Thursday, June 19, 2025

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (Article 21 )


"किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा, जब तक कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार न हो।"
(अनुच्छेद 21, भारत का संविधान)


🔍 मुख्य विशेषताएँ (मुख्य बिंदु):

  1. व्यापक अधिकार:

    • यह अधिकार हर व्यक्ति को प्राप्त है — न केवल भारतीय नागरिकों को, बल्कि विदेशियों को भी।
    • यह जीवन और स्वतंत्रता का मूल अधिकार है।
  2. जीवन का अधिकार (Right to Life):

    • केवल शारीरिक रूप से जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार भी शामिल है।
    • जैसे — भोजन, पानी, स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आश्रय, गरिमा से जीना, आदि।
  3. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Personal Liberty):

    • बिना किसी उचित प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार या बंदी नहीं बनाया जा सकता।
    • मनमानी गिरफ्तारी, यातना, और अवैध हिरासत पर रोक।
  4. न्यायोचित प्रक्रिया (Due Process of Law):

    • मैनका गांधी बनाम भारत सरकार (1978) केस के बाद न्यायालय ने कहा कि "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" का मतलब है — यह प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और तर्कसंगत होनी चाहिए।

🧠 महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले:

मामला वर्ष निर्णय का महत्व
मैनका गांधी बनाम भारत सरकार 1978 अनुच्छेद 21 को अनुच्छेद 14 और 19 से जोड़ा गया और प्रक्रिया को न्यायोचित होना जरूरी बताया।
फ्रांसिस कोरेली मुलिन मामला 1981 जीवन में मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल।
ओल्गा टेलिस बनाम BMC 1985 रोजगार का अधिकार भी जीवन के अधिकार में शामिल।
के. एस. पुट्टस्वामी मामला 2017 निजता का अधिकार (Right to Privacy) को मूल अधिकार घोषित किया गया।

अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकारों के उदाहरण:

  • सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार
  • स्वास्थ्य व चिकित्सा सुविधा का अधिकार
  • पर्यावरण और स्वच्छ हवा का अधिकार
  • शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21-A से जुड़ा)
  • निजता का अधिकार
  • यौन उत्पीड़न से संरक्षण
  • गरिमा से मृत्यु (Passive Euthanasia) का अधिकार
  • नशीली दवाओं या अवैध गिरफ्तारी से सुरक्षा

📌 निष्कर्ष (Summary):

अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान का सबसे जीवंत और व्यापक मूल अधिकार है। यह समय और परिस्थितियों के अनुसार विकसित होता रहा है और नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने की कानूनी गारंटी देता है।



Sunday, June 15, 2025

गढ़वाली नाटक: "भोर च अनपढ़"



🎭 गढ़वाली नाटक: "भोर च अनपढ़"

विषय: साक्षरता, आत्मसम्मान और ग्रामीण महिला जागरूकता


संक्षिप्त कथानक (Plot Summary):

गढ़वाल के एक छोटे से गांव मलयालगांव में रहने वाली भोरू – एक मेहनती लेकिन अनपढ़ महिला है। वह दूसरों के दस्तखत करवाती है, बच्चों की फीस जमा करवाती है, लेकिन खुद कभी स्कूल नहीं गई। जब उसकी बेटी कहती है "तू तो अनपढ़ हौ", तब उसे एक ठेस लगती है।

भोरू 40 साल की उम्र में साक्षरता अभियान से जुड़ती है और धीरे-धीरे पढ़ना-लिखना सीखती है। उसका ये सफर गांव की कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन जाता है।


मुख्य पात्र (Characters):

  1. भोरू – नायिका, अनपढ़ महिला
  2. जुनेदी – उसकी बेटी, स्कूल जाती है
  3. गगनु – उसका पति, मजदूरी करता है
  4. टीचर नीमा – गांव में आई शिक्षिका
  5. संगीता – गांव की दूसरी महिला जो पढ़ना चाहती है
  6. प्रधान चाचा – गांव के प्रधान
  7. नाटक के अंत में भोरू का भाषण

