Sunday, April 5, 2026

उत्तराखंड का आंचलिक सिनेमा: कैमरे चमक रहे हैं, कलाकार अंधेरे में

 

 

उत्तराखंड का आंचलिक सिनेमा: कैमरे चमक रहे हैं, कलाकार अंधेरे में

उत्तराखंड आज फिल्म शूटिंग का हॉटस्पॉट है। बर्फ़ से ढके पहाड़, शांत घाटियाँ और सरकार की सब्सिडीसब कुछ मौजूद है। लेकिन सवाल यह है कि
जिस धरती की तस्वीरों पर सिनेमा पल रहा है, उसी धरती के कलाकार, तकनीशियन और संगीतकार आज भी हाशिये पर क्यों हैं?

यह विडंबना नहीं, नीतिगत असफलता है।

फिल्म नीति: उद्योग के नाम पर पर्यटन योजना

राज्य की फिल्म नीति का ढोल ज़ोर-शोर से पीटा गया। कहा गया

  • रोज़गार मिलेगा
  • स्थानीय युवाओं को अवसर मिलेंगे
  • आंचलिक सिनेमा मजबूत होगा

हकीकत यह है कि यह नीति आंचलिक सिनेमा नहीं, बाहरी प्रोडक्शन को आकर्षित करने की योजना बनकर रह गई।

बड़े बैनर आए, शूटिंग हुई, होटल भरे, टैक्स छूट मिली
लेकिन स्थानीय फिल्म निर्माता आज भी फंड के लिए दर-दर भटक रहा है।

मेकर्स: सपनों के साथ कर्ज़ में डूबे

गढ़वाली-कुमाऊँनी सिनेमा के निर्माता आज भी

  • निजी कर्ज़
  • सीमित दर्शक
  • और सरकारी फाइलों की भूलभुलैया
    के बीच फंसे हैं।

सब्सिडी की शर्तें इतनी जटिल हैं कि छोटा निर्माता शुरुआत में ही बाहर हो जाता है
यह नीति बड़े बजट के लिए है, लोक-सिनेमा के लिए नहीं।

कलाकार: चेहरा पहाड़ी, मेहनताना मैदानी

उत्तराखंड के कलाकारों को बड़े प्रोजेक्ट्स में

  • भीड़ का हिस्सा बनाया जाता है
  • संवाद कम, पहचान शून्य

आंचलिक फिल्मों में मेहनताना इतना कम है कि अभिनय आज भी शौकबना हुआ है, पेशा नहीं।
जिस राज्य में कलाकार पेट नहीं पाल सकता, वहाँ सिनेमा कैसे फलेगा?

तकनीशियन: प्रतिभा है, प्लेटफॉर्म नहीं

कैमरा, साउंड, एडिटिंगहर क्षेत्र में उत्तराखंड के युवा हैं,
लेकिन राज्य में

  • न फिल्म स्कूल
  • न प्रशिक्षण संस्थान
  • न स्थायी स्टूडियो

नतीजाप्रतिभा पहाड़ में जन्म लेती है,
लेकिन रोज़गार के लिए मैदानी शहरों में खप जाती है।

लोक संगीत: इस्तेमाल बहुत, सम्मान शून्य

फिल्मों और विज्ञापनों में लोकधुनें बज रही हैं,
लेकिन असली लोक कलाकार

  • न रॉयल्टी पाते हैं
  • न पहचान
  • न मंच

लोक संगीत को सजावट बना दिया गया है,
संस्कृति को उद्योग नहीं, सामग्री समझा जा रहा है।

सरकार से सवाल

  • क्या उत्तराखंड की फिल्म नीति सिर्फ़ लोकेशन बेचने के लिए है?
  • क्या गढ़वाली-कुमाऊँनी सिनेमा सिर्फ़ लोक कार्यक्रमभर है?
  • क्या स्थानीय कलाकार नीति के केंद्र में कभी आएँगे?

