Thursday, February 26, 2026

धार्मिक राष्ट्रवाद और उसके प्रभाव: विमर्श, विवेक और वास्तविकता

धार्मिक राष्ट्रवाद और उसके प्रभाव: विमर्श, विवेक और वास्तविकता

आज की वैश्विक राजनीति में धार्मिक पहचान आधारित राष्ट्रवाद एक शक्तिशाली विमर्श के रूप में उभरा है। पश्चिम एशिया में Zionism ने यहूदियों के ऐतिहासिक मातृभूमि के विचार को राजनीतिक रूप दिया और 1948 में Israel के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। भारत में इसी प्रकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को अक्सर Hindutva के संदर्भ में देखा जाता है।

परंतु प्रश्न यह है कि जब राष्ट्र की आत्मा को धर्म या सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा जाता है, तो उसके दीर्घकालिक प्रभाव क्या होते हैं?

पहचान की राजनीति: शक्ति या चुनौती?

धार्मिक राष्ट्रवाद समर्थकों के लिए आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम है। सदियों के ऐतिहासिक संघर्ष, उपनिवेशवाद और विभाजन के अनुभवों के बाद अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना कई समाजों को स्वाभिमान का आधार देता है।

किन्तु दूसरी ओर, बहुधर्मी और बहुजातीय समाजों में यही आग्रह सामाजिक ध्रुवीकरण का कारण भी बन सकता है। यदि राष्ट्र की परिभाषा किसी एक पहचान से अत्यधिक जुड़ जाए, तो अन्य समुदायों में उपेक्षा या असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है। लोकतंत्र की मजबूती विविधता के सम्मान में निहित है, न कि एकरूपता के आग्रह में।

लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी

धर्म आधारित राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा परीक्षण संविधान और संस्थाओं की स्वतंत्रता है। क्या राज्य सभी नागरिकों को समान दृष्टि से देख पा रहा है? क्या असहमति को स्थान मिल रहा है? यदि राष्ट्रवाद आलोचना को “राष्ट्रविरोध” में बदल देता है, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

इज़राइल का उदाहरण बताता है कि धार्मिक-राष्ट्रीय पहचान सुरक्षा, विदेश नीति और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को गहराई से प्रभावित करती है। भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए यह संतुलन और भी संवेदनशील है। वैश्विक मंच पर छवि, निवेश, कूटनीति—ये सभी कारक आंतरिक सामाजिक सामंजस्य से जुड़े होते हैं।

संतुलन ही समाधान

यह मानना गलत होगा कि धार्मिक या सांस्कृतिक चेतना अपने आप में नकारात्मक है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह समावेशिता की जगह वर्चस्व का रूप ले लेती है। भारत की ऐतिहासिक शक्ति उसकी विविधता और सहअस्तित्व की परंपरा में रही है।

आज आवश्यकता है कि सांस्कृतिक स्वाभिमान और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। राष्ट्र का निर्माण किसी एक पहचान से नहीं, बल्कि साझा नागरिकता और समान अधिकारों से होता है।

धार्मिक राष्ट्रवाद का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह बहुलता को अपनाता है या सीमित करता है। विवेकपूर्ण राजनीति वही है जो पहचान की ऊर्जा को सामाजिक समरसता में बदल सके—न कि विभाजन में।

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