मुख्य दृश्य (Key Scenes):

दृश्य 1:
भोरू खेत में काम करती है, बेटी स्कूल जाती है। बेटी की किताब देखती है और कहती है – "काश म्यर हाथ भी पढ़ण मा लाग जानदा।"

दृश्य 2:
भोरू को राशन कार्ड में अंगूठा लगाना पड़ता है – उसे शर्म आती है।

दृश्य 3:
गांव में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर शिक्षिका नीमा बोलती हैं – "उमर कु नई, इछा कु पढ़ाई चाहिं।"

दृश्य 4:
भोरू, संगीता और कुछ और महिलाएं रात को चुपचाप पढ़ने जाती हैं।

दृश्य 5:
भोरू खुद अपनी बेटी की फीस का फॉर्म भरती है – अब वह पढ़ी-लिखी है।

दृश्य 6 (अंतिम):
भोरू मंच से बोलती है –

“आज म्यर नाम म्यर हाथ से लिखी ग्ये। अब म्यर आत्मा भी पढ़ी-लिखी लगण लगी।”


मुख्य संदेश:

  • पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती
  • आत्मसम्मान केवल पैसे या दिखावे से नहीं, ज्ञान से आता है
  • महिलाएं जब पढ़ती हैं, पूरा समाज जागता है


🎭 नाटक शीर्षक: "राजनीति का आईना"



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विषय: राजनेता द्वारा मानव जाति को दो वर्गों — उपकरण और दुश्मन — में बाँट देने की प्रवृत्ति
अवधि: लगभग 15–20 मिनट
कलाकार: 5–6 पात्र
शैली: प्रतीकात्मक, व्यंग्यात्मक, यथार्थवादी


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🎬 पात्र परिचय:

1. राजनेता – सत्ता का प्रतीक, आत्ममुग्ध और चालाक


2. सचिव – सलाहकार, कभी ईमानदार, कभी डरपोक


3. जनता – दो भागों में विभाजित (उपकरण और दुश्मन)


4. पत्रकार/कवि – सच का आईना


5. आवाज़/सूत्रधार – पृष्ठभूमि व कथ्य को आगे बढ़ाता है




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🎭 दृश्य 1: सत्ता का मंच

(मंच पर सिंहासन रखा है। रोशनी धीमी है। सूत्रधार की आवाज़ आती है:)

सूत्रधार:
"यह वह मंच है जहाँ कभी लोकतंत्र बैठता था... अब वहाँ राजनीति का चेहरा बैठा है। देखिए, कैसे वह इंसानों को औजार और बाधा समझता है।"

(राजनेता मंच पर आता है, भारी वस्त्रों में। सचिव उसके पीछे। जनता दो ओर खड़ी है — बाईं ओर ‘उपकरण’, दाईं ओर ‘दुश्मन’।)

राजनेता:
"मैं जनता से प्रेम करता हूँ... बशर्ते वह मेरी बात माने!
जो मेरी जय-जयकार करे — वह मेरा साथी।
जो मेरे झूठ में भी सच देखे — वह मेरा औज़ार।
बाकी सब? देशद्रोही!"

(जनता खामोश है। ‘उपकरण’ समूह तालियाँ बजाता है, ‘दुश्मन’ चुप खड़ा रहता है।)


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🎭 दृश्य 2: संवाद और भ्रम

(पत्रकार मंच पर आता है, अपने हाथ में एक कलम और काग़ज़ लेकर)

पत्रकार:
"महाराज, क्या मैं सवाल कर सकता हूँ?"

राजनेता:
"तुम्हारा सवाल मेरे लिए हथियार बनता है या ज़हर?
अगर मेरी तस्वीर चमकाए तो पूछो, वरना जेल भेज दूँगा!"

पत्रकार:
"तो क्या सच बोलना अब देशद्रोह है?"

राजनेता: (हँसता है)
"सच? यहाँ सच वही होता है जो प्रचार करता है!"


