उत्तराखंड रजत
जयंती स्मारिका लेख
उत्तराखंड : 25 वर्ष की यात्रा — संघर्ष, संकल्प और संभावनाओं का वृतांत
(उत्तर प्रदेश से
पृथक होकर बने उत्तराखंड राज्य की रजत जयंती पर विशेष स्मारिका लेख)
भूमिका
9 नवम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व
में आए उत्तराखंड राज्य ने अपने गठन के 25 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। यह केवल एक प्रशासनिक पुनर्गठन की
घटना नहीं थी, बल्कि हिमालयी
क्षेत्र के लोगों के लंबे संघर्ष, उपेक्षा के
विरुद्ध प्रतिरोध, आकांक्षाओं और
आत्मसम्मान का परिणाम थी—जिसमें जनभावनाओं
की अनदेखी की कीमत राज्य और केंद्र, दोनों को चुकानी पड़ी। ‘छोटा राज्य, बेहतर शासन’ की अवधारणा के साथ बने उत्तराखंड के सामने शुरुआत से ही
विषम भौगोलिक परिस्थितियाँ, सीमित संसाधन और
विकास की भारी अपेक्षाएँ थीं। रजत जयंती के इस अवसर पर यह आवश्यक है कि हम बीते 25 वर्षों की उपलब्धियों, कमियों और भविष्य की राह का समग्र
मूल्यांकन करें।
राज्य निर्माण की पृष्ठभूमि
उत्तराखंड आंदोलन
केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक‑सांस्कृतिक
चेतना का आंदोलन था। पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा, पलायन, रोजगार की कमी और
संसाधनों के असंतुलित दोहन ने अलग राज्य की माँग को जन्म दिया। 1990 के दशक में यह आंदोलन जन‑आंदोलन में
बदला और अंततः 9 नवम्बर 2000 को भारत का 27वाँ राज्य अस्तित्व में आया।
प्रारंभिक चुनौतियाँ
राज्य गठन के समय
उत्तराखंड के पास न तो पर्याप्त औद्योगिक आधार था और न ही मजबूत अवसंरचना। सीमित
राजस्व, दुर्गम भौगोलिक
स्थिति, बिखरी हुई आबादी
और प्रशासनिक ढाँचे के निर्माण की चुनौती सरकार के सामने थी। राजधानी, सचिवालय, विभागीय ढाँचे और नीतिगत दिशा तय करना अपने‑आप में एक कठिन
कार्य था।
आर्थिक विकास : 25 वर्षों का लेखा‑जोखा
पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था
ने उल्लेखनीय प्रगति की है, यह तथ्य निर्विवाद
है। किंतु यह प्रगति समान, संतुलित और
न्यायसंगत नहीं रही—मैदान और पहाड़ के
बीच की खाई आज भी स्पष्ट दिखाई देती है। राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) जो गठन के समय लगभग 14‑15 हजार करोड़ रुपये के आसपास था, आज बढ़कर 3.5 से 3.8 लाख करोड़ रुपये
के स्तर पर पहुँच चुका है। प्रति‑व्यक्ति आय में भी निरंतर वृद्धि हुई है और यह
राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है।
औद्योगिक नीति, कर‑प्रोत्साहन और निवेश‑अनुकूल वातावरण
के कारण राज्य के मैदानी क्षेत्रों—हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, देहरादून—में औद्योगिक विकास तेज हुआ। फार्मा, एफएमसीजी, ऑटो‑कंपोनेंट और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में निवेश
बढ़ा, जिससे रोजगार के
अवसर सृजित हुए।
अवसंरचना और कनेक्टिविटी
सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी उत्तराखंड के
विकास की रीढ़ अवश्य बनी, पर कई परियोजनाएँ
पर्यावरणीय मूल्यांकन, स्थानीय सहमति और
दीर्घकालिक स्थिरता की कसौटी पर सवाल भी खड़े करती हैं। पिछले 25 वर्षों में सड़क नेटवर्क कई गुना बढ़ा
है। चारधाम ऑल‑वेदर रोड परियोजना ने धार्मिक पर्यटन के साथ‑साथ सामरिक और आपदा‑प्रबंधन
दृष्टि से भी राज्य को मजबूती दी है। ऋषिकेश‑कर्णप्रयाग रेल परियोजना जैसे कार्य
पहाड़ को शेष देश से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम हैं।
पर्यटन : अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार
उत्तराखंड की
आर्थिकी में पर्यटन की भूमिका लगातार बढ़ी है, पर यह भी सच है कि अनियंत्रित और मौसमी पर्यटन ने संसाधनों
पर दबाव बढ़ाया है तथा स्थानीय समुदाय को अपेक्षित लाभ हर बार नहीं मिल पाया।
चारधाम यात्रा, धार्मिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन, योग और वेलनेस टूरिज्म ने राज्य को
वैश्विक पहचान दी। हाल के वर्षों में पर्यटकों की संख्या रिकॉर्ड स्तर तक पहुँची
है, जिससे स्थानीय
स्तर पर रोजगार, स्वरोजगार और सेवा
क्षेत्र को बल मिला है।
कृषि, आजीविका और पलायन
हालाँकि औद्योगिक
और सेवा क्षेत्र में प्रगति हुई, पर पर्वतीय कृषि
