Sunday, January 19, 2025

क्या प्रेस क्लब के विकास में राजनीति करना जरूरी है ?

प्रेस क्लब के विकास में राजनीति का होना आवश्यक नहीं है, लेकिन इसे पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। प्रेस क्लब एक ऐसा मंच है, जहाँ पत्रकारिता और मीडिया से जुड़े लोग आपसी सहयोग, विकास, और विचार-विमर्श के लिए एकजुट होते हैं। इसका उद्देश्य आमतौर पर पत्रकारिता को सशक्त बनाना और मीडिया की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना होता है।

हालाँकि, प्रेस क्लब के विकास में राजनीति की भूमिका को समझने के लिए कुछ पहलुओं पर विचार किया जा सकता है:

1. संस्थागत समर्थन:

प्रेस क्लब के विकास के लिए किसी हद तक संस्थागत या राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता हो सकती है। सरकार और राजनीतिक दलों का समर्थन मीडिया संस्थाओं के बुनियादी ढांचे, सुविधाओं और पत्रकारों के लिए बेहतर कामकाजी माहौल की दिशा में सहायक हो सकता है। सरकारी योजनाओं के तहत पत्रकारों के लिए प्रशिक्षण, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन योजनाएँ आदि प्रदान की जा सकती हैं।

2. स्वतंत्रता और निष्पक्षता:

प्रेस क्लब का मुख्य उद्देश्य मीडिया की स्वतंत्रता को बनाए रखना है, ताकि पत्रकारिता बिना किसी राजनीतिक दबाव के निष्पक्ष रूप से काम कर सके। अगर प्रेस क्लब में राजनीति हावी हो जाए, तो यह स्वतंत्रता और निष्पक्षता को खतरे में डाल सकता है। राजनीति का प्रभाव पत्रकारों की आवाज को दबा सकता है, जो प्रेस क्लब की मूल भावना के खिलाफ है।

3. स्थानीय विकास योजनाओं के साथ तालमेल:

राजनीति के साथ जुड़ाव होने पर प्रेस क्लब, स्थानीय सरकारों द्वारा लागू की जा रही योजनाओं और विकास कार्यों में हिस्सा ले सकता है। यह पत्रकारों को अपने क्षेत्र में हो रहे महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने और उन पर रिपोर्टिंग करने का अवसर दे सकता है।

4. संघर्ष और असहमति:

राजनीति का अधिक प्रभाव होने पर क्लब के भीतर आंतरिक संघर्ष और असहमति भी उत्पन्न हो सकती है, जिससे संस्थागत विकास प्रभावित हो सकता है। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य क्लब के उद्देश्यों से भटक सकते हैं।

निष्कर्ष:

प्रेस क्लब के विकास में राजनीति का होना जरूरी नहीं है, लेकिन संतुलित और जिम्मेदार राजनीतिक समर्थन, विशेष रूप से सरकारी योजनाओं के मामले में, क्लब के लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार हो सकता है। यह जरूरी है कि क्लब अपने उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से बनाए रखे और राजनीतिक प्रभाव से बचने के लिए एक मजबूत और निष्पक्ष ढांचे को सुनिश्चित करे।


उत्तराखंड में निकाय चुनाव (स्थानीय निकाय चुनाव)

उत्तराखंड में निकाय चुनाव (स्थानीय निकाय चुनाव) राज्य के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों के लिए होते हैं। इन चुनावों में स्थानीय नेताओं और उम्मीदवारों को जनता द्वारा चुना जाता है ताकि वे राज्य और स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों के लिए नीति बनाएं और कार्यान्वयन करें। इन चुनावों का उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करना और राज्य के नागरिकों को स्थानीय शासन में भागीदारी का अवसर देना है।

निकाय चुनाव के प्रमुख पहलू:

1. चुनाव की संरचना:

नगर निगम चुनाव: यह चुनाव राज्य के बड़े शहरों के लिए होते हैं, जैसे देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी आदि। नगर निगमों में मेयर और पार्षदों का चुनाव होता है।

नगर पालिका चुनाव: ये चुनाव छोटे नगर क्षेत्रों के लिए होते हैं, जहां नगर पालिका परिषद के सदस्य चुने जाते हैं।

ग्राम पंचायत चुनाव: यह चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों के लिए होते हैं, जिसमें ग्राम प्रधान, पंचायत सदस्य और क्षेत्र पंचायत सदस्य चुने जाते हैं।



2. निर्वाचन प्रक्रिया:

