Monday, January 12, 2026

अद्वैत वेदांत: जब ‘मैं’ और ‘तुम’ मिट जाते हैं

अद्वैत वेदांत: जब ‘मैं’ और ‘तुम’ मिट जाते हैं

आज का मनुष्य सबसे अधिक जिस चीज़ से जूझ रहा है, वह है—विभाजन। मैं और तुम, अपना और पराया, धर्म और अधर्म, जीत और हार। इसी टूटन के दौर में अद्वैत वेदांत एक ऐसा दर्शन है, जो टकराव नहीं, एकता की बात करता है—बिना शोर, बिना दावा।

अद्वैत का सीधा अर्थ है—दो नहीं, एक। यह दर्शन कहता है कि इस पूरे अस्तित्व का मूल सत्य एक है, जिसे ब्रह्म कहा गया। वही चेतना हर जीव में, हर कण में विद्यमान है। भेद दिखाई देता है, लेकिन वह वास्तविक नहीं—वह हमारी सीमित समझ का परिणाम है। इस विचार को सुस्पष्ट रूप देने वाले आचार्य थे आदि शंकराचार्य।

अद्वैत वेदांत की सबसे क्रांतिकारी बात यह है कि वह ईश्वर को आकाश के पार नहीं, मनुष्य के भीतर खोजता है। “अहं ब्रह्मास्मि” का अर्थ कोई अहंकार नहीं, बल्कि यह बोध है कि मैं केवल शरीर नहीं, बल्कि वही चेतना हूँ जो सबमें समान रूप से प्रवाहित है। जब यह समझ आती है, तो ऊँच–नीच, जाति–धर्म, अमीर–गरीब जैसे भेद अपने आप अर्थहीन हो जाते हैं।

यह दर्शन संसार को झूठा नहीं कहता, बल्कि अस्थायी बताता है। जैसे सपना सच लगता है, लेकिन जागने पर उसका सत्य बदल जाता है। अद्वैत कहता है कि हम जिस दुनिया को अंतिम मानकर लड़ रहे हैं, वह बदलने वाली है; स्थायी केवल चेतना है। इसलिए यह दर्शन पलायन नहीं सिखाता, बल्कि आसक्ति से मुक्ति सिखाता है—कर्म करो, लेकिन बँधो मत।

आज के समय में अद्वैत की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। जब धर्म पहचान बनकर टकराव का कारण बनता है, तब अद्वैत याद दिलाता है कि यदि सब एक ही चेतना के रूप हैं, तो हिंसा, घृणा और घमंड का कोई नैतिक आधार नहीं बचता। यह दर्शन हमें नैतिक उपदेश नहीं देता, बल्कि ऐसी समझ देता है जिससे करुणा स्वाभाविक हो जाती है।

निष्कर्षतः, अद्वैत वेदांत कोई जटिल दर्शन नहीं, बल्कि जीवन को देखने की सरल दृष्टि है—
कि दूसरे में खुद को देखना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।
शायद इसी बोध की आज सबसे अधिक आवश्यकता है—जहाँ बहस नहीं, समझ हो;
और जीत नहीं, एकता हो।

उत्तराखंड की गंदी होती राजनीति और जनता से टूटा भरोसा

संपादकीय | उत्तराखंड की गंदी होती राजनीति और जनता से टूटा भरोसा

उत्तराखंड का जन्म एक स्वप्न के साथ हुआ था—जनभागीदारी, पर्यावरण-संवेदनशील विकास और पहाड़ के अनुरूप शासन का स्वप्न। लेकिन दो दशकों बाद यह सवाल ज़्यादा तीखा हो गया है कि क्या राजनीति इस स्वप्न को ढो रही है, या उसे धीरे-धीरे दफ़ना रही है?

आज उत्तराखंड की राजनीति को “गंदी” कहे जाने के पीछे आक्रोश है—और वह आक्रोश निराधार नहीं। सत्ता के गलियारों में निर्णय अक्सर जनता की ज़रूरतों से नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों से तय होते दिखते हैं। पहाड़ की ज़मीन, जंगल, नदियाँ और संसाधन विकास के नाम पर सौदेबाज़ी का विषय बन गए हैं, जबकि स्थानीय समुदाय सिर्फ़ दर्शक।

भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं रहे। जांच बैठती है, सुर्खियाँ बनती हैं, पर नतीजे अक्सर शून्य रहते हैं। जवाबदेही का यह अभाव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। जब जनता देखती है कि दोष तय नहीं होते, तो व्यवस्था से विश्वास उठना स्वाभाविक है।

इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है असली मुद्दों से जानबूझकर ध्यान भटकाना। रोज़गार का संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली, पहाड़ों से होता पलायन, और बार-बार आने वाली आपदाओं की तैयारी—ये सब पीछे छूट जाते हैं। उनकी जगह प्रतीकात्मक राजनीति और ध्रुवीकरण ले लेता है, जो चुनाव जीत सकता है, लेकिन राज्य नहीं चला सकता।

