Friday, April 3, 2026

पहाड़ों में बढ़ता सन्नाटा—मानव-वन्यजीव संघर्ष पर कब जागेगा तंत्र?

 

संपादकीय: पहाड़ों में बढ़ता सन्नाटा—मानव-वन्यजीव संघर्ष पर कब जागेगा तंत्र?

उत्तराखण्ड के शांत पर्वतीय अंचलों में आज एक अदृश्य भय पसरा हुआ है। पौड़ी गढ़वाल के चौबट्टाखाल, जैरिकहल, रिखणीखाल, नैनीडांडा और आसपास के क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं अब सामान्य खबर नहीं, बल्कि एक गहरे संकट का संकेत बन चुकी हैं। सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस खतरे को अभी भी “घटना” भर मान रहा है, या इसे एक गंभीर नीति-चुनौती के रूप में देखेगा?

वन्यजीवों का गांवों की ओर बढ़ता रुख केवल संयोग नहीं है। यह उस विकास मॉडल का परिणाम है जिसमें जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास लगातार बाधित हो रहे हैं। सड़क, निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन ने पहाड़ के पारिस्थितिक संतुलन को झकझोर दिया है। नतीजतन, अब जंगल और गांव के बीच की रेखा धुंधली हो गई है।

इससे भी अधिक चिंताजनक है सरकारी तंत्र की निष्क्रियता। वन विभाग की सीमित गश्त, त्वरित कार्रवाई तंत्र की कमी और प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों का अभाव यह दर्शाता है कि योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित हैं। ग्रामीणों को न तो पर्याप्त चेतावनी प्रणाली मिल पा रही है, न ही समय पर राहत और मुआवजा।

जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी इस संकट में कठघरे में खड़ी नजर आती है। चौबट्टाखाल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सतपाल महाराज द्वारा इस मुद्दे को विधानसभा में अपेक्षित मजबूती से न उठाया जाना स्थानीय जनता की पीड़ा को और बढ़ाता है। जब लोगों की जान-माल पर खतरा मंडरा रहा हो, तब जनप्रतिनिधियों की चुप्पी केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक प्रश्न भी बन जाती है।

यह समय दोषारोपण का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का है। राज्य सरकार, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को मिलकर एक समन्वित रणनीति बनानी होगी। संवेदनशील क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान, आधुनिक निगरानी प्रणाली, सोलर फेंसिंग, त्वरित प्रतिक्रिया दल और स्थानीय समुदाय की भागीदारी—ये सभी उपाय अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुके हैं।

उत्तराखण्ड की पहचान उसके जंगलों और जैव विविधता से है, लेकिन यदि यही संपदा मानव जीवन के लिए खतरा बन जाए, तो विकास और संरक्षण के बीच संतुलन पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।

पहाड़ों में बढ़ता यह सन्नाटा केवल डर का नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता का संकेत है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस चेतावनी को सुनती है या फिर अगली त्रासदी का इंतजार करती है।

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