चुनाव में सीधे चुनाव पद्धति के तहत वोट डाले जाते हैं, जहां उम्मीदवार जनता से अपनी तरफ से समर्थन मांगते हैं। नगर निगम और नगर पालिका चुनावों में मेयर और पार्षदों के लिए चुनाव होते हैं, जबकि पंचायत चुनावों में प्रधान और सदस्य चुने जाते हैं।

चुनाव प्रणाली में सामान्यत: प्रतिनिधि चुनाव होता है, यानी एक व्यक्ति द्वारा चुने गए प्रतिनिधि उस क्षेत्र का नेतृत्व करता है।



3. चुनाव की तारीख और अवधि:

निकाय चुनाव आम तौर पर राज्य सरकार द्वारा निर्धारित समय पर होते हैं। कुछ चुनाव पंचायती राज संस्थाओं के तहत होते हैं, जिन्हें राज्य सरकार निर्धारित करती है, जबकि नगर निगम और नगर पालिका चुनाव स्वतंत्र रूप से निर्वाचन आयोग द्वारा होते हैं।

यह चुनाव हर 5 साल में होते हैं, और यदि किसी कारणवश कोई सीट खाली हो जाती है, तो उपचुनाव कराए जाते हैं।



4. समानता और आरक्षण:

राज्य में महिलाओं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया जाता है।

पंचायत चुनावों में महिलाएं और पिछड़ी जातियों के लिए सीटों का आरक्षण है, ताकि उनके लिए अवसर समान हों।



5. चुनाव का महत्व:

निकाय चुनाव में स्थानीय मुद्दे जैसे पानी, सड़क, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था आदि पर मुख्य ध्यान होता है।

ये चुनाव स्थानीय प्रशासन के द्वारा सार्वजनिक सेवाओं के सुधार की दिशा तय करने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

निकाय चुनावों के माध्यम से सरकार के पास यह अवसर होता है कि वह नागरिकों के मुद्दों का समाधान करें और उनके लिए अच्छे बुनियादी ढांचे और विकास योजनाएँ लागू करें।



6. राजनीतिक दलों की भूमिका:

राज्य में प्रमुख राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों जैसे भारतीय जनता पार्टी (BJP), कांग्रेस, और अन्य स्थानीय दल इस चुनाव में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।

इन चुनावों में उम्मीदवार आमतौर पर स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय होते हैं, लेकिन पार्टी आधार पर भी चुनाव लड़ा जाता है। पार्टियाँ स्थानीय उम्मीदवारों का समर्थन करती हैं और विकास की योजनाओं का प्रचार करती हैं।



7. चुनाव प्रचार और मुद्दे:

चुनाव प्रचार में उम्मीदवार विभिन्न मुद्दों पर जनता से संपर्क करते हैं जैसे रोजगार, जल आपूर्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सड़कों की मरम्मत, और सफाई व्यवस्था।

पार्टी उम्मीदवार आमतौर पर अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का हिसाब देते हैं, ताकि जनता उन्हें अपना समर्थन दे सके।




उत्तराखंड में निकाय चुनाव स्थानीय सरकारों की कार्यप्रणाली को तय करने का महत्वपूर्ण अवसर होते हैं, जिनमें स्थानीय लोगों के हितों और समस्याओं को प्राथमिकता दी जाती है।


वर्तमान में राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी क्या स्थानीय मुद्दों पर खड़ी हैं उत्तराखंड के परिपेक्ष में

उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियाँ स्थानीय मुद्दों पर काफी हद तक ध्यान दे रही हैं, लेकिन उनका ध्यान कई बार राज्य के विकास से अधिक राष्ट्रीय दृष्टिकोण और पार्टी के आंतरिक लाभ पर केंद्रित होता है। फिर भी, कुछ प्रमुख मुद्दे हैं जिन पर ये पार्टियाँ खड़ी हैं:

1. महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का विकास: राष्ट्रीय पार्टियाँ उत्तराखंड में सड़कों, हवाईअड्डों, और रेलवे कनेक्टिविटी के विस्तार पर जोर दे रही हैं, ताकि राज्य का आर्थिक विकास हो सके और पर्यटन को बढ़ावा मिले।


2. हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय संरक्षण: पर्यावरण सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, और जैव विविधता को बचाने के लिए राष्ट्रीय पार्टियाँ कई पहलें उठा रही हैं। इसके तहत नदियों की सफाई, जंगलों की सुरक्षा, और सस्टेनेबल विकास को बढ़ावा देने की योजनाएँ हैं।


3. स्वास्थ्य और शिक्षा: सरकारों ने राज्य के दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए कई योजनाएँ बनाई हैं। हालांकि, स्थानीय लोग इन सुधारों में सुस्त गति और संसाधनों की कमी की शिकायत करते हैं।