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🎭 दृश्य 3: जनता की आत्मा बोलती है

(‘दुश्मन’ की ओर खड़ी जनता का एक प्रतिनिधि आगे आता है)

जनता प्रतिनिधि:
"हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं,
हम वो आईना हैं जिससे तुम डरते हो।
हम वो आवाज़ हैं जिसे तुम दबाना चाहते हो।
हम इंसान हैं, औजार नहीं!"

राजनेता (गुस्से में):
"सत्ता चलाने के लिए तर्क नहीं, समर्थन चाहिए।
तुम्हें या तो मेरे साथ रहना होगा... या मेरे खिलाफ!"


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🎭 दृश्य 4: आईना टूटता है या जगता है?

(कवि मंच पर आता है, भावुक होकर बोलता है):

कवि:
"जब राजनेता इंसानों को वस्तु समझे,
जब सवाल देशद्रोह लगे,
जब समर्थन बिक जाए,
तब लोकतंत्र मर नहीं जाता —
वह जनता के हृदय में छुप जाता है।"


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🎭 अंतिम दृश्य: आवाज़ें उठती हैं

(दोनों जनता पक्ष एक साथ मंच पर आ जाते हैं, एक साथ बोलते हैं):

जनता (समवेत स्वर में):
"हम औजार नहीं हैं।
हम दुश्मन नहीं हैं।
हम नागरिक हैं — जागरूक, ज़िंदा, ज़िम्मेदार।"

(राजनेता अकेला रह जाता है। प्रकाश धीमा होता है।)

सूत्रधार (अंतिम पंक्तियाँ):
"राजनीति तब सुंदर होती है जब वह सेवा बनती है।
लेकिन जब वह सत्ता बन जाए — तो आईना ज़रूर दिखाइए।"


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🎭 मंच सज्जा व निर्देश:

राजनेता के वस्त्र – भारी, सोने जैसे रंग में, प्रतीकात्मक

जनता के वस्त्र – सामान्य लेकिन रंगों से वर्ग विभाजन (उपकरण: सफेद/पीला, दुश्मन: काला/ग्रे)

प्रकाश प्रभाव – शुरुआत में तिरछी रोशनी, अंत में मंच पर समान प्रकाश

पृष्ठभूमि संगीत – हल्की पृष्ठभूमि ध्वनि, अंत में जन-आंदोलन की आवाज़



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📝 संदेश:

यह नाटक सिर्फ एक नेता की नहीं, हर सत्ता की प्रवृत्ति की आलोचना है — जो समाज को दो भागों में बाँटती है: जो उसके साथ हैं, और जो उसके खिलाफ गिने जाते हैं। लेकिन असल लोकतंत्र वह है जहाँ सवाल पूछना गुनाह नहीं, अधिकार होता है।


"एक राजनेता मानव जाति को दो भागों में विभाजित करता है: उपकरण और दुश्मन"

 सत्ता और राजनीति की एक बहुत ही तीखी, गूढ़ और यथार्थवादी व्याख्या करता है। यह वाक्य न केवल राजनीति के व्यवहारवादी और सत्ता-केंद्रित दृष्टिकोण को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस प्रकार राजनीतिक सत्ता में नैतिकता का स्थान अक्सर रणनीति ले लेती है।


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🔍 विश्लेषण:

1. उपकरण (Tools):

वे लोग, संस्थाएँ या समूह जो राजनेता की सत्ता, छवि और लाभ के लिए उपयोगी हैं।

ये कभी कार्यकर्ता, मीडिया, पार्टी के वफादार, ब्यूरोक्रेसी, या जनता का एक हिस्सा हो सकते हैं।

इनका मानवीकरण नहीं, बल्कि उपयोग होता है — जब तक ज़रूरत है, तब तक साथ; उसके बाद त्याग।


2. दुश्मन (Enemies):

वे लोग जो सवाल करते हैं, विरोध करते हैं, सत्ता को चुनौती देते हैं।

ये विचारधारात्मक विरोधी, स्वतंत्र पत्रकार, सक्रिय नागरिक, या असहमत सहयोगी भी हो सकते हैं।

सत्ता की राजनीति इन्हें खतरे के रूप में देखती है — और इनका चरित्र-हनन, बहिष्कार या दमन सत्ता के लिए सामान्य रणनीति बन जाती है।



