संपादकीय
राजभवन से ‘लोक भवन’ तक — नाम बदलने के पीछे की राजनीति और प्रतीकवाद
उत्तराखंड सरकार द्वारा राजभवन का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ रखना सिर्फ एक नामांतरण नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक बयान है—एक ऐसा बयान जो प्रतीकों की राजनीति, सत्ता की वैचारिक दिशा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को नए सांचे में ढालने की कोशिशों को सामने लाता है।
राजभवन भारतीय संघीय लोकतंत्र में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का प्रतीक रहा है। औपनिवेशिक काल से निकली इस संस्था की अपनी जड़ें और परंपराएँ हैं। लेकिन नाम में ‘राज’ शब्द को बदलकर ‘लोक’ करना उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है जो सत्ता प्रतिष्ठानों को जनता-केंद्रित दिखाने की कोशिश में लगातार आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव बताता है कि सत्ता जनसंपर्क और प्रतीकों के अर्थ बदलकर एक नई राजनीतिक भाषा निर्मित करना चाहती है।
सवाल यह नहीं कि नाम ‘लोक भवन’ अच्छा है या बुरा; सवाल यह है कि क्या नाम बदलने भर से संस्थाओं का लोकतांत्रिक चरित्र मजबूत हो जाता है? राज्यपाल की भूमिका, केंद्र-राज्य संबंधों की जटिलताएँ, और संविधान की मर्यादा—ये सब मुद्दे जस के तस बने हुए हैं। नाम बदलने से न तो संवैधानिक जवाबदेही बढ़ती है, न ही संस्थागत पारदर्शिता अपने आप स्थापित होती है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ शासन संरचनाएँ अब भी विकास, पारदर्शिता और जवाबदेही की चुनौतियों से जूझ रही हैं, नाम परिवर्तन को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि सरकार रूपक और प्रतीकवाद को वास्तविक काम पर तरजीह दे रही है। यह बदलाव ज़्यादा प्रभावी होता अगर इसके साथ राज्यपाल कार्यालय की कार्यप्रणाली में सुधार, जनता से संचार को मजबूत करने, और संविधानिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता जैसे कदम भी जुड़े होते।
‘लोक भवन’ नामकरण एक सकारात्मक संकेत हो सकता है—अगर इसके साथ प्रशासनिक संस्कृति भी ‘लोक’ यानी जनता की ओर उन्मुख हो। लेकिन अगर यह सिर्फ राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बनकर रह गया, तो यह भी अन्य नामांतरणों की तरह केवल शोर पैदा करेगा, परिवर्तन नहीं।
लोकतंत्र में प्रतीक मायने रखते हैं, लेकिन प्रतीकों से पहले ज़रूरत है संस्थाओं को मजबूत करने की। राजभवन चाहे ‘राज’ कहलाए या ‘लोक’, उसकी भूमिका तभी सार्थक होगी जब वह संविधान की आत्मा, जनहित और निष्पक्षता के मूल्यों को निभाए।