स्थानीय स्वशासन की स्थिति भी निराशाजनक है। पंचायतें और नगर निकाय लोकतंत्र की रीढ़ होने चाहिए थे, पर अधिकारों की कमी ने उन्हें केवल औपचारिक बना दिया है। जब फैसले ऊपर से थोपे जाते हैं, तो पहाड़ की ज़मीनी समझ गायब हो जाती है।

फिर भी, तस्वीर का एक पक्ष और है। उत्तराखंड की जनता ने हमेशा सवाल पूछे हैं—वनों की रक्षा से लेकर अपने अधिकारों तक। चुप्पी इस समाज की पहचान नहीं रही। समस्या जनता में नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति में है जिसने सत्ता को सेवा से ऊपर रख दिया।

आज ज़रूरत है साफ़ राजनीति की—जहाँ विकास पहाड़ को समझकर हो, जवाबदेही दिखे, और जनता सिर्फ़ वोटर नहीं, भागीदार बने। वरना “गंदी राजनीति” सिर्फ़ एक आरोप नहीं, आने वाले समय की कठोर सच्चाई बन जाएगी।

खाली होते गाँव, चुप होती राजनीति और उत्तराखंड का पलायन

संपादकीय | खाली होते गाँव, चुप होती राजनीति और उत्तराखंड का पलायन

उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी आज कोई एक घोटाला, कोई एक सरकार या कोई एक चुनाव नहीं है—सबसे बड़ा संकट है ग्रामीण पलायन। पहाड़ के गाँव खाली हो रहे हैं, स्कूलों में ताले लग रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और राजनीति… इस सच्चाई पर लगभग मौन है।

गाँव से शहर की यह मजबूरी कोई नई नहीं है, लेकिन चिंता इस बात की है कि यह अब स्थायी पलायन बन चुका है। लोग सिर्फ़ रोज़गार के लिए नहीं जा रहे, वे इसलिए जा रहे हैं क्योंकि गाँव में रहने की बुनियादी शर्तें ही खत्म होती जा रही हैं—स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, संचार और सम्मानजनक आजीविका।

राजनीति को अगर सबसे पहले इस संकट को समझना चाहिए था, तो वही सबसे ज़्यादा उदासीन दिखती है। चुनाव आते हैं, घोषणाएँ होती हैं—“रिवर्स पलायन”, “होम स्टे”, “स्टार्टअप गांव”—लेकिन ज़मीनी हकीकत वही रहती है। योजनाएँ काग़ज़ पर जन्म लेती हैं और वहीं दम तोड़ देती हैं।

सबसे पीड़ादायक सच यह है कि पलायन को अब सामान्य मान लिया गया है। जैसे यह विकास का स्वाभाविक परिणाम हो। लेकिन सवाल यह है—किस विकास का?
जिस विकास में अपने ही गाँव छोड़ना पड़े, वह प्रगति नहीं, विस्थापन है।

खेत छोड़कर गया किसान सिर्फ़ मज़दूर नहीं बनता, वह अपनी संस्कृति, भाषा और आत्मसम्मान का भी बोझ उठाकर जाता है। पीछे रह जाते हैं बुज़ुर्ग, महिलाएँ और वीरान घर—जो कभी जीवंत समाज हुआ करते थे।

स्थानीय स्वशासन इस संकट से लड़ने का सबसे मज़बूत हथियार हो सकता था, लेकिन पंचायतों को अधिकार नहीं दिए गए। फैसले राजधानी और सचिवालयों में होते रहे, जबकि गाँव की ज़रूरतें कभी ठीक से सुनी ही नहीं गईं।

आज ज़रूरत है ईमानदार स्वीकारोक्ति की—
पलायन कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, यह नीतिगत विफलता है।
और जब तक राजनीति इसे स्वीकार नहीं करेगी, तब तक समाधान भी नहीं निकलेगा।

उत्तराखंड की राजनीति को तय करना होगा:
क्या वह खाली होते गाँवों को सिर्फ़ चुनावी आँकड़ा मानती रहेगी,
या गाँव को फिर से रहने लायक बनाने की ज़िम्मेदारी लेगी?

