संपादकीय: रसोई गैस संकट—क्या उलट रही है स्वच्छ ऊर्जा की दिशा?
भारत में रसोई गैस (एलपीजी) की कमी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा नीति केवल आपूर्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन का भी विषय है। बीते वर्षों में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से करोड़ों गरीब परिवारों को स्वच्छ ईंधन से जोड़ा गया था। यह पहल केवल सुविधा नहीं, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में एक संरचनात्मक बदलाव थी।
लेकिन आज जब एलपीजी की उपलब्धता अनिश्चित और कीमतें अस्थिर होती दिख रही हैं, तो वही परिवार पुनः लकड़ी, कोयला और गोबर जैसे पारंपरिक ईंधनों की ओर लौटने को विवश हो रहे हैं। यह वापसी केवल एक ऊर्जा विकल्प का परिवर्तन नहीं, बल्कि वर्षों की सार्वजनिक नीति के कमजोर पड़ने का संकेत है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में यह संकट और गहरा है। दुर्गम भौगोलिक स्थितियाँ, सीमित वितरण नेटवर्क और मौसमजनित बाधाएँ पहले से ही आपूर्ति को अस्थिर बनाती रही हैं। ऐसे में एलपीजी की कमी सीधे तौर पर ग्रामीण जीवन को प्रभावित करती है। जंगलों से लकड़ी पर निर्भरता बढ़ती है, जिससे वनों पर दबाव और पर्यावरणीय क्षरण तेज होता है।
स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह स्थिति और चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन लगातार चेतावनी देता रहा है कि पारंपरिक ईंधनों से उत्पन्न इनडोर वायु प्रदूषण गंभीर बीमारियों और समयपूर्व मृत्यु का प्रमुख कारण है। पहाड़ी क्षेत्रों में बंद कमरों में धुएँ का जमाव, महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष रूप से घातक साबित होता है।
इस परिप्रेक्ष्य में सवाल केवल यह नहीं है कि एलपीजी की आपूर्ति क्यों घट रही है, बल्कि यह है कि क्या हमारी ऊर्जा नीतियाँ दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ हैं? क्या सब्सिडी व्यवस्था इतनी स्थिर है कि गरीब परिवार बाजार की अस्थिरताओं से सुरक्षित रह सकें? और क्या हमने क्षेत्रीय असमानताओं—विशेषकर पहाड़ी राज्यों की विशिष्ट चुनौतियों—को नीति निर्माण में पर्याप्त महत्व दिया है?
समाधान स्पष्ट हैं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्राथमिकता की आवश्यकता है। एलपीजी सब्सिडी को लक्षित और स्थिर बनाया जाए, वितरण प्रणाली को स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकेंद्रीकृत किया जाए, और बायोगैस व सौर ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्वच्छ ईंधनों को वास्तविक स्तर पर बढ़ावा दिया जाए।
अंततः, यह संकट एक चेतावनी है—यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो भारत स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में अपनी अब तक की उपलब्धियों को खो सकता है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह खतरा और अधिक वास्तविक है, जहाँ हर नीति का प्रभाव सीधे जीवन और प्रकृति दोनों पर पड़ता है।
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