Saturday, January 31, 2026

हिमालय की थाली: जलवायु संकट के दौर में भारत का मौन संदेश



हिमालय की थाली: जलवायु संकट के दौर में भारत का मौन संदेश

27 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में आयोजित राजकीय भोज को केवल कूटनीतिक औपचारिकता मानना एक बड़ी भूल होगी। यह दरअसल भारत की ओर से दुनिया को दिया गया एक पर्यावरणीय वक्तव्य था—बिना भाषण, बिना घोषणा, सिर्फ भोजन के ज़रिये।

जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण और खाद्य असुरक्षा की चुनौती से जूझ रही है, उस समय यूरोपीय संघ के नेताओं के सामने परोसी गई हिमालयी व्यंजनों की थाली यह बताने के लिए काफी थी कि टिकाऊ भविष्य के सूत्र आधुनिक प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि सदियों पुराने स्थानीय ज्ञान में छिपे हैं।

हिमालयी भोजन परंपरा की आत्मा “कम से कम हस्तक्षेप” पर आधारित है। धीमी पकाने की तकनीक, मौसमी सामग्री, जंगली साग, मिलेट, कंद-मूल और स्थानीय बीज—ये सभी उस कृषि और जीवन पद्धति के प्रतीक हैं, जिसमें कार्बन फुटप्रिंट कम और प्रकृति के साथ टकराव न्यूनतम होता है। जखिया, थिचोनी, गुच्छी मशरूम या बिच्छू बूटी जैसे व्यंजन दरअसल जैव विविधता को सहेजने की सांस्कृतिक रणनीतियाँ हैं।

यह संयोग नहीं कि इस मेन्यू में किसी औद्योगिक फूड सिस्टम का दबदबा नहीं दिखता। न अत्यधिक प्रोसेसिंग, न लंबी सप्लाई चेन, न ही ऊर्जा-खपत वाली खेती। इसके उलट, यह थाली स्थानीय समुदायों की उस समझ को सामने लाती है जहाँ भोजन, जंगल और जल एक ही पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से हैं।

आज हिमालय खुद एक संकट क्षेत्र बन चुका है—ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं, और पारंपरिक खेती विस्थापित हो रही है। ऐसे में राष्ट्रपति भवन में हिमालयी भोजन का चयन एक प्रतीकात्मक स्वीकारोक्ति भी है कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों से नहीं, विकल्पों से होता है।

यह भोज यह भी याद दिलाता है कि यदि हम स्थानीय खाद्य प्रणालियों को बचाते हैं, तो हम केवल स्वाद नहीं बचाते—हम जलवायु संतुलन, ग्रामीण आजीविका और पीढ़ियों का ज्ञान बचाते हैं। यही कारण है कि यह आयोजन किसी फूड फेस्टिवल से आगे बढ़कर एक नीतिगत संकेत बन जाता है।

संभव है कि EU नेताओं ने उस शाम केवल एक अच्छा डिनर समझकर भोजन किया हो, लेकिन भारत ने उस थाली के माध्यम से यह साफ़ कर दिया कि उसका पर्यावरणीय दृष्टिकोण “ग्रीन स्लोगन” नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।

हिमालय की यह थाली दरअसल एक सवाल भी छोड़ जाती है—
क्या हम विकास की दौड़ में इस संतुलन को थाम पाएंगे,
या फिर इसे भी स्मृति में बदल देंगे?

क्योंकि अगर हिमालय सुरक्षित है,
तो मैदान भी सुरक्षित हैं।

थाली में हिमालय, स्वाद में कूटनीति



थाली में हिमालय, स्वाद में कूटनीति

जब वैश्विक कूटनीति व्यापार, शुल्क और समझौतों की भाषा बोलती है, तब कभी-कभी एक थाली भी वही बात उससे अधिक प्रभावशाली ढंग से कह देती है। 27 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में यूरोपीय संघ (EU) के नेताओं के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज ऐसा ही एक मौन लेकिन गहरा संवाद था—संस्कृति, प्रकृति और आत्मनिर्भर भारत का संवाद।

इस भोज की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें किसी आयातित लक्ज़री या पश्चिमी व्यंजनों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भारतीय हिमालय की मिट्टी, मौसम और परंपरा से जन्मे स्वाद थे। कश्मीर से लेकर उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर तक—पूरा हिमालय मानो एक थाली में सिमट आया हो।

यह मेन्यू केवल भोजन नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था—
👉 भारत अपनी पहचान को छुपाकर नहीं, बल्कि अपनी जड़ों के साथ वैश्विक मंच पर खड़ा है।

आज जब विकास को अक्सर प्रकृति के विरोध में खड़ा कर दिया जाता है, तब यह हिमालयी मेन्यू पहाड़ी समाज की उस समझ को सामने लाता है, जहाँ भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का तरीका है। जखिया आलू, थिचोनी, गुच्छी मशरूम, जंगली साग, रागी और मिलेट—ये सब उस जीवन दर्शन के प्रतीक हैं जो कम संसाधनों में संतुलन सिखाता है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि इस मेन्यू को युवा भारतीय शेफ्स ने रचा—जो परंपरा को “म्यूज़ियम की चीज़” नहीं, बल्कि जीवित और प्रासंगिक ज्ञान मानते हैं। उन्होंने भारतीय भोजन को बदले बिना, उसकी प्रस्तुति को वैश्विक भाषा दी। यह आत्मविश्वास का संकेत है, न कि अनुकरण का।

दरअसल, यह राजकीय भोज भारत की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का सटीक उदाहरण है। जिस समय FTA जैसे समझौतों में आर्थिक लाभ-हानि की गणनाएं चल रही थीं, उसी समय भारत ने यह भी दिखाया कि वह केवल बाज़ार नहीं, बल्कि सभ्यता भी है।

हिमालयी व्यंजनों की यह थाली यूरोपीय नेताओं के लिए सिर्फ स्वाद का अनुभव नहीं थी, बल्कि एक संकेत भी थी—
कि भारत के विकास मॉडल में प्रकृति, परंपरा और समुदाय हाशिये पर नहीं, केंद्र में हैं।

शायद यही असली आत्मनिर्भरता है—
जब आप दुनिया से संवाद करते हैं, लेकिन अपनी आवाज़ में।
और उस आवाज़ में, हिमालय की ख़ामोशी भी सुनाई देती है।

Monday, January 26, 2026

शव पानी में तैरता है, लेकिन जिंदा डूब जाता है: एक सामाजिक चेतावनी

शव पानी में तैरता है, लेकिन जिंदा डूब जाता है: एक सामाजिक चेतावनी

हम अक्सर समाचारों में पढ़ते हैं कि कोई व्यक्ति नदी, तालाब या पोखर में डूब गया, और कुछ दिनों बाद शव पानी में तैरता हुआ मिला। विज्ञान की दृष्टि से इसका सरल कारण है: जिंदा व्यक्ति का शरीर पानी से भारी होता है और डूब सकता है, जबकि मृत्यु के बाद शरीर में गैस बन जाती है और उसका घनत्व कम हो जाता है, इसलिए वह पानी में ऊपर तैरता है।

लेकिन इस साधारण भौतिक प्रक्रिया के पीछे छिपा है गंभीर संदेश—हमारी सुरक्षा, सतर्कता और समाज की जिम्मेदारी।