4. जल, जंगल और ज़मीन का मुद्दा: वन भूमि और जल स्रोतों के संरक्षण की दिशा में कई योजनाएँ हैं, लेकिन स्थानीय लोग अक्सर इन योजनाओं को लेकर संघर्ष करते हैं, विशेष रूप से जब ये योजनाएँ उनके पारंपरिक अधिकारों या जीवनशैली से टकराती हैं।


5. आपदा प्रबंधन और पुनर्निर्माण: 2013 की आपदा के बाद से राज्य सरकारों ने आपदा राहत और पुनर्निर्माण के कार्यों को प्राथमिकता दी है। राष्ट्रीय दल इस दिशा में केंद्र से अधिक मदद लाने का वादा करते हैं।



इन मुद्दों पर राष्ट्रीय पार्टियाँ आम तौर पर विकास और राज्य की समृद्धि के वादे करती हैं, लेकिन स्थानीय समुदायों के बीच अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ये योजनाएँ वास्तव में उनके दैनिक जीवन में बदलाव ला रही हैं या नहीं।


मानव की सात मूलभूत भावनाएँ

मानव की सात मूलभूत भावनाएँ वे भावनाएँ हैं जो हर इंसान स्वाभाविक रूप से अनुभव करता है और व्यक्त करता है। ये भावनाएँ सभी संस्कृतियों में समान होती हैं और मनोवैज्ञानिक पॉल एकमैन द्वारा पहचान की गई थीं।

1. खुशी (Happiness)

विवरण: आनंद, संतोष या प्रसन्नता की भावना।

उदाहरण: अच्छी खबर सुनकर मुस्कुराना या किसी लक्ष्य को प्राप्त करने पर खुश होना।

उद्देश्य: सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करना और सामाजिक संबंधों को मजबूत करना।


2. दुख (Sadness)

विवरण: हानि, निराशा या असहायता की भावना।

उदाहरण: किसी प्रियजन को खोने पर रोना या असफलता के बाद दुखी होना।

उद्देश्य: दुःख को समझने और दूसरों से सहारा पाने में मदद करना।


3. भय (Fear)

विवरण: खतरे या डर की भावना।

उदाहरण: खतरनाक स्थिति में घबराना या अज्ञात चीजों से डरना।

उद्देश्य: "लड़ो या भागो" (fight or flight) की प्रतिक्रिया को सक्रिय करके खुद को बचाना।


4. गुस्सा (Anger)

विवरण: नाखुशी या आक्रोश की तीव्र भावना।

उदाहरण: अन्याय होने पर चिल्लाना या नाराज होना।

उद्देश्य: अन्याय या खतरों से निपटने के लिए प्रेरित करना।


5. आश्चर्य (Surprise)

विवरण: किसी अप्रत्याशित घटना पर प्रतिक्रिया।

उदाहरण: अचानक उपहार पाकर चौंक जाना या अप्रत्याशित स्थिति का सामना करना।

उद्देश्य: नई परिस्थितियों के प्रति सतर्कता और अनुकूलनशीलता बढ़ाना।


6. घृणा (Disgust)

विवरण: किसी अप्रिय या अवांछनीय चीज़ के प्रति नापसंदगी।

उदाहरण: खराब गंध, सड़ा हुआ खाना या अनैतिक व्यवहार देखकर प्रतिक्रिया देना।

उद्देश्य: नुकसानदायक या अस्वस्थ चीज़ों से बचाव करना।


7. तिरस्कार (Contempt)

विवरण: किसी के प्रति श्रेष्ठता या अस्वीकृति की भावना।

उदाहरण: किसी गलत व्यवहार को देखकर तिरछी नजर से देखना या उनकी बात को अनसुना करना।

उद्देश्य: सामाजिक पदानुक्रम बनाए रखना या अपनी सीमाओं को व्यक्त करना।


निष्कर्ष:

ये सात भावनाएँ मानव जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये न केवल हमारी भावनाओं को व्यक्त करने में मदद करती हैं बल्कि हमारे अस्तित्व, सामाजिक जुड़ाव और सुरक्षा के लिए भी आवश्यक हैं।


seven humans emotions

The seven basic human emotions are universally recognized emotions that humans express and experience across all cultures. These emotions were identified by psychologist Paul Ekman, who studied facial expressions and their relation to emotions. They are:

1. Happiness (Joy)

Description: A feeling of pleasure, contentment, or satisfaction.

Examples: Smiling when you receive good news or achieve something meaningful.

Purpose: Encourages social bonding and reinforces positive behavior.



