📰 1️⃣ दिव्यांगजन के लिए सरकारी योजनाओं का विश्लेषण
भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों और कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएँ संचालित हैं। कानूनी आधार के रूप में Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 ने दिव्यांगता को अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से परिभाषित किया है। इस कानून ने शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में आरक्षण व सुविधाओं को सुनिश्चित किया।
प्रमुख योजनाएँ
1. ADIP योजना
Department of Empowerment of Persons with Disabilities द्वारा संचालित Assistance to Disabled Persons for Purchase/Fitting of Aids and Appliances (ADIP) योजना के अंतर्गत कृत्रिम अंग, व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र आदि उपलब्ध कराए जाते हैं।
विश्लेषण:
योजना उपयोगी है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में वितरण और जागरूकता की कमी स्पष्ट दिखाई देती है।
2. दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना (DDRS)
यह योजना गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से पुनर्वास सेवाओं को समर्थन देती है।
विश्लेषण:
एनजीओ की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
3. सुगम्य भारत अभियान
Accessible India Campaign (Sugamya Bharat Abhiyan) का उद्देश्य सार्वजनिक भवनों, परिवहन और वेबसाइटों को दिव्यांग-अनुकूल बनाना है।
विश्लेषण:
शहरी क्षेत्रों में कुछ प्रगति हुई है, परंतु छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में सुगमता अभी भी अधूरी है।
4. शिक्षा एवं रोजगार आरक्षण
सरकारी नौकरियों में 4% आरक्षण का प्रावधान है। समावेशी शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है।
चुनौती:
व्यवहारिक स्तर पर भर्ती प्रक्रिया और कार्यस्थल अनुकूलन में कमी।
सरकार की नीतियाँ सैद्धांतिक रूप से सशक्त हैं, परंतु क्रियान्वयन की गति धीमी है। आवश्यकता है:
प्रभावी निगरानी
स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान
डिजिटल पहुंच में सुधार
निजी क्षेत्र की भागीदारी
उत्तराखंड में दिव्यांगजन: चुनौतियाँ और संभावनाएँ
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में दिव्यांगजनों की स्थिति विशेष ध्यान की मांग करती है। भौगोलिक दुर्गमता, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएँ और रोजगार के कम अवसर उनकी चुनौतियों को और बढ़ा देते हैं।
राज्य सरकार द्वारा विभिन्न पेंशन योजनाएँ, छात्रवृत्ति और उपकरण वितरण कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। परंतु पर्वतीय क्षेत्रों में परिवहन और सुगमता की समस्या गंभीर है।
मुख्य चुनौतियाँ
पहाड़ी क्षेत्रों में अस्पतालों की दूरी
विशेष शिक्षकों की कमी
कौशल विकास केंद्रों का अभाव
सरकारी भवनों में रैंप और लिफ्ट की कमी
सामाजिक जागरूकता का अभाव
संभावनाएँ
धार्मिक और पर्यटन क्षेत्र में दिव्यांग-अनुकूल अवसंरचना विकसित की जा सकती है।
कौशल विकास कार्यक्रमों को स्थानीय हस्तशिल्प और डिजिटल सेवाओं से जोड़ा जा सकता है।
पंचायत स्तर पर दिव्यांग रजिस्ट्रेशन और सहायता शिविर आयोजित किए जा सकते हैं।
सामाजिक कार्य की भूमिका
उत्तराखंड में सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे:
सरकारी योजनाओं तक पहुँच सुनिश्चित कर सकते हैं
परिवारों को परामर्श दे सकते हैं
सामुदायिक जागरूकता बढ़ा सकते हैं
अधिकार आधारित दृष्टिकोण को मजबूत कर सकते हैं
समापन
दिव्यांगजन किसी राज्य की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति हैं। यदि उत्तराखंड वास्तव में समावेशी विकास की ओर बढ़ना चाहता है, तो पहाड़ों की भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए विशेष नीति निर्माण और सशक्त क्रियान्वयन आवश्यक है।
No comments:
Post a Comment