Wednesday, February 12, 2025

लघुचित्र परंपरा (Miniature Painting Tradition) का परिचय



लघुचित्र (Miniature Painting) एक ऐसी चित्रकला परंपरा है जिसमें छोटे आकार में बारीक और जटिल चित्र बनाए जाते हैं। इन चित्रों में प्राकृतिक रंगों और महीन ब्रशवर्क का उपयोग होता है। भारत में यह परंपरा मध्यकाल (9वीं-19वीं शताब्दी) के दौरान फली-फूली।


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🔷 लघुचित्र परंपरा की विशेषताएँ

✅ छोटे आकार – सामान्यतः 5x7 इंच से लेकर 12x16 इंच तक।
✅ प्राकृतिक रंगों का प्रयोग – पत्तियों, पत्थरों, सोने-चाँदी के पाउडर से बने रंग।
✅ बारीक ब्रशवर्क – गिलहरी और गिलहरी के बच्चों के बालों से बने ब्रशों का उपयोग।
✅ धार्मिक और पौराणिक विषय – रामायण, महाभारत, कृष्ण-लीला, शिव-पार्वती आदि।
✅ प्राकृतिक परिदृश्य – पहाड़, नदियाँ, बादल, जंगल, फूल-पत्तियाँ।
✅ स्थानीय संस्कृति का चित्रण – पारंपरिक वस्त्र, आभूषण, रीति-रिवाज।


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🔷 भारत में प्रमुख लघुचित्र परंपराएँ

1️⃣ पश्चिमी भारतीय शैली (9वीं-12वीं शताब्दी)

राजस्थान और गुजरात में विकसित हुई।

जैन ग्रंथों की चित्रकारी में प्रयोग की गई।

मुख्यतः पामलीफ (ताड़पत्र) पांडुलिपियों में चित्र बने।


2️⃣ मुगल लघुचित्र (16वीं-18वीं शताब्दी)

अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के संरक्षण में विकसित हुई।

ईरानी, तुर्की और भारतीय प्रभाव का मिश्रण।

प्रमुख चित्रकार: मंसूर, बिसनदास, अब्दुस्समद।


3️⃣ राजस्थानी लघुचित्र (17वीं-19वीं शताब्दी)

राजस्थान के विभिन्न राजाओं द्वारा संरक्षित।

प्रमुख शैलियाँ: मेवाड़, मारवाड़, बूँदी, किशनगढ़, जयपुर, जोधपुर।

विषय: कृष्ण-लीला, युद्ध दृश्य, रागमाला चित्रण।


4️⃣ पहाड़ी लघुचित्र (17वीं-19वीं शताब्दी)

हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में विकसित।

प्रमुख शैलियाँ: कांगड़ा, बसोहली, गढ़वाल, चंबा, मंडी।

मोलाराम जैसे कलाकारों ने इसे ऊँचाइयों तक पहुँचाया।


5️⃣ बंगाल और तंजावुर लघुचित्र (19वीं शताब्दी)

बंगाल शैली में जलरंगों का उपयोग हुआ।

तंजावुर (तमिलनाडु) शैली में सोने और रत्नों की सजावट की गई।



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🔷 गढ़वाल लघुचित्र परंपरा

गढ़वाल लघुचित्र कांगड़ा और बसोहली शैली से प्रेरित थी, लेकिन इसमें गढ़वाली संस्कृति, पहाड़ी परिदृश्य और भक्ति रस को प्रमुखता दी गई।

मोलाराम इस परंपरा के सबसे प्रसिद्ध कलाकार थे।

मुख्य विषय: कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, नंदा देवी यात्रा, गढ़वाली लोक जीवन।



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🔷 वर्तमान में लघुचित्र परंपरा

आज भी राजस्थान, हिमाचल, उत्तराखंड और तंजावुर में यह परंपरा जीवित है।

डिजिटल तकनीकों के साथ कलाकार इस कला को पुनर्जीवित कर रहे हैं।

भारत सरकार और विभिन्न संस्थाएँ इसे संरक्षित करने के लिए कार्य कर रही हैं।



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📌 निष्कर्ष:

लघुचित्र परंपरा भारत की सबसे पुरानी और समृद्ध चित्रकला परंपराओं में से एक है। गढ़वाल, कांगड़ा, राजस्थानी और मुगल शैलियाँ इसकी सबसे प्रमुख धारा रही हैं। यह कला आज भी अपनी सुंदरता और बारीकी के लिए विश्व प्रसिद्ध है।


मोला राम (Mola Ram): गढ़वाल चित्रकला के जनक



मोला राम (1743-1833) उत्तराखंड की गढ़वाल चित्रकला शैली के सबसे प्रसिद्ध कलाकार और विद्वान थे। वे न केवल एक महान चित्रकार थे बल्कि कवि, इतिहासकार और आध्यात्मिक विचारक भी थे।


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🔷 मोला राम का जीवन परिचय

जन्म: 1743 ईस्वी, श्रीनगर, गढ़वाल (उत्तराखंड)

परिवार: उनके पिता शिवराम भी एक चित्रकार और विद्वान थे।

संरक्षण: गढ़वाल के राजा जयकृत शाह और प्रद्युम्न शाह के राजदरबार में चित्रकार।

मृत्यु: 1833 ईस्वी



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🔷 मोला राम की चित्रकला की विशेषताएँ

✅ गढ़वाल शैली के प्रमुख कलाकार – उनकी चित्रकला कांगड़ा और बसोहली शैली से प्रेरित थी लेकिन उसमें स्थानीय गढ़वाली परंपरा जोड़ी गई।
✅ कृष्ण-भक्ति और शिव-पार्वती – उनकी कला में राधा-कृष्ण, गोपियों की रासलीला, शिव-पार्वती, नंदा देवी प्रमुख विषय थे।
✅ प्राकृतिक सौंदर्य – हिमालय, फूल, वृक्ष, नदियाँ, गढ़वाल के गाँवों का सुंदर चित्रण।
✅ कोमल रंग और बारीक ब्रशवर्क – उनके चित्रों में हल्के गुलाबी, पीले, हरे और नीले रंगों का प्रयोग किया गया।
✅ गढ़वाली लोक जीवन – उनके चित्रों में पहाड़ी समाज, स्त्रियों के आभूषण, पारंपरिक वेशभूषा और त्योहारों का चित्रण किया गया।


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🔷 मोला राम की प्रसिद्ध पेंटिंग्स

1️⃣ कृष्ण गोपियों के साथ – राधा-कृष्ण और गोपियों की रासलीला।
2️⃣ शिव-पार्वती हिमालय में – हिमालय की वादियों में शिव-पार्वती का दिव्य रूप।
3️⃣ नंदा देवी – उत्तराखंड की प्रमुख देवी, नंदा देवी की पूजा और यात्रा का चित्रण।
4️⃣ गढ़वाल के राजाओं के चित्र – राजा जयकृत शाह और प्रद्युम्न शाह के चित्र बनाए।
5️⃣ रामायण और महाभारत प्रसंग – राम-सीता, अर्जुन-कृष्ण के दृश्यों का चित्रण।


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🔷 मोला राम: एक कवि और इतिहासकार

उन्होंने गढ़वाल राज्य का इतिहास भी लिखा, जिसे "गढ़राजवंश कौ वर्णन" कहा जाता है।

उनकी कविताएँ संस्कृत और ब्रज भाषा में थीं और उनमें भक्ति रस देखने को मिलता है।

वे शिव और कृष्ण के भक्त थे और उनके काव्य में आध्यात्मिकता झलकती है।



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🔷 मोला राम की विरासत और योगदान

उन्होंने गढ़वाल में लघुचित्र परंपरा को समृद्ध किया और इसे एक पहचान दी।

उनकी चित्रकला की परंपरा उनके शिष्यों द्वारा आगे बढ़ाई गई।

वर्तमान में गढ़वाल विश्वविद्यालय और स्थानीय कला संस्थाएँ उनकी कृतियों को संरक्षित करने का प्रयास कर रही हैं।



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📌 निष्कर्ष:

मोला राम गढ़वाल चित्रकला के जनक थे और उन्होंने स्थानीय कला, संस्कृति और भक्ति परंपरा को चित्रों में संजोया। उनकी कृतियाँ गढ़वाल की अनमोल धरोहर हैं।


