28 जून 2025 | संवाददाता: उद्यान न्यूज़ नेटवर्क (Udaen News Network)**


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में 5-6 वर्षों से बंद **140 रिहाई के पात्र कैदियों** की रिहाई में हो रही **बेतहाशा देरी** पर सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने इसे **प्रशासनिक उदासीनता** बताते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि **दो सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी बोर्ड का गठन कर रिहाई की प्रक्रिया** तत्काल शुरू की जाए।


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### 📌 **क्या है मामला?**


शनिवार को मुख्य न्यायाधीश **जी. नरेंद्र** और न्यायमूर्ति **राकेश थपलियाल** की खंडपीठ के समक्ष यह मामला प्रस्तुत हुआ, जिसमें एक विस्तृत रिपोर्ट के माध्यम से यह बताया गया कि **140 ऐसे कैदी** हैं जो **सरकार की नीतियों के अनुसार** रिहाई के पूर्णतः पात्र हैं, लेकिन फिर भी वर्षों से जेलों में बंद हैं।


रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि इनमें से **तीन कैदी तो वर्ष 2019, 2020 और 2021** से ही रिहाई के योग्य हैं। बावजूद इसके उन्हें अब तक कोई कानूनी राहत नहीं मिली।


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### ⚖️ **कोर्ट की सख्त टिप्पणी:**


न्यायालय ने कहा कि –


> **"राष्ट्रीय, राज्य और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के निरंतर प्रयासों के बावजूद इन कैदियों को रिहा नहीं किया गया है, जो सीधे-सीधे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।"**


कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि **"यह प्रशासनिक लापरवाही और मानवीय संवेदनशीलता की घोर कमी को दर्शाता है।"**


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### 🧾 **क्या कहती है सरकार की नीति?**


सरकार की रिहाई नीति के अनुसार, ऐसे कैदी जो एक निश्चित अवधि की सजा पूरी कर चुके हैं या अच्छे आचरण के आधार पर छूट के पात्र हैं, उन्हें समय-समय पर गठित **Sentence Review Board** की संस्तुति पर रिहा किया जाना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, **इस प्रक्रिया में वर्षों से ठहराव बना हुआ है।**


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### 🚨 **अब क्या हुआ आदेश?**


हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि—


* **दो सप्ताह में Sentence Review Board का गठन किया जाए।**

* **140 कैदियों की समीक्षा प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाए।**

* **रिहाई की पूरी कार्यवाही समयबद्ध रूप से पूरी की जाए।**


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### 📣 **जन संगठनों की प्रतिक्रिया:**


**Udaen Foundation** और अन्य सामाजिक संगठनों ने इस आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह उत्तराखंड की न्याय प्रणाली के लिए **मानवीय और संवेदनशील दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम** है।


> **"यह सिर्फ कैदियों की नहीं, बल्कि न्याय के उस सिद्धांत की रिहाई है, जो कहता है कि न्याय में देरी, अन्याय होती है।"** — *दीनेश गुसाईं, अध्यक्ष, उद्यान फाउंडेशन*


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### 🕊️ **क्या है अगला कदम?**


अब निगाहें इस बात पर होंगी कि—


* राज्य सरकार कितनी तत्परता से बोर्ड का गठन करती है।

* क्या सभी पात्र कैदियों को समय पर न्याय मिलेगा?

* क्या आगे से जेलों में रिहाई प्रक्रिया को नियमित किया जाएगा?


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### 🔎 **विशेष टिप्पणी:**


"उत्तराखंड की जेलों में न्याय की प्रतीक्षा कर रहे इन 140 कैदियों की पीड़ा यह दर्शाती है कि प्रशासनिक चुप्पी भी कई बार **एक धीमा जहर बन जाती है**। हाईकोर्ट का यह आदेश उन सभी आवाज़ों के लिए उम्मीद की किरण है, जो सालों से 'रिहाई की तारीख' का इंतज़ार कर रहे थे।"


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न्यूज़ विचार और व्यव्हार

फिल्म या शॉर्ट फिल्म एआई की मदद से

 फिल्म या शॉर्ट फिल्म एआई की मदद से  1. विषय और कहानी तय करें सबसे पहले फिल्म का विषय, शैली (ड्रामा, थ्रिलर, डॉक्यूमेंट्री, साइंस फिक्शन आदि...