1. जीवन की अनमोलता और सुरक्षा

जिन लोगों को तैरना नहीं आता या जो पानी के किनारे अनजाने में समय बिताते हैं, उनका जोखिम सबसे अधिक होता है। जीवन का संरक्षण केवल व्यक्तिगत सावधानी नहीं है, बल्कि समाज और राज्य की जिम्मेदारी भी है। हर जलाशय, नदी और पोखर के पास सुरक्षा संकेत, बचाव उपकरण और निगरानी होना चाहिए।

2. सामाजिक चेतना और शिक्षा

स्कूलों और कॉलेजों में जल सुरक्षा का पाठ्यक्रम अनिवार्य होना चाहिए।

माता-पिता और समाज को बच्चों और युवाओं को तैराकी और पानी में सुरक्षा के नियम सिखाने चाहिए।

केवल डराने से काम नहीं चलेगा; विज्ञान और समझ को जीवन का हिस्सा बनाना होगा।


3. विज्ञान और मानव जिम्मेदारी

शव के तैरने और जिंदा डूबने की घटना हमें याद दिलाती है कि जीवन असुरक्षित है, पर ज्ञान और तैयारी सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

चेतना और तैयारी ही है जो जिंदगियों को बचा सकती है।

यह सिर्फ एक वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है: सावधानी, सुरक्षा और जिम्मेदारी अपनाएँ।


निष्कर्ष

जैसे शव पानी में तैरता है क्योंकि उसका घनत्व कम हो गया है, वैसे ही समाज में सुरक्षा और जागरूकता का अभाव जीवन को डुबो सकता है। हमें चाहिए कि हम व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी से काम करें, ताकि कोई अनजानी त्रासदी जीवन को निगल न पाए।

मनुष्य के दिमाग में दौड़ते दो घोड़े

मनुष्य के दिमाग में दौड़ते दो घोड़े

मनुष्य का मस्तिष्क एक रणभूमि है, जहाँ हर क्षण दो घोड़े दौड़ते रहते हैं—
एक सकारात्मक सोच का, दूसरा नकारात्मक सोच का।
जीत उसी की होती है जिसे हम अधिक खुराक देते हैं।

यह खुराक कोई भोजन नहीं, बल्कि हमारे विचार, शब्द, आदतें और दृष्टिकोण हैं।
हम दिन भर क्या सोचते हैं, किस बात पर ध्यान देते हैं, किस तरह की भाषा बोलते हैं—यही तय करता है कि कौन-सा घोड़ा ताकतवर बनेगा।

नकारात्मक घोड़ा डर से पलता है।
वह असफलताओं की यादों, अपमान के अनुभवों, “लोग क्या कहेंगे” की चिंता और “मुझसे नहीं होगा” जैसी सोच से मजबूत होता है।
यह घोड़ा तेज़ दिखता है, पर अंततः मनुष्य को थका देता है।

दूसरी ओर, सकारात्मक घोड़ा विश्वास से जीवित रहता है।
वह आशा, धैर्य, आत्मसम्मान, सीखने की इच्छा और समाधान खोजने की आदत से ऊर्जा पाता है।
यह घोड़ा धीरे चलता है, पर मंज़िल तक पहुँचाता है।

आधुनिक न्यूरोसाइंस भी यही कहता है कि जिस विचार को हम बार-बार दोहराते हैं, मस्तिष्क उसी के लिए रास्ता बना लेता है।
यानी हमारा दिमाग वही बन जाता है, जिसे हम रोज़ अभ्यास कराते हैं।

यहीं से जीवन की दिशा तय होती है—
सोच बदलेगी तो भावना बदलेगी,
भावना बदलेगी तो कर्म बदलेगा,
और कर्म बदलेगा तो परिणाम अपने-आप बदल जाएंगे।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि हमारे मन में नकारात्मक विचार आते हैं या नहीं—वे तो आते ही हैं।
असल प्रश्न यह है कि हम उन्हें खुराक देते हैं या नहीं।

हर सुबह, हर निर्णय, हर प्रतिक्रिया में हम अपने घोड़े को चुनते हैं।
जो समाज, परिवार और व्यक्ति सकारात्मक घोड़े को पालते हैं, वही कठिन समय में भी खड़े रहते हैं।

अंततः जीवन की दौड़ में जीत उसी की होती है
जो अपने दिमाग में सही घोड़े को रोज़ खिला रहा होता है।

रिश्तों का बदलता व्याकरण

संपादकीय | रिश्तों का बदलता व्याकरण

“भावुक लोग संबंध को संभालते हैं, प्रैक्टिकल लोग संबंध का फायदा उठाते हैं, और प्रोफेशनल लोग फायदा देखकर संबंध बनाते हैं।”
यह पंक्ति केवल एक विचार नहीं, बल्कि आज के सामाजिक चरित्र का आईना है।

एक समय था जब रिश्ते भरोसे, त्याग और संवेदना की बुनियाद पर खड़े होते थे। संबंध निभाना जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती थी। आज वही रिश्ते लाभ–हानि के गणित में उलझते दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं कि समय बदला है, सवाल यह है कि क्या इंसान भी अपने मूल से दूर होता जा रहा है?

भावुक लोग आज भी समाज की रीढ़ हैं। वे रिश्तों को इसलिए निभाते हैं क्योंकि उनके लिए संबंध स्वयं में एक मूल्य है। वे टूटते रिश्तों को जोड़ने की कोशिश करते हैं, भले ही इसकी कीमत उन्हें अकेले चुकानी पड़े। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे लोग अक्सर ‘कमज़ोर’ समझ लिए जाते हैं, जबकि असल में वही सबसे मजबूत होते हैं।

प्रैक्टिकल लोग यथार्थ की बात करते हैं। उनका तर्क है कि जीवन केवल भावनाओं से नहीं चलता। लेकिन जब व्यावहारिकता अवसरवाद में बदल जाती है, तब संबंध एक साधन मात्र रह जाते हैं। ज़रूरत तक रिश्ता, सुविधा तक साथ—यही सोच सामाजिक खोखलेपन को जन्म देती है।

सबसे अधिक चिंता का विषय हैं प्रोफेशनल रिश्ते—जहाँ इंसान नहीं, फायदा केंद्र में होता है। यहाँ मुस्कान भी रणनीति होती है और संवाद भी निवेश। जब लाभ समाप्त, तो संबंध समाप्त। यही प्रवृत्ति राजनीति, मीडिया, कॉरपोरेट और यहाँ तक कि सामाजिक संगठनों तक में स्पष्ट दिखती है।

समस्या भावुक, प्रैक्टिकल या प्रोफेशनल होने में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब भावनाओं का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया जाता है। एक स्वस्थ समाज के लिए ज़रूरी है कि व्यावहारिकता में मानवीय संवेदना बनी रहे और पेशेवर अनुशासन में नैतिकता जीवित रहे।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने रिश्तों से यह पूछें—
क्या यह संबंध सिर्फ लाभ के लिए है, या विश्वास के लिए भी?
क्योंकि जो समाज रिश्तों को केवल फायदे से तौलता है, वह अंततः इंसान को भी एक वस्तु बना देता है।

रिश्ते अगर बोझ लगने लगें, तो समझिए हमने भावनाओं को नहीं, इंसानियत को खो दिया है।

“रोज़ नए-नए मार्गों की खोज करना ही जीवन है”—यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।

“रोज़ नए-नए मार्गों की खोज करना ही जीवन है”—
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।

जीवन ठहराव में नहीं, जिज्ञासा में सांस लेता है। जो हर दिन वही रास्ता चलता है, वह सुरक्षित तो रहता है, पर विकसित नहीं होता। नए मार्ग केवल भौगोलिक नहीं होते—वे विचारों के होते हैं, संवेदनाओं के होते हैं, साहस और आत्ममंथन के होते हैं।