क्योंकि अगर गाँव नहीं बचे,
तो उत्तराखंड सिर्फ़ एक भौगोलिक इकाई रह जाएगा—
पहाड़ नहीं, पहचान नहीं।

यह संपादकीय सिर्फ़ सवाल नहीं पूछता, चेतावनी भी देता है—
पलायन को नज़रअंदाज़ करना, भविष्य को छोड़ देना है।

2027 की ओर बढ़ता उत्तराखंड: गंदी राजनीति बनाम जनता का फैसला

संपादकीय | 2027 की ओर बढ़ता उत्तराखंड: गंदी राजनीति बनाम जनता का फैसला

उत्तराखंड जैसे छोटे, संवेदनशील और संसाधन-सीमित राज्य में राजनीति का चरित्र केवल सत्ता का प्रश्न नहीं होता, वह जनता के भविष्य का प्रश्न होता है। 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही यह सवाल और गहरा हो गया है—क्या उत्तराखंड की राजनीति जनता की समस्याओं से बाहर निकल पाएगी, या वही “गंदी राजनीति” एक बार फिर हावी रहेगी?

पिछले वर्षों में सत्ता का व्यवहार यह संकेत देता रहा है कि चुनावी प्रबंधन, छवि निर्माण और विरोध को दबाना—इन सबको शासन से ज़्यादा महत्व मिला। पहाड़ों में रोज़गार का संकट गहराता गया, पलायन स्थायी समस्या बनता गया, लेकिन राजनीति का विमर्श इन मुद्दों के इर्द-गिर्द टिक नहीं पाया।

2027 के चुनाव से पहले एक बार फिर वही रणनीति साफ दिखती है—भावनात्मक मुद्दे, पहचान की राजनीति और विकास के बड़े-बड़े दावे। ज़मीन पर स्कूलों की हालत, अस्पतालों की कमी, आपदा प्रबंधन की विफलताएँ और बेरोज़गार युवाओं की हताशा इन दावों से मेल नहीं खाती।

भ्रष्टाचार के सवाल भी चुनावी मौसम में दबा दिए जाते हैं। जांच आयोग और रिपोर्टें जनता के सामने जवाब नहीं बन पातीं, बल्कि समय काटने का औज़ार बन जाती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है, क्योंकि जब चुनाव बिना जवाबदेही के हो, तो सत्ता और निरंकुश हो जाती है।

2027 का चुनाव इसलिए निर्णायक है क्योंकि यह सिर्फ़ सरकार बदलने या बनाए रखने का चुनाव नहीं है—यह राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देने का अवसर है। सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा, सवाल यह है कि क्या जनता मुद्दों को एजेंडा बना पाएगी?

अगर रोज़गार, पलायन, पर्यावरण, स्थानीय अधिकार और पारदर्शिता चुनावी बहस के केंद्र में नहीं आए, तो “गंदी राजनीति” और मजबूत होगी। लेकिन अगर मतदाता सवाल पूछने लगे, तो यही चुनाव राजनीति को साफ करने की शुरुआत भी बन सकता है।

उत्तराखंड का इतिहास गवाह है—यह राज्य चुप रहने के लिए नहीं बना। 2027 में जनता के पास मौका है कि वह तय करे:
राजनीति सत्ता के लिए होगी या पहाड़ और जनता के लिए।


Thursday, January 8, 2026

रिश्ते, सवाल और पत्रकारिता का साहस

संपादकीय | रिश्ते, सवाल और पत्रकारिता का साहस

हर रिश्ता निभाने के लिए नहीं होता। कुछ रिश्ते इसलिए आते हैं ताकि हमें जीवन के लिए तैयार किया जा सके। वे हमें आराम नहीं देते, बल्कि असहज करते हैं—हमारे भीतर सवाल खड़े करते हैं, हमारी धारणाओं को तोड़ते हैं और हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। ऐसे रिश्ते अक्सर टूट जाते हैं, लेकिन जाते-जाते हमें वह दृष्टि दे जाते हैं, जिसके बिना आगे बढ़ना संभव नहीं होता।

जीवन में कई बार ऐसा क्षण आता है जब सब कुछ “ठीक” होना ही सबसे बड़ा सवाल बन जाता है। क्योंकि जब सब ठीक दिखता है, तब अक्सर अन्याय, चुप्पी और समझौते भी ठीक मान लिए जाते हैं। सवाल पूछना जोखिम भरा होता है, लेकिन वही जोखिम मनुष्य को जीवित और जागरूक बनाए रखता है।

पत्रकारिता का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है। यह सुविधा का नहीं, साहस का पेशा है। पत्रकारिता सिखाती है कि हर स्वीकार्य सच अंतिम सच नहीं होता। यह सत्ता से प्रश्न करने, भीड़ के विरुद्ध खड़े होने और असहज तथ्यों को सामने रखने का नैतिक बल देती है। यहाँ आगे बढ़ना मतलब लोकप्रिय होना नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार होना है।

जिस तरह कुछ रिश्ते हमें मजबूत बनाकर विदा हो जाते हैं, उसी तरह पत्रकारिता भी हमें आसान रास्ते नहीं देती—वह हमें सच के कठिन रास्ते पर चलना सिखाती है। और शायद इसी में उसका सबसे बड़ा मूल्य छिपा है: आगे बढ़ने का साहस।

