Monday, December 29, 2025

मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी



संपादकीय: मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी

मजीठिया वेज बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में फैसला पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्रकारों और समाचार पत्र कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन और भत्तों की सिफारिशें वैध और लागू होने योग्य हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस की वकालत ने कर्मचारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाई।

लेकिन, 2025 में भी यह लड़ाई पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कई मीडिया संस्थानों में वेज बोर्ड की सिफारिशों का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है। कर्मचारियों को अभी भी अपने बकाया वेतन और भत्तों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह दर्शाता है कि कानूनी जीत के बावजूद, वास्तविक जीवन में न्याय के लिए निरंतर सतर्कता और प्रयास की आवश्यकता होती है।

मजीठिया वेज बोर्ड का मामला हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है। जब तक पत्रकारों के अधिकार सुरक्षित नहीं होंगे, समाज में निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया का सपना अधूरा रहेगा।

न्यायपालिका ने दिशा दिखा दी है, अब यह जिम्मेदारी मीडिया संस्थानों और समाज की है कि पत्रकारों के अधिकारों की पूरी रक्षा सुनिश्चित करें।

Sunday, December 28, 2025

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर आरोप नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत आत्मालोचना है। सच यह है कि आज का ब्राह्मण—और केवल ब्राह्मण ही क्यों, पूरा समाज—अपने मूल दर्शन से कटा हुआ है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।

पहला कारण—जन्म का भ्रम।
समय के साथ ब्राह्मण होना साधना से हटकर पहचान बन गया। जो दर्शन कभी ज्ञान, संयम और तप पर आधारित था, वह केवल उपनाम और परंपरा में सिमट गया। जब “होना” स्वतः मान लिया जाए, तो “बनने” की यात्रा रुक जाती है। यही कारण है कि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी, जो आत्मचिंतन और प्रश्न की मांग करती थी, औपचारिक कर्मकांड में बदल गई।

दूसरा कारण—ग्रंथों से दूरी।
जिस परंपरा की आत्मा उपनिषद जैसे ग्रंथों में बसती है, वहाँ आज उनका पाठ नहीं, केवल उनका नाम बचा है। ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी प्रश्न पूछना सिखाती है—“मैं कौन हूँ?”, “सत्य क्या है?”—लेकिन आज अधिकांश धार्मिक शिक्षा उत्तर रटाने तक सीमित है। प्रश्नों से डर और जिज्ञासा का अभाव बोध को जन्म ही नहीं लेने देता।

तीसरा कारण—कर्मकांड का वर्चस्व।
दर्शन कठिन है, कर्मकांड आसान। दर्शन विवेक माँगता है, कर्मकांड केवल अभ्यास। धीरे-धीरे ब्राह्मण की भूमिका समाज के पथप्रदर्शक से घटकर अनुष्ठान कराने वाले पेशेवर की बन गई। जब ज्ञान का स्थान प्रक्रिया ले ले, तब बोध खो जाता है।

चौथा कारण—सत्ता से समझौता।
इतिहास में कई दौर ऐसे आए जब ब्राह्मण वर्ग ने सत्ता से दूरी रखने के बजाय उससे समझौता किया। परिणामस्वरूप दर्शन निर्भीक नहीं रहा। जबकि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का मूल स्वर सत्ता से प्रश्न करना था—जैसा कि आदि शंकराचार्य ने अपने समय में किया। आज वह साहस कम दिखाई देता है।

पाँचवाँ कारण—आधुनिकता का अधूरा बोध।
आज का ब्राह्मण न पूरी तरह परंपरा में है, न पूरी तरह आधुनिक विवेक में। पश्चिमी आधुनिकता उसने उपभोग में अपनाई, लेकिन आलोचनात्मक चिंतन में नहीं; और परंपरा उसने रस्मों में बचाई, दर्शन में नहीं। इस दोराहे पर खड़ा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से बौध से दूर हो जाता है।

निष्कर्ष
आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध इसलिए नहीं है क्योंकि उसने ब्राह्मण होने को विरासत और ब्राह्मण बनने की साधना छोड़ दी है।
बोध किसी जाति से नहीं, चेतना के श्रम से आता है।
जिस दिन ब्राह्मण फिर से प्रश्न करेगा, सत्ता से दूरी रखेगा, और ज्ञान को जीवन में उतारेगा—उसी दिन यह दर्शन पुनर्जीवित होगा।

यह संकट किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे समाज का है। क्योंकि जब मार्गदर्शक ही मार्ग भूल जाए, तो यात्रा भटकना तय है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी: जन्म नहीं, बोध की परंपरा

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी: जन्म नहीं, बोध की परंपरा

आज “ब्राह्मण” शब्द आते ही बहस खड़ी हो जाती है। कोई इसे विशेषाधिकार से जोड़ता है, कोई वर्चस्व से। लेकिन इस शोर में वह मूल विचार गुम हो गया है जिसे ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी कहा जाता है। यह दर्शन किसी जाति का प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि ब्रह्म को जानने की बौद्धिक–नैतिक यात्रा है।

भारतीय दर्शन की परंपरा में ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का आधार वेद और उपनिषद हैं। इन ग्रंथों में ब्राह्मण का अर्थ है—जो प्रश्न करता है, जो सत्य की खोज में जीवन को तपस्या बनाता है। “अहं ब्रह्मास्मि” जैसी उक्ति यह स्पष्ट करती है कि परम सत्य बाहर नहीं, चेतना के भीतर खोजा जाना है।