2. Sadness

Description: A feeling of loss, disappointment, or helplessness.

Examples: Crying after losing a loved one or facing a failure.

Purpose: Helps process grief and seek support from others.



3. Fear

Description: A response to perceived danger or threat.

Examples: Feeling scared during a dangerous situation or when facing the unknown.

Purpose: Triggers a fight-or-flight response to protect oneself.



4. Anger

Description: A strong feeling of displeasure or hostility.

Examples: Yelling or feeling frustrated when treated unfairly.

Purpose: Drives action to address injustice or threats.



5. Surprise

Description: A reaction to something unexpected.

Examples: Opening a surprise gift or encountering an unforeseen situation.

Purpose: Increases alertness and helps adapt to new situations.



6. Disgust

Description: A feeling of aversion or revulsion toward something unpleasant.

Examples: Reacting to bad smells, spoiled food, or unethical behavior.

Purpose: Protects from harmful or unhealthy substances and behaviors.



7. Contempt

Description: A feeling of superiority or disapproval toward someone or something.

Examples: Smirking or dismissing someone’s actions when you disapprove of their behavior.

Purpose: Helps maintain social hierarchy or assert personal boundaries.




These emotions are expressed through universal facial expressions and play a crucial role in human survival, communication, and social interaction.


Infinity (अनंत) और उसका Interpretation (व्याख्या)

Infinity (अनंत) और उसका Interpretation (व्याख्या) एक गहरी और बहुआयामी अवधारणा है जो गणित, दर्शन, भौतिक विज्ञान, धर्म और आध्यात्मिकता में अलग-अलग तरीकों से व्यक्त की गई है।

1. Infinity का सामान्य अर्थ

Infinity का अर्थ है वह जो सीमाओं से परे है, जिसका कोई अंत या सीमा नहीं है। यह एक अवधारणा है जो असीम, अनंत, और अपरिमेय को दर्शाती है।


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2. Mathematical Interpretation of Infinity

गणित में, Infinity को एक प्रतीक (∞) से दर्शाया जाता है, जो सीमाहीनता का प्रतिनिधित्व करता है।

गणितीय दृष्टिकोण:

गणितीय सीमा (Limits):

किसी संख्या या फ़ंक्शन का मान असीम रूप से बढ़ सकता है।

जैसे, का मतलब है कि x असीम रूप से बढ़ रहा है।


सकारात्मक और नकारात्मक अनंत:

: असीम रूप से बड़ी संख्या।

: असीम रूप से छोटी संख्या।


Set Theory में अनंत:

अनंत को "गिनती योग्य अनंत" (Countable Infinity) और "अगिनती अनंत" (Uncountable Infinity) में बांटा गया है।

जैसे, प्राकृतिक संख्याएँ गिनती योग्य अनंत हैं।


Zeno's Paradox:
अनंत का विचार प्राचीन ग्रीक दर्शन में भी था, जहाँ दार्शनिक ज़ेनो ने "अनंत विभाजन" की अवधारणा प्रस्तुत की थी।



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3. Philosophical Interpretation of Infinity

Infinity को दार्शनिक दृष्टिकोण से असीम संभावनाओं, अस्तित्व और समय के रूप में देखा जाता है।

अनंत का अनुभव:
दार्शनिक इसे ब्रह्मांड, चेतना, और जीवन की अनंतता से जोड़ते हैं।

पश्चिमी दर्शन:

इमैनुएल कांट ने अनंत को मानव बुद्धि की एक सीमा कहा।

डेविड ह्यूम ने इसे अनुभव की पहुंच से परे बताया।


भारतीय दर्शन:
भारतीय दर्शन में अनंत को "ब्रह्म" के रूप में माना गया है, जो सत्, चित्, और आनंद का स्वरूप है।



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4. Infinity in Religion and Spirituality

धर्म और आध्यात्मिकता में अनंत को परमात्मा या ब्रह्म के साथ जोड़ा जाता है।

भारतीय दृष्टिकोण:

वेद और उपनिषद:

"पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
यह श्लोक बताता है कि अनंत से अनंत निकालने पर भी अनंत बचता है।


भगवद गीता:

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को "विराट स्वरूप" दिखाया, जो ब्रह्मांड की अनंतता का प्रतीक है।



पश्चिमी दृष्टिकोण:

ईश्वर को "Infinite Being" कहा गया है।

यह अनंत दया, शक्ति और प्रेम का प्रतीक है।



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5. Scientific Interpretation of Infinity

Universe का अनंत विस्तार:

आधुनिक विज्ञान यह मानता है कि ब्रह्मांड संभवतः अनंत है, लेकिन इसका मापन सीमित साधनों से संभव नहीं है।