Monday, December 29, 2025

मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी



संपादकीय: मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी

मजीठिया वेज बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में फैसला पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्रकारों और समाचार पत्र कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन और भत्तों की सिफारिशें वैध और लागू होने योग्य हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस की वकालत ने कर्मचारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाई।

लेकिन, 2025 में भी यह लड़ाई पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कई मीडिया संस्थानों में वेज बोर्ड की सिफारिशों का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है। कर्मचारियों को अभी भी अपने बकाया वेतन और भत्तों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह दर्शाता है कि कानूनी जीत के बावजूद, वास्तविक जीवन में न्याय के लिए निरंतर सतर्कता और प्रयास की आवश्यकता होती है।

मजीठिया वेज बोर्ड का मामला हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है। जब तक पत्रकारों के अधिकार सुरक्षित नहीं होंगे, समाज में निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया का सपना अधूरा रहेगा।

न्यायपालिका ने दिशा दिखा दी है, अब यह जिम्मेदारी मीडिया संस्थानों और समाज की है कि पत्रकारों के अधिकारों की पूरी रक्षा सुनिश्चित करें।

Sunday, December 28, 2025

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर आरोप नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत आत्मालोचना है। सच यह है कि आज का ब्राह्मण—और केवल ब्राह्मण ही क्यों, पूरा समाज—अपने मूल दर्शन से कटा हुआ है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।

पहला कारण—जन्म का भ्रम।
समय के साथ ब्राह्मण होना साधना से हटकर पहचान बन गया। जो दर्शन कभी ज्ञान, संयम और तप पर आधारित था, वह केवल उपनाम और परंपरा में सिमट गया। जब “होना” स्वतः मान लिया जाए, तो “बनने” की यात्रा रुक जाती है। यही कारण है कि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी, जो आत्मचिंतन और प्रश्न की मांग करती थी, औपचारिक कर्मकांड में बदल गई।

दूसरा कारण—ग्रंथों से दूरी।
जिस परंपरा की आत्मा उपनिषद जैसे ग्रंथों में बसती है, वहाँ आज उनका पाठ नहीं, केवल उनका नाम बचा है। ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी प्रश्न पूछना सिखाती है—“मैं कौन हूँ?”, “सत्य क्या है?”—लेकिन आज अधिकांश धार्मिक शिक्षा उत्तर रटाने तक सीमित है। प्रश्नों से डर और जिज्ञासा का अभाव बोध को जन्म ही नहीं लेने देता।

तीसरा कारण—कर्मकांड का वर्चस्व।
दर्शन कठिन है, कर्मकांड आसान। दर्शन विवेक माँगता है, कर्मकांड केवल अभ्यास। धीरे-धीरे ब्राह्मण की भूमिका समाज के पथप्रदर्शक से घटकर अनुष्ठान कराने वाले पेशेवर की बन गई। जब ज्ञान का स्थान प्रक्रिया ले ले, तब बोध खो जाता है।

चौथा कारण—सत्ता से समझौता।
इतिहास में कई दौर ऐसे आए जब ब्राह्मण वर्ग ने सत्ता से दूरी रखने के बजाय उससे समझौता किया। परिणामस्वरूप दर्शन निर्भीक नहीं रहा। जबकि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का मूल स्वर सत्ता से प्रश्न करना था—जैसा कि आदि शंकराचार्य ने अपने समय में किया। आज वह साहस कम दिखाई देता है।

पाँचवाँ कारण—आधुनिकता का अधूरा बोध।
आज का ब्राह्मण न पूरी तरह परंपरा में है, न पूरी तरह आधुनिक विवेक में। पश्चिमी आधुनिकता उसने उपभोग में अपनाई, लेकिन आलोचनात्मक चिंतन में नहीं; और परंपरा उसने रस्मों में बचाई, दर्शन में नहीं। इस दोराहे पर खड़ा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से बौध से दूर हो जाता है।

निष्कर्ष
आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध इसलिए नहीं है क्योंकि उसने ब्राह्मण होने को विरासत और ब्राह्मण बनने की साधना छोड़ दी है।
बोध किसी जाति से नहीं, चेतना के श्रम से आता है।
जिस दिन ब्राह्मण फिर से प्रश्न करेगा, सत्ता से दूरी रखेगा, और ज्ञान को जीवन में उतारेगा—उसी दिन यह दर्शन पुनर्जीवित होगा।

यह संकट किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे समाज का है। क्योंकि जब मार्गदर्शक ही मार्ग भूल जाए, तो यात्रा भटकना तय है।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

फिल्म या शॉर्ट फिल्म एआई की मदद से

 फिल्म या शॉर्ट फिल्म एआई की मदद से  1. विषय और कहानी तय करें सबसे पहले फिल्म का विषय, शैली (ड्रामा, थ्रिलर, डॉक्यूमेंट्री, साइंस फिक्शन आदि...