यह दर्शन ज्ञान को सर्वोच्च मानता है। यहाँ सत्ता, संपत्ति या जन्म नहीं, बल्कि विवेक और बोध निर्णायक हैं। इसलिए ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी समाज को निर्देश देती है कि अंधविश्वास नहीं, प्रश्न पूछो; अनुकरण नहीं, आत्मबोध करो। यही कारण है कि यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, गहराई से दार्शनिक और नैतिक है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का शिखर रूप अद्वैत वेदांत में दिखाई देता है, जिसे व्यवस्थित स्वरूप दिया आदि शंकराचार्य ने। अद्वैत का संदेश सीधा है—जीव और ब्रह्म में भेद अज्ञान से है, ज्ञान से नहीं। जब यह समझ आती है, तब ऊँच–नीच, मैं–तुम, अपना–पराया अपने आप ढह जाते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ इस दर्शन को जन्म आधारित श्रेष्ठता में बदल दिया गया। यही विकृति “ब्राह्मणवाद” कहलाती है, जिसने दर्शन को सत्ता का औज़ार बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जो परंपरा समाज को दिशा देने वाली थी, वही समाज को बाँटने का माध्यम बन गई।

आज के भारत में, जब धर्म का उपयोग राजनीति और ध्रुवीकरण के लिए हो रहा है, तब ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी की मूल आत्मा और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि धर्म आचरण है, प्रदर्शन नहीं; और ब्राह्मण होना अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है—सत्य बोलने का, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का, और समाज को विवेक की ओर ले जाने का।

निष्कर्षतः, ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी किसी एक समुदाय की जागीर नहीं। यह चेतना की वह ऊँचाई है जहाँ पहुँचना हर मनुष्य के लिए संभव है। जो सत्य की खोज करे, जो ज्ञान को जीवन में उतारे—वही इस दर्शन की सच्ची परिभाषा है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी के मूल स्तंभ

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी कोई जातीय श्रेष्ठता का सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन–ब्रह्म–ज्ञान को समझने की एक दार्शनिक परंपरा है। इसका केंद्र “कौन जन्म से क्या है” नहीं, बल्कि “कौन कर्म, ज्ञान और आचरण से क्या बनता है” — यही इसका मूल है।


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ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी के मूल स्तंभ

1️⃣ ब्रह्म की खोज

ब्राह्मण दर्शन का केंद्रीय प्रश्न है— ब्रह्म क्या है?
यानी वह परम सत्य जो सृष्टि, चेतना और अस्तित्व का आधार है।
यह विचार हमें वेद और विशेष रूप से उपनिषद में मिलता है—

> “अहं ब्रह्मास्मि” — मैं ही ब्रह्म हूँ।




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2️⃣ ज्ञान को सर्वोच्च मान

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी में ज्ञान (ज्ञानयोग) को मुक्ति का मार्ग माना गया है—
धन, सत्ता या जन्म नहीं, बल्कि बोध और विवेक।

यही कारण है कि यह दर्शन प्रश्न करना सिखाता है—

> क्यों? कैसे? सत्य क्या है?




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3️⃣ कर्म और आचरण

यह दर्शन केवल विचार नहीं, जीवन-पद्धति है।
ब्राह्मण वही है जो—

सत्य बोले

संयम रखे

लोभ से मुक्त हो

समाज को दिशा दे


यानी ब्राह्मण होना कर्तव्य है, अधिकार नहीं।


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4️⃣ अद्वैत की दृष्टि

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का शिखर है अद्वैत वेदांत —
जिसे व्यवस्थित रूप दिया आदि शंकराचार्य ने।

इसका सार—

> जीव और ब्रह्म अलग नहीं हैं।
भेद अज्ञान से है, ज्ञान से एकता प्रकट होती है।




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ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी बनाम ब्राह्मणवाद

यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा हुआ—

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी → ज्ञान, तप, नैतिकता, प्रश्न

ब्राह्मणवाद (विकृत रूप) → जन्म, प्रभुत्व, अहंकार


जब दर्शन सत्ता का औज़ार बनता है, तब उसका पतन होता है।


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आज के संदर्भ में

आज जब—

धर्म राजनीति बन रहा है

ज्ञान की जगह शोर है

आस्था का उपयोग नफ़रत के लिए हो रहा है


तब ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी हमें याद दिलाती है—

> धर्म धारण करने की वस्तु है,
दूसरों पर थोपने की नहीं।




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निष्कर्ष

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी जन्म की नहीं, चेतना की पहचान है।
जो सत्य की खोज करे, वही ब्राह्मण—
चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या समय का हो।


इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

(संपादकीय)

1919 में यदि औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिनिधि Lord Chelmsford से जुड़ा यह कथन— “ब्राह्मणों में नायकत्व नहीं होता”—कहा या प्रचारित किया गया, तो वह केवल उस दौर की राजनीतिक चाल नहीं थी। वह एक सोची-समझी रणनीति थी—समाज को बाँटो, नेतृत्व को कमज़ोर करो और सत्ता को सुरक्षित रखो।

दुखद सच्चाई यह है कि एक सदी बाद भी यह रणनीति बदली नहीं है, केवल शासक बदल गए हैं, तरीके आधुनिक हो गए हैं।

आज भी नायकत्व को परिभाषित करने का ठेका कुछ खास खाँचों ने ले रखा है। कोई जाति, कोई वर्ग, कोई विचारधारा—सबको प्रमाणपत्र बाँटे जा रहे हैं कि कौन “नेतृत्व के योग्य” है और कौन नहीं। फर्क बस इतना है कि 1919 में यह काम विदेशी सत्ता करती थी, आज यह काम हम अपने ही समाज के भीतर से कर रहे हैं।

वर्तमान भारत में जब भी कोई वर्ग सवाल पूछता है, तर्क देता है, संविधान की भाषा बोलता है—उसे तुरंत किसी न किसी लेबल में बंद कर दिया जाता है।

कभी “एलीट”

कभी “अर्बन नक्सल”

कभी “जातिवादी”


यह वही मानसिकता है, जो कभी “नायकत्व नहीं होता” जैसे वाक्यों में व्यक्त हुई थी।

आज नेतृत्व को भी केवल शोर, शक्ति और आक्रामकता से जोड़ दिया गया है। शांत विवेक, वैचारिक गहराई और नैतिक साहस को कमजोरी समझा जाने लगा है। यह सोच लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक है, जितनी औपनिवेशिक शासन के लिए राष्ट्रीय चेतना खतरनाक थी।

इतिहास गवाह है—जब भी समाज ने नायकत्व को संकीर्ण परिभाषाओं में कैद किया, तब-तब वह बाहरी या भीतरी सत्ता के हाथों खिलौना बना। 1919 में अंग्रेज़ों ने यह प्रयोग किया था, आज हम वही प्रयोग स्वयं पर दोहरा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किस जाति या वर्ग में नायकत्व है।
असल सवाल यह है—क्या हम विचार आधारित नेतृत्व से डरने लगे हैं?
क्या हम अब भी यह तय करना चाहते हैं कि कौन नेतृत्व करेगा, और कौन केवल अनुसरण?