नए मार्ग चुनने का अर्थ है प्रश्न करना, जोखिम उठाना और असफलताओं से सीखना। यही प्रक्रिया मनुष्य को साधारण से असाधारण बनाती है। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने प्रचलित रास्तों से हटकर सोचा, वही परिवर्तन के वाहक बने।

जीवन वास्तव में एक सतत यात्रा है—जहाँ मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण होता है रास्ता, और हर नया रास्ता हमें स्वयं से थोड़ा और परिचित कराता है। इसलिए जीवन को जीना है, तो खोजते रहिए—क्योंकि खोज ही जीवन की सबसे सच्ची पहचान है।

जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है



✍️ विशेष संपादकीय

जब खेल संवाद बने और संवेदना कर्म, तब गणतंत्र जीवंत होता है

77वें गणतंत्र दिवस पर कोटद्वार के राजकीय स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित क्रिकेट सद्भावना मैत्री मैच केवल एक खेल आयोजन नहीं था, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक चेतना का सार्वजनिक प्रकटीकरण था, जिसकी नींव हमारे संविधान में निहित है। प्रेस क्लब कोटद्वार द्वारा अपने पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में आयोजित यह आयोजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक साझा मंच पर लाने का सार्थक प्रयास रहा।

आज के समय में जब संवाद की जगह अक्सर शोर और टकराव ले लेते हैं, तब वकील, पुलिस, मीडिया और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का एक मैदान पर उतरना अपने आप में एक संदेश था—कि असहमति के बावजूद सहअस्तित्व संभव है। खेल के दौरान दिखी प्रतिस्पर्धा मर्यादित रही और यही इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

ट्रॉफी भले ही बार एसोसिएशन कोटद्वार के हिस्से आई हो, पर वास्तविक जीत उस सौहार्द की रही, जो हर मैच के साथ मजबूत होता गया। ऐसे आयोजन हमें यह भी याद दिलाते हैं कि गणतंत्र केवल अधिकारों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों का संकल्प भी है।

इस पूरे आयोजन को अर्थवत्ता तब मिली, जब खेल के बाद गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रेस क्लब कोटद्वार की ओर से कुष्ठ आश्रम में सेवा का कार्य किया गया। प्रेस क्लब के सचिव दिनेश एवं कार्यकारिणी सदस्यों द्वारा आश्रम में भोजन वितरण कर यह संदेश दिया गया कि लोकतंत्र की असली परीक्षा मैदान या मंच पर नहीं, बल्कि समाज के सबसे उपेक्षित व्यक्ति तक हमारी संवेदना पहुंचने में होती है।

स्वर्गीय सुधीन्द्र नेगी जी की स्मृति में खेला गया यह आयोजन और उसके साथ जुड़ा यह सेवा कार्य, दोनों मिलकर यही कहते हैं कि स्मरण तब सार्थक होता है, जब वह कर्म में ढलता है। गणतंत्र दिवस ऐसे ही प्रयासों से जीवंत बनता है—जहां खेल संवाद बने और संवेदना सामाजिक कर्तव्य।

— दिनेश गुसाईं
(वरिष्ठ पत्रकार )



Saturday, January 24, 2026

मानव शरीर: चलता-फिरता वर्कशॉप



📰 मानव शरीर: चलता-फिरता वर्कशॉप

उपशीर्षक:

कोशिकाओं से अंगों तक, शरीर की अद्भुत रिपेयरिंग मशीन


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🔹 शरीर की सबसे छोटी वर्कशॉप: कोशिकाएं

हर कोशिका में अपने आप को ठीक करने की क्षमता होती है। DNA रिपेयर, प्रोटीन का पुनर्निर्माण, और नष्ट कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाओं का निर्माण—यह सब निरंतर होता रहता है।

इन्फोग्राफिक आइडिया: कोशिका + DNA repair enzymes + नई कोशिकाओं का चित्र


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🔹 अंग और ऊतक स्तर की मरम्मत

हड्डियां: टूटी हड्डी नई हड्डियों से जुड़ती है।

त्वचा: कट या घाव स्वतः भर जाता है।

जिगर: अपनी क्षतिग्रस्त हिस्सों को तेजी से पुनर्निर्मित करता है।

हृदय: मरम्मत धीमी लेकिन लगातार होती रहती है।


इन्फोग्राफिक आइडिया: बाहरी घाव और हड्डी रिपेयर की प्रक्रिया का क्रमबद्ध चित्र


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🔹 प्रतिरक्षा प्रणाली: हमारी सुरक्षा तंत्र

घाव या संक्रमण होने पर सफेद रक्त कोशिकाएं तुरंत सक्रिय होती हैं। सूजन, दर्द और ऊतक निर्माण — ये शरीर की मरम्मत प्रक्रिया के संकेत हैं।

इन्फोग्राफिक आइडिया: घाव पर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दिखाता एनिमेशन या चरणबद्ध चित्र


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🔹 शरीर = 24×7 ऑटो-रिपेयर मशीन

शरीर की यह वर्कशॉप लगातार चलती रहती है।

इनपुट: पोषण, पानी, ऑक्सीजन, नींद

प्रोसेसिंग: कोशिकाएं, हार्मोन, प्रतिरक्षा प्रणाली

आउटपुट: ऊर्जा, मरम्मत, रोग प्रतिरोध

वेस्ट मैनेजमेंट: किडनी, पसीना, श्वसन


इन्फोग्राफिक आइडिया: शरीर को कारखाना/वर्कशॉप की तरह दिखाना, इनपुट → प्रोसेस → आउटपुट → वेस्ट


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🔹 निष्कर्ष

मानव शरीर एक अद्भुत वर्कशॉप है, जो खुद को लगातार मरम्मत और बनाए रखती है। हमारी जिम्मेदारी है कि इसे सही पोषण, पर्याप्त नींद और मानसिक संतुलन देकर लंबे समय तक स्वस्थ रखा जाए।

 क्योंकि जब शरीर स्वस्थ रहेगा, तभी हम जीवन की चुनौतियों का सामना पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ कर पाएंगे।


हम सभी ऊर्जा हैं : कंपन करता हुआ मानव अस्तित्व

हम सभी ऊर्जा हैं : कंपन करता हुआ मानव अस्तित्व

— एक वैचारिक संपादकीय

आधुनिक विज्ञान, दर्शन और आध्यात्म—तीनों आज एक ऐसे बिंदु पर आकर मिलते दिखाई देते हैं, जहाँ मानव को केवल मांस-हड्डियों का ढांचा नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक सक्रिय स्रोत माना जा रहा है। यह विचार कि “हम सभी ऊर्जा हैं, जो अलग-अलग आवृत्तियों में कंपन कर रही हैं” अब केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समझ का भी हिस्सा बनता जा रहा है।

विज्ञान स्पष्ट करता है कि इस ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है। परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक—सब कुछ गति और कंपन में है। जिसे हम ठोस वस्तु समझते हैं, वह भी सूक्ष्म स्तर पर ऊर्जा तरंगों का ही रूप है। ऐसे में मनुष्य, जो इसी ब्रह्मांड का हिस्सा है, उससे अलग कैसे हो सकता है?