अगर जवाब नहींहै,
तो यह नीति सिनेमा नीति नहीं, इवेंट मैनेजमेंट दस्तावेज़ है।

 

अब भी समय है

उत्तराखंड को शूटिंग स्टेट नहीं, सृजन राज्य बनाना होगा।

 

  • आंचलिक फिल्मों के लिए अलग कोष
  • फिल्म डेवलपमेंट बोर्ड लेटेस्ट कैमरा और टेक्निकल इक्विपमेंट खरीद कर प्रोदुसर्स को कम रेंटल पर दे सकती है,साथ मैं पोस्ट प्रोडक्शन स्टूडियो एस्ताब्लिशेद करे
  • स्थानीय कलाकार व तकनीशियन की अनिवार्य भागीदारी
  • फिल्म स्कूल और लोक-संगीत अकादमी
  • आंचलिक फिल्मों के लिए ओटीटी और सिनेमाघर समर्थन
  • फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े सभी कामगारों की डायरेक्टरी

वरना पहाड़ पर कैमरे चलते रहेंगे,
और पहाड़ का सिनेमा
हमेशा संघर्ष की रील में कैद रहेगा।

 

 

उत्तराखंड : 25 वर्ष की यात्रा — संघर्ष, संकल्प और संभावनाओं का वृतांत

 

उत्तराखंड रजत जयंती स्मारिका लेख

उत्तराखंड : 25 वर्ष की यात्रा संघर्ष, संकल्प और संभावनाओं का वृतांत

(उत्तर प्रदेश से पृथक होकर बने उत्तराखंड राज्य की रजत जयंती पर विशेष स्मारिका लेख)

भूमिका

9 नवम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य ने अपने गठन के 25 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। यह केवल एक प्रशासनिक पुनर्गठन की घटना नहीं थी, बल्कि हिमालयी क्षेत्र के लोगों के लंबे संघर्ष, उपेक्षा के विरुद्ध प्रतिरोध, आकांक्षाओं और आत्मसम्मान का परिणाम थीजिसमें जनभावनाओं की अनदेखी की कीमत राज्य और केंद्र, दोनों को चुकानी पड़ी। छोटा राज्य, बेहतर शासनकी अवधारणा के साथ बने उत्तराखंड के सामने शुरुआत से ही विषम भौगोलिक परिस्थितियाँ, सीमित संसाधन और विकास की भारी अपेक्षाएँ थीं। रजत जयंती के इस अवसर पर यह आवश्यक है कि हम बीते 25 वर्षों की उपलब्धियों, कमियों और भविष्य की राह का समग्र मूल्यांकन करें।

राज्य निर्माण की पृष्ठभूमि

उत्तराखंड आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक‑सांस्कृतिक चेतना का आंदोलन था। पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा, पलायन, रोजगार की कमी और संसाधनों के असंतुलित दोहन ने अलग राज्य की माँग को जन्म दिया। 1990 के दशक में यह आंदोलन जन‑आंदोलन में बदला और अंततः 9 नवम्बर 2000 को भारत का 27वाँ राज्य अस्तित्व में आया।

प्रारंभिक चुनौतियाँ

राज्य गठन के समय उत्तराखंड के पास न तो पर्याप्त औद्योगिक आधार था और न ही मजबूत अवसंरचना। सीमित राजस्व, दुर्गम भौगोलिक स्थिति, बिखरी हुई आबादी और प्रशासनिक ढाँचे के निर्माण की चुनौती सरकार के सामने थी। राजधानी, सचिवालय, विभागीय ढाँचे और नीतिगत दिशा तय करना अपने‑आप में एक कठिन कार्य था।

आर्थिक विकास : 25 वर्षों का लेखा‑जोखा

पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय प्रगति की है, यह तथ्य निर्विवाद है। किंतु यह प्रगति समान, संतुलित और न्यायसंगत नहीं रहीमैदान और पहाड़ के बीच की खाई आज भी स्पष्ट दिखाई देती है। राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) जो गठन के समय लगभग 14‑15 हजार करोड़ रुपये के आसपास था, आज बढ़कर 3.5 से 3.8 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुका है। प्रति‑व्यक्ति आय में भी निरंतर वृद्धि हुई है और यह राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है।

औद्योगिक नीति, कर‑प्रोत्साहन और निवेश‑अनुकूल वातावरण के कारण राज्य के मैदानी क्षेत्रोंहरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, देहरादूनमें औद्योगिक विकास तेज हुआ। फार्मा, एफएमसीजी, ऑटो‑कंपोनेंट और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ा, जिससे रोजगार के अवसर सृजित हुए।