1919 का कथन हमें चेतावनी देता है—नायकत्व को जाति, वर्ग या पहचान से जोड़ना सत्ता के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन समाज के लिए यह हमेशा विनाशकारी सिद्ध हुआ है।

इतिहास केवल पढ़ने के लिए नहीं होता।
इतिहास इसलिए होता है ताकि हम वही गलती दोबारा न करें—
जिसे कभी किसी वायसराय ने हमारे लिए रचा था,
और जिसे आज हम स्वयं अपने लिए रच रहे हैं।

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

धर्म का अर्थ है—जो हमें धारण करे, जो हमारे आचरण, करुणा और विवेक को संभाले।
पर जब धर्म नशा बन जाता है, तब वह हमें नहीं संभालता—हम दूसरों को कुचलने लगते हैं।

धर्म का नशा आदमी को इतना मदहोश कर देता है कि
वह ईश्वर की जगह स्वयं को उसका ठेकेदार समझने लगता है।
फिर सत्य नहीं, केवल पहचान बचती है;
करुणा नहीं, केवल क्रोध बोलता है।

धर्म को धारण करने वाला व्यक्ति
शांत होता है, सहिष्णु होता है, प्रश्न करता है।
वहीं धर्म का नशा करने वाला
भीड़ बनाता है, दुश्मन खोजता है और हिंसा को आस्था कहता है।

सच्चा धर्म
हाथ में शस्त्र नहीं,
हृदय में संवेदना देता है।
वह दूसरों को बदलने नहीं,
खुद को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।

धर्म यदि हमें
अहंकारी, कठोर और असहिष्णु बना दे—
तो समझ लेना चाहिए कि
हमने धर्म नहीं, नशा कर लिया है।

धर्म वह है जो
मनुष्य को मनुष्य बनाए।
बाक़ी सब—केवल शोर है।

Saturday, December 27, 2025

चुप्पी भी एक अपराध

 

संपादकीय | चुप्पी भी एक अपराध

अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर से सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है। कारण है—मामले में वीआईपी नाम का सामने आना। लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक है, इस खुलासे के बाद संविधानिक संस्थाओं की चुप्पी, विशेषकर उत्तराखंड महिला आयोग का इस पर संज्ञान न लेना।

यह सवाल केवल एक व्यक्ति या एक बयान का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है, जो महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का दावा करती है, लेकिन जब सत्ता के गलियारों तक मामला पहुंचता है, तो वही व्यवस्था मौन साध लेती है।

अंकिता एक आम लड़की थी—न सत्ता में, न प्रभाव में। उसकी हत्या पहले ही प्रदेश और देश की न्यायिक संवेदना को झकझोर चुकी है। ऐसे में यदि अब किसी वीआईपी की भूमिका को लेकर सवाल उठते हैं, तो यह महिला आयोग जैसे संस्थानों की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वे स्वतः संज्ञान लें, निष्पक्ष जांच की मांग करें और पीड़िता के पक्ष में मजबूती से खड़ी हों।

लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो संदेश स्पष्ट जाता है—
कि न्याय की रेखा प्रभावशाली और साधारण के बीच कहीं धुंधली हो जाती है।

महिला आयोग का मौन केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि संस्थागत साहस की कमी को उजागर करता है। आयोग का गठन सिर्फ औपचारिकता के लिए नहीं हुआ है; उसका उद्देश्य है—जहाँ व्यवस्था डगमगाए, वहाँ हस्तक्षेप करना।

आज जरूरत है कि इस मामले में:

  • सभी दावों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो

  • किसी भी प्रभावशाली नाम को जांच से बाहर न रखा जाए

  • महिला आयोग जैसी संस्थाएं अपनी भूमिका को पुनः स्थापित करें

क्योंकि अगर सत्ता के नाम पर संवेदनशील मामलों में भी संस्थाएं खामोश रहेंगी, तो सवाल केवल अंकिता के लिए नहीं उठेगा—सवाल हर उस बेटी के लिए होगा, जो न्याय की उम्मीद लेकर व्यवस्था की ओर देखती है।

न्याय केवल फैसलों से नहीं, साहसिक हस्तक्षेप से भी जिंदा रहता है।
और चुप्पी—कई बार सबसे बड़ा अपराध बन जाती है।

Friday, December 26, 2025

बड़े मन की राजनीति

बड़े मन की राजनीति

अटल जी की जयंती पर सभी नेता कार्यकर्ता ने उन्हें याद किया जगह जगह राजनीतिक भाषण हुए पर उनको सच्चे मन से अनुसरण करने वाले बहुत कम दिखे, कौन उनके वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं आओ जानते हैं उनके बड़े मन की राजनीति बात।

“छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता”—यह पंक्ति अटल बिहारी वाजपेयी की है, और शायद इसी एक वाक्य में उनके पूरे सार्वजनिक जीवन का सार छिपा है।