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📜 ऐतिहासिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य:

निकोलो मैकियावेली (Machiavelli) ने 'राजनीति' को एक नैतिकता से परे कला बताया था, जहाँ परिणाम ही सब कुछ होता है।

कार्ल मार्क्स के अनुसार, सत्ता हमेशा एक वर्ग विशेष की सेवा करती है, बाकी वर्गों को या तो उपयोग करती है या दमन।

चाणक्य ने भी सत्ता में साम, दाम, दंड, भेद के उपयोग को यथार्थ माना था।



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✍️ इस कथन का विस्तार लेख के रूप में (संक्षिप्त):

> एक राजनेता की दृष्टि में समाज दो वर्गों में सिमट जाता है — उपकरण और दुश्मन। जो उसकी सत्ता, प्रचार और योजनाओं के साथ हैं, वे साधन हैं। और जो सवाल करते हैं, टोकते हैं या विकल्प की मांग करते हैं, वे शत्रु हैं।

यह सोच सत्ता को संवाद और समरसता की जगह रणनीति और विभाजन की ओर ले जाती है। लोकतंत्र जहाँ जनता को भागीदार बनाना चाहिए, वहाँ ऐसे राजनेता उन्हें या तो उपयोगी वस्तु समझते हैं या रोकने योग्य बाधा।

यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति, नैतिकता से दूर होकर केवल सत्ता प्रबंधन की तकनीक बन जाती है। इस सोच से बचना ही लोकतंत्र की आत्मा को बचाना है।

"एक राजनेता मानव जाति को दो भागों में बाँटता है: उपकरण और दुश्मन"



👉 "राजनीति की आँखें इंसान नहीं देखतीं, सिर्फ दो चीजें देखती हैं: उपयोग और विरोध।"

मुख्य टेक्स्ट:
"एक राजनेता मानव जाति को दो भागों में बाँट देता है —
उपकरण और दुश्मन।
जो उसकी सत्ता के काम आते हैं, वे साधन हैं।
जो सवाल उठाते हैं, वे शत्रु।
इस सोच में न जनता बचती है, न लोकतंत्र।
बचता है सिर्फ प्रचार और नियंत्रण।"
#Politics #Power #Democracy #सोचो_मतदान_से_पहले


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🟨 2. डिबेट स्क्रिप्ट (वक्ता आरंभिक कथन):

विषय: क्या आज की राजनीति नागरिकों को केवल उपयोग और विरोध के खांचे में देखती है?

वक्ता (विपक्ष या आलोचक के रूप में):

"मंच पर उपस्थित सभी विद्वानों और श्रोताओं को नमस्कार।
मैं अपनी बात एक कथन से शुरू करना चाहता हूँ —
'एक राजनेता मानव जाति को दो भागों में विभाजित करता है: उपकरण और दुश्मन।'

यह कथन केवल एक व्यंग्य नहीं, आज की सत्ता-नीति का कड़वा सच है।
जो नागरिक उसके प्रचार में भाग लेते हैं, उसके पक्ष में बोलते हैं, वह उन्हें मंच देता है।
और जो तर्क, आलोचना या विकल्प रखते हैं — वे ‘देशद्रोही’, ‘अर्बन नक्सल’ या ‘टूलकिट गैंग’ बन जाते हैं।
क्या यही लोकतंत्र है? या यह सत्ता का अहंकार है जो केवल आज्ञा चाहता है, संवाद नहीं?

आज हमें यह तय करना होगा कि हम सिर्फ उपकरण रहेंगे — या ज़िम्मेदार नागरिक।"


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🟥 3. स्टेज स्क्रिप्ट / नाटक का दृश्य विचार:

दृश्य शीर्षक: "राजनीति का आईना"

स्थान: एक राजा का दरबार (प्रतीकात्मक लोकतंत्र)

चरित्र:

राजनेता (मुख्य पात्र, सत्ता में है)

सचिव (राजनेता का सलाहकार)

जनता (दो हिस्सों में बाँटी गई) – "उपकरण" और "विरोधी"


संवाद अंश:

राजनेता: (मंच पर चलता हुआ)
"मुझे लोग नहीं चाहिए, मुझे भीड़ चाहिए।
मुझे ताली चाहिए, सवाल नहीं।
जो मेरी बात बोले, वह मेरा औज़ार।
जो मेरी बात टाले, वह मेरा दुश्मन।"

सचिव: "जनता तो लोकतंत्र की आत्मा है, महाराज!"

