Saturday, February 28, 2026

मां की सेहत, राष्ट्र की शक्ति: सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ निर्णायक कदम

 

✍️ संपादकीय

मां की सेहत, राष्ट्र की शक्ति: सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ निर्णायक कदम

भारत में गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर के खिलाफ शुरू हुई निःशुल्क, स्वैच्छिक एकल-खुराक एचपीवी टीकाकरण पहल केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर सहमति के बाद यह टीका उपलब्ध कराना उस सोच का विस्तार है, जिसमें “मां स्वस्थ तो परिवार सशक्त” को नीति का आधार बनाया गया है।

विश्व स्तर पर भी इस दिशा में स्पष्ट लक्ष्य तय किए गए हैं। World Health Organization ने सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन का वैश्विक अभियान चलाया है, जिसमें टीकाकरण, स्क्रीनिंग और उपचार की त्रिस्तरीय रणनीति अपनाई गई है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह चुनौती बड़ी है, क्योंकि यहां जागरूकता, संसाधन और सामाजिक संकोच—तीनों बाधाएं मौजूद हैं।

एकल खुराक: व्यवहारिक और प्रभावी समाधान

एचपीवी वैक्सीन को एकल डोज के रूप में उपलब्ध कराना नीतिगत दृष्टि से व्यावहारिक कदम है। इससे लॉजिस्टिक्स सरल होंगे, ड्रॉप-आउट दर कम होगी और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच आसान बनेगी। साथ ही, स्वदेशी वैक्सीन निर्माण में Serum Institute of India की भागीदारी ने लागत घटाने और आत्मनिर्भरता को बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया है।

चुनौती केवल टीका नहीं, मानसिकता भी

सर्वाइकल कैंसर एक ऐसा विषय है, जिस पर समाज में खुलकर चर्चा कम होती है। यौन स्वास्थ्य से जुड़े पूर्वाग्रह और झिझक के कारण कई परिवार टीकाकरण या स्क्रीनिंग से कतराते हैं। इसलिए यह अभियान तभी सफल होगा जब इसे जन-जागरूकता आंदोलन का रूप दिया जाए। आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ता, स्कूल और स्थानीय निकाय—सभी की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

योजनाओं का समन्वय ही सफलता की कुंजी

महिलाओं के स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर पहले से कई योजनाएं संचालित हैं—

  • प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना

  • जननी सुरक्षा योजना

  • आयुष्मान भारत योजना

यदि एचपीवी टीकाकरण को इन कार्यक्रमों के साथ समन्वित किया जाए, तो इसका प्रभाव बहुगुणित हो सकता है।

निष्कर्ष: अधिकार आधारित स्वास्थ्य दृष्टि

सर्वाइकल कैंसर रोके जा सकने वाला रोग है। फिर भी यदि महिलाएं केवल जागरूकता और संसाधन के अभाव में अपनी जान गंवाती हैं, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता है। निःशुल्क एचपीवी टीकाकरण पहल इस विफलता को सुधारने का अवसर है।

यह समय है कि स्वास्थ्य को “खर्च” नहीं, बल्कि “निवेश” समझा जाए। एक स्वस्थ मां केवल परिवार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की संरक्षक होती है। यदि यह अभियान पारदर्शिता, जागरूकता और सतत निगरानी के साथ आगे बढ़ा, तो भारत सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज कर सकता है।

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