Tuesday, December 16, 2025

कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

संपादकीय | कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

देश के प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर निकलते हैं, तो वह केवल राजनयिक दौरा नहीं होता, बल्कि आर्थिक आत्मविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता है। निवेश, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी—इन सबका संदेश यही होता है कि देश आगे बढ़ रहा है। इसी बीच देश और राज्यों पर बढ़ते कर्ज़ के आँकड़े भी सामने आते हैं। हैरानी यह है कि इन आँकड़ों के बावजूद व्यवस्था निर्बाध चलती रहती है। सरकारें आश्वस्त हैं, योजनाएँ जारी हैं और घोषणाओं का सिलसिला थमता नहीं।

यही दृश्य आम नागरिक के मन में एक अजीब-सा आत्मविश्वास पैदा करता है। जब देश और प्रदेश कर्ज़ लेकर विकास का दावा कर सकते हैं, तो आम आदमी भी अपने सीमित दायरे में वही तर्क अपनाने लगता है। घरेलू बजट हो या व्यक्तिगत जीवन—उधार अब संकट नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा बनता जा रहा है। फर्क सिर्फ पैमाने का है, सोच की दिशा एक जैसी होती जा रही है।

सरकारें कर्ज़ को भविष्य के निवेश के रूप में प्रस्तुत करती हैं। कहा जाता है कि आज लिया गया कर्ज़ कल की समृद्धि का आधार बनेगा। पर सवाल यह है कि क्या हर कर्ज़ उत्पादक होता है? क्या हर उधार विकास में बदलता है, या फिर उसका बड़ा हिस्सा केवल व्यवस्था को चलाए रखने में खर्च हो जाता है? यही सवाल राज्यों के वित्त से लेकर आम आदमी की जेब तक समान रूप से लागू होता है।

चिंता का विषय यह नहीं है कि कर्ज़ लिया जा रहा है, बल्कि यह है कि कर्ज़ को सामान्य और अनिवार्य मान लिया गया है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कर्ज़ को सहजता से स्वीकार करते हैं, तो समाज के निचले स्तर तक यही संदेश जाता है कि उधार लेकर चलना कोई असामान्य बात नहीं। धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की जगह किस्तों की संस्कृति ले लेती है।

लोकतंत्र में सरकारें जवाबदेह होती हैं और आर्थिक फैसलों की समीक्षा ज़रूरी है। देश और राज्यों के कर्ज़ का बोझ आखिरकार जनता पर ही आता है—करों के रूप में, महंगाई के रूप में और भविष्य की सीमाओं के रूप में। इसलिए यह बहस जरूरी है कि विकास और कर्ज़ के बीच संतुलन कहाँ है।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ हों या राज्यों की विकास योजनाएँ—इनका मूल्यांकन केवल प्रतीकों और भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक परिणामों से होना चाहिए। उसी तरह, आम आदमी के लिए भी यह ज़रूरी है कि वह सरकारों से मिले ‘आत्मविश्वास’ को आँख बंद कर न अपनाए।

कर्ज़ पर चलती अर्थव्यवस्था कुछ समय तक रफ्तार बनाए रख सकती है, लेकिन स्थायी प्रगति के लिए वित्तीय अनुशासन अपरिहार्य है। वरना एक दिन यह सवाल केवल सरकारों से नहीं, बल्कि हर नागरिक से पूछा जाएगा—
“चल तो रहा था, लेकिन किस कीमत पर?”