आज के समय में जब राजनीति और समाज दोनों ही असहिष्णुता, त्वरित प्रतिक्रिया और सतही जीत की होड़ में उलझे दिखते हैं, यह पंक्ति हमें ठहरकर सोचने को मजबूर करती है। अटल जी का मानना था कि नेतृत्व का कद भाषणों से नहीं, मन की विशालता से तय होता है। संकीर्ण सोच के साथ सत्ता मिल भी जाए, तो वह इतिहास नहीं रचती—केवल शोर पैदा करती है।

दूसरी पंक्ति और भी गहरी है—“टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।” यह केवल व्यक्तिगत अवसाद की बात नहीं, बल्कि सामाजिक हताशा का संकेत है। जब नागरिक बार-बार अपमानित हों, उनकी बात सुनी न जाए, और असहमति को अपराध बना दिया जाए, तो मन टूटते हैं। ऐसे में विकास के आंकड़े खड़े हो सकते हैं, लेकिन समाज खुद खड़ा नहीं रह पाता।

अटल जी की राजनीति संवाद की राजनीति थी। विरोधियों के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति प्रतिबद्धता उनकी पहचान थी। वे जानते थे कि मन तोड़कर भीड़ तो जुटाई जा सकती है, लेकिन राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम फिर से उस राजनीति और उस सामाजिक सोच की ओर लौटें जहाँ बड़ा बनने की शर्त दूसरों को छोटा करना नहीं, बल्कि मन को बड़ा करना हो। क्योंकि अंततः देश वही आगे बढ़ता है, जिसके नागरिक आत्मसम्मान के साथ खड़े हों—और टूटे मनों के सहारे कोई भविष्य नहीं बनता।

सबको अपने हिस्से की भूख मिलती है, पर सबको अपने हिस्से का भात नहीं मिलता

सबको अपने हिस्से की भूख मिलती है, पर सबको अपने हिस्से का भात नहीं मिलता

यह पंक्ति किसी कविता का अलंकार नहीं, बल्कि हमारे समय का नंगा सच है। भूख किसी भेदभाव को नहीं मानती। वह अमीर के पेट में भी उठती है और गरीब की आँतों में भी। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी के सामने थाली रख दी जाती है और किसी के सामने केवल प्रतीक्षा।

आज देश में अनाज की कमी नहीं है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि गोदाम भरे हैं, उत्पादन रिकॉर्ड तोड़ रहा है और योजनाएँ काग़ज़ों पर सफल हैं। इसके बावजूद एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो रोज़ अपने हिस्से की भूख के साथ सोता है। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या भूख की नहीं, व्यवस्था की है।

किसान खेत में पसीना बहाता है, मज़दूर ईंट-गारा ढोता है, श्रमिक शहरों की नींव उठाता है—लेकिन सबसे पहले वही भात से वंचित रह जाता है। भूख उसकी नियति बना दी गई है और भात किसी और का अधिकार। यह सामाजिक असमानता का सबसे क्रूर रूप है, जहाँ मेहनत और भोजन के बीच की कड़ी तोड़ दी गई है।

भूख केवल पेट तक सीमित नहीं रहती। वह आत्मसम्मान, शिक्षा और भविष्य को भी निगल जाती है। भूखा बच्चा स्कूल में सीख नहीं पाता, भूखा युवा व्यवस्था पर विश्वास खो देता है और भूखा समाज धीरे-धीरे भीतर से टूटने लगता है। यह सिर्फ मानवीय संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विफलता भी है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब समाज भूख का आदी हो जाता है—जब खाली थाली को सामान्य मान लिया जाता है और इसे भाग्य या मजबूरी कहकर टाल दिया जाता है। यहीं से संवेदना मरने लगती है और नीति केवल आंकड़ों तक सिमट जाती है।

अब समय आ गया है कि भूख को दया का विषय नहीं, अधिकार का प्रश्न माना जाए। भोजन कोई उपकार नहीं, जीवन का मूल अधिकार है। जब तक हर व्यक्ति को उसके हिस्से का भात नहीं मिलेगा, तब तक विकास, समृद्धि और प्रगति जैसे शब्द खोखले ही रहेंगे।

क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके गोदामों से नहीं, बल्कि उसकी थालियों से होती है।

“अपने को बताना कोई अध्यात्म नहीं, दूसरे को जानना अध्यात्म है।”



“अपने को बताना कोई अध्यात्म नहीं, दूसरे को जानना अध्यात्म है।”

अक्सर हम अध्यात्म को स्व-प्रचार या स्व-घोषणा समझ लेते हैं—
कि मैंने यह साधना की, मुझे यह अनुभूति हुई, मैं यह जानता हूँ।
पर यह अहं का विस्तार है, अध्यात्म नहीं।

सच्चा अध्यात्म वहाँ शुरू होता है जहाँ
मैं पीछे हटता है और तू सामने आता है।

दूसरे को जानना मतलब—

उसके दुःख को बिना उपदेश दिए समझ लेना

उसकी चुप्पी को सुन लेना

उसकी कमज़ोरी में उसे तौलना नहीं, थाम लेना


जब आप किसी को जज नहीं करते, बल्कि समझते हैं—
तभी भीतर का ज्ञान जागता है।

अपने बारे में बोलना जानकारी है,
दूसरे के लिए संवेदना रखना चेतना है।

और यही चेतना अध्यात्म का मूल है।

Monday, December 22, 2025

संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?

 

संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?

