Friday, December 26, 2025
बड़े मन की राजनीति
सबको अपने हिस्से की भूख मिलती है, पर सबको अपने हिस्से का भात नहीं मिलता
“अपने को बताना कोई अध्यात्म नहीं, दूसरे को जानना अध्यात्म है।”
Monday, December 22, 2025
संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?
संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?
क्यों पहाड़ियों के पीछे पड़े हो?
यह सवाल आज सिर्फ़ एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे देश की विकास-दृष्टि पर प्रश्नचिह्न है। पहाड़ इसलिए निशाने पर हैं क्योंकि वे अब पहले जैसे प्रहरी नहीं रहे—न अपने जंगलों के, न अपनी ज़मीन के, न अपने भविष्य के।
एक समय था जब पहाड़ी समाज खुद अपनी रक्षा-रेखा था। जंगल कटता तो आवाज़ उठती थी, नदी रोकी जाती तो विरोध होता था, ज़मीन छीनी जाती तो संघर्ष खड़ा हो जाता था। आज वही समाज रोज़गार की मजबूरी, पलायन, और राजनीतिक उपेक्षा के चलते बिखर चुका है। प्रहरी कमजोर नहीं हुआ, उसे अकेला छोड़ दिया गया।
अरावली की स्थिति इस सच्चाई की गवाही देती है। जब किसी पहाड़ी श्रृंखला को सिर्फ़ खनन, रियल एस्टेट और त्वरित मुनाफ़े की नज़र से देखा जाता है, तो वह पहाड़ नहीं, मलबा बन जाती है। अरावली आज चेतावनी है—कल उत्तराखंड का आईना। फर्क बस इतना है कि यहाँ आपदा भूस्खलन बनकर आती है, वहाँ धूल बनकर उड़ती है।
उत्तराखंड का पहाड़ी आज ना घर का रहा, ना घाट का।
गाँव उजड़ गए, शहरों ने अपनाया नहीं।
खेती छूटी, नौकरी मिली नहीं।
संस्कृति पीछे छूट गई, पहचान अधूरी रह गई।
यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि नीतिगत अंधेपन का नतीजा है। विकास के नाम पर पहाड़ को संसाधन समझा गया, समाज नहीं। सड़कें बनीं, पर रोज़गार नहीं। परियोजनाएँ आईं, पर स्थानीय भागीदारी नहीं। फैसले हुए, पर पहाड़ से पूछकर नहीं।
असल सवाल यह नहीं कि पहााड़ियों के पीछे क्यों पड़े हो,
असल सवाल यह है कि पहााड़ी खुद अपने पीछे क्यों नहीं खड़े हो रहे?
जब तक पहाड़ के मुद्दे चुनावी एजेंडा नहीं बनेंगे,
जब तक पर्यावरण, पलायन, स्थानीय रोजगार और भूमि अधिकार नीति के केंद्र में नहीं आएँगे,
और जब तक पहाड़ी समाज खुद संगठित होकर सवाल नहीं पूछेगा—
तब तक पहाड़ सिर्फ़ भावनाओं में जिएगा, नीतियों में नहीं।
आज ज़रूरत है पहाड़ को बचाने की नहीं,
पहाड़ को फिर से प्रहरी बनाने की।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
जब पहाड़ ढह रहा था, तब हम चुप क्यों थे?
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