Wednesday, December 10, 2025

विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

 विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

नासिक कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। मिट्टी, संस्कृति और अध्यात्म की सुगंध से बना यह आयोजन स्वयं में महान है। लेकिन विडंबना यह है कि उसी आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र—तपोवन—में आज 1700 से अधिक पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा गया है।

प्रश्न यह नहीं है कि कुंभ के लिए सुविधाएँ क्यों चाहिए। प्रश्न यह है कि सुविधाएँ प्रकृति की कीमत पर क्यों?
आज दुनिया सतत विकास की बात कर रही है। शहर आधुनिकता के साथ ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ को जोड़ रहे हैं। ऐसे समय में धार्मिक आयोजन के लिए हज़ारों पेड़ काटना नासिक को पीछे ले जाने वाला कदम है।

पेड़ केवल लकड़ी नहीं—एक जीवित तंत्र है। वे हवा शुद्ध करते हैं, मिट्टी को बाँधते हैं, गर्मी कम करते हैं और मानव–जीवन के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। तपोवन जैसे हरित क्षेत्र में पेड़ों की इतनी बड़ी कटाई न केवल पर्यावरणीय नुकसान है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत पर भी प्रहार है।

क्या विकल्प नहीं हैं?
बिल्कुल हैं। आधुनिक बायोटॉयलेट, पोर्टेबल सैनिटेशन यूनिट, मोबाइल वॉशरूम, और पर्यावरण-अनुकूल अस्थायी ढाँचे दुनिया के अनेक बड़े आयोजनों में अपनाए जा चुके हैं। यह ऐसे समाधान हैं जिनसे पेड़ों को छुए बिना आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह समय आत्मचिंतन का है। धार्मिक आयोजन के नाम पर प्रकृति का नुकसान हमारी आस्था का उद्देश्य नहीं हो सकता।
तपोवन को बचाना केवल 1700 पेड़ों को बचाना नहीं है—यह नासिक की पहचान, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रखना है।

अब नागरिकों को जिम्मेदारी के साथ अपनी आवाज़ उठानी होगी ताकि विकास और पर्यावरण एक साथ चल सकें।

Monday, December 8, 2025

कविता: शरीर और मन का अनुनाद



1️⃣ कविता: शरीर और मन का अनुनाद

सांसों की चुप रोशनी में,
मन का एक चराग जलता है।
शरीर की थकी गलियों में,
शांति का कोई पंछी पलता है।

जब धड़कनें विचारों के साथ
एक ही लय में चलती हैं,
तब भीतर का टूटा संगीत
फिर से सुर पाता है।

तन की मिट्टी और मन का आकाश,
दोनों एक ही क्षण में खुलते हैं,
और इंसान अपने भीतर छिपा
सच पहचानने लगता है।

न कोई युद्ध, न कोई शोर—
सिर्फ भीतर का धीमा कंपन।
जहाँ शरीर शांत, मन प्रसन्न,
और आत्मा गाती है—
"यही मेरा घर, यही मेरा ध्यान।"


2️⃣ संपादकीय: शरीर और मन का अनुनाद—समकालीन जीवन की गुम होती लय

हम आधुनिक दुनिया में तेज़ी से भागते हुए अक्सर भूल जाते हैं कि इंसान दो हिस्सों में बँटा हुआ नहीं है—एक शरीर और दूसरा मन। वास्तविकता यह है कि दोनों एक ही समग्र अस्तित्व के दो स्वर हैं। जब ये स्वर तालमेल में होते हैं, तभी जीवन का संगीत पूर्ण होता है; और जब इनमें दरार पड़ती है, तो हमारा पूरा अस्तित्व असंतुलन में डगमगाने लगता है।

आज का मनुष्य तनाव, भागदौड़ और अनिश्चितताओं के बीच जी रहा है। तकनीक की चमक और सूचनाओं की बाढ़ के बीच मन लगातार उत्तेजित रहता है, जबकि शरीर अनियमित जीवनशैली की मार झेलता है। परिणाम यह कि दोनों की लय टूट जाती है। यही टूटन चिंता, अनिद्रा, अवसाद और थकान के रूप में सामने आती है।