गढ़वाल चित्रकला (Garhwal Painting): उत्तराखंड की अनमोल कला



गढ़वाल चित्रकला 18वीं शताब्दी में विकसित हुई और इसे पहाड़ी चित्रकला की एक विशिष्ट शाखा माना जाता है। यह शैली अपनी कोमलता, प्राकृतिक सौंदर्य और भक्ति भाव के लिए प्रसिद्ध है।


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🔷 गढ़वाल चित्रकला की उत्पत्ति और इतिहास

गढ़वाल शैली का विकास श्रीनगर (गढ़वाल) में हुआ।

इसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई, लेकिन इसे प्रसिद्धि 18वीं शताब्दी में मिली।

यह शैली कांगड़ा और बसोहली चित्रकला से प्रभावित थी, लेकिन इसमें स्थानीय रंग और भावनाएँ जोड़ी गईं।

गढ़वाल नरेश प्रताप शाह, जयकृत शाह और सुदर्शन शाह इसके प्रमुख संरक्षक थे।



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🔷 गढ़वाल चित्रकला की विशेषताएँ

✅ प्राकृतिक सौंदर्य – हिमालय, नदियाँ, फूलों से भरे जंगल, रंगीन पक्षी।
✅ कोमल और भावनात्मक चेहरे – विशेष रूप से स्त्रियों के चेहरे को बहुत आकर्षक बनाया गया।
✅ कृष्ण-लीला और भक्ति रस – राधा-कृष्ण की प्रेम कहानियाँ, रामायण-महाभारत के प्रसंग।
✅ हल्के और कोमल रंगों का प्रयोग – लाल, गुलाबी, हरा, नीला, हल्का पीला।
✅ पारंपरिक गढ़वाली पहनावा – चित्रों में स्त्रियाँ पहाड़ी गहने और घाघरा-चोली पहनती हैं।
✅ स्थानीय जीवन का चित्रण – गाँवों के दृश्य, नंदा देवी यात्रा, हिमालय की संस्कृति।


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🔷 प्रमुख चित्रकार (गढ़वाल शैली के कलाकार)

🎨 मोलाराम (18वीं-19वीं शताब्दी)

गढ़वाल चित्रकला के सबसे प्रसिद्ध कलाकार।

उन्होंने राजा जयकृत शाह के संरक्षण में कई उत्कृष्ट पेंटिंग्स बनाईं।

उनके चित्रों में कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, हिमालय की सुंदरता को दर्शाया गया।

मोलाराम की प्रसिद्ध कृतियाँ –

कृष्ण गोपियों के साथ

शिव-पार्वती हिमालय में

श्रीनगर (गढ़वाल) का चित्रण



🎨 अज्ञात स्थानीय कलाकार

कई अन्य कलाकारों ने भी रामायण-महाभारत के दृश्य, देवी-देवताओं और गढ़वाली लोक संस्कृति को चित्रित किया।



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🔷 गढ़वाल चित्रकला की प्रमुख कृतियाँ

1️⃣ रास लीला – कृष्ण गोपियों के साथ नृत्य करते हुए।
2️⃣ शिव-पार्वती हिमालय में – पहाड़ों के बीच दिव्य प्रेम।
3️⃣ नंदा देवी यात्रा – उत्तराखंड की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा का चित्रण।
4️⃣ गढ़वाली लोक जीवन – गाँव के त्योहार, पहाड़ी महिलाओं की दिनचर्या।


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🔷 गढ़वाल चित्रकला की वर्तमान स्थिति

यह शैली समय के साथ लुप्त होती गई, लेकिन अब इसे पुनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं।

गढ़वाल विश्वविद्यालय और स्थानीय कलाकार इसे संरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।

डिजिटल युग में भी गढ़वाल चित्रकला को आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।



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📌 निष्कर्ष:

गढ़वाल चित्रकला कृष्ण भक्ति, हिमालय की सुंदरता और पहाड़ी संस्कृति का अद्भुत मिश्रण है। यह उत्तराखंड की कला और परंपरा की अमूल्य धरोहर है।