मानव शरीर स्वयं एक जीवित ऊर्जा प्रणाली है। मस्तिष्क की तरंगें, हृदय की विद्युत गतिविधि, तंत्रिका तंत्र में दौड़ते संकेत—ये सभी इस बात का प्रमाण हैं कि हमारा अस्तित्व ऊर्जा के निरंतर प्रवाह पर आधारित है। दिलचस्प तथ्य यह है कि हमारी भावनाएँ और विचार इन ऊर्जा तरंगों को प्रभावित करते हैं। तनाव शरीर को असंतुलित करता है, जबकि शांति और सकारात्मकता ऊर्जा को लयबद्ध बनाती है।

यही कारण है कि कुछ लोगों की उपस्थिति हमें सुकून देती है, तो कुछ स्थानों या परिस्थितियों में बेचैनी महसूस होती है। आम भाषा में जिसे हम “वाइब्स” कहते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा के कंपन का ही अनुभव है। यह अनुभव न तो अंधविश्वास है और न ही कोरी कल्पना—बल्कि चेतना की सूक्ष्म समझ है।

भारतीय दर्शन तो सदियों पहले ही कह चुका है—
“अहं ब्रह्मास्मि”
अर्थात मैं वही ब्रह्म हूँ, वही ऊर्जा, वही चेतना। उपनिषदों और योग दर्शन में चेतना को कंपनशील ऊर्जा माना गया है, जिसे साधना, ध्यान और संयम के माध्यम से ऊँचे स्तर तक ले जाया जा सकता है।

आज के समय में, जब समाज तनाव, हिंसा और असंतुलन से जूझ रहा है, यह समझ और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि हम यह स्वीकार कर लें कि हमारे विचार और भावनाएँ केवल निजी नहीं, बल्कि सामूहिक ऊर्जा को प्रभावित करती हैं, तो शायद हम अधिक जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील मनुष्य बन सकें।

विकास का अर्थ केवल भौतिक प्रगति नहीं है। वास्तविक विकास है—
अपनी आंतरिक आवृत्ति को ऊँचा उठाना।
नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर,
डर से समझ की ओर,
और द्वेष से करुणा की ओर।

अंततः, मनुष्य कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती ऊर्जा है। सवाल सिर्फ इतना है—
हम किस आवृत्ति पर कंपन कर रहे हैं?

यही प्रश्न हमारे वर्तमान को भी परिभाषित करता है और भविष्य को भी।

Tuesday, January 20, 2026

लोकतंत्र की आत्मा इसी समझ पर टिकी होती है कि जनता कौन है और जनता के सेवक कौन।

लोकतंत्र की आत्मा इसी समझ पर टिकी होती है कि जनता कौन है और जनता के सेवक कौन। 


1️⃣ Civil (जनता / नागरिक) कौन होते हैं?

Civil शब्द का अर्थ है — देश के सामान्य नागरिक
यानि वे लोग जो किसी सरकारी पद पर नहीं हैं, लेकिन संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त हैं।

जनता (Civil) के अधिकार

भारतीय संविधान के भाग–3 (Fundamental Rights) के अंतर्गत नागरिकों को ये अधिकार मिले हैं:

🔹 (क) मौलिक अधिकार

  • जीवन और सम्मान का अधिकार (अनुच्छेद 21)
  • समानता का अधिकार (कानून के सामने सब बराबर)
  • विचार, अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता
  • धर्म मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता
  • शांतिपूर्ण विरोध और आंदोलन का अधिकार
  • सूचना पाने का अधिकार (RTI)
  • न्याय पाने का अधिकार (कोर्ट जाने का अधिकार)

🔹 (ख) लोकतांत्रिक अधिकार

  • वोट देने का अधिकार
  • सरकार से सवाल पूछने का अधिकार
  • जनहित याचिका (PIL) का अधिकार

📌 जनता (Civil) के दायित्व

संविधान का भाग–4A (Fundamental Duties) नागरिकों को ये कर्तव्य सौंपता है:

  • संविधान और कानून का सम्मान
  • राष्ट्रीय ध्वज और प्रतीकों का आदर
  • सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा
  • सामाजिक सौहार्द बनाए रखना
  • पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा
  • कर (Tax) देना
  • हिंसा से दूर रहना

लोकतंत्र में अधिकार तभी सुरक्षित रहते हैं, जब नागरिक अपने दायित्व निभाते हैं।


2️⃣ Civil Servants (जनसेवक / सरकारी कर्मचारी) कौन होते हैं?

Civil Servants वे लोग हैं जिन्हें जनता के टैक्स से वेतन मिलता है और जिनका काम जनता की सेवा करना है।

उदाहरण:

  • IAS, IPS, IFS
  • राज्य प्रशासनिक सेवा
  • पुलिस, तहसील, सचिवालय
  • शिक्षक, डॉक्टर (सरकारी)
  • नगर निगम, पंचायत कर्मचारी

Civil Servants के अधिकार

  • वेतन और भत्ते
  • सेवा सुरक्षा (बिना कारण हटाया नहीं जा सकता)
  • पदोन्नति का अधिकार
  • सुरक्षित कार्य वातावरण
  • न्याय पाने का अधिकार (Tribunal / कोर्ट)

📌 Civil Servants के दायित्व

यहीं असली जवाबदेही होती है:

  • जनता की सेवा करना
  • संविधान के अनुसार कार्य करना
  • निष्पक्ष और ईमानदार रहना
  • कानून का पालन कराना, न कि उसका दुरुपयोग
  • राजनीतिक पक्षपात से दूर रहना
  • नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार
  • सूचना छिपाना नहीं (RTI का पालन)

⚖️ Civil servant मालिक नहीं, सेवक होता है।


3️⃣ जनता बनाम जनसेवक – स्पष्ट अंतर

विषय जनता (Civil) जनसेवक (Civil Servant)
सत्ता का स्रोत संविधान जनता
भूमिका मालिक / संप्रभु सेवक
वेतन देता कौन जनता (टैक्स से)
जवाबदेह कानून के प्रति जनता + कानून के प्रति
शक्ति लोकतांत्रिक प्रशासनिक

4️⃣ अगर जनसेवक दायित्व न निभाए तो?

जनता के पास ये अधिकार हैं:

  • शिकायत (CM Portal, DM, विभाग)
  • RTI डालना
  • कोर्ट / हाईकोर्ट / सुप्रीम कोर्ट जाना
  • मीडिया और जनप्रतिनिधि के माध्यम से आवाज उठाना
  • शांतिपूर्ण आंदोलन

🔴 निष्कर्ष (सबसे ज़रूरी बात)

लोकतंत्र में जनता शासक होती है और सिविल सर्वेंट सेवक।
यदि सेवक खुद को मालिक समझने लगे, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।

Saturday, January 17, 2026

उत्तराखंड: पहाड़, पानी और अधिकार — सरकार नहीं, जनता मालिक

संपादकीय

उत्तराखंड: पहाड़, पानी और अधिकार — सरकार नहीं, जनता मालिक

उत्तराखंड की पहचान उसकी नदियाँ, जंगल और पहाड़ हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं पर सबसे पहले स्थानीय लोगों के अधिकार सिमटते दिखाई देते हैं। जबकि संवैधानिक सच्चाई यह है कि सत्ता का स्रोत जनता है, और सरकार केवल ट्रस्टी—मालिक नहीं। यह सिद्धांत भारतीय संविधान की आत्मा है।

ज़मीन: विकास या विस्थापन?