अवसंरचना और कनेक्टिविटी

सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी उत्तराखंड के विकास की रीढ़ अवश्य बनी, पर कई परियोजनाएँ पर्यावरणीय मूल्यांकन, स्थानीय सहमति और दीर्घकालिक स्थिरता की कसौटी पर सवाल भी खड़े करती हैं। पिछले 25 वर्षों में सड़क नेटवर्क कई गुना बढ़ा है। चारधाम ऑल‑वेदर रोड परियोजना ने धार्मिक पर्यटन के साथ‑साथ सामरिक और आपदा‑प्रबंधन दृष्टि से भी राज्य को मजबूती दी है। ऋषिकेश‑कर्णप्रयाग रेल परियोजना जैसे कार्य पहाड़ को शेष देश से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम हैं।

पर्यटन : अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार

उत्तराखंड की आर्थिकी में पर्यटन की भूमिका लगातार बढ़ी है, पर यह भी सच है कि अनियंत्रित और मौसमी पर्यटन ने संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है तथा स्थानीय समुदाय को अपेक्षित लाभ हर बार नहीं मिल पाया। चारधाम यात्रा, धार्मिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन, योग और वेलनेस टूरिज्म ने राज्य को वैश्विक पहचान दी। हाल के वर्षों में पर्यटकों की संख्या रिकॉर्ड स्तर तक पहुँची है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार, स्वरोजगार और सेवा क्षेत्र को बल मिला है।

कृषि, आजीविका और पलायन

हालाँकि औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में प्रगति हुई, पर पर्वतीय कृषि आज भी उपेक्षा, नीति-शून्यता और संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रही है, जिसके कारण पलायन राज्य की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना जाने लगा है। छोटे जोत‑खंड, जंगली जानवरों की समस्या और बाजार तक पहुँच की कमी ने पलायन को बढ़ावा दिया। फिर भी जैविक खेती, मोटे अनाज, औषधीय पौधों और स्थानीय उत्पादों पर आधारित नीतियों ने नई संभावनाएँ खोली हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य

शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों की संख्या बढ़ी है और उच्च शिक्षा में निजी निवेश आया है, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की बदहाली, शिक्षकों की भारी कमी और आधारभूत सुविधाओं का अभाव प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है। स्वास्थ्य सेवाओं में भी सुधार हुआ है, लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों तक विशेषज्ञ सेवाओं की पहुँच आज भी चुनौती बनी हुई है।

पर्यावरण और आपदा प्रबंधन

उत्तराखंड एक संवेदनशील हिमालयी राज्य है, जहाँ विकास की हर पहल को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जाना चाहिए थापर व्यवहार में यह संतुलन अक्सर नज़रअंदाज़ किया गया। भूस्खलन, बाढ़ और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव लगातार सामने आ रहे हैं। 2013 की आपदा ने विकास और पर्यावरण के संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित किया। पिछले वर्षों में आपदा‑प्रबंधन ढाँचे को मजबूत किया गया है, फिर भी सतत और पर्यावरण‑अनुकूल विकास राज्य की प्राथमिक आवश्यकता है।

शासन, पहचान और सामाजिक चेतना

छोटे राज्य के लाभ के रूप में प्रशासनिक निर्णय‑क्षमता और योजनाओं के क्रियान्वयन में गति आई है। साथ ही, उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचानभाषा, लोक‑परंपराएँ, रीति‑रिवाजको संरक्षण मिला है। हालांकि, क्षेत्रीय असमानता और पहाड़‑मैदान का अंतर अभी भी नीति‑निर्माण में बड़ी चुनौती है।

राज्य नेतृत्व और नीति दिशा

उत्तराखंड की 25 वर्षीय यात्रा में विभिन्न निर्वाचित सरकारों और मुख्यमंत्रियों की भूमिका निर्णायक रही है। अलगअलग कालखंडों में नेतृत्व की प्राथमिकताएँ भिन्न रहींकहीं संस्थागत ढाँचे के निर्माण पर बल दिया गया, तो कहीं औद्योगिकीकरण, पर्यटन विस्तार और कनेक्टिविटी को गति मिली।

पिछले एक दशक में राज्य नेतृत्व द्वारा बुनियादी ढाँचे, सड़करेल कनेक्टिविटी, चारधाम परियोजना, निवेश आकर्षण, पर्यटन और सुशासन को विकास का केंद्र बनाया गया। मुख्यमंत्री स्तर पर डबल इंजन सरकारकी अवधारणा के तहत केंद्र और राज्य के बीच समन्वय से कई बड़ी परियोजनाएँ धरातल पर उतरीं।

