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जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है
✍️ विशेष संपादकीय
जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है
77वें गणतंत्र दिवस पर कोटद्वार के राजकीय स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित क्रिकेट सद्भावना मैत्री मैच केवल एक खेल आयोजन नहीं था, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक चेतना का सार्वजनिक प्रकटीकरण था, जिसकी नींव हमारे संविधान में निहित है। प्रेस क्लब कोटद्वार द्वारा अपने पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में आयोजित यह आयोजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक साझा मंच पर लाने का सार्थक प्रयास रहा।
आज के समय में जब संवाद की जगह अक्सर शोर और टकराव ले लेते हैं, तब वकील, पुलिस, मीडिया और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का एक मैदान पर उतरना अपने आप में एक संदेश था—कि असहमति के बावजूद सहअस्तित्व संभव है। खेल के दौरान दिखी प्रतिस्पर्धा मर्यादित रही और यही इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
ट्रॉफी भले ही बार एसोसिएशन कोटद्वार के हिस्से आई हो, पर वास्तविक जीत उस सौहार्द की रही, जो हर मैच के साथ मजबूत होता गया। ऐसे आयोजन हमें यह भी याद दिलाते हैं कि गणतंत्र केवल अधिकारों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों का संकल्प भी है।
इस पूरे आयोजन को अर्थवत्ता तब मिली, जब खेल के बाद गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रेस क्लब कोटद्वार की ओर से कुष्ठ आश्रम में सेवा का कार्य किया गया। प्रेस क्लब के सचिव दिनेश एवं कार्यकारिणी सदस्यों द्वारा आश्रम में भोजन वितरण कर यह संदेश दिया गया कि लोकतंत्र की असली परीक्षा मैदान या मंच पर नहीं, बल्कि समाज के सबसे उपेक्षित व्यक्ति तक हमारी संवेदना पहुंचने में होती है।
स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में खेला गया यह आयोजन और उसके साथ जुड़ा यह सेवा कार्य, दोनों मिलकर यही कहते हैं कि स्मरण तब सार्थक होता है, जब वह कर्म में ढलता है। गणतंत्र दिवस ऐसे ही प्रयासों से जीवंत बनता है—जहां खेल संवाद बने और संवेदना सामाजिक कर्तव्य।
— दिनेश गुसाईं
(वरिष्ठ पत्रकार )
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