Wednesday, February 25, 2026

सामाजिक कार्य : न्यायपूर्ण समाज की मौन आधारशिला

 

📰 संपादकीय

सामाजिक कार्य : न्यायपूर्ण समाज की मौन आधारशिला

तेजी से बदलते दौर में जब विकास को केवल आर्थिक आंकड़ों, ऊँची इमारतों और डिजिटल प्रगति से मापा जा रहा है, तब एक ऐसा क्षेत्र है जो चुपचाप समाज की जड़ों को मजबूत कर रहा है — सामाजिक कार्य। यह केवल सहायता प्रदान करने का कार्य नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और मानवीय गरिमा की रक्षा का संगठित प्रयास है।

सामाजिक कार्य उस खाई को पाटता है जो नीति निर्माण और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद होती है। राजधानी में बनी योजनाएँ तभी सार्थक होती हैं जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। इस प्रक्रिया में सामाजिक कार्यकर्ता ही वह कड़ी होता है जो व्यवस्था और वंचित वर्गों के बीच सेतु का काम करता है।

बढ़ती चुनौतियाँ और सामाजिक कार्य की आवश्यकता

आज समाज अनेक जटिल समस्याओं से जूझ रहा है—गरीबी, बेरोजगारी, घरेलू हिंसा, बाल श्रम, नशाखोरी, मानसिक स्वास्थ्य संकट और लैंगिक असमानता। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सामाजिक असंतुलन स्पष्ट दिखाई देता है। कोविड-19 महामारी ने यह भी सिद्ध कर दिया कि संकट की घड़ी में सबसे पहले जो वर्ग आगे आता है, वह सामाजिक कार्यकर्ताओं का ही होता है। उन्होंने राहत सामग्री पहुँचाई, परामर्श सेवाएँ दीं और सामुदायिक सहयोग को संगठित किया।

फिर भी विडंबना यह है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपेक्षित मान्यता और संसाधन नहीं मिल पाते। सीमित वेतन, भावनात्मक दबाव और प्रशासनिक जटिलताओं के बीच वे अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं।

सहायता से आगे—सशक्तिकरण की ओर

आधुनिक सामाजिक कार्य केवल दान या राहत तक सीमित नहीं है। इसका लक्ष्य है—सशक्तिकरण। किसी पीड़ित महिला को आश्रय देना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है उसे कानूनी जानकारी, परामर्श और आर्थिक आत्मनिर्भरता उपलब्ध कराना। बाल संरक्षण का अर्थ केवल बचाव नहीं, बल्कि शिक्षा, मनो-सामाजिक सहयोग और दीर्घकालिक पुनर्वास भी है।

नैतिकता और उत्तरदायित्व

सामाजिक कार्य का मूल आधार उसकी नैतिकता है। गोपनीयता, निष्पक्षता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और जवाबदेही इसके प्रमुख स्तंभ हैं। भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से परे, सामाजिक कार्य वैज्ञानिक अध्ययन, शोध और कानूनी ढाँचे पर आधारित हस्तक्षेप को महत्व देता है।

आगे की दिशा

यदि सामाजिक न्याय संविधान की भावना है, तो सामाजिक कार्य उसका व्यावहारिक स्वरूप है। सरकारों को चाहिए कि वे सामाजिक कार्य के क्षेत्र में प्रशिक्षण, उचित वेतन और संस्थागत समर्थन को प्राथमिकता दें। विश्वविद्यालयों में व्यावहारिक प्रशिक्षण को मजबूत किया जाए और समाज को यह समझना होगा कि टिकाऊ विकास केवल आर्थिक प्रगति से संभव नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा है।

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। सामाजिक कार्य हमें यह स्मरण कराता है कि विकास तभी सार्थक है, जब उसमें संवेदना और समानता का समावेश हो।



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