Thursday, February 26, 2026

कोटद्वार: गढ़वाल का प्रवेशद्वार और इतिहास की जीवंत धरोहर

कोटद्वार: गढ़वाल का प्रवेशद्वार और इतिहास की जीवंत धरोहर

को गढ़वाल का “द्वार” कहा जाता है। शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी में बसा यह नगर सदियों से व्यापार, सैन्य गतिविधियों, आध्यात्मिक यात्राओं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख केंद्र रहा है। नाम के अनुसार—‘कोट’ (किला) और ‘द्वार’ (प्रवेश)—यह स्थान कभी गढ़वाल राज्य में प्रवेश का महत्वपूर्ण मार्ग था।


प्राचीन और मध्यकालीन पृष्ठभूमि

  • प्राचीन काल में यह क्षेत्र खोह घाटी के नाम से जाना जाता था।
  • कत्यूरी और बाद में पंवार (परमार) शासकों के समय यह इलाका गढ़वाल राज्य के अधीन रहा।
  • हिमालयी व्यापार मार्गों से जुड़ा होने के कारण यहाँ मैदान और पहाड़ के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था।

गोरखा और ब्रिटिश काल

  • 1803 में गोरखाओं ने गढ़वाल पर कब्जा किया और कोटद्वार भी उनके अधीन आ गया।
  • 1815 में अंग्रेजों ने गोरखाओं को हराकर गढ़वाल का बड़ा भाग अपने नियंत्रण में लिया।

ब्रिटिश शासन के दौरान कोटद्वार का महत्व तेजी से बढ़ा—

  • 19वीं सदी के उत्तरार्ध में यहाँ रेलवे लाइन बिछाई गई, जिससे यह पहाड़ों के लिए मुख्य रेल संपर्क बना।
  • 1890 के आसपास कोटद्वार रेलवे स्टेशन अस्तित्व में आया और यह गढ़वाल का प्रमुख टर्मिनल बना।
  • लकड़ी, अनाज और अन्य वन उत्पादों का बड़ा व्यापार यहाँ से होता था।

स्वतंत्रता संग्राम और वीरता की भूमि

कोटद्वार स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहा। यह भूमि वीर सैनिकों और राष्ट्रभक्तों की रही है।

  • भारत के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का संबंध इसी क्षेत्र से रहा।
  • गढ़वाल राइफल्स की सैन्य परंपरा ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

  • कोटद्वार के समीप स्थित आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
  • यहाँ से कुछ दूरी पर विश्वप्रसिद्ध स्थित है, जो ब्रिटिश काल में सैन्य छावनी के रूप में विकसित हुआ।
  • यह क्षेत्र के निकट होने के कारण वन्यजीव और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

आधुनिक विकास

  • स्वतंत्रता के बाद कोटद्वार व्यापारिक नगर के रूप में विकसित हुआ।
  • 2017 में इसे नगर निगम का दर्जा मिला।
  • शिक्षा, पर्यटन और परिवहन के क्षेत्र में निरंतर विस्तार हो रहा है।

निष्कर्ष

कोटद्वार केवल एक शहर नहीं, बल्कि गढ़वाल की आत्मा का प्रवेशद्वार है। यहाँ इतिहास की गूंज, सैनिक परंपरा का गौरव, आस्था की शक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम दिखाई देता है।

गढ़वाल में प्रवेश करने वाला हर यात्री कोटद्वार की धरती पर कदम रखते ही उस ऐतिहासिक धारा का हिस्सा बन जाता है, जिसने सदियों से पहाड़ और मैदान को जोड़े रखा है।

No comments:

Post a Comment

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

लकड़ी पड़ाव: व्यापारिक विरासत और वर्तमान कानूनी प्रश्न

लकड़ी पड़ाव: व्यापारिक विरासत और वर्तमान कानूनी प्रश्न कोटद्वार का लकड़ी पड़ाव क्षेत्र केवल एक बाजार नहीं, बल्कि दशकों तक सरकार, व्यापारियों...