पहाड़ी चित्रकला (Pahari Painting): एक संक्षिप्त परिचय



पहाड़ी चित्रकला उत्तर भारत के हिमालयी क्षेत्रों, विशेषकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में विकसित हुई। यह मुख्य रूप से 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच फली-फूली और इसे भारतीय लघु चित्रकला (Miniature Painting) की एक प्रमुख शैली माना जाता है।


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🔷 पहाड़ी चित्रकला की प्रमुख विशेषताएँ

✅ देवी-देवताओं और धार्मिक विषयों का चित्रण – शिव-पार्वती, कृष्ण-लीला, रामायण और महाभारत के प्रसंग।
✅ प्राकृतिक सौंदर्य – पहाड़, नदियाँ, जंगल, फूल, पक्षी, और नीला-सुनहरा आकाश।
✅ मधुरता और कोमलता – आकृतियाँ सुकोमल होती हैं, विशेष रूप से स्त्रियाँ।
✅ प्रेम और भक्ति – कृष्ण-राधा, गोपियों के साथ कृष्ण की लीलाएँ, शिव-पार्वती का प्रेम।
✅ उज्ज्वल रंगों का प्रयोग – लाल, पीला, हरा, नीला जैसे गहरे और चमकीले रंग।


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🔷 प्रमुख पहाड़ी चित्रकला शैलियाँ

1️⃣ बसोहली शैली (Basohli Style) - 17वीं शताब्दी

✅ विशेषता: चमकीले रंग, उभरी हुई नाक, बड़े बादामी नेत्र।
✅ प्रसिद्ध चित्र: देवी दुर्गा, कृष्ण-राधा, दशावतार।
📌 स्थान: बसोहली (जम्मू-कश्मीर)

2️⃣ गढ़वाल शैली (Garhwal Style) - 18वीं शताब्दी

✅ विशेषता: कोमल आकृतियाँ, प्राकृतिक सौंदर्य, पहाड़ी परिदृश्य।
✅ प्रसिद्ध चित्र: गंगा अवतरण, शिव-पार्वती, नंदा देवी।
📌 स्थान: श्रीनगर (उत्तराखंड), टिहरी

3️⃣ कांगड़ा शैली (Kangra Style) - 18वीं शताब्दी

✅ विशेषता: नाजुक आकृतियाँ, हल्के रंग, रोमांटिक और आध्यात्मिक भाव।
✅ प्रसिद्ध चित्र: कृष्ण-राधा की लीलाएँ, भागवत पुराण प्रसंग।
📌 स्थान: कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)

4️⃣ चंबा शैली (Chamba Style) - 17वीं शताब्दी

✅ विशेषता: जटिल डिज़ाइन, सुनहरे रंग, मंदिरों और लोक जीवन के दृश्य।
✅ प्रसिद्ध चित्र: रामायण-महाभारत के प्रसंग, गद्दी जनजाति का जीवन।
📌 स्थान: चंबा (हिमाचल प्रदेश)

5️⃣ मंडी शैली (Mandi Style) - 17वीं-18वीं शताब्दी

✅ विशेषता: धार्मिक और तांत्रिक विषय, गहरे रंग, शिव-पार्वती और अन्य देवता।
📌 स्थान: मंडी (हिमाचल प्रदेश)


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🔷 प्रमुख कलाकार और संरक्षक राजा

✅ राजा किरत सिंह (बसोहली शैली के संरक्षक)
✅ राजा संसार चंद (कांगड़ा शैली को ऊँचाइयों तक पहुँचाया)
✅ मोलाराम (गढ़वाल शैली के प्रसिद्ध चित्रकार)


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📌 निष्कर्ष:

पहाड़ी चित्रकला भारत की एक अनमोल कला धरोहर है, जिसमें हिमालयी प्रकृति, भक्ति, प्रेम और सौंदर्य को अद्भुत रूप से उकेरा गया है। उत्तराखंड की गढ़वाल शैली इस परंपरा का हिस्सा है।

चित्रकला और मूर्तिकला में देवी-देवताओं के चित्रण का इतिहास

चित्रकला और मूर्तिकला में देवी-देवताओं के चित्रण का इतिहास बहुत पुराना है। अलग-अलग कालखंडों में विभिन्न कलाकारों और कला शैलियों ने इनका निर्माण किया।

