कार्बन क्रेडिट के मुख्य पहलू:
1. कैप-एंड-ट्रेड सिस्टम:
इसमें हर कंपनी या संगठन को एक निश्चित सीमा (cap) में गैस उत्सर्जन की अनुमति होती है। यदि वे इस सीमा से नीचे उत्सर्जन करते हैं, तो उनके पास अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट्स होंगे, जिन्हें वे बेच सकते हैं। और यदि वे सीमा से अधिक उत्सर्जन करते हैं, तो उन्हें क्रेडिट खरीदना होता है।
2. कार्बन क्रेडिट की खरीद-बिक्री:
कार्बन क्रेडिट्स एक तरह की वस्तु बन गए हैं, जिनकी कीमत मांग और आपूर्ति पर आधारित होती है। जो कंपनियाँ कम उत्सर्जन करती हैं, वे इन क्रेडिट्स को बेच सकती हैं और अतिरिक्त आमदनी कमा सकती हैं। इस तरह की खरीद-बिक्री मुख्य रूप से कार्बन मार्केट्स (जैसे कि यूरोपियन यूनियन का कार्बन मार्केट) के माध्यम से होती है।
3. सकारात्मक प्रभाव:
यह प्रणाली संगठनों को प्रोत्साहित करती है कि वे ऊर्जा कुशल तकनीक का उपयोग करें और हरित ऊर्जा (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) में निवेश करें। इससे प्रदूषण में कमी आती है और पर्यावरण की रक्षा होती है।
4. किसानों और वन्य संस्थानों का योगदान:
वन्य क्षेत्रों का संवर्धन और खेती में सुधार कर कार्बन क्रेडिट कमाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई क्षेत्र वन संवर्धन (Afforestation) के ज़रिए कार्बन का अवशोषण करता है, तो उस क्षेत्र को कार्बन क्रेडिट्स मिल सकते हैं।
5. कार्बन ऑफसेटिंग:
यदि कोई कंपनी उत्सर्जन में कमी करने के लिए अन्य देशों में पर्यावरण अनुकूल परियोजनाओं में निवेश करती है, जैसे कि सौर ऊर्जा परियोजना, तो उसे इसके लिए कार्बन क्रेडिट मिल सकते हैं। इसे कार्बन ऑफसेटिंग कहा जाता है।
भारत में कार्बन क्रेडिट की स्थिति:
भारत में भी कार्बन क्रेडिट की खरीद-बिक्री में रुचि बढ़ रही है। सरकार और कई निजी कंपनियाँ पर्यावरण को सुधारने के लिए इस क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, भारत में अनेक परियोजनाएँ जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और जैविक खेती कार्बन क्रेडिट्स उत्पन्न करने का प्रयास कर रही हैं।
कार्बन क्रेडिट्स का लक्ष्य है कि उद्योग, सरकारें, और समाज पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करें।
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