क्यों पहाड़ियों के पीछे पड़े हो?
यह सवाल आज सिर्फ़ एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे देश की विकास-दृष्टि पर प्रश्नचिह्न है। पहाड़ इसलिए निशाने पर हैं क्योंकि वे अब पहले जैसे प्रहरी नहीं रहे—न अपने जंगलों के, न अपनी ज़मीन के, न अपने भविष्य के।

एक समय था जब पहाड़ी समाज खुद अपनी रक्षा-रेखा था। जंगल कटता तो आवाज़ उठती थी, नदी रोकी जाती तो विरोध होता था, ज़मीन छीनी जाती तो संघर्ष खड़ा हो जाता था। आज वही समाज रोज़गार की मजबूरी, पलायन, और राजनीतिक उपेक्षा के चलते बिखर चुका है। प्रहरी कमजोर नहीं हुआ, उसे अकेला छोड़ दिया गया

अरावली की स्थिति इस सच्चाई की गवाही देती है। जब किसी पहाड़ी श्रृंखला को सिर्फ़ खनन, रियल एस्टेट और त्वरित मुनाफ़े की नज़र से देखा जाता है, तो वह पहाड़ नहीं, मलबा बन जाती है। अरावली आज चेतावनी है—कल उत्तराखंड का आईना। फर्क बस इतना है कि यहाँ आपदा भूस्खलन बनकर आती है, वहाँ धूल बनकर उड़ती है।

उत्तराखंड का पहाड़ी आज ना घर का रहा, ना घाट का
गाँव उजड़ गए, शहरों ने अपनाया नहीं।
खेती छूटी, नौकरी मिली नहीं।
संस्कृति पीछे छूट गई, पहचान अधूरी रह गई।

यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि नीतिगत अंधेपन का नतीजा है। विकास के नाम पर पहाड़ को संसाधन समझा गया, समाज नहीं। सड़कें बनीं, पर रोज़गार नहीं। परियोजनाएँ आईं, पर स्थानीय भागीदारी नहीं। फैसले हुए, पर पहाड़ से पूछकर नहीं।

असल सवाल यह नहीं कि पहााड़ियों के पीछे क्यों पड़े हो,
असल सवाल यह है कि पहााड़ी खुद अपने पीछे क्यों नहीं खड़े हो रहे?

जब तक पहाड़ के मुद्दे चुनावी एजेंडा नहीं बनेंगे,
जब तक पर्यावरण, पलायन, स्थानीय रोजगार और भूमि अधिकार नीति के केंद्र में नहीं आएँगे,
और जब तक पहाड़ी समाज खुद संगठित होकर सवाल नहीं पूछेगा—
तब तक पहाड़ सिर्फ़ भावनाओं में जिएगा, नीतियों में नहीं।

आज ज़रूरत है पहाड़ को बचाने की नहीं,
पहाड़ को फिर से प्रहरी बनाने की।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
जब पहाड़ ढह रहा था, तब हम चुप क्यों थे?

Sunday, December 21, 2025

जब पत्रकार ही खबरों की हत्या करने लगें

संपादकीय | जब पत्रकार ही खबरों की हत्या करने लगें

लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींव स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता मानी जाती है। कहा जाता है कि पत्रकार समाज की आँख और कान होता है, जो सत्ता के अंधेरे को उजाले में लाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब यही पत्रकार सच को दफना दे, खबरों की हत्या कर दे, तो लोकतंत्र का क्या होगा?

आज “खबर न चलाने” की संस्कृति केवल चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध बनती जा रही है। दबाव, प्रलोभन, भय या सौदेबाज़ी के कारण जब जनहित से जुड़ी सूचनाएँ जनता तक नहीं पहुँचतीं, तब यह केवल पत्रकारिता का पतन नहीं, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार की हत्या है।

संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है। अनुच्छेद 19(1)(a) पत्रकार को बोलने का अधिकार देता है, पर अनुच्छेद 19(2) यह भी स्पष्ट करता है कि यह अधिकार जनहित के विरुद्ध नहीं हो सकता। जब कोई पत्रकार जानबूझकर सच छिपाता है, तो वह इस अधिकार का दुरुपयोग करता है।

दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि भारत में खबरों की हत्या को सीधे अपराध मानने वाला कोई स्पष्ट कानून नहीं है। हाँ, परिस्थितियों के अनुसार भारतीय दंड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत कार्रवाई संभव है, लेकिन यह सब अप्रत्यक्ष और सीमित है।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएँ नैतिक निंदा तो कर सकती हैं, पर दंड देने की शक्ति उनके पास नहीं है। यही कारण है कि खबरों की हत्या करने वाले अक्सर बेखौफ रहते हैं।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। क्योंकि अगर खबरें बिकने लगें, दबने लगें या सौदों का हिस्सा बन जाएँ, तो जनता सच और झूठ में फर्क कैसे करेगी? सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?

अब समय आ गया है कि देश यह तय करे—
क्या खबर दबाना सिर्फ अनैतिक कृत्य है या जनहित के खिलाफ अपराध?

ज़रूरत है:

खबर दबाने और जानबूझकर सूचना छिपाने को दंडनीय अपराध घोषित करने की

एक स्वतंत्र मीडिया लोकपाल की

और पत्रकारिता में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने की


क्योंकि अगर पत्रकार ही सच का गला घोंटने लगे,
तो याद रखना चाहिए—
खबरों की हत्या के बाद, बारी लोकतंत्र की होती है।

Friday, December 19, 2025

जैन धर्म: क्षत्रिय जन्म, परंतु कर्म प्रधान दर्शन

lसंपादकीय | जैन धर्म: क्षत्रिय जन्म, परंतु कर्म प्रधान दर्शन

भारतीय धार्मिक परंपरा में जैन धर्म को अक्सर किसी एक सामाजिक वर्ग से जोड़कर देखा जाता है। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या जैन धर्म क्षत्रिय कुल से जुड़ा हुआ था, और यदि हाँ, तो आज जैन समाज में व्यापारी वर्ग की प्रधानता क्यों दिखाई देती है। इस प्रश्न का उत्तर इतिहास, दर्शन और सामाजिक विकास—तीनों को साथ रखकर समझना आवश्यक है।

जैन परंपरा के अनुसार अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी क्षत्रिय कुल में जन्मे थे। उनके पिता राजा सिद्धार्थ और माता रानी त्रिशला थीं। इसी प्रकार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को भी इक्ष्वाकु वंश का क्षत्रिय राजा माना जाता है। जैन ग्रंथों में अधिकांश तीर्थंकरों का संबंध राजवंशों से बताया गया है। इस दृष्टि से यह कहना ऐतिहासिक रूप से गलत नहीं कि तीर्थंकरों का जन्म क्षत्रिय कुलों में हुआ।