साथ ही, नीति स्तर पर यह स्वीकार किया गया कि उत्तराखंड का विकास मॉडल केवल मैदानी औद्योगिकीकरण तक सीमित नहीं रह सकता। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग रणनीतिस्थानीय रोजगार, पर्यटन आधारित आजीविका, कृषिवन आधारित अर्थव्यवस्था और सीमांत गाँवों का पुनर्जीवनराज्य नेतृत्व के एजेंडे का हिस्सा बना।

यह भी सच है कि शासन और नीति-निर्माण में निरंतरता की कमी, बार-बार सरकारों का बदलना और प्रशासनिक अस्थिरता ने कई बार विकास की गति को प्रभावित किया। फिर भी, समग्र रूप से राज्य नेतृत्व ने उत्तराखंड को एक अलग पहचान देने और उसे राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

निष्कर्ष : भविष्य की दिशा

उत्तराखंड की 25 वर्ष की यात्रा उपलब्धियों की नहीं, बल्कि उपलब्धियों और चूकोंदोनों की साझा कहानी है, जिसे ईमानदारी से स्वीकार किए बिना आगे की राह तय नहीं की जा सकती। राज्य ने आर्थिक, अवसंरचनात्मक और पर्यटन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, पर पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संतुलन जैसे मुद्दे अभी भी समाधान की प्रतीक्षा में हैं। रजत जयंती का यह अवसर आत्ममंथन का हैताकि आने वाले वर्षों में उत्तराखंड केवल विकासशीलनहीं, बल्कि संतुलित, समावेशी और सतत विकास का मॉडल राज्य बन सके।

उत्तराखंड की यह यात्रा केवल बीते समय का लेखा‑जोखा नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक संकल्प हैजहाँ विकास, प्रकृति और जन‑आकांक्षाएँ एक‑दूसरे के पूरक हों।

 

Friday, April 3, 2026

पहाड़ों में बढ़ता सन्नाटा—मानव-वन्यजीव संघर्ष पर कब जागेगा तंत्र?

 

संपादकीय: पहाड़ों में बढ़ता सन्नाटा—मानव-वन्यजीव संघर्ष पर कब जागेगा तंत्र?

उत्तराखण्ड के शांत पर्वतीय अंचलों में आज एक अदृश्य भय पसरा हुआ है। पौड़ी गढ़वाल के चौबट्टाखाल, जैरिकहल, रिखणीखाल, नैनीडांडा और आसपास के क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं अब सामान्य खबर नहीं, बल्कि एक गहरे संकट का संकेत बन चुकी हैं। सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस खतरे को अभी भी “घटना” भर मान रहा है, या इसे एक गंभीर नीति-चुनौती के रूप में देखेगा?

वन्यजीवों का गांवों की ओर बढ़ता रुख केवल संयोग नहीं है। यह उस विकास मॉडल का परिणाम है जिसमें जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास लगातार बाधित हो रहे हैं। सड़क, निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन ने पहाड़ के पारिस्थितिक संतुलन को झकझोर दिया है। नतीजतन, अब जंगल और गांव के बीच की रेखा धुंधली हो गई है।

इससे भी अधिक चिंताजनक है सरकारी तंत्र की निष्क्रियता। वन विभाग की सीमित गश्त, त्वरित कार्रवाई तंत्र की कमी और प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों का अभाव यह दर्शाता है कि योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित हैं। ग्रामीणों को न तो पर्याप्त चेतावनी प्रणाली मिल पा रही है, न ही समय पर राहत और मुआवजा।

जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी इस संकट में कठघरे में खड़ी नजर आती है। चौबट्टाखाल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सतपाल महाराज द्वारा इस मुद्दे को विधानसभा में अपेक्षित मजबूती से न उठाया जाना स्थानीय जनता की पीड़ा को और बढ़ाता है। जब लोगों की जान-माल पर खतरा मंडरा रहा हो, तब जनप्रतिनिधियों की चुप्पी केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक प्रश्न भी बन जाती है।