पहाड़ों में ज़मीन केवल संपत्ति नहीं, जीवन-आधार है। सड़क, बांध, सुरंग, या टाउनशिप—हर परियोजना “जनहित” के नाम पर आती है, पर अनुच्छेद 300A याद दिलाता है कि संपत्ति कानून के बिना नहीं ली जा सकती। सवाल यह है कि क्या उचित मुआवज़ा, स्थानीय सहमति और पर्यावरणीय न्याय वास्तव में सुनिश्चित हो रहे हैं? जब निर्णय दूर बैठे दफ्तरों में होते हैं और बोझ पहाड़ उठाते हैं, तब विकास का नैतिक आधार कमजोर पड़ता है।

जंगल: संरक्षण के नाम पर बेदखली

उत्तराखंड के जंगल सदियों से वन-समुदायों की देखरेख में रहे हैं। आज “संरक्षण” की भाषा में परंपरागत अधिकार हाशिये पर हैं। जबकि वन अधिकार कानून, 2006 स्पष्ट करता है कि जंगलों पर पहला दावा स्थानीय समुदायों का है और ग्राम सभा सर्वोच्च। यदि संरक्षण का अर्थ लोगों को बाहर करना है, तो यह संरक्षण नहीं—विच्छेदन है।

पानी: नौले, धाराएँ और निजीकरण का खतरा

यहाँ की सभ्यता नौलों और धाराओं पर टिकी है। फिर भी जलस्रोत सूख रहे हैं, नदियाँ सुरंगों में कैद हैं, और पानी धीरे-धीरे व्यापार बनता जा रहा है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पानी जीवन का हिस्सा है। पहाड़ों में जल प्रबंधन का अधिकार स्थानीय निकायों और समुदायों के बिना संभव नहीं—केंद्रीकरण यहाँ समाधान नहीं, समस्या है।

केंद्र–राज्य नहीं, जनता केंद्र में

चाहे संघ सरकार, केंद्र सरकार या भारत सरकार—नाम कुछ भी हो, सीमा एक है: संविधान। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में नीति बनाते समय स्थानीय सहमति, पारिस्थितिकी और आजीविका को केंद्र में रखना होगा। पहाड़ों को केवल “प्रोजेक्ट साइट” समझना भविष्य के लिए जोखिम है।
 अंत में जो निष्कर्ष रहता है कि उत्तराखंड में संघर्ष सरकार बनाम राज्य का नहीं, नीति बनाम नागरिक का है। ज़मीन आपकी है, जंगल समुदाय के हैं, पानी सबका है। सरकार का कर्तव्य है—ट्रस्टशिप, पारदर्शिता और न्याय। और नागरिकों का अधिकार—सवाल पूछना, सहमति देना या न देना।
यही पहाड़ों का रास्ता है—विकास के साथ अधिकार। यही उत्तराखंड की आत्मा है।

सरकार, संसाधन और नागरिक: मालिक कौन?

संपादकीय

सरकार, संसाधन और नागरिक: मालिक कौन?

भारत में अक्सर यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जाता है कि सरकार ही सर्वोच्च है—कि ज़मीन, जंगल और पानी पर अंतिम अधिकार सत्ता का है। जबकि संवैधानिक सच्चाई इससे ठीक उलट है। भारत का संविधान—भारतीय संविधान—स्पष्ट करता है कि सत्ता का स्रोत नागरिक हैं, सरकार केवल उनके नाम पर प्रबंधन (ट्रस्टशिप) करती है।

संघ सरकार (Union Government) संविधान से बंधी है; केंद्र सरकार (Central Government) प्रशासन चलाने का माध्यम है; और भारत सरकार (Government of India) देश की कानूनी पहचान। नाम अलग हो सकते हैं, पर तीनों की सीमा वही है—नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। सरकार मालिक नहीं, सेवक है।

आज सबसे बड़ा टकराव प्राकृतिक संसाधनों पर दिखता है। ज़मीन को अधिग्रहण के नाम पर छीना जाता है, जंगलों को “संरक्षण” की आड़ में समुदायों से दूर किया जाता है, और पानी को व्यापार बना दिया जाता है। जबकि संविधान की भावना कहती है—संपत्ति कानून के बिना नहीं ली जा सकती, जीवन का अधिकार स्वच्छ पर्यावरण और पानी तक पहुँच की गारंटी देता है, और जंगल समुदायों के साझा अधिकार हैं, न कि महज़ फाइलों में दर्ज परिसंपत्तियाँ।

अनुच्छेद 300A नागरिक की संपत्ति की ढाल है—सरकार मनमानी नहीं कर सकती। अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा का अधिकार देता है—जिसमें स्वच्छ हवा-पानी शामिल है। वन अधिकार कानून, 2006 बताता है कि जंगलों पर पहला दावा उन समुदायों का है जो पीढ़ियों से उनकी रक्षा करते आए हैं; यहाँ ग्राम सभा की आवाज़ सर्वोपरि है, न कि किसी दफ्तर की मुहर।

लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान नहीं; सवाल पूछने का अधिकार भी है। सूचना का अधिकार, न्यायालय जाने की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध—ये सब नागरिक को सरकार के ऊपर नहीं, संविधान के भीतर खड़ा करते हैं। जब सरकार नीति बनाते समय लोगों की सहमति और पर्यावरणीय न्याय को दरकिनार करती है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है।

आज ज़रूरत है इस बुनियादी सच को दोहराने की—भारत में सर्वोच्च सत्ता सरकार नहीं, संविधान है; और संविधान में केंद्र में नागरिक है। ज़मीन आपकी है, जंगल समुदाय के हैं, पानी सबका है। सरकार का काम इन्हें बेचना नहीं, संरक्षित करना और न्यायपूर्ण ढंग से प्रबंधित करना है।

यदि यह संतुलन टूटता है, तो विकास नहीं—विस्थापन बढ़ता है; समृद्धि नहीं—असमानता गहराती है। इसलिए समय की मांग है कि शासन ट्रस्टशिप की भावना लौटाए, और नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों को पहचाने, मांगे और बचाए। यही भारत के लोकतंत्र की असली कसौटी है।

Tuesday, January 13, 2026

जो हमें तोड़ नहीं पाता, वही हमें मज़बूत बनाता है

जो हमें तोड़ नहीं पाता, वही हमें मज़बूत बनाता है

जीवन और समाज—दोनों के इतिहास में यह वाक्य केवल एक प्रेरक कथन नहीं, बल्कि अनुभव से निकला हुआ सत्य है कि संघर्ष मनुष्य की असली परीक्षा होते हैं। हर कठिनाई विनाश के लिए नहीं आती; कुछ कठिनाइयाँ मनुष्य को भीतर से गढ़ने आती हैं।

आज का समय अस्थिरता, अविश्वास और त्वरित लाभ की राजनीति का समय है। ऐसे दौर में व्यक्ति, समाज और लोकतांत्रिक संस्थाएँ लगातार दबाव में हैं। पत्रकारिता सवाल पूछने पर कटघरे में खड़ी है, नागरिक अधिकारों को असुविधा कहा जा रहा है और असहमति को देशद्रोह की तरह देखा जाने लगा है। यह दबाव स्वाभाविक रूप से थकाता है—कभी-कभी तोड़ भी देता है। लेकिन जो दबाव तोड़ नहीं पाता, वही भविष्य की मजबूत चेतना का निर्माण करता है।

इतिहास गवाह है कि दमन ने कभी भी विचारों को समाप्त नहीं किया। विचार दबते हैं तो और पैने होते हैं। सामाजिक आंदोलनों, लोकतांत्रिक संघर्षों और स्वतंत्र पत्रकारिता की यात्रा में असफलताएँ आईं, बंदिशें लगीं, लेकिन इन्हीं कठिन दौरों ने नेतृत्व, वैचारिक स्पष्टता और नैतिक साहस को जन्म दिया।

हालाँकि यह भी सच है कि हर पीड़ा अपने आप ताकत में नहीं बदलती। बिना आत्ममंथन के संघर्ष केवल घाव छोड़ता है। सीख, विवेक और धैर्य—यही वह प्रक्रिया है जो दर्द को शक्ति में बदलती है। जो समाज अपनी असफलताओं से सबक नहीं लेता, वह बार-बार उन्हीं गलतियों का शिकार होता है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम कठिन समय को केवल सहें नहीं, बल्कि उसे समझें। सवाल पूछते रहें, सच लिखते रहें और अन्याय के सामने खड़े रहें। क्योंकि इतिहास अंततः उन्हीं का पक्ष लेता है जो टूटते नहीं—बल्कि संघर्ष से और मज़बूत होकर निकलते हैं।

यही इस कथन का सार है—
जो हमें तोड़ नहीं पाता, वही हमें मज़बूत बनाता है।

गलवान के बाद ‘गले मिलना’?



