संपादकीय
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन नागरिकों के नाम पर सत्ता चलती है, उन्हीं को “अवैध” घोषित कर दिया जाता है।
जब राज्य रोजगार नहीं देता, जमीन का अधिकार नहीं देता, और आवास की व्यवस्था नहीं करता—तो नागरिक अपने स्तर पर समाधान तलाशते हैं। वे जंगलों में बसते हैं, नजूल भूमि पर घर बनाते हैं, और अपने अस्तित्व के लिए संसाधनों का उपयोग करते हैं।
लेकिन सत्ता इस संघर्ष को समझने के बजाय उसे “अतिक्रमण” और “अवैध कब्जा” का नाम देकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती है।
सवाल यह है—
क्या दशकों से रह रहा व्यक्ति अवैध है,
या वह व्यवस्था अवैध है जो उसे अधिकार देने में असफल रही?
उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है, जहां हजारों परिवार पीढ़ियों से बसे होने के बावजूद कानूनी पहचान और भूमि अधिकार से वंचित हैं।
यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं,
यह सम्मान, अस्तित्व और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है।
यदि लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो “अवैध नागरिक” जैसी अवधारणा को त्यागना होगा—
और यह स्वीकार करना होगा कि असली सुधार व्यवस्था में चाहिए, नागरिकों में नहीं।
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