प्राचीन काल (1st - 12th Century CE)

✅ अजन्ता-एलोरा (Ajanta-Ellora) चित्रकला

गुप्त काल (4th-6th Century CE) में बौद्ध, जैन और हिंदू देवी-देवताओं के चित्र बने।

इन चित्रों को नामहीन कलाकारों और भिक्षुओं ने बनाया।


✅ मथुरा और गांधार मूर्तिकला (Mathura & Gandhara Art)

बुद्ध, विष्णु, शिव और अन्य देवी-देवताओं की पहली मूर्तियाँ बनीं।

कलाकारों के नाम प्रायः अज्ञात रहे।



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मध्यकाल (13th - 18th Century CE)

✅ राजस्थानी और पहाड़ी चित्रशैली (Rajasthani & Pahari Painting)

राजा रवि वर्मा (Raja Ravi Varma) – 19वीं सदी

भारतीय देवी-देवताओं को यथार्थवादी (Realistic) शैली में चित्रित किया।

उनकी पेंटिंग्स आज भी देवी-देवताओं के सबसे लोकप्रिय चित्रों में शामिल हैं।



✅ मुगल और राजस्थानी चित्रकला (Mughal & Rajasthani Miniature Art)

मालवा, कांगड़ा और बसोहली शैली में कृष्ण, राधा, शिव-पार्वती के सुंदर चित्र बने।



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आधुनिक काल (19वीं सदी - वर्तमान)

✅ कल्याणीकृण कन्नन (Kalyanikrishnan Kannan) – डिजिटल युग में देवी-देवताओं के चित्र बनाने वाले प्रसिद्ध कलाकार।
✅ B. G. Sharma – पारंपरिक राजस्थानी और तंजावुर शैली के चित्रकार।
✅ Raja Ravi Varma Press – देवी-देवताओं के पोस्टर बनाने में अग्रणी।

आजकल डिजिटल कलाकार और AI-आधारित डिजाइनर भी देवी-देवताओं की तस्वीरें बना रहे हैं।


बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा की शुरुआत और विकास



बुद्ध के समय (563-483 BCE) तक बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा नहीं थी। बुद्ध ने ध्यान और आचरण पर जोर दिया, और उनकी उपासना प्रतीकों (Symbolism) के माध्यम से की जाती थी। लेकिन बाद में, बौद्ध धर्म में भी मूर्ति पूजा प्रचलित हो गई।


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1. प्रारंभिक बौद्ध काल (6वीं से 3वीं शताब्दी BCE) - अनिकॉनिक चरण (Non-Iconic Phase)

बुद्ध के जीवनकाल और उनके तुरंत बाद की अवधि में, उनकी मूर्तियाँ नहीं बनाई जाती थीं।
उनकी उपासना प्रतीकों (Symbols) के रूप में की जाती थी, जैसे:

बोधि वृक्ष (Bodhi Tree) – ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक।

धर्मचक्र (Dharmachakra) – धर्म के चक्र का घुमाव, पहला उपदेश।

पदचिह्न (Buddha’s Footprints) – उनकी उपस्थिति का प्रतीक।

स्तूप (Stupa) – बुद्ध के अवशेषों को समर्पित स्मारक।


इस काल में बुद्ध की प्रत्यक्ष मूर्ति बनाने की परंपरा नहीं थी।


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2. कुषाण काल (1st-3rd Century CE) – बुद्ध मूर्तियों की शुरुआत

कुषाण सम्राट कनिष्क (127-150 CE) के समय पहली बार बुद्ध की मूर्तियाँ बनने लगीं।
इस दौर में दो प्रमुख कला शैलियों में बुद्ध की मूर्तियाँ बनाई गईं:

✅ गांधार शैली (Gandhara Art)

ग्रीक प्रभाव वाली मूर्तियाँ (यूनानी-अभिनीत चेहरा, रोमन टोगा जैसी पोशाक)।

बुद्ध को अधिक यथार्थवादी रूप में दिखाया गया।


✅ मथुरा शैली (Mathura Art)

