स्वभाव की छाया
(कविता)
स्वर्ण जड़ित वचन बोल ले कोई,
मुख पर ओढ़ ले चादर नई।
पर भीतर की जो गंध बसी है,
क्या वो छिप सकती है कहीं?
बाहर से तो बदल गया लगता,
भीतर वैसा ही धूर्त है आज।
रंग नया पहन लिया उसने,
पर मन में वही पुरानी राज।
फूलों की बात करे जो ठग,
पर कांटे बोए हर बगिया में,
क्या वो सचमुच बदल गया है,
या फिर छुपा है छल की छाया में?
धोखे की ये चाल पुरानी,
चेहरे पर मासूमियत की लकीर।
पर कहते हैं जो संत-पुरानी,
स्वभाव न बदले, चाहे लाख तदबीर।
नदी की धारा उलटी कब बही?
चाँदनी ने कब अंधकार को पिया?
जो जैसा है, वैसा ही रहेगा,
चाहे कितनी बार रंग बदल लिया।
@दिनेश दिनकर
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