राजनेता: "आत्मा नहीं, यहाँ मुझे चाहिए व्यवस्था – जिसे मैं चला सकूँ, जैसे चाहता हूँ।"

(पर्दा गिरता है, पृष्ठभूमि में आवाज़:)
"जब राजनेता इंसानों को उपकरण समझने लगे, तब लोकतंत्र बस एक मंच बन जाता है — और जनता केवल अभिनय करती है.

जो नवीनतम भारत सरकार की जनगणना (2011) और राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्टों के आधार पर है — साथ ही कुछ अनुमानित अद्यतन आँकड़े (2023-2024 तक) भी शामिल किए गए हैं:

, जो नवीनतम भारत सरकार की जनगणना (2011) और राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्टों के आधार पर है — साथ ही कुछ अनुमानित अद्यतन आँकड़े (2023-2024 तक) भी शामिल किए गए हैं:


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📚 उत्तराखंड में शिक्षा और साक्षरता का औसत (औपचारिक आँकड़े)

🔹 कुल साक्षरता दर (Literacy Rate):

श्रेणी 2011 की जनगणना 2023-24 अनुमानित

कुल साक्षरता 78.8% ~83%
पुरुष साक्षरता 87.4% ~89%
महिला साक्षरता 70% ~77%


➡️ उत्तराखंड की साक्षरता दर देश के औसत (74% - 2011) से अधिक है और राज्यों में ऊँचे स्थान पर गिनी जाती है।


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🔹 शिक्षा के स्तर पर विभाजन (% अनुमान):

शिक्षा स्तर पुरुष (Urban+Rural) महिलाएँ (Urban+Rural)

प्राथमिक शिक्षा ~95% ~92%
माध्यमिक शिक्षा ~75% ~65%
उच्चतर माध्यमिक (12वीं) ~60% ~52%
स्नातक (Graduate) ~25% ~18%
स्नातकोत्तर/ऊँची डिग्रियाँ ~8–10% ~5–7%



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🏞 ग्रामीण बनाम शहरी शिक्षा अंतर:

क्षेत्र साक्षरता दर (2023 अनुमान)

शहरी क्षेत्र ~87%
ग्रामीण क्षेत्र ~79%


➡️ ग्रामीण इलाकों में विशेष रूप से महिला साक्षरता दर अभी भी शहरी क्षेत्रों की तुलना में कम है।


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🔍 चिंताजनक पहलू:

1. गुणवत्ता की गिरावट: कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक अनुपात, डिजिटल सुविधाएँ और शैक्षणिक गुणवत्ता में कमी है।


2. बेरोजगारी के बावजूद डिग्री: बड़ी संख्या में युवा स्नातक व स्नातकोत्तर करने के बाद भी बेरोजगार हैं — जो शिक्षा प्रणाली और रोजगार में समन्वय की कमी को दर्शाता है।


3. माइग्रेशन का असर: शिक्षित युवाओं का पलायन (ब्रेन ड्रेन) उत्तराखंड की एक बड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौती है।




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✅ सकारात्मक संकेत:

बेटी पढ़ाओ अभियान और महिला सशक्तिकरण से महिला शिक्षा में सुधार हो रहा है।

ई-लर्निंग और डिजिटल माध्यमों का प्रयोग ग्रामीण स्कूलों में बढ़ रहा है।

नैनीताल, देहरादून, हल्द्वानी, अल्मोड़ा जैसे ज़िलों में उच्च शिक्षा की अच्छी संस्थाएँ हैं।



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✍️ निष्कर्ष:

उत्तराखंड में शिक्षा की बुनियादी स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है, लेकिन अभी भी ग्रामीण-शहरी अंतर, महिला शिक्षा, और रोजगार से जुड़ी शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