लेकिन यहीं पर एक बड़ी भ्रांति जन्म लेती है। जैन धर्म जन्म आधारित श्रेष्ठता को नहीं, बल्कि कर्म आधारित उन्नति को स्वीकार करता है। जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है—आत्मा स्वतंत्र है, शुद्ध है और अपने कर्मों से बंधती तथा मुक्त होती है। न तो कोई ईश्वर किसी को ऊँचा-नीचा बनाता है और न ही जन्म किसी को मोक्ष का अधिकारी या अयोग्य ठहराता है।

महावीर स्वामी स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे राजा थे, परंतु उन्होंने राजसत्ता, वैभव और कुल-गौरव को त्यागकर संयम और तप का मार्ग चुना। जैन धर्म में राजा का महत्व उसके सिंहासन से नहीं, बल्कि उसके त्याग से तय होता है। यही कारण है कि जैन परंपरा में साधु सर्वोच्च आदर्श है—वह चाहे किसी भी कुल में जन्मा हो।

समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ बदलीं। युद्ध, हिंसा और सत्ता संघर्ष से दूरी बनाए रखने के लिए जैन समाज ने ऐसे व्यवसाय अपनाए जो अहिंसा के अधिक अनुकूल थे। व्यापार, लेखा, शिक्षा और दान—ये क्षेत्र जैन मूल्यों से सहज रूप से मेल खाते थे। परिणामस्वरूप जैन समाज में वैश्य वर्ग की संख्या बढ़ी। यह परिवर्तन धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और नैतिक चयन था।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन धर्म को किसी जाति या वर्ग के खांचे में बंद न किया जाए। जैन धर्म का संदेश स्पष्ट है—अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम। यह संदेश हर मनुष्य के लिए है, चाहे वह किसी भी कुल, वर्ग या पृष्ठभूमि से आता हो।

अंततः कहा जा सकता है कि जैन धर्म की जड़ें भले ही क्षत्रिय राजपरिवारों में दिखाई देती हों, लेकिन उसकी शाखाएँ और फल समस्त मानवता के लिए हैं। यह धर्म सत्ता से नहीं, साधना से; जन्म से नहीं, कर्म से; और बाहरी पहचान से नहीं, आंतरिक शुद्धता से मनुष्य का मूल्य तय करता है। यही जैन दर्शन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता और शक्ति है।

Thursday, December 18, 2025

विरोध से परिपक्वता तक

संपादकीय | विरोध से परिपक्वता तक

“मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ!”
यह पंक्तियाँ केवल शायरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का घोषवाक्य हैं। आज के दौर में, जहाँ असहमति को देशद्रोह और सवाल को साज़िश मान लिया जाता है, वहाँ यह सोच एक ज़रूरी हस्तक्षेप है।

लोकतंत्र का मूल स्वभाव ही प्रश्न करना है। सत्ता, समाज और विचार—तीनों तभी स्वस्थ रहते हैं जब उन पर सवाल उठते रहें। इतिहास गवाह है कि जिन व्यवस्थाओं ने आलोचना से मुँह मोड़ा, वे आत्ममुग्धता का शिकार होकर अंततः ढह गईं। इसके उलट, जिन समाजों ने विरोध को सुना, बहस को जगह दी और असहमति को सम्मान दिया, वे समय के साथ अधिक मज़बूत हुए।

आज दुर्भाग्य यह है कि विरोध करने वाला “दुश्मन” बना दिया जाता है। असहमति रखने वाला नागरिक नहीं, बल्कि “एजेंडा” माना जाता है। सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, भाषा में शिष्टता की जगह कटुता ने ले ली है। नतीजा यह कि संवाद टूट रहा है और लोकतंत्र शोर में बदलता जा रहा है।

वास्तव में विरोधी वह आईना होता है जो हमारी कमज़ोरियाँ दिखाता है। आलोचक वह शिक्षक है जो बिना शुल्क लिए हमें बेहतर बनने का अवसर देता है। जो व्यक्ति या सत्ता अपने आलोचकों का सम्मान करना सीख लेती है, वही परिपक्व कहलाने की हक़दार होती है। आत्मविश्वास तालियों से नहीं, सवालों से बनता है।

इसलिए ज़रूरत है कि हम विरोध को सहन करना नहीं, स्वीकार करना सीखें। असहमति से डरने के बजाय उससे संवाद करें। क्योंकि जो समाज अपने “दुश्मनों” का सम्मान करना जानता है, वही वास्तव में अपने लोकतंत्र की रक्षा करता है।

आज के भारत में यह सोच सिर्फ़ साहित्यिक सौंदर्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक आवश्यकता है। विरोध से सँवरने की क्षमता ही हमें भीड़ से नागरिक और सत्ता से लोकतंत्र बनाती है।

Tuesday, December 16, 2025

कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

संपादकीय | कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

देश के प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर निकलते हैं, तो वह केवल राजनयिक दौरा नहीं होता, बल्कि आर्थिक आत्मविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता है। निवेश, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी—इन सबका संदेश यही होता है कि देश आगे बढ़ रहा है। इसी बीच देश और राज्यों पर बढ़ते कर्ज़ के आँकड़े भी सामने आते हैं। हैरानी यह है कि इन आँकड़ों के बावजूद व्यवस्था निर्बाध चलती रहती है। सरकारें आश्वस्त हैं, योजनाएँ जारी हैं और घोषणाओं का सिलसिला थमता नहीं।