शरीर–मन अनुनाद कोई अध्यात्मिक कल्पना नहीं है; यह विज्ञान और व्यवहार दोनों की कसौटी पर खरी उतरने वाली वास्तविकता है। ध्यान, श्वास साधना और सचेत चाल-ढाल आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य-विज्ञान द्वारा स्वीकार की जा चुकी प्रक्रियाएँ हैं। यह प्रमाणित है कि धीमी और गहरी सांसें मस्तिष्क के तनाव केंद्रों को शांत करती हैं, और बदले में शरीर के हार्मोनल तंत्र को संतुलित करती हैं।

दूसरी ओर, शरीर की उपेक्षा सीधे मन की गुणवत्ता पर चोट करती है। खराब नींद, असंतुलित भोजन या निष्क्रियता केवल शारीरिक बीमारियाँ नहीं लातीं—वे विचारों को धुँधला, भावनाओं को चिड़चिड़ा और निर्णयों को अस्थिर बनाती हैं।

समस्या यह नहीं कि मनुष्य व्यस्त है; समस्या यह है कि वह अपनी लय से कट चुका है।
समाधान भी उतना ही सरल है—
शांत सांसें, सचेत अस्तित्व, और शरीर व मन के बीच संवाद।

आज की दुनिया को सिर्फ तेज़ गति नहीं, बल्कि सही लय की आवश्यकता है।
और यह लय तब मिलती है जब हम स्वीकार करते हैं कि शरीर और मन विरोध नहीं, बल्कि साथी हैं—एक-दूसरे की ऊर्जा को बढ़ाने वाले।

हमारे समाज, शिक्षा और कार्य-संस्कृति को भी इस समझ को अपनाने की ज़रूरत है। जीवन की गुणवत्ता केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि आंतरिक लय के संतुलन से तय होती है।

शरीर और मन के इस अनुनाद को पुनः खोज लेना, आधुनिक मनुष्य के लिए न केवल उपयोगी बल्कि आवश्यक है — क्योंकि लय में होता मनुष्य  सक्षम और शांत होता है।



Monday, December 1, 2025

राजभवन से ‘लोक भवन’ तक — नाम बदलने के पीछे की राजनीति और प्रतीकवाद

संपादकीय

राजभवन से ‘लोक भवन’ तक — नाम बदलने के पीछे की राजनीति और प्रतीकवाद

उत्तराखंड सरकार द्वारा राजभवन का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ रखना सिर्फ एक नामांतरण नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक बयान है—एक ऐसा बयान जो प्रतीकों की राजनीति, सत्ता की वैचारिक दिशा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को नए सांचे में ढालने की कोशिशों को सामने लाता है।

राजभवन भारतीय संघीय लोकतंत्र में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का प्रतीक रहा है। औपनिवेशिक काल से निकली इस संस्था की अपनी जड़ें और परंपराएँ हैं। लेकिन नाम में ‘राज’ शब्द को बदलकर ‘लोक’ करना उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है जो सत्ता प्रतिष्ठानों को जनता-केंद्रित दिखाने की कोशिश में लगातार आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव बताता है कि सत्ता जनसंपर्क और प्रतीकों के अर्थ बदलकर एक नई राजनीतिक भाषा निर्मित करना चाहती है।

सवाल यह नहीं कि नाम ‘लोक भवन’ अच्छा है या बुरा; सवाल यह है कि क्या नाम बदलने भर से संस्थाओं का लोकतांत्रिक चरित्र मजबूत हो जाता है? राज्यपाल की भूमिका, केंद्र-राज्य संबंधों की जटिलताएँ, और संविधान की मर्यादा—ये सब मुद्दे जस के तस बने हुए हैं। नाम बदलने से न तो संवैधानिक जवाबदेही बढ़ती है, न ही संस्थागत पारदर्शिता अपने आप स्थापित होती है।

उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ शासन संरचनाएँ अब भी विकास, पारदर्शिता और जवाबदेही की चुनौतियों से जूझ रही हैं, नाम परिवर्तन को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि सरकार रूपक और प्रतीकवाद को वास्तविक काम पर तरजीह दे रही है। यह बदलाव ज़्यादा प्रभावी होता अगर इसके साथ राज्यपाल कार्यालय की कार्यप्रणाली में सुधार, जनता से संचार को मजबूत करने, और संविधानिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता जैसे कदम भी जुड़े होते।

‘लोक भवन’ नामकरण एक सकारात्मक संकेत हो सकता है—अगर इसके साथ प्रशासनिक संस्कृति भी ‘लोक’ यानी जनता की ओर उन्मुख हो। लेकिन अगर यह सिर्फ राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बनकर रह गया, तो यह भी अन्य नामांतरणों की तरह केवल शोर पैदा करेगा, परिवर्तन नहीं।

लोकतंत्र में प्रतीक मायने रखते हैं, लेकिन प्रतीकों से पहले ज़रूरत है संस्थाओं को मजबूत करने की। राजभवन चाहे ‘राज’ कहलाए या ‘लोक’, उसकी भूमिका तभी सार्थक होगी जब वह संविधान की आत्मा, जनहित और निष्पक्षता के मूल्यों को निभाए।

Sunday, November 23, 2025

काले मुर्गे की बढ़ती मांग: अंधविश्वास की वापसी या बेरोज़गारी का नया बाजार?

संपादकीय

काले मुर्गे की बढ़ती मांग: अंधविश्वास की वापसी या बेरोज़गारी का नया बाजार?

उत्तराखंड एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ आस्था और अंधविश्वास, विज्ञान और तंत्रवाद, और रोजगार व बाज़ार—तीनों की टकराहट साफ देखी जा सकती है। हाल के दिनों में मषण पूजन, झाड़–फूंक और तांत्रिक अनुष्ठानों की बढ़ती चर्चा के साथ काले मुर्गों की मांग में अचानक उछाल आना कोई संयोग नहीं है।

पहाड़ के कई इलाकों में काले मुर्गे बाजार में आमतौर पर मिलने वाली कीमत से कई गुना अधिक दामों पर बेचे जा रहे हैं। इसकी वजह न वैज्ञानिक है, न आर्थिक—बल्कि समाज में फैलती वह मनोवृत्ति है जहाँ समाधान की तलाश तर्क में नहीं बल्कि डर और आस्था में की जा रही है।

अंधविश्वास का बाज़ार

उत्तराखंड की पहाड़ी बसावटें सदियों से अपने लोकदेवताओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जानी जाती रही हैं। यह परंपराएँ समाज को जोड़ने का काम करती थीं। लेकिन अब इन्हीं परंपराओं की आड़ में एक ऐसा अंधविश्वास पनप रहा है जो न सिर्फ लोगों को भ्रमित कर रहा है, बल्कि उसे एक ‘कमाई का साधन’ भी बनाया जा रहा है।

कुछ लोगों द्वारा प्रचारित यह धारणा कि काले मुर्गे से “उपरी बाधा”, “बुरी नजर” या “ग्रह दोष” दूर हो सकते हैं, न सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टि का क्षय है बल्कि लोगों की कमजोरियों का शोषण भी है।

दुर्भाग्य यह है कि यही अंधविश्वास अब व्यापार बन गया है।

बेरोज़गारी और भ्रमित विकल्प

राज्य में बेरोज़गारी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में युवा किसी भी नए रोज़गार मॉडल की तरफ आकर्षित होते हैं। मुर्गी पालन एक बेहतर और व्यावहारिक व्यवसाय हो सकता है, लेकिन जब उसका आधार अंधविश्वास बन जाए तो समाज के सामने नई समस्याएँ खड़ी होती हैं।

यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या उत्तराखंड के युवाओं का भविष्य ऐसे व्यवसाय पर टिक सकता है जो तर्कहीन मान्यताओं पर आधारित हो?
अगर रोजगार की दिशा अज्ञान, डर, और तांत्रिक प्रथाओं पर निर्भर होने लगे, तो यह प्रगति नहीं, पिछड़ापन है।

क्या हम पुराने दौर की ओर लौट रहे हैं?