आज भी उपेक्षा, नीति-शून्यता और
संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रही है, जिसके कारण पलायन राज्य की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना
जाने लगा है। छोटे जोत‑खंड, जंगली जानवरों की
समस्या और बाजार तक पहुँच की कमी ने पलायन को बढ़ावा दिया। फिर भी जैविक खेती, मोटे अनाज, औषधीय पौधों और स्थानीय उत्पादों पर आधारित नीतियों ने नई
संभावनाएँ खोली हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य
शिक्षा के क्षेत्र
में संस्थानों की संख्या बढ़ी है और उच्च शिक्षा में निजी निवेश आया है, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी
स्कूलों की बदहाली, शिक्षकों की भारी
कमी और आधारभूत सुविधाओं का अभाव प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है। स्वास्थ्य
सेवाओं में भी सुधार हुआ है, लेकिन दूरस्थ
क्षेत्रों तक विशेषज्ञ सेवाओं की पहुँच आज भी चुनौती बनी हुई है।
पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
उत्तराखंड एक
संवेदनशील हिमालयी राज्य है, जहाँ विकास की हर
पहल को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जाना चाहिए था—पर व्यवहार में यह संतुलन अक्सर नज़रअंदाज़ किया गया।
भूस्खलन, बाढ़ और जलवायु
परिवर्तन के प्रभाव लगातार सामने आ रहे हैं। 2013 की आपदा ने विकास और पर्यावरण के संतुलन की आवश्यकता को
रेखांकित किया। पिछले वर्षों में आपदा‑प्रबंधन ढाँचे को मजबूत किया गया है, फिर भी सतत और पर्यावरण‑अनुकूल विकास
राज्य की प्राथमिक आवश्यकता है।
शासन, पहचान और सामाजिक चेतना
छोटे राज्य के लाभ
के रूप में प्रशासनिक निर्णय‑क्षमता और योजनाओं के क्रियान्वयन में गति आई है। साथ
ही, उत्तराखंड की
सांस्कृतिक पहचान—भाषा, लोक‑परंपराएँ, रीति‑रिवाज—को संरक्षण मिला है। हालांकि, क्षेत्रीय असमानता और पहाड़‑मैदान का अंतर अभी भी नीति‑निर्माण
में बड़ी चुनौती है।
राज्य नेतृत्व और नीति दिशा
उत्तराखंड की 25 वर्षीय यात्रा में विभिन्न निर्वाचित
सरकारों और मुख्यमंत्रियों की भूमिका निर्णायक रही है। अलग–अलग कालखंडों में नेतृत्व की प्राथमिकताएँ भिन्न रहीं—कहीं संस्थागत ढाँचे के निर्माण पर बल दिया गया, तो कहीं औद्योगिकीकरण, पर्यटन विस्तार और कनेक्टिविटी को गति
मिली।
पिछले एक दशक में
राज्य नेतृत्व द्वारा बुनियादी ढाँचे, सड़क–रेल कनेक्टिविटी, चारधाम परियोजना, निवेश आकर्षण, पर्यटन और सुशासन को विकास का
केंद्र बनाया गया। मुख्यमंत्री स्तर पर ‘डबल इंजन सरकार’ की अवधारणा के तहत केंद्र और राज्य के बीच समन्वय से कई
बड़ी परियोजनाएँ धरातल पर उतरीं।
साथ ही, नीति स्तर पर यह स्वीकार किया गया कि
उत्तराखंड का विकास मॉडल केवल मैदानी औद्योगिकीकरण तक सीमित नहीं रह सकता। पर्वतीय
क्षेत्रों के लिए अलग रणनीति—स्थानीय रोजगार, पर्यटन आधारित आजीविका, कृषि–वन आधारित अर्थव्यवस्था और सीमांत गाँवों का पुनर्जीवन—राज्य नेतृत्व के एजेंडे का हिस्सा बना।
यह भी सच है कि
शासन और नीति-निर्माण में निरंतरता की कमी, बार-बार सरकारों का बदलना और प्रशासनिक अस्थिरता ने कई बार
विकास की गति को प्रभावित किया। फिर भी, समग्र रूप से राज्य नेतृत्व ने उत्तराखंड को एक अलग पहचान
देने और उसे राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
है।
निष्कर्ष : भविष्य की दिशा
उत्तराखंड की 25 वर्ष की यात्रा उपलब्धियों की नहीं, बल्कि उपलब्धियों और चूकों—दोनों की साझा कहानी है, जिसे ईमानदारी से
स्वीकार किए बिना आगे की राह तय नहीं की जा सकती। राज्य ने आर्थिक, अवसंरचनात्मक और पर्यटन के क्षेत्र में
उल्लेखनीय प्रगति की है, पर पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संतुलन जैसे मुद्दे अभी भी समाधान की
प्रतीक्षा में हैं। रजत जयंती का यह अवसर आत्ममंथन का है—ताकि आने वाले वर्षों में उत्तराखंड ‘केवल विकासशील’ नहीं, बल्कि संतुलित, समावेशी और सतत विकास का मॉडल राज्य बन सके।
उत्तराखंड की यह
यात्रा केवल बीते समय का लेखा‑जोखा नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक संकल्प है—जहाँ विकास, प्रकृति और जन‑आकांक्षाएँ एक‑दूसरे के
पूरक हों।
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