गलवान के बाद ‘गले मिलना’?

CPC–RSS–BJP संवाद: कूटनीति या रणनीतिक मनोवैज्ञानिक युद्ध

जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) का प्रतिनिधिमंडल दिल्ली के केशव कुंज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पहुंचता है और उससे पहले भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करता है, तो यह सामान्य राजनयिक घटना नहीं रह जाती। यह एक साफ़ राजनीतिक संकेत बन जाती है—खासतौर पर उस चीन से, जिसके साथ भारत का भरोसा गलवान घाटी में खून से टूट चुका है।

BJP का यह कहना कि बातचीत ‘खुले तौर पर’ हुई और इससे ‘हालात बेहतर होने’ के संकेत मिले, अपने आप में एक बड़ा दावा है। सवाल यह है कि हालात किस मोर्चे पर बेहतर हुए?
सीमा पर? व्यापार में? या केवल बातचीत की मेज़ पर?

CPC प्रतिनिधिमंडल में भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग की मौजूदगी इस बात को स्पष्ट करती है कि यह दौरा न तो अकादमिक था, न ही प्रतीकात्मक। वहीं RSS के जनरल सेक्रेटरी दत्तात्रेय होसबोले से सीधी मुलाकात यह दिखाती है कि चीन अब केवल भारत सरकार से नहीं, बल्कि भारत की वैचारिक रीढ़ से संवाद करना चाहता है।

चीन किससे बात कर रहा है—सरकार से या राष्ट्रवाद से?

यह पहली बार नहीं है जब चीन ने किसी देश में सत्ता के साथ-साथ वैचारिक केंद्रों को साधने की कोशिश की हो। CPC अच्छी तरह जानती है कि भारत में RSS केवल एक संगठन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रवादी सोच का केंद्र है, जिसकी छाया सरकार, नीतियों और जनमत—तीनों पर पड़ती है।

ऐसे में यह सवाल अनिवार्य हो जाता है:

क्या चीन भारत के भीतर वैचारिक पढ़त (Ideological Mapping) कर रहा है?

क्या यह संवाद सीमा विवाद के समाधान से पहले मनोवैज्ञानिक भरोसा बनाने की कोशिश है?

या फिर यह वही पुरानी रणनीति है—बातचीत के नाम पर समय खरीदना?


गलवान की छाया संवाद की मेज़ पर

भारत यह नहीं भूल सकता कि बातचीत और समझौतों के दौर में ही चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर यथास्थिति बदली।
इतिहास बताता है कि चीन की कूटनीति में मुस्कान और सैन्य चाल साथ-साथ चलती हैं।

इसलिए CPC–RSS–BJP संवाद को ‘सकारात्मक संकेत’ कहना जितना आसान है, उतना ही ख़तरनाक भी—अगर यह मान लिया जाए कि संवाद अपने आप में समाधान है।

भारत के लिए लाल रेखाएं

भारत संवाद करे—यह ज़रूरी है।
लेकिन संवाद की शर्तें स्पष्ट हों:

सीमा पर यथास्थिति से कोई समझौता नहीं

राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ नहीं

और वैचारिक सम्मान को रणनीतिक भ्रम न समझा जाए


निष्कर्ष: सावधानी ही असली राष्ट्रहित

CPC का RSS और BJP—दोनों से एक ही दौरे में मिलना बताता है कि चीन भारत को अब केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चुनौती और संभावना—दोनों के रूप में देख रहा है।

भारत के लिए यह संवाद परीक्षा है—
परिपक्वता की नहीं, सजगता की।
क्योंकि इतिहास गवाह है:
चीन से दोस्ती के वादे आसान होते हैं, लेकिन उनकी कीमत अक्सर सीमाओं पर चुकानी पड़ती है।



Monday, January 12, 2026

Uttarakhand has a dirty politics — why many people feel this way

Uttarakhand has a dirty politics — why many people feel this way

Many citizens describe Uttarakhand’s politics as “dirty” not out of cynicism, but from lived experience. The frustration usually comes from a pattern, not a single event.

1) Power over people
Decisions often appear driven by political survival rather than public interest. Whether it’s land use, mining, or big infrastructure in fragile zones, voices of local communities feel sidelined.

2) Corruption without consequences
Allegations surface, inquiries are announced, but accountability rarely follows through. When investigations drag on or quietly fade, public trust erodes.

3) Identity politics replacing governance
Instead of serious debates on employment, education, healthcare, migration, or disaster preparedness, politics slips into symbolism and polarisation—useful for elections, harmful for solutions.

4) Weak local self-government
Panchayats and municipalities are often underpowered. Real authority stays concentrated, making grassroots democracy more decorative than decisive.

5) Exploitation of a sensitive state
Uttarakhand’s ecology and demography make it unique. Yet policy frequently treats it like any other state—ignoring mountains, disasters, and migration realities—until tragedy strikes.

The result:
People don’t just feel angry; they feel unheard. When politics stops being a tool for service and becomes a marketplace of deals, it earns the label “dirty.”

But there’s a counter-truth:
Uttarakhand also has a strong tradition of people’s movements, environmental consciousness, and vocal civil society. The problem isn’t the people—it’s the political culture.

उत्तराखंड की राजनीति क्यों “गंदी” कही जा रही है

उत्तराखंड की राजनीति क्यों “गंदी” कही जा रही है

उत्तराखंड की राजनीति को लेकर आम लोगों में जो नाराज़गी है, वह किसी एक घटना से नहीं, बल्कि लगातार बनते गए अनुभवों से पैदा हुई है।

1) सत्ता, सेवा पर भारी
नीतियाँ अक्सर जनता के हित से ज़्यादा सत्ता की मजबूती के लिए बनती दिखती हैं। खनन, ज़मीन, बड़े प्रोजेक्ट और पहाड़ों की संवेदनशीलता—इन सबमें स्थानीय लोगों की आवाज़ पीछे छूट जाती है।

2) भ्रष्टाचार, पर जवाबदेही नहीं
घोटालों के आरोप लगते हैं, जांच बैठती है, लेकिन नतीजा बहुत कम निकलता है। जब दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो व्यवस्था पर भरोसा टूटता है।

3) असली मुद्दों से ध्यान भटकाना
रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की जगह पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति हावी हो जाती है।

4) स्थानीय सरकारें सिर्फ नाम की
पंचायत और नगर निकायों के पास अधिकार कम हैं। असली ताक़त ऊपर केंद्रित रहती है, जिससे जमीनी लोकतंत्र कमजोर पड़ता है।