यही दृश्य आम नागरिक के मन में एक अजीब-सा आत्मविश्वास पैदा करता है। जब देश और प्रदेश कर्ज़ लेकर विकास का दावा कर सकते हैं, तो आम आदमी भी अपने सीमित दायरे में वही तर्क अपनाने लगता है। घरेलू बजट हो या व्यक्तिगत जीवन—उधार अब संकट नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा बनता जा रहा है। फर्क सिर्फ पैमाने का है, सोच की दिशा एक जैसी होती जा रही है।

सरकारें कर्ज़ को भविष्य के निवेश के रूप में प्रस्तुत करती हैं। कहा जाता है कि आज लिया गया कर्ज़ कल की समृद्धि का आधार बनेगा। पर सवाल यह है कि क्या हर कर्ज़ उत्पादक होता है? क्या हर उधार विकास में बदलता है, या फिर उसका बड़ा हिस्सा केवल व्यवस्था को चलाए रखने में खर्च हो जाता है? यही सवाल राज्यों के वित्त से लेकर आम आदमी की जेब तक समान रूप से लागू होता है।

चिंता का विषय यह नहीं है कि कर्ज़ लिया जा रहा है, बल्कि यह है कि कर्ज़ को सामान्य और अनिवार्य मान लिया गया है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कर्ज़ को सहजता से स्वीकार करते हैं, तो समाज के निचले स्तर तक यही संदेश जाता है कि उधार लेकर चलना कोई असामान्य बात नहीं। धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की जगह किस्तों की संस्कृति ले लेती है।

लोकतंत्र में सरकारें जवाबदेह होती हैं और आर्थिक फैसलों की समीक्षा ज़रूरी है। देश और राज्यों के कर्ज़ का बोझ आखिरकार जनता पर ही आता है—करों के रूप में, महंगाई के रूप में और भविष्य की सीमाओं के रूप में। इसलिए यह बहस जरूरी है कि विकास और कर्ज़ के बीच संतुलन कहाँ है।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ हों या राज्यों की विकास योजनाएँ—इनका मूल्यांकन केवल प्रतीकों और भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक परिणामों से होना चाहिए। उसी तरह, आम आदमी के लिए भी यह ज़रूरी है कि वह सरकारों से मिले ‘आत्मविश्वास’ को आँख बंद कर न अपनाए।

कर्ज़ पर चलती अर्थव्यवस्था कुछ समय तक रफ्तार बनाए रख सकती है, लेकिन स्थायी प्रगति के लिए वित्तीय अनुशासन अपरिहार्य है। वरना एक दिन यह सवाल केवल सरकारों से नहीं, बल्कि हर नागरिक से पूछा जाएगा—
“चल तो रहा था, लेकिन किस कीमत पर?”

Wednesday, December 10, 2025

विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

 विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

नासिक कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। मिट्टी, संस्कृति और अध्यात्म की सुगंध से बना यह आयोजन स्वयं में महान है। लेकिन विडंबना यह है कि उसी आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र—तपोवन—में आज 1700 से अधिक पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा गया है।

प्रश्न यह नहीं है कि कुंभ के लिए सुविधाएँ क्यों चाहिए। प्रश्न यह है कि सुविधाएँ प्रकृति की कीमत पर क्यों?
आज दुनिया सतत विकास की बात कर रही है। शहर आधुनिकता के साथ ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ को जोड़ रहे हैं। ऐसे समय में धार्मिक आयोजन के लिए हज़ारों पेड़ काटना नासिक को पीछे ले जाने वाला कदम है।

पेड़ केवल लकड़ी नहीं—एक जीवित तंत्र है। वे हवा शुद्ध करते हैं, मिट्टी को बाँधते हैं, गर्मी कम करते हैं और मानव–जीवन के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। तपोवन जैसे हरित क्षेत्र में पेड़ों की इतनी बड़ी कटाई न केवल पर्यावरणीय नुकसान है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत पर भी प्रहार है।

क्या विकल्प नहीं हैं?
बिल्कुल हैं। आधुनिक बायोटॉयलेट, पोर्टेबल सैनिटेशन यूनिट, मोबाइल वॉशरूम, और पर्यावरण-अनुकूल अस्थायी ढाँचे दुनिया के अनेक बड़े आयोजनों में अपनाए जा चुके हैं। यह ऐसे समाधान हैं जिनसे पेड़ों को छुए बिना आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह समय आत्मचिंतन का है। धार्मिक आयोजन के नाम पर प्रकृति का नुकसान हमारी आस्था का उद्देश्य नहीं हो सकता।
तपोवन को बचाना केवल 1700 पेड़ों को बचाना नहीं है—यह नासिक की पहचान, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रखना है।

अब नागरिकों को जिम्मेदारी के साथ अपनी आवाज़ उठानी होगी ताकि विकास और पर्यावरण एक साथ चल सकें।

Monday, December 8, 2025

कविता: शरीर और मन का अनुनाद



1️⃣ कविता: शरीर और मन का अनुनाद

सांसों की चुप रोशनी में,
मन का एक चराग जलता है।
शरीर की थकी गलियों में,
शांति का कोई पंछी पलता है।

जब धड़कनें विचारों के साथ
एक ही लय में चलती हैं,
तब भीतर का टूटा संगीत
फिर से सुर पाता है।

तन की मिट्टी और मन का आकाश,
दोनों एक ही क्षण में खुलते हैं,
और इंसान अपने भीतर छिपा
सच पहचानने लगता है।

न कोई युद्ध, न कोई शोर—
सिर्फ भीतर का धीमा कंपन।
जहाँ शरीर शांत, मन प्रसन्न,
और आत्मा गाती है—
"यही मेरा घर, यही मेरा ध्यान।"


2️⃣ संपादकीय: शरीर और मन का अनुनाद—समकालीन जीवन की गुम होती लय

हम आधुनिक दुनिया में तेज़ी से भागते हुए अक्सर भूल जाते हैं कि इंसान दो हिस्सों में बँटा हुआ नहीं है—एक शरीर और दूसरा मन। वास्तविकता यह है कि दोनों एक ही समग्र अस्तित्व के दो स्वर हैं। जब ये स्वर तालमेल में होते हैं, तभी जीवन का संगीत पूर्ण होता है; और जब इनमें दरार पड़ती है, तो हमारा पूरा अस्तित्व असंतुलन में डगमगाने लगता है।