ब्लैक होल और सिंगुलैरिटी:

भौतिकी में ब्लैक होल को अनंत घनत्व और गुरुत्वाकर्षण के रूप में देखा जाता है।


Multiverse Theory:

यह मान्यता है कि अनगिनत ब्रह्मांड अस्तित्व में हो सकते हैं।




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6. Practical Interpretation of Infinity

समय और स्थान का अनुभव:

जीवन में Infinity का अनुभव तब होता है जब कोई समय और स्थान की सीमाओं से ऊपर उठता है।


अनंत संभावनाएँ:

यह व्यक्तिगत विकास, विचारों, और रचनात्मकता में असीम संभावनाओं का प्रतीक हो सकता है।




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7. सारांश

Infinity की व्याख्या इस बात पर निर्भर करती है कि आप इसे किस दृष्टिकोण से देखते हैं:

गणित में यह मात्रात्मक और प्रतीकात्मक है।

दर्शन में यह अस्तित्व और चेतना का आधार है।

धर्म में यह ईश्वर की सर्वव्यापकता का प्रतीक है।

विज्ञान में यह ब्रह्मांड की सीमाओं और संभावनाओं को व्यक्त करता है।


Infinity एक ऐसी अवधारणा है जो मानव सोच की सीमाओं को चुनौती देती है और उसे असीम के विचार से जोड़ती है।


वेद और उपनिषद भारतीय दर्शन और धार्मिक ग्रंथों का आधार

वेद और उपनिषद भारतीय दर्शन और धार्मिक ग्रंथों का आधार हैं। इन ग्रंथों में "भगवान" का जिक्र एक विशिष्ट रूप में नहीं, बल्कि गहराई से जुड़े आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों के रूप में होता है।

वेदों में भगवान का जिक्र:

1. वेदों का मुख्य उद्देश्य: वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) मुख्यतः ब्रह्मांडीय शक्तियों, प्रकृति के तत्वों (अग्नि, वायु, सूर्य, आदि), और यज्ञ विधियों का वर्णन करते हैं।

वेदों में ईश्वर को कई रूपों में व्यक्त किया गया है, जैसे:

ऋग्वेद में "एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, लेकिन ज्ञानी उसे विभिन्न रूपों में बताते हैं)।

ईश्वर को "परब्रह्म," "सत्य," "ऋत," और "हिरण्यगर्भ" जैसे शब्दों से पुकारा गया है।




2. साकार और निराकार दोनों दृष्टिकोण:

देवताओं (इंद्र, वरुण, अग्नि) का साकार रूप में उल्लेख है।

लेकिन इन्हें केवल ब्रह्मांडीय शक्तियों का प्रतीक माना गया है, जो एक परम सत्य (परमात्मा) से जुड़े हैं।




उपनिषदों में भगवान का जिक्र:

1. निराकार ब्रह्म का वर्णन: उपनिषद मुख्यतः अद्वैत वेदांत के दर्शन को प्रस्तुत करते हैं, जिसमें भगवान या ईश्वर को "ब्रह्म" के रूप में निराकार और सर्वव्यापी बताया गया है।

उदाहरण: ब्रह्मसूत्र - "अहम् ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ)।

ब्रह्म को चेतना का स्रोत और सृष्टि का आधार माना गया है।



2. आत्मा और परमात्मा का संबंध:

उपनिषदों में आत्मा (जीव) और परमात्मा (ईश्वर) के अद्वैत संबंध का वर्णन किया गया है।

जैसे मुण्डक उपनिषद में कहा गया है, "सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म" (ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंत है)।



3. योग और ध्यान: भगवान को समझने का मार्ग आत्मा की खोज, ध्यान और योग के माध्यम से बताया गया है।



निष्कर्ष:

वेद और उपनिषदों में भगवान का जिक्र है, लेकिन यह "भगवान" शब्द के पारंपरिक या सांस्कृतिक अर्थ में नहीं, बल्कि एक व्यापक, दार्शनिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से है।

वेदों में भगवान को प्रकृति और ब्रह्मांडीय शक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

उपनिषद भगवान को निराकार, सर्वव्यापी और अनंत ब्रह्म के रूप में देखते हैं।


इस प्रकार, भगवान का जिक्र इन ग्रंथों में गहराई से है, लेकिन इसे समझने के लिए दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।


न्यूज़ विचार और व्यव्हार

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✍️ संपादकीय विधानसभा की गरिमा और जनप्रतिनिधित्व: संसदीय परंपरा बनाम व्यवहारिक राजनीति का द्वंद्व लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधानसभा केवल कानू...