5) पहाड़ का सिर्फ़ चुनावी इस्तेमाल
उत्तराखंड की भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौतियाँ अलग हैं, लेकिन नीतियाँ मैदानी राज्यों की नकल पर बनती हैं—जब तक कोई आपदा न आ जाए।

नतीजा क्या है?
लोग नाराज़ ही नहीं, खुद को अनसुना महसूस करते हैं। जब राजनीति सेवा की बजाय सौदेबाज़ी बन जाए, तो उसे “गंदी” कहा जाना स्वाभाविक है।

फिर भी एक उम्मीद है
उत्तराखंड की जनता ने हमेशा सवाल पूछे हैं—चिपको से लेकर जन आंदोलनों तक। समस्या जनता नहीं, राजनीतिक संस्कृति है।


अद्वैत वेदांत: जब ‘मैं’ और ‘तुम’ मिट जाते हैं

अद्वैत वेदांत: जब ‘मैं’ और ‘तुम’ मिट जाते हैं

आज का मनुष्य सबसे अधिक जिस चीज़ से जूझ रहा है, वह है—विभाजन। मैं और तुम, अपना और पराया, धर्म और अधर्म, जीत और हार। इसी टूटन के दौर में अद्वैत वेदांत एक ऐसा दर्शन है, जो टकराव नहीं, एकता की बात करता है—बिना शोर, बिना दावा।

अद्वैत का सीधा अर्थ है—दो नहीं, एक। यह दर्शन कहता है कि इस पूरे अस्तित्व का मूल सत्य एक है, जिसे ब्रह्म कहा गया। वही चेतना हर जीव में, हर कण में विद्यमान है। भेद दिखाई देता है, लेकिन वह वास्तविक नहीं—वह हमारी सीमित समझ का परिणाम है। इस विचार को सुस्पष्ट रूप देने वाले आचार्य थे आदि शंकराचार्य।

अद्वैत वेदांत की सबसे क्रांतिकारी बात यह है कि वह ईश्वर को आकाश के पार नहीं, मनुष्य के भीतर खोजता है। “अहं ब्रह्मास्मि” का अर्थ कोई अहंकार नहीं, बल्कि यह बोध है कि मैं केवल शरीर नहीं, बल्कि वही चेतना हूँ जो सबमें समान रूप से प्रवाहित है। जब यह समझ आती है, तो ऊँच–नीच, जाति–धर्म, अमीर–गरीब जैसे भेद अपने आप अर्थहीन हो जाते हैं।

यह दर्शन संसार को झूठा नहीं कहता, बल्कि अस्थायी बताता है। जैसे सपना सच लगता है, लेकिन जागने पर उसका सत्य बदल जाता है। अद्वैत कहता है कि हम जिस दुनिया को अंतिम मानकर लड़ रहे हैं, वह बदलने वाली है; स्थायी केवल चेतना है। इसलिए यह दर्शन पलायन नहीं सिखाता, बल्कि आसक्ति से मुक्ति सिखाता है—कर्म करो, लेकिन बँधो मत।

आज के समय में अद्वैत की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। जब धर्म पहचान बनकर टकराव का कारण बनता है, तब अद्वैत याद दिलाता है कि यदि सब एक ही चेतना के रूप हैं, तो हिंसा, घृणा और घमंड का कोई नैतिक आधार नहीं बचता। यह दर्शन हमें नैतिक उपदेश नहीं देता, बल्कि ऐसी समझ देता है जिससे करुणा स्वाभाविक हो जाती है।

निष्कर्षतः, अद्वैत वेदांत कोई जटिल दर्शन नहीं, बल्कि जीवन को देखने की सरल दृष्टि है—
कि दूसरे में खुद को देखना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।
शायद इसी बोध की आज सबसे अधिक आवश्यकता है—जहाँ बहस नहीं, समझ हो;
और जीत नहीं, एकता हो।

उत्तराखंड की गंदी होती राजनीति और जनता से टूटा भरोसा

संपादकीय | उत्तराखंड की गंदी होती राजनीति और जनता से टूटा भरोसा

उत्तराखंड का जन्म एक स्वप्न के साथ हुआ था—जनभागीदारी, पर्यावरण-संवेदनशील विकास और पहाड़ के अनुरूप शासन का स्वप्न। लेकिन दो दशकों बाद यह सवाल ज़्यादा तीखा हो गया है कि क्या राजनीति इस स्वप्न को ढो रही है, या उसे धीरे-धीरे दफ़ना रही है?

आज उत्तराखंड की राजनीति को “गंदी” कहे जाने के पीछे आक्रोश है—और वह आक्रोश निराधार नहीं। सत्ता के गलियारों में निर्णय अक्सर जनता की ज़रूरतों से नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों से तय होते दिखते हैं। पहाड़ की ज़मीन, जंगल, नदियाँ और संसाधन विकास के नाम पर सौदेबाज़ी का विषय बन गए हैं, जबकि स्थानीय समुदाय सिर्फ़ दर्शक।

भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं रहे। जांच बैठती है, सुर्खियाँ बनती हैं, पर नतीजे अक्सर शून्य रहते हैं। जवाबदेही का यह अभाव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। जब जनता देखती है कि दोष तय नहीं होते, तो व्यवस्था से विश्वास उठना स्वाभाविक है।

इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है असली मुद्दों से जानबूझकर ध्यान भटकाना। रोज़गार का संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली, पहाड़ों से होता पलायन, और बार-बार आने वाली आपदाओं की तैयारी—ये सब पीछे छूट जाते हैं। उनकी जगह प्रतीकात्मक राजनीति और ध्रुवीकरण ले लेता है, जो चुनाव जीत सकता है, लेकिन राज्य नहीं चला सकता।

स्थानीय स्वशासन की स्थिति भी निराशाजनक है। पंचायतें और नगर निकाय लोकतंत्र की रीढ़ होने चाहिए थे, पर अधिकारों की कमी ने उन्हें केवल औपचारिक बना दिया है। जब फैसले ऊपर से थोपे जाते हैं, तो पहाड़ की ज़मीनी समझ गायब हो जाती है।

फिर भी, तस्वीर का एक पक्ष और है। उत्तराखंड की जनता ने हमेशा सवाल पूछे हैं—वनों की रक्षा से लेकर अपने अधिकारों तक। चुप्पी इस समाज की पहचान नहीं रही। समस्या जनता में नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति में है जिसने सत्ता को सेवा से ऊपर रख दिया।

आज ज़रूरत है साफ़ राजनीति की—जहाँ विकास पहाड़ को समझकर हो, जवाबदेही दिखे, और जनता सिर्फ़ वोटर नहीं, भागीदार बने। वरना “गंदी राजनीति” सिर्फ़ एक आरोप नहीं, आने वाले समय की कठोर सच्चाई बन जाएगी।

खाली होते गाँव, चुप होती राजनीति और उत्तराखंड का पलायन

संपादकीय | खाली होते गाँव, चुप होती राजनीति और उत्तराखंड का पलायन

उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी आज कोई एक घोटाला, कोई एक सरकार या कोई एक चुनाव नहीं है—सबसे बड़ा संकट है ग्रामीण पलायन। पहाड़ के गाँव खाली हो रहे हैं, स्कूलों में ताले लग रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और राजनीति… इस सच्चाई पर लगभग मौन है।