गाँवों में बढ़ती झाड़–फूंक संस्कृति, बीमारी का इलाज मेडिकल सेंटर की बजाय अनुष्ठान से करवाना, और सामाजिक संकटों का हल तांत्रिक तरीकों में ढूँढ़ना—ये सब संकेत हैं कि हम वैज्ञानिक सोच से दूर होते जा रहे हैं।
यह वही रास्ता है जो समाज को विकास से नहीं, बल्कि भ्रम की खाई में ले जाता है।

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और आपदाग्रस्त राज्य में वैज्ञानिक चेतना न सिर्फ ज़रूरी है बल्कि जीवनरक्षक भी है। ऐसे में अंधविश्वास का बढ़ना एक खतरनाक संदेश देता है।

आगे की दिशा

समाधान सरकार या समाज—दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

स्कूलों और गांवों में वैज्ञानिक चेतना के कार्यक्रम

स्वास्थ्य सुविधाओं और मानसिक परामर्श तक आसान पहुंच

प्रशासन द्वारा अवैध तांत्रिक गतिविधियों पर रोक

आधुनिक पशुपालन और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा

मीडिया द्वारा संतुलित, तथ्यपूर्ण रिपोर्टिंग


यह जरूरी है कि हम रोजगार दें—लेकिन ऐसा रोजगार जो तर्क, तकनीक, और सृजनशीलता पर आधारित हो, न कि भय और अंधविश्वास पर।



काला मुर्गा समस्या नहीं है—वह केवल एक प्रतीक है।
समस्या वह सोच है जो आज भी हमारे समाज के बड़े हिस्से को जकड़े हुए है।

उत्तराखंड को आगे बढ़ना है तो रास्ता विज्ञान से होकर गुजरेगा, न कि उन काले मुर्गों से जिनकी कीमत आज आस्था के नाम पर लगातार बढ़ रही है।

Saturday, November 22, 2025

**Journalism in the Age of Labor Codes: A New Chapter of Rights or the End of Old Protections?**


**Journalism in the Age of Labor Codes: A New Chapter of Rights or the End of Old Protections?**


The implementation of four labor codes by the central government has marked a decisive shift in the country's labor landscape. These codes formally abolished 29 outdated labor laws. In the same vein, three important laws related to journalists and the press industry—the *Working Journalists Act*, the *Working Journalists' Wages Act*, and the *Trade Unions Act*—have also become part of history.


This change is not merely a matter of renaming laws or consolidating them into a single folder; it marks a turning point in the structure of rights, protections, and professional dignity in Indian journalism.


### **Broader Definition—A Positive Step**


Amending the Working Journalists Act and incorporating it into an industry-specific code is a welcome step in that the definition of a journalist has become more contemporary.


Today, the largest segment of media is electronic, digital, and audio-visual platforms, employing millions—yet, surprisingly, these journalists did not receive the same protections as print journalists under the old law.


The new definition eliminates this disparity and acknowledges the changing reality of media.


### **But concerns are not without**


While this change is in keeping with modernity, a major debate has been suppressed in the process—

**Will the special protections afforded to journalists now be weakened?**


The old laws provided journalists with a distinct identity, distinct rights, and a unique protection framework. The wage board system, limitations on disciplinary action, special protections against arbitrary dismissal, and a specific interpretation of employer-employee relations—all these distinguished journalism from a general industry.


The new Code now includes journalists within the broader scope of general industries. This threatens to upset the balance between industry interests and editorial autonomy.


### **Potential Impact on Press Freedom**


When journalists' rights are weakened, press freedom ultimately suffers. Journalists working in an insecure, unstable, and uncertain environment often hesitate to report boldly against powerful forces, corporate pressure, or organizational interests.