पूरी तरह भारतीय शैली, जिसमें बुद्ध को ध्यान मुद्रा में या अभय मुद्रा में दर्शाया गया।

चेहरे पर आध्यात्मिक शांति और हल्की मुस्कान।



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3. गुप्त काल (4th-6th Century CE) – बुद्ध मूर्ति पूजा का स्वर्ण युग

गुप्त काल में बुद्ध की मूर्ति पूजा पूरी तरह से स्थापित हो गई थी।
इस काल में:

अजन्ता-एलोरा गुफाओं में बुद्ध की विशालकाय मूर्तियाँ बनीं।

महायान बौद्ध धर्म (Mahayana Buddhism) में बुद्ध को ईश्वर समान माना जाने लगा, और उनकी भव्य मूर्तियाँ बनने लगीं।

इस दौर की प्रमुख मूर्तियाँ सारनाथ, बोधगया, नालंदा और अजंता में पाई जाती हैं।



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4. वज्रयान और तंत्रमार्ग (7वीं शताब्दी CE के बाद)

तिब्बती बौद्ध धर्म (Vajrayana) में बुद्ध, बोधिसत्व और तांत्रिक देवताओं की मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ा।

पद्मसंभव, अवलोकितेश्वर, तारा और मं‍जुश्री जैसी मूर्तियाँ पूजी जाने लगीं।



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निष्कर्ष

बुद्ध के समय मूर्ति पूजा नहीं थी, बल्कि प्रतीकों के माध्यम से उनकी उपासना होती थी।

1st-3rd Century CE (कुषाण काल) में पहली बार बुद्ध की मूर्तियाँ बनीं।

4th-6th Century CE (गुप्त काल) में बौद्ध मूर्ति पूजा व्यापक रूप से फैल गई।

महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म ने मूर्ति पूजा को पूरी तरह से अपना लिया।



भारत में मूर्ति पूजा (Idol Worship) की शुरुआत

भारत में मूर्ति पूजा (Idol Worship) की शुरुआत वैदिक काल से पहले यानी सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1300 BCE) में ही देखी जाती है।

1. सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1300 BCE)

खुदाई में मातृ देवी (Mother Goddess), पशुपति (शिव का प्राचीन रूप), लिंग एवं योनि जैसे प्रतीक मिले हैं।

ये संकेत देते हैं कि मूर्ति पूजा का प्रारंभ इस सभ्यता में हो चुका था।


2. वैदिक काल (1500-600 BCE)

प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों (ऋग्वेद) में यज्ञ और अग्नि पूजा का अधिक महत्व था, लेकिन देवताओं की मूर्ति स्थापना की परंपरा स्पष्ट नहीं थी।

बाद में उपनिषदों और पुराणों के काल में मूर्ति पूजा को व्यवस्थित रूप में अपनाया गया।


3. महाजनपद काल और बौद्ध-जैन परंपरा (600 BCE - 200 CE)

इस काल में मंदिर निर्माण और देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित होने लगीं।

बौद्ध और जैन धर्म ने भी मूर्ति पूजा को अपनाया, जिससे यह परंपरा और मजबूत हुई।

बौद्ध काल में गौतम बुद्ध की मूर्तियाँ पहली बार बनाई गईं (मथुरा और गांधार शैली)।


4. गुप्त काल और बाद का दौर (300 CE - वर्तमान)

गुप्त काल (4th-6th century CE) में मूर्ति पूजा का स्वर्ण युग आया।

हिंदू धर्म में विष्णु, शिव, देवी, गणेश, कार्तिकेय, कृष्ण आदि की भव्य मूर्तियाँ बनने लगीं।

इस काल में मंदिर निर्माण की परंपरा भी व्यापक रूप से फैली।


निष्कर्ष

भारत में मूर्ति पूजा की जड़ें 5000 साल से भी पुरानी हैं और इसका प्रारंभिक स्वरूप सिंधु घाटी सभ्यता में देखा जा सकता है। वैदिक काल में भले ही यज्ञ प्रमुख थे, लेकिन महाजनपद काल और गुप्त काल तक आते-आते मूर्ति पूजा हिंदू धर्म का अभिन्न अंग बन गई।


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