Friday, February 27, 2026

🌿 उत्तराखंड मॉडल ऑफ इको-गवर्नेंस

🌿 उत्तराखंड मॉडल ऑफ इको-गवर्नेंस

(सतत विकास और जनभागीदारी आधारित शासन का प्रस्तावित ढांचा)

उत्तराखंड हिमालयी पारिस्थितिकी का संवेदनशील क्षेत्र है। यहाँ विकास का मॉडल पारंपरिक औद्योगिक ढांचे पर नहीं, बल्कि प्रकृति-संतुलित, समुदाय-आधारित और विकेन्द्रीकृत शासन पर आधारित होना चाहिए।

यह “इको-गवर्नेंस मॉडल” पाँच स्तंभों पर आधारित हो सकता है:


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1️⃣ संवैधानिक और कानूनी आधार

Public Trust Doctrine – प्राकृतिक संसाधन जनता की सामूहिक धरोहर।

अनुच्छेद 21 – स्वच्छ पर्यावरण जीवन का अधिकार।

ग्राम सभा को निर्णय प्रक्रिया में वैधानिक भूमिका।

वन अधिकार कानून 2006 का प्रभावी क्रियान्वयन।

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) में वास्तविक जनसुनवाई।


🔎 सुझाव:
राज्य स्तर पर “हिमालयी पारिस्थितिकी संरक्षण अधिनियम” बनाया जाए।


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2️⃣ जल नीति – नदी केंद्रित विकास

प्रमुख सिद्धांत:

नदियाँ केवल जलस्रोत नहीं, जीवित पारिस्थितिक तंत्र हैं।

बड़े बांधों के बजाय लघु जलविद्युत परियोजनाओं को प्राथमिकता।

नदी तटीय क्षेत्रों में निर्माण पर सख्त नियंत्रण।


गंगा नदी और यमुना नदी के लिए:

अविरलता और निर्मलता नीति

अपशिष्ट प्रबंधन की सख्त निगरानी

स्थानीय निगरानी समितियाँ



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3️⃣ सामुदायिक वन प्रबंधन

राजाजी टाइगर रिज़र्व जैसे संरक्षित क्षेत्रों में संतुलन आवश्यक है।

मॉडल:

वन पंचायतों को पुनः सशक्त बनाना

सामुदायिक वन अधिकार लागू करना

वन-आधारित आजीविका (जड़ी-बूटी, इको-टूरिज्म)


प्रेरणा: चिपको आंदोलन की विरासत, जिसे सुंदरलाल बहुगुणा जैसे पर्यावरणविदों ने दिशा दी।


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4️⃣ पहाड़ आधारित अर्थव्यवस्था

(A) ग्रीन इकोनॉमी

ऑर्गेनिक खेती

पर्वतीय उत्पादों का ब्रांडिंग

स्थानीय हस्तशिल्प को वैश्विक बाजार


(B) नियंत्रित पर्यटन

कैरीइंग कैपेसिटी के आधार पर पर्यटन

होम-स्टे मॉडल

कचरा प्रबंधन अनिवार्य



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5️⃣ पारदर्शिता और जनभागीदारी

हर विकास परियोजना की सार्वजनिक डैशबोर्ड पर जानकारी

RTI और सोशल ऑडिट

जिला स्तर पर “इको काउंसिल”

युवाओं और महिलाओं की भागीदारी



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📊 संभावित लाभ

✔ पर्यावरण संरक्षण
✔ स्थानीय रोजगार
✔ पलायन में कमी
✔ आपदा जोखिम में कमी
✔ दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता


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⚖ संभावित चुनौतियाँ

❗ राजनीतिक इच्छाशक्ति
❗ कॉरपोरेट दबाव
❗ अवैध खनन और अतिक्रमण
❗ प्रशासनिक समन्वय की कमी


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📌 निष्कर्ष

उत्तराखंड का भविष्य पारंपरिक “मैदानी विकास मॉडल” में नहीं, बल्कि “हिमालयी पारिस्थितिकी आधारित शासन” में है।

सरकार को मालिक नहीं, संरक्षक (Trustee) की भूमिका में रहकर
जनता को साझेदार बनाना होगा — तभी सच्चा “इको-गवर्नेंस मॉडल” स्थापित होगा।



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