Therefore, the question isn't just about employment; it's about strengthening the fourth pillar of democracy.


### **Responsibility of both the government and the media**


The responsibility doesn't end with the implementation of labor codes. The real test will now be:

to what extent the rules established under the codes protect the actual rights and protections of journalists.


Media owners also have a moral obligation to use the technical reforms in the law not to weaken journalists' protections, but to make media houses more transparent and accountable.


### **Finally…**


The four labor codes are an attempt to simplify and streamline India's industrial structure. But journalism isn't just an industry—it's the heartbeat of democracy.

The new codes certainly provide a modern framework, but this framework will only be meaningful if journalists' rights are protected, their voices are safeguarded, and the press remains the watchdog of the people, not of power.


This is a time of both excitement and concern.


This is a time to be vigilant.

Thursday, November 20, 2025

प्रारंभिक बचपन में समय पर पहचान और हस्तक्षेप से बदलेगा बच्चों का भविष्य: Udaen Foundation



Udaen Foundation
दिनांक: 21/11/2025
स्थान: 


Udaen Foundation ने कहा है कि जन्म से छह वर्ष तक की आयु बच्चों के मस्तिष्क विकास का सबसे संवेदनशील और तेज़ चरण होता है। इस अवधि में समय पर की गई जांच, मूल्यांकन और सही हस्तक्षेप बच्चों के जीवन में दीर्घकालिक सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

फाउंडेशन के अध्यक्ष दीनेश पाल सिंह गुसाईं ने बताया कि प्रारंभिक जांच न केवल दिव्यांगता के शुरुआती संकेतों की पहचान सुनिश्चित करती है, बल्कि विकास में देरी वाले बच्चों को सही दिशा और सुविधाएँ उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण है। इससे परिवारों को सही मार्गदर्शन मिलता है और वे सरकारी योजनाओं एवं संस्थागत सेवाओं का लाभ आसानी से ले सकते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रारंभिक हस्तक्षेप से बच्चों में भाषा, संज्ञानात्मक क्षमता, मोटर स्किल और सामाजिक-भावनात्मक कौशल जैसे आवश्यक विकासात्मक गुण अधिक प्रभावी ढंग से विकसित होते हैं। यह उन्हें स्कूल और समाज में बेहतर भागीदारी के लिए तैयार करता है।

Udaen Foundation ने राष्ट्रीय स्तर पर दिव्यांगजन सशक्तिकरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे प्रमुख संस्थानों—
DDU-NIPPD, NIEPID, SVNIRTAR कट्टक, NIEPVD, AYJNISHD, अटल बिहारी वाजपेयी दिव्यांगजन खेल प्रशिक्षण केंद्र, CRC लखनऊ और CRC गोरखपुर—की सेवाओं की सराहना की। फाउंडेशन ने कहा कि ये संस्थान देशभर में बच्चों की प्रारंभिक पहचान, थेरेपी, पुनर्वास और परामर्श सेवाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

अध्यक्ष दीनेश पाल सिंह गुसाईं ने कहा कि “यदि समाज, संस्थान और परिवार मिलकर कार्य करें, तो प्रारंभिक बचपन से ही दिव्यांग बच्चों के जीवन को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है। हमारा लक्ष्य है—सशक्त दिव्यांगजन, समर्थ भारत।”

मीडिया संपर्क

दिनेश पाल सिंह गुसाईं 
अध्यक्ष, Udaen Foundation
मोबाइल: 6395501520
ईमेल: udaenhimalya@gmail.com

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

विधानसभा की गरिमा और जनप्रतिनिधित्व: संसदीय परंपरा बनाम व्यवहारिक राजनीति का द्वंद्व

✍️ संपादकीय विधानसभा की गरिमा और जनप्रतिनिधित्व: संसदीय परंपरा बनाम व्यवहारिक राजनीति का द्वंद्व लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधानसभा केवल कानू...