आज का मनुष्य तनाव, भागदौड़ और अनिश्चितताओं के बीच जी रहा है। तकनीक की चमक और सूचनाओं की बाढ़ के बीच मन लगातार उत्तेजित रहता है, जबकि शरीर अनियमित जीवनशैली की मार झेलता है। परिणाम यह कि दोनों की लय टूट जाती है। यही टूटन चिंता, अनिद्रा, अवसाद और थकान के रूप में सामने आती है।

शरीर–मन अनुनाद कोई अध्यात्मिक कल्पना नहीं है; यह विज्ञान और व्यवहार दोनों की कसौटी पर खरी उतरने वाली वास्तविकता है। ध्यान, श्वास साधना और सचेत चाल-ढाल आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य-विज्ञान द्वारा स्वीकार की जा चुकी प्रक्रियाएँ हैं। यह प्रमाणित है कि धीमी और गहरी सांसें मस्तिष्क के तनाव केंद्रों को शांत करती हैं, और बदले में शरीर के हार्मोनल तंत्र को संतुलित करती हैं।

दूसरी ओर, शरीर की उपेक्षा सीधे मन की गुणवत्ता पर चोट करती है। खराब नींद, असंतुलित भोजन या निष्क्रियता केवल शारीरिक बीमारियाँ नहीं लातीं—वे विचारों को धुँधला, भावनाओं को चिड़चिड़ा और निर्णयों को अस्थिर बनाती हैं।

समस्या यह नहीं कि मनुष्य व्यस्त है; समस्या यह है कि वह अपनी लय से कट चुका है।
समाधान भी उतना ही सरल है—
शांत सांसें, सचेत अस्तित्व, और शरीर व मन के बीच संवाद।

आज की दुनिया को सिर्फ तेज़ गति नहीं, बल्कि सही लय की आवश्यकता है।
और यह लय तब मिलती है जब हम स्वीकार करते हैं कि शरीर और मन विरोध नहीं, बल्कि साथी हैं—एक-दूसरे की ऊर्जा को बढ़ाने वाले।

हमारे समाज, शिक्षा और कार्य-संस्कृति को भी इस समझ को अपनाने की ज़रूरत है। जीवन की गुणवत्ता केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि आंतरिक लय के संतुलन से तय होती है।

शरीर और मन के इस अनुनाद को पुनः खोज लेना, आधुनिक मनुष्य के लिए न केवल उपयोगी बल्कि आवश्यक है — क्योंकि लय में होता मनुष्य  सक्षम और शांत होता है।



Monday, December 1, 2025

राजभवन से ‘लोक भवन’ तक — नाम बदलने के पीछे की राजनीति और प्रतीकवाद

संपादकीय

राजभवन से ‘लोक भवन’ तक — नाम बदलने के पीछे की राजनीति और प्रतीकवाद

उत्तराखंड सरकार द्वारा राजभवन का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ रखना सिर्फ एक नामांतरण नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक बयान है—एक ऐसा बयान जो प्रतीकों की राजनीति, सत्ता की वैचारिक दिशा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को नए सांचे में ढालने की कोशिशों को सामने लाता है।

राजभवन भारतीय संघीय लोकतंत्र में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का प्रतीक रहा है। औपनिवेशिक काल से निकली इस संस्था की अपनी जड़ें और परंपराएँ हैं। लेकिन नाम में ‘राज’ शब्द को बदलकर ‘लोक’ करना उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है जो सत्ता प्रतिष्ठानों को जनता-केंद्रित दिखाने की कोशिश में लगातार आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव बताता है कि सत्ता जनसंपर्क और प्रतीकों के अर्थ बदलकर एक नई राजनीतिक भाषा निर्मित करना चाहती है।

सवाल यह नहीं कि नाम ‘लोक भवन’ अच्छा है या बुरा; सवाल यह है कि क्या नाम बदलने भर से संस्थाओं का लोकतांत्रिक चरित्र मजबूत हो जाता है? राज्यपाल की भूमिका, केंद्र-राज्य संबंधों की जटिलताएँ, और संविधान की मर्यादा—ये सब मुद्दे जस के तस बने हुए हैं। नाम बदलने से न तो संवैधानिक जवाबदेही बढ़ती है, न ही संस्थागत पारदर्शिता अपने आप स्थापित होती है।

उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ शासन संरचनाएँ अब भी विकास, पारदर्शिता और जवाबदेही की चुनौतियों से जूझ रही हैं, नाम परिवर्तन को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि सरकार रूपक और प्रतीकवाद को वास्तविक काम पर तरजीह दे रही है। यह बदलाव ज़्यादा प्रभावी होता अगर इसके साथ राज्यपाल कार्यालय की कार्यप्रणाली में सुधार, जनता से संचार को मजबूत करने, और संविधानिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता जैसे कदम भी जुड़े होते।

‘लोक भवन’ नामकरण एक सकारात्मक संकेत हो सकता है—अगर इसके साथ प्रशासनिक संस्कृति भी ‘लोक’ यानी जनता की ओर उन्मुख हो। लेकिन अगर यह सिर्फ राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बनकर रह गया, तो यह भी अन्य नामांतरणों की तरह केवल शोर पैदा करेगा, परिवर्तन नहीं।

लोकतंत्र में प्रतीक मायने रखते हैं, लेकिन प्रतीकों से पहले ज़रूरत है संस्थाओं को मजबूत करने की। राजभवन चाहे ‘राज’ कहलाए या ‘लोक’, उसकी भूमिका तभी सार्थक होगी जब वह संविधान की आत्मा, जनहित और निष्पक्षता के मूल्यों को निभाए।

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...