Wednesday, February 25, 2026

दिव्यांगजन: सहानुभूति नहीं, अधिकार आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता

 

📰 संपादकीय

दिव्यांगजन: सहानुभूति नहीं, अधिकार आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर वर्ग के साथ कैसा व्यवहार करता है। भारत में दिव्यांगजन लंबे समय तक दया और सहानुभूति की दृष्टि से देखे जाते रहे हैं, जबकि आज आवश्यकता है उन्हें अधिकार, सम्मान और समान अवसर की दृष्टि से देखने की। दिव्यांगता कोई कमी नहीं, बल्कि विविधता का एक रूप है। समस्या व्यक्ति में नहीं, बल्कि समाज की संरचनाओं और मानसिकता में है।

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों को मजबूत करने के लिए Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 लागू किया गया, जिसने शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक सुरक्षा में उनके अधिकारों को कानूनी मान्यता दी। इस कानून ने दिव्यांगता की श्रेणियों का विस्तार किया और आरक्षण को बढ़ाया। इसके साथ ही भारत ने United Nations के UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities को भी स्वीकार किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि दिव्यांगता एक मानवाधिकार का विषय है, न कि कल्याण मात्र का।

चुनौती केवल कानून नहीं, क्रियान्वयन है

हालांकि कानूनी ढांचा सशक्त है, परंतु ज़मीनी स्तर पर अनेक चुनौतियाँ मौजूद हैं। सरकारी भवनों में सुगम्यता की कमी, स्कूलों में विशेष शिक्षकों का अभाव, रोजगार के अवसरों में भेदभाव, और सामाजिक पूर्वाग्रह आज भी दिव्यांगजनों को पीछे धकेलते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ जागरूकता और संसाधनों की भारी कमी है।

शिक्षा और रोजगार: आत्मनिर्भरता की कुंजी

समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है। यदि विद्यालयों में रैंप, ब्रेल पुस्तकें, सांकेतिक भाषा के प्रशिक्षित शिक्षक और सहायक उपकरण उपलब्ध हों, तो लाखों बच्चे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं। रोजगार के क्षेत्र में आरक्षण के साथ-साथ कौशल विकास और डिजिटल प्रशिक्षण आवश्यक है।

सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक

समस्या केवल व्यवस्थागत नहीं, मानसिकता की भी है। दिव्यांगजन को “बेचारा” या “असमर्थ” मानने की सोच बदलनी होगी। अनेक दिव्यांग व्यक्तियों ने खेल, शिक्षा, प्रशासन और कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर यह सिद्ध किया है कि अवसर मिलने पर वे किसी से कम नहीं।

सामाजिक कार्य की भूमिका

सामाजिक कार्यकर्ता इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे जागरूकता अभियान चला सकते हैं, सरकारी योजनाओं तक पहुँच सुनिश्चित कर सकते हैं, परिवारों को परामर्श दे सकते हैं और समुदाय को संवेदनशील बना सकते हैं। अधिकार आधारित दृष्टिकोण को मजबूत करने में सामाजिक कार्य एक सशक्त माध्यम है।

निष्कर्ष

दिव्यांगजन समाज पर बोझ नहीं, बल्कि उसकी शक्ति हैं। आवश्यकता है कि हम सहानुभूति से आगे बढ़कर समानता और अधिकार की बात करें। जब तक सार्वजनिक स्थान, शिक्षा प्रणाली, रोजगार बाजार और सामाजिक व्यवहार पूरी तरह समावेशी नहीं होंगे, तब तक वास्तविक विकास अधूरा रहेगा।

एक समावेशी भारत का निर्माण तभी संभव है जब हर नागरिक — चाहे वह किसी भी शारीरिक या मानसिक स्थिति में हो — गरिमा और अवसर के साथ जीवन जी सके।



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