यह समय दोषारोपण का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का है। राज्य सरकार, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को मिलकर एक समन्वित रणनीति बनानी होगी। संवेदनशील क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान, आधुनिक निगरानी प्रणाली, सोलर फेंसिंग, त्वरित प्रतिक्रिया दल और स्थानीय समुदाय की भागीदारी—ये सभी उपाय अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुके हैं।

उत्तराखण्ड की पहचान उसके जंगलों और जैव विविधता से है, लेकिन यदि यही संपदा मानव जीवन के लिए खतरा बन जाए, तो विकास और संरक्षण के बीच संतुलन पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।

पहाड़ों में बढ़ता यह सन्नाटा केवल डर का नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता का संकेत है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस चेतावनी को सुनती है या फिर अगली त्रासदी का इंतजार करती है।

हिमाचल का सख्त कदम—क्या उत्तराखंड भी सीखेगा सबक?

 

✍️ संपादकीय: हिमाचल का सख्त कदम—क्या उत्तराखंड भी सीखेगा सबक?

हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार द्वारा दलबदल करने वाले विधायकों की पेंशन समाप्त करने का प्रस्ताव केवल एक राज्य का विधायी निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ एक सख्त संदेश है। दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता को अब आर्थिक परिणामों से जोड़ना, राजनीति में जवाबदेही की नई परिभाषा गढ़ता है। सवाल यह है—क्या उत्तराखंड इस पहल से कुछ सीखेगा?


🔹 उत्तराखंड का संदर्भ: छोटी विधानसभा, बड़ा खतरा

उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में, जहां विधानसभा की सीटें सीमित हैं, वहां कुछ विधायकों का दलबदल पूरी सरकार की दिशा बदल सकता है
राज्य ने भी अतीत में राजनीतिक अस्थिरता और दल-बदल की आशंकाओं को देखा है।

  • सत्ता संतुलन अक्सर कुछ सीटों पर निर्भर रहता है

  • राजनीतिक नैतिकता से अधिक सत्ता समीकरण हावी होते हैं

ऐसे में, केवल अयोग्यता का प्रावधान पर्याप्त नहीं लगता।


🔹 क्यों जरूरी है उत्तराखंड में ऐसा कानून?

1. जनादेश की रक्षा

जब कोई विधायक दल बदलता है, तो वह केवल पार्टी नहीं बदलता, बल्कि मतदाताओं के विश्वास को भी तोड़ता है
पेंशन जैसे दीर्घकालिक लाभों को समाप्त करना इस विश्वासघात पर ठोस कार्रवाई होगी।

2. राजनीतिक स्थिरता

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और पर्वतीय राज्य में, जहां विकास योजनाएं पहले ही चुनौतियों से घिरी हैं,
सरकारों की स्थिरता अत्यंत आवश्यक है

3. सार्वजनिक धन का नैतिक उपयोग

पेंशन अंततः जनता के कर से आती है।
क्या जनता के पैसे से ऐसे प्रतिनिधियों को लाभ देना उचित है, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन किया?


🔹 संभावित चुनौतियां

  • कानूनी परीक्षण:
    ऐसा कानून न्यायालय में चुनौती का सामना कर सकता है, विशेषकर समानता के अधिकार के आधार पर।

  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी:
    क्या उत्तराखंड के राजनीतिक दल खुद पर यह सख्ती लागू करने को तैयार होंगे?


🔹 व्यापक संदेश: राजनीति में जवाबदेही का नया दौर

हिमाचल का यह कदम बताता है कि अब केवल “अयोग्यता” पर्याप्त नहीं है।
जरूरत है कि दलबदल को राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर हतोत्साहित किया जाए


🔚 निष्कर्ष

उत्तराखंड, जो अक्सर पर्यावरणीय और विकासात्मक चुनौतियों से जूझता है, वहां राजनीतिक स्थिरता और नैतिकता किसी भी नीति से कम महत्वपूर्ण नहीं है
हिमाचल का प्रस्ताव एक अवसर है—

या तो उत्तराखंड इसे एक “दूसरे राज्य की खबर” मानकर अनदेखा कर दे,
या इसे लोकतांत्रिक सुधार की दिशा में एक ठोस कदम के रूप में अपनाए।

समय आ गया है कि उत्तराखंड भी यह तय करे—
जनादेश सर्वोपरि है या सत्ता की राजनीति?

समावेशी विकास की नई दिशा या प्रतीकात्मक पहल?

 संपादकीय | समावेशी विकास की नई दिशा या प्रतीकात्मक पहल?