गाँव से शहर की यह मजबूरी कोई नई नहीं है, लेकिन चिंता इस बात की है कि यह अब स्थायी पलायन बन चुका है। लोग सिर्फ़ रोज़गार के लिए नहीं जा रहे, वे इसलिए जा रहे हैं क्योंकि गाँव में रहने की बुनियादी शर्तें ही खत्म होती जा रही हैं—स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, संचार और सम्मानजनक आजीविका।

राजनीति को अगर सबसे पहले इस संकट को समझना चाहिए था, तो वही सबसे ज़्यादा उदासीन दिखती है। चुनाव आते हैं, घोषणाएँ होती हैं—“रिवर्स पलायन”, “होम स्टे”, “स्टार्टअप गांव”—लेकिन ज़मीनी हकीकत वही रहती है। योजनाएँ काग़ज़ पर जन्म लेती हैं और वहीं दम तोड़ देती हैं।

सबसे पीड़ादायक सच यह है कि पलायन को अब सामान्य मान लिया गया है। जैसे यह विकास का स्वाभाविक परिणाम हो। लेकिन सवाल यह है—किस विकास का?
जिस विकास में अपने ही गाँव छोड़ना पड़े, वह प्रगति नहीं, विस्थापन है।

खेत छोड़कर गया किसान सिर्फ़ मज़दूर नहीं बनता, वह अपनी संस्कृति, भाषा और आत्मसम्मान का भी बोझ उठाकर जाता है। पीछे रह जाते हैं बुज़ुर्ग, महिलाएँ और वीरान घर—जो कभी जीवंत समाज हुआ करते थे।

स्थानीय स्वशासन इस संकट से लड़ने का सबसे मज़बूत हथियार हो सकता था, लेकिन पंचायतों को अधिकार नहीं दिए गए। फैसले राजधानी और सचिवालयों में होते रहे, जबकि गाँव की ज़रूरतें कभी ठीक से सुनी ही नहीं गईं।

आज ज़रूरत है ईमानदार स्वीकारोक्ति की—
पलायन कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, यह नीतिगत विफलता है।
और जब तक राजनीति इसे स्वीकार नहीं करेगी, तब तक समाधान भी नहीं निकलेगा।

उत्तराखंड की राजनीति को तय करना होगा:
क्या वह खाली होते गाँवों को सिर्फ़ चुनावी आँकड़ा मानती रहेगी,
या गाँव को फिर से रहने लायक बनाने की ज़िम्मेदारी लेगी?

क्योंकि अगर गाँव नहीं बचे,
तो उत्तराखंड सिर्फ़ एक भौगोलिक इकाई रह जाएगा—
पहाड़ नहीं, पहचान नहीं।

यह संपादकीय सिर्फ़ सवाल नहीं पूछता, चेतावनी भी देता है—
पलायन को नज़रअंदाज़ करना, भविष्य को छोड़ देना है।

2027 की ओर बढ़ता उत्तराखंड: गंदी राजनीति बनाम जनता का फैसला

संपादकीय | 2027 की ओर बढ़ता उत्तराखंड: गंदी राजनीति बनाम जनता का फैसला

उत्तराखंड जैसे छोटे, संवेदनशील और संसाधन-सीमित राज्य में राजनीति का चरित्र केवल सत्ता का प्रश्न नहीं होता, वह जनता के भविष्य का प्रश्न होता है। 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही यह सवाल और गहरा हो गया है—क्या उत्तराखंड की राजनीति जनता की समस्याओं से बाहर निकल पाएगी, या वही “गंदी राजनीति” एक बार फिर हावी रहेगी?

पिछले वर्षों में सत्ता का व्यवहार यह संकेत देता रहा है कि चुनावी प्रबंधन, छवि निर्माण और विरोध को दबाना—इन सबको शासन से ज़्यादा महत्व मिला। पहाड़ों में रोज़गार का संकट गहराता गया, पलायन स्थायी समस्या बनता गया, लेकिन राजनीति का विमर्श इन मुद्दों के इर्द-गिर्द टिक नहीं पाया।

2027 के चुनाव से पहले एक बार फिर वही रणनीति साफ दिखती है—भावनात्मक मुद्दे, पहचान की राजनीति और विकास के बड़े-बड़े दावे। ज़मीन पर स्कूलों की हालत, अस्पतालों की कमी, आपदा प्रबंधन की विफलताएँ और बेरोज़गार युवाओं की हताशा इन दावों से मेल नहीं खाती।

भ्रष्टाचार के सवाल भी चुनावी मौसम में दबा दिए जाते हैं। जांच आयोग और रिपोर्टें जनता के सामने जवाब नहीं बन पातीं, बल्कि समय काटने का औज़ार बन जाती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है, क्योंकि जब चुनाव बिना जवाबदेही के हो, तो सत्ता और निरंकुश हो जाती है।

2027 का चुनाव इसलिए निर्णायक है क्योंकि यह सिर्फ़ सरकार बदलने या बनाए रखने का चुनाव नहीं है—यह राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देने का अवसर है। सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा, सवाल यह है कि क्या जनता मुद्दों को एजेंडा बना पाएगी?

अगर रोज़गार, पलायन, पर्यावरण, स्थानीय अधिकार और पारदर्शिता चुनावी बहस के केंद्र में नहीं आए, तो “गंदी राजनीति” और मजबूत होगी। लेकिन अगर मतदाता सवाल पूछने लगे, तो यही चुनाव राजनीति को साफ करने की शुरुआत भी बन सकता है।

उत्तराखंड का इतिहास गवाह है—यह राज्य चुप रहने के लिए नहीं बना। 2027 में जनता के पास मौका है कि वह तय करे:
राजनीति सत्ता के लिए होगी या पहाड़ और जनता के लिए।


Thursday, January 8, 2026

रिश्ते, सवाल और पत्रकारिता का साहस

संपादकीय | रिश्ते, सवाल और पत्रकारिता का साहस

हर रिश्ता निभाने के लिए नहीं होता। कुछ रिश्ते इसलिए आते हैं ताकि हमें जीवन के लिए तैयार किया जा सके। वे हमें आराम नहीं देते, बल्कि असहज करते हैं—हमारे भीतर सवाल खड़े करते हैं, हमारी धारणाओं को तोड़ते हैं और हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। ऐसे रिश्ते अक्सर टूट जाते हैं, लेकिन जाते-जाते हमें वह दृष्टि दे जाते हैं, जिसके बिना आगे बढ़ना संभव नहीं होता।

जीवन में कई बार ऐसा क्षण आता है जब सब कुछ “ठीक” होना ही सबसे बड़ा सवाल बन जाता है। क्योंकि जब सब ठीक दिखता है, तब अक्सर अन्याय, चुप्पी और समझौते भी ठीक मान लिए जाते हैं। सवाल पूछना जोखिम भरा होता है, लेकिन वही जोखिम मनुष्य को जीवित और जागरूक बनाए रखता है।

पत्रकारिता का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है। यह सुविधा का नहीं, साहस का पेशा है। पत्रकारिता सिखाती है कि हर स्वीकार्य सच अंतिम सच नहीं होता। यह सत्ता से प्रश्न करने, भीड़ के विरुद्ध खड़े होने और असहज तथ्यों को सामने रखने का नैतिक बल देती है। यहाँ आगे बढ़ना मतलब लोकप्रिय होना नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार होना है।

जिस तरह कुछ रिश्ते हमें मजबूत बनाकर विदा हो जाते हैं, उसी तरह पत्रकारिता भी हमें आसान रास्ते नहीं देती—वह हमें सच के कठिन रास्ते पर चलना सिखाती है। और शायद इसी में उसका सबसे बड़ा मूल्य छिपा है: आगे बढ़ने का साहस।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...