शिक्षा: विद्रोह की पहली पाठशाला




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"शिक्षा मूलतः विद्रोही होती है।"
यह कथन ब्राज़ील के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री पाउलो फ्रेरे की है, जिन्होंने शिक्षा को शोषित वर्गों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा औज़ार माना। उनका मानना था कि सच्ची शिक्षा वह है जो हमें सिर्फ आज्ञाकारी नागरिक नहीं बनाती, बल्कि हमें सोचने, सवाल करने और व्यवस्था को चुनौती देने की शक्ति देती है।

शिक्षा: केवल जानकारी नहीं, चेतना का विकास

आज के समय में जब शिक्षा को अक्सर डिग्रियों और नौकरियों तक सीमित कर दिया गया है, फ्रेरे का यह विचार और भी प्रासंगिक हो जाता है। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है, बल्कि व्यक्ति में ‘संकल्पनात्मक चेतना’ (Critical Consciousness) विकसित करना है — यानी ऐसी चेतना जो सामाजिक अन्याय, असमानता और सत्ता के ढाँचों को पहचान सके और उन्हें बदलने का साहस जुटा सके।

सोचने की तमीज़: शिक्षा की असली ताकत

जब कोई बच्चा स्कूल में जाता है, तो वह केवल गणित, विज्ञान या भाषा नहीं सीखता — वह यह भी सीखता है कि चीज़ों को कैसे देखा जाए। यदि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित रहे और बच्चों को सोचने की आदत न डाले, तो वह व्यक्ति को गुलाम बना देती है, स्वतंत्र नहीं।

फ्रेरे कहते हैं कि सच्ची शिक्षा व्यक्ति को अपने अनुभवों पर विचार करने, उनसे सीखने और समाज की संरचना को समझने का माध्यम बनती है। वह सत्ता के उस चरित्र को उजागर करती है जो अपने हित में ज्ञान को नियंत्रित करती है।

सत्ता से सवाल करना: शिक्षा का राजनीतिक पक्ष

फ्रेरे के अनुसार शिक्षा कभी भी तटस्थ नहीं होती। या तो वह शोषण को बनाए रखने में मदद करती है, या वह शोषण के खिलाफ विद्रोह करना सिखाती है। जब छात्र यह सवाल पूछना शुरू करते हैं कि समाज में कुछ लोग विशेषाधिकार प्राप्त क्यों हैं और कुछ लोग वंचित क्यों, तब शिक्षा सचमुच जीवंत हो जाती है।

विशेषाधिकार और आत्मविश्लेषण

शिक्षा हमें यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या हम केवल अपने फायदे के लिए पढ़ रहे हैं, या समाज में बदलाव लाने की ज़िम्मेदारी भी उठाने को तैयार हैं। यह हमें अपने विशेषाधिकारों को पहचानने, उन पर सवाल उठाने और ज़रूरतमंदों के लिए आवाज़ उठाने की नैतिकता सिखाती है।

निष्कर्ष: विद्रोह से बदलाव तक

फ्रेरे की शिक्षा-चेतना हमें बताती है कि शिक्षित व्यक्ति वही है जो समाज के मौजूदा ढाँचों को आँख बंद कर के स्वीकार नहीं करता, बल्कि उनमें सुधार की गुंजाइश तलाशता है। वह व्यवस्था से सवाल करता है, अपने अनुभवों को समझता है और बदलाव के लिए संकल्प लेता है।

इसलिए, जब हम स्कूल, कॉलेज, पाठ्यक्रम या शिक्षकों की बात करें, तो यह ज़रूर सोचें कि क्या हम सिर्फ जानकारियाँ दे रहे हैं, या एक ऐसा समाज भी गढ़ रहे हैं जहाँ हर नागरिक जागरूक, संवेदनशील और सवाल पूछने वाला हो।

क्योंकि शिक्षा अगर विद्रोही नहीं है, तो वह केवल प्रशिक्षण है — और प्रशिक्षण से क्रांति नहीं होती।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...