देहरादून में ₹62 लाख की लागत से दिव्यांगजनों के लिए इंडोर बैडमिंटन हॉल का निर्माण, प्रशासनिक संवेदनशीलता का एक सकारात्मक संकेत है। यह पहल उस सोच को दर्शाती है जिसमें विकास केवल सड़कों और भवनों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के सबसे वंचित वर्गों तक अवसर पहुंचाने का माध्यम बनता है।

Pushkar Singh Dhami के नेतृत्व में राज्य सरकार लगातार समावेशी विकास की बात करती रही है, और जिला स्तर पर इस तरह के प्रयास उसी नीति की जमीनी अभिव्यक्ति के रूप में देखे जा सकते हैं। देहरादून के जिलाधिकारी द्वारा उठाया गया यह कदम दर्शाता है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो तो सीमित संसाधनों में भी बदलाव की शुरुआत संभव है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पहल एक व्यापक नीति का हिस्सा है या फिर केवल एक “मॉडल प्रोजेक्ट” बनकर रह जाएगी? उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांगजनों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक सीमित हैं, वहां एक इंडोर हॉल बनाना सराहनीय जरूर है, पर पर्याप्त नहीं।

वास्तविक चुनौती इस परियोजना के उपयोग और प्रभाव में निहित है। क्या इस हॉल में प्रशिक्षित कोच उपलब्ध होंगे? क्या यहां तक पहुंचने के लिए दिव्यांगजनों के लिए परिवहन की व्यवस्था होगी? क्या इसे स्थानीय और राज्य स्तरीय खेल प्रतियोगिताओं से जोड़ा जाएगा? यदि इन सवालों के जवाब नकारात्मक रहे, तो यह पहल भी कई अन्य योजनाओं की तरह केवल उद्घाटन और समाचारों तक सिमट सकती है।

इसके साथ ही, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) जैसे फंड का उपयोग सामाजिक अवसंरचना के लिए किया जाना एक सकारात्मक संकेत है। यह बताता है कि यदि फंड के उपयोग में प्राथमिकताएं सही तय हों, तो स्थानीय स्तर पर बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि यह मॉडल अन्य जिलों में भी दोहराया जा सके।

अंततः, यह पहल एक अवसर है—केवल एक भवन बनाने का नहीं, बल्कि एक समावेशी खेल संस्कृति विकसित करने का। यदि सरकार और प्रशासन इसे दीर्घकालिक दृष्टि से देखें, तो यह न केवल दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए मंच तैयार करेगा, बल्कि समाज में समानता और गरिमा के मूल्यों को भी मजबूत करेगा।

समावेशी विकास का असली अर्थ यही है—जहां हर व्यक्ति, चाहे उसकी शारीरिक क्षमता कुछ भी हो, अपने सपनों को पूरा करने के लिए समान अवसर पा सके।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन नागरिकों के नाम पर सत्ता चलती है, उन्हीं को “अवैध” घोषित कर दिया जाता है।

 

 संपादकीय 

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन नागरिकों के नाम पर सत्ता चलती है, उन्हीं को “अवैध” घोषित कर दिया जाता है।

जब राज्य रोजगार नहीं देता, जमीन का अधिकार नहीं देता, और आवास की व्यवस्था नहीं करता—तो नागरिक अपने स्तर पर समाधान तलाशते हैं। वे जंगलों में बसते हैं, नजूल भूमि पर घर बनाते हैं, और अपने अस्तित्व के लिए संसाधनों का उपयोग करते हैं।

लेकिन सत्ता इस संघर्ष को समझने के बजाय उसे “अतिक्रमण” और “अवैध कब्जा” का नाम देकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती है।

सवाल यह है—
क्या दशकों से रह रहा व्यक्ति अवैध है,
या वह व्यवस्था अवैध है जो उसे अधिकार देने में असफल रही?

उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है, जहां हजारों परिवार पीढ़ियों से बसे होने के बावजूद कानूनी पहचान और भूमि अधिकार से वंचित हैं।

यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं,
यह सम्मान, अस्तित्व और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है।

यदि लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो “अवैध नागरिक” जैसी अवधारणा को त्यागना होगा—
और यह स्वीकार करना होगा कि असली सुधार व्यवस्था में चाहिए, नागरिकों में नहीं।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

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